Saturday, October 16, 2021

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नॉर्थ ईस्ट डायरीः बिप्लब कुमार देब के खिलाफ भाजपा के अंदर तेज हो रही है बगावत

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त्रिपुरा के उप मुख्यमंत्री जिष्णु देव वर्मा ने कहा कि अगरतला में 13 दिसंबर को निर्धारित मुख्यमंत्री का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया है। कुछ दिन पहले सीएम बिप्लब कुमार देब ने कहा था कि वह 13 दिसंबर को विवेकानंद मैदान जाएंगे और लोगों को वहां आने के लिए कहेंगे और वहां जनता से पूछेंगे कि उन्हें सीएम के रूप में रहना चाहिए कि नहीं। सीएम देब ने कहा था कि वह लोगों से अपने बारे में राय लेंगे और अगर प्रतिक्रिया नकारात्मक रही तो हाईकमान को इस बारे में बताएंगे।

मीडिया से बात करते हुए बिप्लब देब भावुक हो गए थे और कहा था कि कि वह 13 दिसंबर को अगरतला के विवेकानंद मैदान में लोगों से पूछेंगे कि मुझे सीएम बने रहना चाहिए या नहीं। अगर जनता मेरा समर्थन नहीं करेगी तो मैं हाईकमान को सूचित करूंगा।

देब ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद बुधवार को भाजपा की राज्य इकाई में तीव्र गुटबाजी के चलते मुख्यमंत्री के पद पर बने रहने के लिए राज्य के लोगों का ‘जनादेश’ हासिल करने के लिए 13 दिसंबर को एक जनसभा बुलाने का निर्णय टाल दिया है।

सूत्रों ने कहा कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने मुख्यमंत्री की मंगलवार की घोषणा के कुछ घंटे बाद देब की ‘तानाशाही’ कार्यशैली के बारे में नेताओं के एक वर्ग के आरोपों से उत्पन्न आंतरिक संकट को हल करने के लिए कदम बढ़ाया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने देब से बात की, जिसके बाद सार्वजनिक ‘जनमत संग्रह’ कार्यक्रम को रद्द कर दिया गया।

भाजपा के केंद्रीय पर्यवेक्षक विनोद सोनकर ने मीडिया को बताया, “चर्चा के बाद यह निर्णय लिया गया कि मुख्यमंत्री ऐसी कोई बैठक नहीं करेंगे। राज्य में उनके नेतृत्व को कोई खतरा नहीं है और वह मुख्यमंत्री के रूप में त्रिपुरा के लोगों की सेवा करते रहेंगे। संगठन को पार्टी में मुद्दों को संभालने दें।”

भाजपा के सूत्रों ने कहा कि देब को शासन के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा गया है, जबकि केंद्रीय नेतृत्व पार्टी की राज्य इकाई में आंतरिक मुद्दों को हल करेगा।

त्रिपुरा भाजपा के सूत्रों के मुताबिक, पार्टी के कई विधायकों ने इस सप्ताह के शुरू में केंद्रीय पर्यवेक्षक के रूप में सोनकर से उनकी पहली मुलाकात के दौरान देब की कार्यशैली पर नाराजगी जताई। कुछ विधायकों ने दावा किया कि देब अन्य नेताओं से सलाह लिए बिना सरकार और पार्टी इकाई चला रहे हैं। पार्टी समर्थकों के एक समूह ने रविवार को सोनकर की उपस्थिति में देब के खिलाफ नारे लगाए। सोनकर, जो 36 विधायकों में से प्रत्येक से व्यक्तिगत रूप से मिले थे, ने बाद में नड्डा को स्थिति के बारे में जानकारी दी।

भाजपा के सूत्रों ने हालांकि नेतृत्व में तत्काल किसी भी परिवर्तन से इंकार किया। सोनकर ने कहा कि नेतृत्व परिवर्तन पर कोई चर्चा नहीं हुई।

भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व, हालांकि विधायकों द्वारा उठाए गए कुछ मुद्दों को लेकर सहमत है, वह मुख्यमंत्री को बदलना नहीं चाहता, क्योंकि यह अन्य राज्य इकाइयों में भी इसी तरह की मांगों को प्रेरित कर सकता है, जहां असंतुष्ट विधायकों ने मुख्यमंत्रियों के खिलाफ मुद्दे उठाए हैं। पार्टी का नेतृत्व देब के मंगलवार की घोषणा के साथ ‘नाराज’ है, जो स्पष्ट रूप से केंद्रीय नेतृत्व के साथ चर्चा किए बगैर ही की गई थी, और केंद्रीय नेतृत्व को लगता है कि इससे त्रिपुरा में पार्टी की संरचना कमजोर हुई है।

रविवार की नारेबाजी के बाद देब के सहयोगियों ने आरोप लगाया था कि पार्टी में उनके प्रतिद्वंद्वी सुदीप रॉय बर्मन द्वारा विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया था, जिन्होंने अक्तूबर में सात विधायकों के साथ मिलकर भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं से मुलाकात कर देब को हटाने की मांग की थी। विधायकों ने 60 सदस्यीय सदन में भाजपा के 36 विधायकों में से कम से कम दो और विधायकों के समर्थन का दावा किया था।

हालांकि, भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता नबेंदु भट्टाचार्य ने कहा कि बिना उचित सबूत के बगावत के लिए रॉय बर्मन की तरफ उंगली उठाना उचित नहीं है, जिन्हें 2019 में मंत्रिमंडल से हटा दिया गया था। विपक्षी दलों पर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा, “हमने सोशल मीडिया पर देखा है कि लोग इस साजिश में सीपीआई (एम) या अन्य राजनीतिक दलों के शामिल होने की बात कर रहे हैं।”

रॉय बर्मन ने मुख्यमंत्री के खिलाफ नारेबाजी की निंदा की। उन्होंने कहा, “यह बहुत खेद का विषय है। मैं इस तरह के व्यवहार की पूरी तरह से निंदा करता हूं। जिसने भी ऐसा किया है, उसने बचकाना और गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार किया है।”

अन्य विधायकों के साथ दिल्ली की यात्रा के बारे में उन्होंने कहा कि वे दो महीने पहले नड्डा से मिले थे, लेकिन उन्होंने दावा किया कि वह राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की मांग करने नहीं गए थे, बल्कि पार्टी के प्रमुख को ‘प्रशासनिक और राजनीतिक मुद्दों’ से अवगत कराने गए थे।

(दिनकर कुमार ‘द सेंटिनेल’ के संपादक रहे हैं।)

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