Tuesday, October 26, 2021

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मेरी रूस यात्रा-3: शहर ही नहीं रूस के गांव भी हैं बेहद समृद्ध

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हमारा अगला पड़ाव मॉस्को से 220 किलोमीटर पूरब, रूस का लगभग 1000 साल पुराना शहर व्लादीमिर था। यहां तक की यात्रा 3 घंटे 30 मिनट में पूरी हुई। यहां पेट्रोल 50.19 रुपये प्रति लीटर है इसलिए टैक्सी उतनी महंगी नहीं हैं। यहां का मुख्य चर्च, सेंट डेमेट्रियस कैथेड्रल, यूनेस्को द्वारा संरक्षित है जो पन्द्रहवीं सदी का बना हुआ है। यह शहर कभी रूस की राजधानी रहा है। चर्च की दीवारों पर पुरानी रूसी भाषा देखी जा सकती है जो वर्तमान में प्रचलन में नहीं है। पुराने शहरों के स्वर्ण घेरे का यह शहर हिस्सा है।

किसी देश को समझने के लिए, उसके ग्रामीण समाज को समझना चाहिए। यहां सुजदाल देखने गया जो रूसी विरासत और परम्परा की झलक दिखाता है। यहां के संग्रहालय में रूसी गाँवों के औजार, हल, ढेंकी, जाँत, बर्तन, करघे, अनाज, कुम्हारी, बढ़ईगिरी, जूते, पवन चक्की, घोड़ागाड़ी के पहिये आदि, तरह-तरह की चीजें देखा जा सकता है। हमारे ग्रामीण समाज के पुराने औजार लगभग उसी तरह के होते थे जिस तरह रूस में । यहां पहले घर पूरी तरह से लकड़ी के बनते थे।

सुजदाल में लेनिन की एक भव्य मूर्ति है। सामने चर्च टावर है, जहां 1917 की क्रांति में विद्रोहियों ने इस पर कब्जा कर लिया था। यह पूरा कस्बा यूनेस्को द्वारा संरक्षित है। यहां कि जनता धार्मिक प्रवृत्ति की है और चर्चों की भरमार है।

सुज़दाल शहर को रूस की परम्परागत संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में इस शहर में के.एफ.सी. की दुकान का खुलना, मेरे गाइड यूरी को खल रहा था। वह कह रहा था-‘यह विगत एक-दो सालों में ऐसा हुआ है। निश्चय ही घूस लेकर इसकी अनुमति दी गई होगी अन्यथा इस संरक्षित शहर में किसी मल्टीनेशनल कंपनी की शाखा खुलने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए थी।’सुजदाल में एक चर्च का सम्पूर्ण कार्यभार, औरतों के हाथ में है। वे ही पादरी हैं और व्यस्थापक भी।

गाइड की बात सुनकर स्पष्ट हुआ कि रूस में ऊपरी स्तर पर घूसखोरी है। प्रगतिशीलता का क्षरण और यह नतीजा है। यहां भी जनता में अंधविश्वास है। यद्यपि 40 प्रतिशत जनता नास्तिक है। इस देश का अधिकांश हिस्सा बर्फ से ढका रहता है। कम जनसंख्या, विस्तृत भू-क्षेत्र और प्रकृति संरक्षण के प्रति सचेत प्रयास ने यहां की नदियों, नालों, वनों और जीव-जन्तुओं को बेहतर स्थिति में रखे हुए है। जमीन के पचास प्रतिशत हिस्से में वन हैं। जानवरों की बहुलता के कारण कुछ के शिकार के लिए लाइसेंस जारी होते हैं। हाथी यहां नहीं पाया जाता और उसकी उपस्थिति केवल सर्कसों में है। रूसी सर्कस और ओपेरा दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। बर्फ पड़ने के कारण खेती की एक फसल ही सम्भव है। यहां अक्टूबर-नवम्बर पतझड़ का मौसम होता है। घरों के निर्माण में उच्च तकनीक का उपयोग होता है। अंदर से सारे घर गर्म होते हैं। गांवों में लकड़ी के घर हैं। पूरी की पूरी लकड़ी का तना दीवार के रूप में एक के ऊपर एक रखा जाता है। दो तनों के बीच, ऊन का एक कपड़ा बिछाकर जोड़ा गया होता है।

इतिहास के प्रति जनता में बेहद लगाव है। ट्रैफिक सुव्यवस्थित है। यहां दाएं चलने का नियम है न कि भारत की तरह बाएं चलने का। पैदल यात्रियों के लिए जेब्रा क्रासिंग पर लाल, नीली बत्तियां नहीं हैं। जहां बत्तियां नहीं हैं वहां जेब्रा क्रांसिंग पर जब चाहे, पैदल यात्री पार कर सकते हैं, वाहन स्वतः रुक जाएंगे। कहीं भी खुली नालियां नहीं हैं और न कहीं सड़कों पर पानी जमा होता है। घरों के दरवाजे बाहर की ओर खुलते हैं। ऐसा इसलिए कि बर्फ अंदर न आने पाए। बड़े संस्थानों या संग्रहालयों में एक के बाद एक, लकड़ी के तीन दरवाजे पार करने पड़ते हैं। यह भी बर्फ को अंदर जाने से रोकने का उपक्रम है। नदियां स्वच्छ हैं। शिक्षा और चिकित्सा पर विशेष ध्यान दिया गया है।

