Tuesday, October 26, 2021

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अनुच्छेद 21ए के तहत वंचित बच्चों की ऑनलाइन शिक्षा की जरूरत को नकारा नहीं जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

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उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि यदि अनुच्छेद 21ए को हकीकत में बदलना है, तो वंचित वर्ग के बच्चों की ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त करने की जरूरतों को नकारा नहीं जा सकता। उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि वंचित छात्रों की ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त करने की जरूरतों को संरक्षित किया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि संविधान के अनुच्छेद 21 ए के तहत शिक्षा का अधिकार एक वास्तविकता बन जाए।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस बीवी नागरत्न की पीठ ने कहा, अनुच्छेद 21ए का हकीकत बनना बेहद जरूरी है और इसके लिए जरूरी है कि कमजोर वर्ग के बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा से जोड़ा जाए। इनके इससे दूर रहते शिक्षा का अधिकार कभी पूरा नहीं हो सकता। पीठ ने कहा, आजकल स्कूलों में ऑनलाइन पढ़ाई हो रही है, बच्चों को होमवर्क ऑनलाइन मिलता है और वहीं उन्हें काम करके जमा करना होता है। अगर गरीब बच्चे सिर्फ इसलिए ऐसा नहीं कर पाते कि उनके पास स्मार्टफोन या इंटरनेट नहीं तो शिक्षा के अधिकार की सभी कवायद बेकार है।

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के बच्चों की दशा पर चिंता जाहिर करते हुए पीठ ने शुक्रवार को कहा, अगर शिक्षा के अधिकार को धरातल पर लाना है केंद्र सरकार और राज्यों को इन बच्चों के लिए वास्तविक योजना तैयार करनी होगी। महामारी के दौरान चली ऑनलाइन कक्षाओं के चलते पढ़ाई से दूर रहे इन बच्चों की सुध लेने की जरूरत है और ऐसी ठोस योजना बनानी होगी जिसका लंबे समय तक इन्हें लाभ मिले। तभी शिक्षा का अधिकार सच साबित होगा।

पीठ ने कहा कि हम दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश का सम्मान करते हैं। जजों ने इसमें अपने दिल की बात रखी है। पीठ ने अपने आदेश में कहा, इस मामले में दिल्ली सरकार को ऐसी योजना पेश करनी ही होगी जिससे इन बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई की सभी जरूरी सुविधाएं मुहैया हों। केंद्र को भी इसमें सहयोग करते हुए दीर्घकालिक योजना तैयार करनी चाहिए। पीठ गैर सहायता वाले मान्यता प्राप्त स्कूलों की कार्रवाई समिति की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के पिछले साल 18 सितंबर को आए आदेश को चुनौती दी गई थी।

दिल्ली हाईकोर्ट ने निजी और सरकारी स्कूलों को ऑनलाइन कक्षाओं के लिए गरीब बच्चों को स्मार्टफोन और इंटरनेट पैकेज उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट के इस फैसले को दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार ने चुनौती दी थी। दिल्ली सरकार ने अपनी दलील में कहा था कि हमारे पास इतने संसाधन नहीं हैं। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने 10 फरवरी को इस पर रोक लगाते हुए गैर सहायता प्राप्त स्कूलों की याचिका को इस मामले से जुड़ी अन्य याचिकाओं से जोड़ दिया था।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि बच्चों के बीच यह असमानता दिल दहलाने जैसी बात है। आखिर गरीब परिवार बच्चों की पढ़ाई के लिए लैपटॉप और टैबलेट कैसे लाएंगे। इनके अभाव में बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई कैसे करेंगे। इनकी मां लोगों के घरों में काम करती हैं, पिता गाड़ी चलाते हैं या मजदूरी करते हैं। आखिर ये लैपटॉप, इंटरनेट कैसे मुहैया कराएंगे।

