अब लोकतंत्र की नई यात्रा पर भारत को निकलना है

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आम चुनाव के कार्यक्रम के अनुसार पांचवें चरण का चुनाव 20 मई 2024 को संपन्न हो गया है। चुनाव के चार चरण के मतदान के संपन्न होने के बाद भारत की राजनीतिक परिस्थिति में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव दिखने लगे हैं। इन बदलावों का तात्कालिक असर निश्चित रूप से पांचवें चरण के मतदान पर पड़ेगा। दीर्घकालिक असर भारत की लोकतांत्रिक स्थिति पर भी पड़े बिना नहीं रह सकता है। इतिहास के रुदन और वर्तमान की बौखलाहट से उदासी में खोए हुए भारत के लोकतंत्र का ‎भविष्य अपनी अगली यात्रा पर निकलने की तैयारी लगा रहा है। भारत के संविधान में वैचारिक मध्यम मार्ग पर पैर टिकाये रखते हुए वाम-दक्षिण दृष्टिकोण के लिए थोड़ी-सी लोच तो है, लेकिन बस थोड़ी-सी। लोकतांत्रिक पद्धति से संवैधानिक प्रक्रियाओं के अंतर्गत चुनी हुई सरकार के ‎‘अति-दक्षिणपंथ’ रुझान ने संविधान को अपनी ओर झुकाने की कोशिश में इतना जोर लगाया कि संविधान, लोकतंत्र, जन-जीवन सब कुछ तबाही के कगार पर पहुंचकर हांफने लगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दस साल के शासनकाल में ‎बेलाग झूठ बोलने के लिए इतिहास में याद किये जायेंगे। सादा हो या काला हो, किसी भी तरह के झूठ बोलने में नरेंद्र मोदी जरा भी संकोच नहीं करते हैं। लोग कितना हिसाब रखेंगे! असल में लोग झूठ इसलिए बोलते हैं कि सामनेवाले को पता न हो तो‎ वे बोले गये झूठ को ही सत्य मान लेते हैं। जिन्हें कुछ-न-कुछ पता होता है, वे भ्रम में पड़ जाते हैं कि जो पहले से पता है वह सही नहीं है, अभी जो सुन रहा है, असल में वही सही है!

झूठ बोलने वाले की हैसियत बड़ी हो तो‎ ‘छोटी हैसियत या बे-हैसियत’ के लोग उसके झूठ को सत्य मानते हुए अपने ज्ञान का हिस्सा बना लेते हैं। इस तरह से झूठ का लोक-प्रसार होता रहता है। बड़े लोगों की कही बातों को जांचने, परखने के लिए लोगों का मन तैयार नहीं होता है। मन के तैयार नहीं होने के पीछे भी कुछ-न-कुछ कारण तो‎ होते ही हैं। पहला कारण तो‎ यह होता है कि ‎‘छोटी हैसियत या बे-हैसियत’ लोगों के मन में बात बसी होती है कि ‘बड़े लोग’ झूठ नहीं बोलते हैं।

दूसरा यह कि बड़ी हैसियत के झूठ को यदि ‎‘छोटी हैसियत या बे-हैसियत’ के लोग पकड़ भी लें तो‎ उस झूठ को हटाकर उसके समकक्ष वास्तविक सत्य को खड़ा करने की ताकत सामान्य और ‘छोटी हैसियत’ के लोगों में नहीं होती है। वैसे भी ऐसा करने के दुस्साहस का खामियाजा भोगना भारी पड़ जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के झूठ की पोलपट्टी खोल दी तो बड़ी हैसियत के कई पत्रकार सीधे ‘यूट्यूबर’ बनकर रह गये। इतना ही नहीं हुआ, कई को तो‎ ‘बड़ी हैसियत’ का नाजायज इस्तेमाल करते हुए जेल में डालकर बरबाद कर दिया गया। नाम क्या लेना! लेकिन इतना कहना जरूरी है कि इससे पत्रकारिता की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय मेधा की बड़ी क्षति हुई।

राष्ट्रीय मेधा की क्षतिपूर्ति बहुत मुश्किल है। मुश्किल इसलिए कि ‎‘बड़ी हैसियत’ ‎ ने सच बोलने के साहस को क्षतिग्रस्त कर दिया। सच बोलने का साहस खो चुकनेवाला समाज अनैतिकता के ऐसे चक्रव्यूह में फंसता है कि उसकी नैतिक पतन की कोई सीमा नहीं रह जाती है। चाहे वह समाज मुण्डकोपनिषद के जमाने से झाल-मृदंग के साथ “सत्यमेव जयते नानृतं” दुहाता चला आ रहा हो या उसे राज्याधिकरण का हिस्सा बनाने की घोषणा करते हुए बुदबुदाता रहे कि सत्य की ‎जय होती है, अनृत (मिथ्या) की नहीं।