रूस की आबादी महज 14 करोड़ के लगभग है जबकि उसका क्षेत्रफल भारत से 420 प्रतिशत ज्यादा है। इसलिए गाँवों में कोई दिखता नहीं। सेव के बाग प्रचुरता में हैं। मेरी यात्रा के समय सितम्बर में जाड़े का गेहूं बोया गया था। क्यूरन में चेरी की तरह फल लगे थे। चुकंदर के आकार दो-दो किलो तक हैं। खेतों के किनारे गेहूं के सूखे डंठलों को रोल बनाकर खेतों में रखा गया है जो बर्फ पड़ने पर पशुओं के चारे के काम आएगा। बैगन और आलू, खूब होता है।

रोसतोव शहर, रूस का लगभग 1000 साल पुराना छोटा शहर है, जहां एक ऐतिहासिक क्रेमलिन और चर्च है। कभी यह भी रूसी सत्ता का केंद्र था। इस शहर में नीली गुम्बद वाली चर्चें देखी जा सकती हैं। यह रूस की पुरानी कला है जो लकड़ी पर पेंट कर बनाई जाती है। रूस में मानव रहित पेट्रोल पंप हैं। आपको ईंधन स्वयं भरना है और उसका भुगतान कार्ड से करना है। हर पेट्रोल पम्प पर एक शॉपिंग मॉल और शौचालय है। भारतीय रुपये में पेट्रोल की कीमत 50 रुपये 20 पैसे प्रति लीटर के लगभग है।

मॉस्को से बाहर हमारी यात्रा का अंतिम पड़ाव सर्गिएव पोसा नामक शहर था जिसे पवित्र शहर माना जाता है। आस्था चरम पर है। लोग चमत्कारों में विश्वास करते हैं। चर्चों की ताकत गजब की है। कभी सत्ता के केंद्र में रहे चर्च, समृद्धि के प्रतीक हैं। सर्गिएव पोसाद में 15वीं शताब्दी का एक महत्वपूर्ण रूसी चर्च है। सेंट सर्जियस द्वारा स्थापित यह मठ, रूस का सबसे बड़ा चर्च है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, 1941 में जर्मनी द्वारा इस शहर पर आक्रमण किया गया था।

यहां पर हम जिस होटल में ठहरे हुए थे, वह सिर्फ होटल नहीं, इतिहास को समेटे हुए था। हर कमरा किसी न किसी महत्वपूर्ण लेखक के नाम पर बनाया गया था और उस लेखक की स्मृतियों को उसमें संरक्षित किया गया था। हम चेखव के कमरे में ठहरे थे। कमरे में चेखव का चित्र, उनके द्वारा उपयोग किये गए समानों जैसा, बॉक्स, मेज, ग्रामोफोन, लकड़ी का डस्टबिन, घड़ी, टेलीफोन, समोवर, चाय के कप आदि रखे हुए थे। चेखव की किताबें भी कमरे में लगी थीं। बाथरूम में चेखव की पसंद का संगीत बजता रहता था।

यहां खाना भी रूसी परम्परा के अनुसार ही दिया जाता है। चाय की केतली को परंपरागत तरीके से गुड़िया से ढंक कर लाया जाता है। उनके शयनकक्ष जैसी घड़ी, टेलीफोन, कुर्सी, समोवर। यहां की गुड़िया का सांस्कृतिक महत्व है। गुड़िया के अंदर गुड़िया की आकृति को कई तरीकों से बनाया जाता है। मूल रूप से लकड़ी की बनने वाली गुड़ियाओं पर हाथ की नक्काशी, कीमत बढ़ा देती हैं। बहुत सी गुड़ियाएं, रूसी-स्लावी संस्कृति की देवियां हैं, जिनके बारे में अब रूसी लोग भूल रहे हैं। धर्म और आस्था में बदलाव के कारण लोग सब कुछ भूल चुके हैं। सम्भवतः इन्हीं गुड़ियों / देवियों को आर्य कबीले भारत ले आए और मूर्ति का रूप दे दिए। दस हाथ वाली गुड़िया, रूस में मदद करने वाली देवी के रूप में जानी जाती है।

सर्गिएव पोसाद से हम पुनः मॉस्को लौट रहे थे। मॉस्को में प्रवेश करने के पूर्व सोवियत एरा थीम पार्क-वदेहा देखने को रुके जिसके निर्माण की रूपरेखा स्टालिन का था। 1935 में इसका निर्माण शुरू हुआ। इसमें सोविययत संघ में शामिल सभी 16 राज्यों की पवेलियन बनी हुई है। मुख्य द्वार के ऊपर किसान दम्पति की मूर्ति है और उनके हाथों में गेहूं का एक बोझ है। यहां भी लेनिन की भव्य मूर्ति लगी हुई है। सोवियत संघ और आधुनिक रूसी प्रगति की इस पवेलियन में देखा जा सकता है। मुख्य गेट पर सोलह राज्यों को गोल्ड मेडल के रूप में चित्रित किया गया है।

