सुप्रीम कोर्ट ने न्यूज क्लिक के संपादक प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ्तारी को बताया अवैध: दिया रिहाई का आदेश

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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार 15 मई को न्यूज क्लिक के संस्थापक और संपादक प्रबीर पुरकायस्थ की रिहाई का आदेश दिया है। अदालत ने आतंकवाद विरोधी कानून के तहत उनकी गिरफ्तारी को अवैध बताया है। जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस संदीप मेहता ने आदेश देते हुए कहा कि दिल्ली पुलिस ने प्रबीर पुरकायस्थ के रिमांड की कॉपी कोर्ट को मुहैया नहीं कराई। ऐसे में इस गिरफ्तारी का कोई मतलब नहीं है। गिरफ्तारी का कोई आधार ही नहीं बताया गया है। अदालत ने पंकज बंसल मामले का हवाला भी दिया है। अदालत ने मार्च में पंकज बंसल मामले में कहा था कि आरोपी को उसकी गिरफ्तारी का आधार लिखित रूप में बताया जाना चाहिए। उसी तरह प्रबीर पुरकायस्थ हिरासत से रिहाई के हकदार हैं। उनका रिमांड आदेश अवैध है।

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (15 मई) को न्यूज़ क्लिक  के संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ की दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तारी और गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम 1967 (यूएपीए एक्ट) के तहत मामले में उनकी रिमांड को अवैध घोषित किया।अदालत ने कहा कि 4 अक्टूबर, 2023 को रिमांड आदेश पारित करने से पहले अपीलकर्ता या उसके वकील को रिमांड आवेदन की कॉपी नहीं दी गई थी। इसलिए अदालत ने माना कि गिरफ्तारी और रिमांड निरर्थक हैं।

अदालत ने कहा कि उसके मन में इस निष्कर्ष पर पहुंचने में कोई झिझक नहीं है कि लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार के संचार के कथित अभ्यास में रिमांड आवेदन की कॉपी आरोपी-अपीलकर्ता या उसके वकील को 4 अक्टूबर, 2023 के रिमांड आदेश के पारित होने से पहले प्रदान नहीं की गई, जो अपीलकर्ता की गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड को रद्द कर देता है। परिणामस्वरूप, अपीलकर्ता पंकज बंसल मामले में इसके द्वारा दिए गए निर्णय के आधार पर हिरासत से रिहाई के निर्देश का हकदार है।

गिरफ्तारी और रिमांड को कानून की नजर में अवैध घोषित कर अलग कर दिया गया। इसलिए अदालत ने प्रबीर पुरकायस्थ को रिहा करने का आदेश दिया। हालांकि, अदालत ने आदेश दिया कि रिहाई ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के अनुसार जमानत और बांड प्रस्तुत करने के अधीन होगी, क्योंकि आरोप पत्र दायर किया गया है।

जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने 30 अप्रैल को बहस पूरी करने के बाद फैसला सुनाया। गौरतलब है कि पुरकायस्थ पिछले साल 2 अक्टूबर से गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए एक्ट) के तहत हिरासत में हैं।

सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल पुरकायस्थ की ओर से पेश हुए और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए।

पुरकायस्थ ने अपनी गिरफ्तारी की वैधता को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया और दलील दी कि पंकज बंसल मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार गिरफ्तारी के आधार उन्हें लिखित रूप में नहीं दिए गए थे। दिल्ली पुलिस ने तर्क दिया कि गिरफ्तारी के आधार रिमांड आवेदन में शामिल थे।

सुनवाई के दौरान, अदालत ने कहा कि रिमांड आदेश 4 अक्टूबर, 2023 को सुबह 6 बजे पारित किया गया। हालांकि, रिमांड आवेदन की प्रति पुरकायस्थ के वकील को बहुत बाद में दी गई। जिस दिन फैसला सुरक्षित रखा गया (30 अप्रैल), दिल्ली पुलिस ने पुरकायस्थ को उनके वकील को सूचित किए बिना सुबह 6 बजे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने में “जल्दबाजी” की। अदालत ने इस तथ्य पर भी आश्चर्य व्यक्त किया कि पुरकायस्थ के वकील को रिमांड आवेदन दिए जाने से पहले ही रिमांड आदेश पारित कर दिया गया।

