सीपी कमेंट्री: नेतेन्याहू से मिली इजराइल को निजात, लेकिन नई सरकार पर भी संशय बरकरार

बार-बार के चुनाव, हर चुनाव के बाद नये सिरे से नई सरकार के गठन और नवीन से नवीनतम सरकार तक के भी शीघ्र पतन के देश का नाम इजराइल है जिसकी दुनिया में अजूबा ‘चक्रवार‘ (रोटेशनल) हुकूमत के मॉडल की नकल हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एक बार उत्तर प्रदेश में की थी।

भारत में 1996 में केंद्र में भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेई की पहली सरकार के 13 दिन में ही गिर जाने के बाद गठबंधन सरकारों के शुरु नये दौर में बार-बार हुए चुनाव के दरम्यान ही उत्तर प्रदेश (यूपी) में 1996 के विधान सभा चुनाव का नतीजा ये निकला कि अवाम ने किसी को सरकार बनाने लायक ही नहीं माना। ऐसे में कोई भी नई सरकार बनाना टेढ़ी खीर पकाने से कम नहीं थी।

भाजपा के सियासी चणक्यागिरी करने वालों ने तब ‘इंडिया दैट इज भारत‘ की आबादी के हिसाब के सबसे बड़े इस राज्य में नई सरकार बनाने के लिये दूर की कौड़ी बिठा इजरायल की ही रोटेशनल सरकार का मॉडल ढूंढ निकाल आजमाया भी। उसी मॉडल पर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री एवं बहुजन समाज पार्टी (बसपा) नेता मायावती और पूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा नेता कल्याण सिंह की बारी-बारी से छह-छह माह की अजूबा सरकार बनाने का समझौता हुआ था। ये दीगर बात है कि पहली बारी में मायावती सरकार तो बन गई। पर उन्होंने कल्याण सिंह की बारी कम से कम उस मॉडल के तहत नहीं आने दी। इजराइल का वह मॉडल उसके भूभाग से बाहर पहली बार भारत में आजमाया गया।

पर राजनीतिक प्रयोग का वह मॉडल छह माह पूरा होते-होते टूट गया। यूपी में ही भाजपा और बसपा ने साथ मिल एक नहीं बल्कि चार बार नई सरकार बनाई। पर उसका मॉडल इजराइल का नहीं था। उन सरकारों में मुख्यमंत्री का पद हर बार बसपा के पास ही रहा। ये बात आम लोग भूल सकते हैं पर भाजपा को भुलाये नहीं भूलती। उनको ये बात हमेशा इसलिये भी टीसती रहेगी कि भाजपा ही नहीं उसकी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयमसेवक संघ (आरएसएस) के लिये भी ‘सैन्य राष्ट्वाद‘ का पसंदीदा मॉडल इजराइल ही है।

यूपी ही नहीं भारत के और किसी भी राज्य में भी अब तक तो ये माडल नहीं आजमाया जा सका है। यूपी में अब आगे किसकी सरकार कैसे बनेगी, ये राम भरोसे है जिसकी कहानी सीपी कमेंट्री के इस अंक में सम्भव नहीं है। क्योंकि ये अंक यूपी पर नहीं बल्कि इजराइल पर केंद्रित है। फिर भी थोड़ा जिक्र मुनासिब था क्योंकि कुछ बारीक बातें हमारे अधिकतर सियासी टीकाकार नहीं समझते हैं सरकार क्या शय है और कहाँ-कहाँ उसके कितने मॉडल हैं।

बहरहाल, इजराइल की चर्चा करें तो वहां प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का शासन बरकरार नहीं रहने देने में कामयाब रही सियासी पार्टियां नेफ्टाली बेनेट की अगुवाई में नई गठबंधन सरकार बनाने की तैयारी लगभग पूरी कर ली है। बेंजामिन नेतन्याहू 12 बरस प्रधानमंत्री रहे। नेतन्याहू के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले चल रहे हैं। उन्हें सजा भी हो सकती है। इसलिए उनके साथ हो लिये।

लेकिन इस नई गठबन्धन सरकार के भी ज्यादा समय तक टिकने पर गंभीर संदेह नजर आते हैं। भले ही वहां कोई और रोटेशनल सरकार बन जाये इजराइल के सैन्य राष्ट्वाद और रोटेशनल सरकार मॉडल की अंतर्निहित समस्यायें हैं।