कुल मिलाकर मेरी रूसी यात्रा कई मायनों में यादगार रही। एक तो मेरे टूर गाइड मार्क बेहद सुलझे हुए समझदार व्यक्ति थे। अगर वह न होते तो आम रूसी, ध्वस्त कम्युनिस्ट सत्ता से प्यार करता है क्योंकि सोवियत संघ के काल में आर्थिक असमानता समाप्त हो चुकी थी। अब यहां एकाध लोग भीख मांगते हुए भी देखे जा ससकते हैं। यहां के आर्थोडॉक्स चर्चों में कम्युनिस्टों के प्रति नफरत है। कम्युनिस्ट सत्ता के सबसे ताकतवर विरोधी, रूस के आर्थोडॉक्स चर्च ही थे इसलिए बोल्शेविक क्रांति के बाद कुछ चर्चों को जलाया भी गया था।
रूबल और रुपये की कीमत लगभग समान है। यहां लगभग 1000 के आस पास हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी और अफगानी हैं जो आपस में घुले मिले हैं। सेंट पीटर्सबर्ग में हमें एक पाकिस्तीनी टैक्सी चालक की सेवाएं एक भारतीय रेस्टोरेंट के मालिक द्वारा उपलब्ध करायी गईं थीं। यहां जाड़े में तापमान -31 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है।

सेंट पीटर्सबर्ग में भारतीय खाने के लिए यहां चार -पांच रेस्टोरेंट हैं। सबसे बड़ा चेन पीयूष मिश्र का है जो भारत के उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के नजीबाबाद के रहने वाले थे। 91 में डॉक्टरी की पढ़ाई करने आये थे, अब यहीं के हो गए हैं। उनके रेस्टोरेंट हैं-नमस्ते इंडिया, लिटिल इंडिया, तंदूरी किचन और तंदूर हैं जहां आप भारतीय भोजन कर सकते हैं। रूस में फल यहां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। सिमकार्ड स्थानीय प्रयोग के लिए सस्ता है पर इंटरनेशनल कॉल के लिए महंगा है। घूमते समय साथ में छाता होना जरूरी है। पल-पल मौसम बदलता है। रूसी खाना भारतीयों को पसंद नहीं आता। इसलिए फल खरीदकर साथ रखें। यहां के पेड़ों की पत्तियां सुनहरे और लाल रंग में बदलती हैं तो खूबसूरत दिखती हैं। बिल्लियों को बहुत प्यार मिलता है यहां।

मास्को में अरबा स्ट्रीट है, जहां कवि, कविताएं पढ़ते हैं, संगीतकार गाते, बजाते हैं।
क्राइस्ट द सेवियर का खूबसूरत कैथेड्रल, मॉस्को नदी के नजदीक मध्य मॉस्को में स्थित है। यह 1999 में जनता के लिए खुला है। पहले यहां अन्य भवन बनना था जिसके सबसे ऊपर लेनिन की मूर्ति लगनी थी मगर 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद वह योजना रद्द कर दी गई। कैथेड्रल की छत से मॉस्को स्काईलाइन के उत्कृष्ट दृश्य देखने को मिलता है मगर यह दृश्य हम देख न सके क्योंकि जिस दिन हम वहां पहुंचे थे उस दिन वह बंद था।
यह देश आज भी लेनिन को नहीं भूला है और न भूलने की स्थिति में है। अभी भी जगह-जगह लेनिन की स्मृतियों को बचा कर रखा गया है जबकि स्टालिन को हटा दिया गया है।

आज भी देश की दूसरी बड़ी पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी है मगर देश में मध्यम वर्ग की संख्या 50 प्रतिशत के लगभग है जो निजी संपत्ति का हिमायती है। वह भले ही लेनिन का सम्मान करता है मगर कम्युनिज्म का समर्थक नहीं है। 35 प्रतिशत गरीब जनता निश्चय ही कम्युनिज्म की समर्थक है। एक वर्ग ऐसा है जो कम्युनिज्म का समर्थक होते हुए भी वर्तमान कम्युनिस्टों को पसन्द नहीं करता। ऐसी स्थिति में फिलहाल रूस में कम्युनिस्टों के वापस आने की सम्भावना नहीं है। कई माफियाओं और शराब कारोबारियों को कम्युनिस्ट पार्टी ने शामिल कर लिया है। जैसे सितम्बर 2021 के चुनाव मे ग्रुडीनिन नामक अमीर व्यवसायी को रूसी कम्युनिस्ट पार्टी ने उम्मीदवार बनाया था। कम्युनिस्ट पार्टी के वर्तमान महासचिव, ईशु मसीह को पहला सोशलिस्ट मानते हैं। ऐसे में वैचारिकी पलायन के कारण ही जनता का दिल जितने में कम्युनिस्ट नाकाम हैं।

(सुभाष चन्द्र कुशवाहा साहित्यकार और इतिहासकार हैं आप ने यह संस्मरण रूस की यात्रा से लौटने के बाद जनचौक के लिए लिखा है।)
समाप्त।

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