जस्टिस नागरत्न ने कहा, इसी अभाव के कारण पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ी है। ये बच्चे मजदूरी करने को मजबूर हैं। इसी के कारण बाल विवाह और बच्चों की तस्करी के मामले भी बढ़ रहे हैं। इन खतरों को दूर करने के लिए ऐसी योजना बनानी होगी जिससे इन बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई के लिए जरूरी हर सुविधा मुहैया हो सके और इनके लिए शिक्षा का अधिकार हकीकत बने। ऐसे बच्चों की जिम्मेदारी सरकार की है।

पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ ‘एक्शन कमेटी अनएडेड रिकॉग्नाइज्ड प्राइवेट स्कूल्स’ द्वारा दायर याचिका में नोटिस जारी किया । इसमें स्कूल प्रबंधन को आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के छात्रों को वंचित समूह (डीजी) ऑनलाइन शिक्षा का उपयोग करने के लिए फीस गैजेट्स और इंटरनेट सुविधाएं प्रदान करने का निर्देश दिया गया। हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को प्राइवेट स्कूलों को जुर्माना की प्रतिपूर्ति करने का निर्देश दिया था।

उच्चतम न्यायलय ने उसी फैसले के खिलाफ दिल्ली सरकार द्वारा दायर एक पूर्व याचिका के साथ याचिका को टैग करते हुए निर्देश दिया कि दिल्ली सरकार के लिए यह आवश्यक होगा कि वह योजना के साथ सामने आए और इसे अदालत के सामने पेश करे। न्यायालय ने कहा कि भारत सरकार अधिनियम के तहत धन उपलब्ध कराने की अपनी समवर्ती जिम्मेदारी को देखते हुए इस पहलू पर राज्य सरकारों के साथ भी बातचीत करेगी। न्यायालय ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारें इस मामले को तत्काल आधार पर निकट समन्वय में उठाएं और एक यथार्थवादी और स्थायी समाधान निकालें।

पीठ ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि एक बार समकालिक फिजिकल शिक्षा प्रदान करने के तरीके के रूप में वास्तविक समय की शिक्षा, निजी गैर-सहायता प्राप्त और सरकारी स्कूलों को धारा तीन (2) और 12(1)(सी) के मद्देनजर चुना गया। आरटीई अधिनियम की धारा 12 (2) के मद्देनजर राज्य से प्रतिपूर्ति के अधीन, डीजी और ईडब्ल्यूएस छात्रों को मुफ्त में इष्टतम कॉन्फ़िगरेशन और इंटरनेट पैकेज के गैजेट और उपकरण की आपूर्ति करनी चाहिए।

दिल्ली सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय को चुनौती दी थी और उस पर 10 फरवरी, 2021 को चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा एक नोटिस जारी किया गया था। दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के संचालन पर भी रोक लगा दी गई थी। वर्तमान एसएलपी गैर-मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों की समिति द्वारा की गई कार्रवाई से संबंधित है। चूंकि दिल्ली सरकार द्वारा पहले दायर की गई याचिका भी लंबित है, तो हम यहां नोटिस जारी करते हैं और इस वर्तमान एसएलपी को पिछली याचिका के साथ टैग करते हैं।

पीठ ने कहा कि यहां उठाए गए मुद्दे को शीघ्र समाधान की आवश्यकता है, क्योंकि महामारी के घटते प्रकोप को देखते हुए स्कूलों को धीरे-धीरे फिर से खोलना होगा। हालांकि, ईडब्ल्यूएस / डीजी के लिए ऑनलाइन सुविधाओं तक पहुंच के साथ-साथ पर्याप्त कंप्यूटर-आधारित उपकरण प्रदान करने की आवश्यकता है। महामारी में जैसे-जैसे स्कूलों ने छोटे बच्चों के संपर्क से बचने के लिए ऑनलाइन शिक्षा की ओर रुख किया, डिजिटल विभाजन ने गंभीर परिणाम उत्पन्न किए। ईडब्ल्यूएस / डीजी बच्चों को पूरी तरह से शिक्षा नहीं लेने या यहां तक कि बीच में छोड़ने के परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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