इजराइल में पिछले दो बरस में ही चार बार चुनाव हो चुके हैं। उतनी ही चार बार नई सरकार बनी और गिरी भी है। इस बार भी नई सरकार बनाने के लिए साथ इकट्ठा हुए आठ राजनीतिक दलों का सर्वोपरि उद्देश्य नेतन्याहू को अपदस्थ करना ही था। इन दलों का अब वैकल्पिक सरकार बनाने और उसे सुचारू रूप से चलाने की प्रक्रिया में दिलचस्पी उतनी नहीं है जितनी इस बात में हैं किसी तरह नए चुनाव से बचा जाये।

ये बात किसी से छुपी नहीं है कि करीब 70 बरस पहले अमेरिका ने अरब क्षेत्र में कच्चे तेल के अपार भंडार पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए ही संयुक्त राष्ट्र की आड़ लेकर इजराइल नाम से नए देश का गठन करवाया था।

अभी भी इजराइल का अस्तित्व कमोबेश अमेरिका पर ही निर्भर है। अमेरिका की जटिल पूंजीवादी व्यवस्था में हुकूमत चाहे रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रम्प की रही हो या फिर उनकी जगह हाल में डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्पति चुने गये जो बाइडेन हों।

फिलिस्तीन समेत अनेक कई मुद्दों पर सबकी नीतियां एक जैसी हैं। फिलिस्तीन के गाजा पट्टी और अन्य इलाकों पर इजराइली सेना की उस हवाई  बमबारी को रोकने के लिये बहुत दिनों तक कोई कदम नहीं उठाया जिसमें सैकड़ों मर्द और औरतें ही नहीं बल्कि मासूम बच्चे भी मारे गये। विश्व जनमत के भारी दबाव के कारण ही अमेरिका को अंतत: पहल कर इजराइली सैन्य हमलों को रुकवाने और दोनों पक्षों की सहमति से युद्ध विराम को लागू करवाना पड़ा।  

इजराइल में नई सरकार बनाने में लगे गठबंधन में अलग मिजाज की 8 पार्टियां हैं जिनके लिये सरकार बनाने के बाद उसे चलाना वास्तव में टेढ़ी खीर होगी। बेनेट 26 अगस्त, 2023 तक ही प्रधानमंत्री रह सकेंगे। इसके बाद ‘येश एटिड पार्टी‘ के प्रमुख येर लेपिड के प्रधानमंत्री बनने की बारी होगी।

नेफ्टाली बेनेट कट्टरपंथी ‘यामिना पार्टी‘ के नेता हैं, 8 दलों के गठबंधन में येश एटिड पार्टी और अरब-मुस्लिमों की ‘राम पार्टी“ (यही नाम है इजराइली की भाषा हिब्रु में) भी है जो इजराइल में रह रहे अरब मूल के मुस्लिमों की कई पार्टियों में से सिर्फ एक है। राम पार्टी पहली बार किसी सरकार का हिस्सा होगी। अरब मुस्लिम समर्थक अन्य पार्टियां नई सरकार बनाने के लिये तैयार गठबंधन में शामिल नहीं हैं।

इजराइल की संसद (नीसेट) में कुल 120 सीटें हैं। बहुमत के लिए 61 सांसद चाहिए। नेतन्याहू की लिकुड पार्टी के 30 सांसद हैं। उनके समर्थक सांसद की गिनती 52 बताई जाती है जो बहुमत से 9 सीटें कम हैं। बेनेट जी की यामिना पार्टी के सिर्फ 7 और राम पार्टी के 5 सांसद हैं। समर्थकों की गिनती अभी 56 बताई जाती है जो स्पष्ट बहुमत से पांच कम ही है।

बहरहाल, इजराइल के ज्यादातर लोग कह सकते हैं। ‘इब्तदाये इश्क (नई रोटेशन सरकार है) रोता है क्या, आगे आगे देखिये होता है क्या।

(चंद्र प्रकाश झा वरिष्ठ पत्रकार हैं और यूएनआई एजेंसी में दो दशकों से ज्यादा समय तक वरिष्ठ पदों पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं।)

This post was last modified on June 4, 2021 7:11 pm

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