दिल्ली पुलिस का तर्क था कि रिमांड आदेश में दर्ज समय (सुबह 6 बजे) गलत था और इसे आरोपी के वकील की सेवा के बाद पारित किया गया। हालांकि, इस तर्क ने न्यायालय को प्रभावित नहीं किया। उसने कहा कि यह केवल न्यायिक आदेश में दर्ज समय के अनुसार ही चलेगा। दिल्ली पुलिस ने यह दलील भी देने की कोशिश की मजिस्ट्रेट ने जो रिमांड आदेश पारित किया था, उस पर समय गलत दर्ज हुआ था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस दलील से सहमत नहीं थी। अदालत ने कहा कि जूडिशियल ऑर्डर में जो समय दर्ज किया गया, वही माना जाता है। उसमें साफ-साफ सुबह 6 बजे का समय दर्ज है। आदेश की कॉपी पुरकायस्थ के वकील के पास उसके बाद पहुंचने की बात है, जैसा कि उन्होंने यह बात भी कही है।

उन्होंने दिल्ली पुलिस द्वारा उनकी गिरफ्तारी बरकरार रखने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर आपत्ति जताते हुए याचिका दायर की थी। वर्तमान फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को भी खारिज कर दिया।

सह-अभियुक्त और न्यूज़ क्लिक के एचआर अमित चक्रवर्ती ने भी अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन प्रवर्तन निदेशालय के सरकारी गवाह बनने के बाद उन्हें अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति दी गई और उन्हें माफ़ी दे दी गई।

जब मामला लंबित था, तब अदालत ने पुरकायस्थ के स्वतंत्र मेडिकल मूल्यांकन के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) द्वारा एक बोर्ड के गठन का निर्देश दिया था। यह रिपोर्ट 20 मार्च को प्राप्त हुई।

प्रबीर पुरकायस्थ की रिहाई ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के अनुसार होगी। यानी जमानत बांड पेश करना होगा, क्योंकि इस मामले में चार्जशीट दायर की जा चुकी है। बता दें कि बेशक सुप्रीम कोर्ट ने रिहाई का आदेश दिया है लेकिन जिस ट्रायल कोर्ट में अभी यह केस चल रहा है, जमानत वहीं से पानी होगी और उसके लिए ट्रायल कोर्ट अपनी शर्त बताएगी। कोर्ट ने कहा कि चूंकि मामले में आरोपपत्र दायर किया जा चुका है, इसलिए पुरकायस्थ को केवल जमानत और जमानत बांड भरने पर ही रिहा किया जा सकता है। अन्यथा, उसे बिना ज़मानत के रिहा किया जा सकता था।

कोर्ट ने आदेश के ऑपरेटिव भाग को पढ़ते हुए कहा, “हालांकि हम उसे बिना जमानत के रिहा कर देते, लेकिन चूंकि आरोपपत्र दाखिल हो चुका है, हम उसे जमानत और जमानत बांड के साथ रिहा करते हैं

संपादक प्रबीर पुरकायस्थ को 3 अक्टूबर 2023 को गिरफ्तार किया गया था। तब से वो हिरासत में थे। सरकार ने उन पर राष्ट्र विरोधी प्रचार के लिए चीन से फंड पाने का आरोप लगाया था। दिल्ली पुलिस ने उन पर यूएपीए की धाराएं लगाई थीं। पुरकायस्थ ने अदालत में अपनी गिरफ्तारी की वैधता को चुनौती दी थी। उन्होंने पंकज बंसल केस का हवाला दिया। हालांकि दिल्ली पुलिस का तर्क था कि कि प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ्तारी का आधार रिमांड अर्जी में दिया गया था। रिमांड आदेश 4 अक्टूबर, 2023 की सुबह 6 बजे जारी किया गया था। लेकिन उसकी कॉपी पुरकायस्थ के वकील को बहुत बाद में भेजी गई थी।

(जे पी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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