ऐसा नहीं कि पहले सब कुछ दुरुस्त था, लेकिन पिछले दस साल के शासकीय चरित्र एवं अन्यान्य कारणों से बहुआयामी विश्वसनीयता और भरोसा हासिल करने की योग्यता में ऐसा क्षरण हुआ है जिसकी भरपाई बहुत मुश्किल है। बहुआयामी विश्वसनीयता और भरोसा ‎ में इस क्षरण का नतीजा है कि आज नड्डा भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जेपी नड्डा बेझिझक कह दिया कि अब भारतीय जनता पार्टी ‘सक्षम’ हो गई है। अपना फैसला खुद कर सकती है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपना काम देखे, भारतीय जनता पार्टी अपने राजनीतिक मामलों को तय करने के लिए स्वयं-सक्षम है! ऐसा कहने का साहस उसी ‎‘बड़ी हैसियत’ ‎के साहचर्य से मिला होगा। उसी ‎‘बड़ी हैसियत ने पचहत्तर का बहाना बनाकर ‘बड़े और बड़े-बड़े’ को ‘मार्ग-दर्शक मंडल’ के उस अंधे कुआं में डाल दिया, जहां न रोशनी की कोई किरण आती-जाती है, न भरोसे और विश्वसनीयता की कोई ऐतिहासिक ध्वनि-प्रतिध्वनि ही सुनाई देती है।

जब ऐसा हो रहा था जाने किस सुख-सुविधा की प्रत्याशा में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ खामोश रहा! राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ कैसे यह नहीं समझ पाया कि जिसने ‘पचहत्तर’ का यह हाल करने की योजना बना ली वह एकोअहं की आत्म-मुग्धता की चौकड़ी भरता हुआ ‘सौ वर्ष’ पूरे होने के पहले उसका क्या हाल कर देगा। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विचारों और नीयत के प्रति शंकित रहने वालों को यह नहीं समझना चाहिए कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को भारतीय जनता पार्टी ने विसर्जन के रास्ते पर डालकर उनका ‘काम’ आसान कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की एक ‘शाखा’ के बराबर का संगठन सौ साल में भी नहीं खड़ा कर सकती है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भारतीय जनता पार्टी जैसी राजनीतिक पार्टी तीस-चालीस में खड़ा कर ले सकता है। हां, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को यह जरूर सोचना चाहिए कि उसके जैसे ‘सांस्कृतिक संगठन’ का ‘राजनीतिक प्रयोग’ कैसे और क्यों फेल कर गया! सत्ता परिवर्तन होने या नहीं होने से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सामने खड़ी आत्मावलोकन की चुनौती पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। खैर सभी के लिए समझने की बात इतनी-सी है कि विश्वास और भरोसा की गुणवत्ता में ऐसा गिराव अंततः लोकतंत्र की गुणवत्ता पर बहुत बुरा असर डालता है। बिना लोकतंत्र के कोई संगठन टिक ही नहीं सकता है। इसलिए लोकतंत्र की ईमानदार चिंता करनेवाले को झूठ के प्रसार के तौर-तरीकों को समझने और रोकने के बारे में कुछ-न-कुछ सोचना ही होगा। सबसे पहले तो‎ यह कि जीवन से जुड़े किसी भी क्षेत्र में सार्वजनिक अवसरों पर ‘झूठी बात’ का सहारा लेनेवालों को हर हाल में रोका जाना चाहिए।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ चुनाव के समय झूठ का बाजार गर्म हुआ है। ध्यान देने की बात है कि वर्तमान सत्ताधारी दल हर समय चुनावी मुद्रा में रहती है। हर मामले को चुनावी रंग से देखने का नतीजा है कि सरकार, सरकारी दल और सरकारी विभाग के बीच का फर्क मिट गया। संवैधानिक मुखिया भी राजनीतिक मुखिया की भूमिका से अपने को किसी भी स्तर पर भिन्न नहीं कर पाया। कार्यपालिका का व्यवहार राजनीतिक आका की तरह होने के कारण स्वाभाविक हैं कि तैतत साधना (तैनाती-तबादला-तरक्की) में लगे नौकरशाह के राजनीतिक कार्यकर्ता में बदल जाने का माहौल बन जाता है।

सत्ता के होने का एहसास हाथ में कारगर और मनमाना नियंत्रण के होने से होता है। आत्म-मुग्धता में फंसे सर्वसत्तावादी राजनीतिक नेता में अपने ‘संपूर्ण नियंत्रक’ होने का भ्रम बहुत भयानक होता है। वह इसके लिए अपने आस-पास भ्रम का जाल फैलाता है और फैलने देता है। भ्रम का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेता है। लगुए-भगुए ऐसे नेता को सम्मानपूर्वक संपूर्ण नियंत्रण का एहसास दिलाते रहते हैं। इस तरह नेता भ्रम का नियंत्रक होने के भ्रम का शिकार हो जाता है। नियंत्रण का भ्रम अंततः ऐसे राजनीतिक नेता को भ्रम के नियंत्रण में डाल देता है।

यह सारा खेल भाषा में होता है। आज-कल शब्द-दृश्य यानी तरंगी मीडिया के चलन का जमाना है। इस तरंगी मीडिया की ताकत के इस्तेमाल की सुविधा हासिल रहने के कारण सर्वसत्तावादी नेता दृष्टि-भ्रम (Optical Illusion) को विकल्पों के भ्रम (Illusions of Options) में बदलकर भ्रम के वास्तविक होने का भरोसा दिलाने में कुछ समय तक कामयाब रहते हैं। जैसे, बहाली के लिए विज्ञापन देना और बहाली प्रक्रिया को ‘लीक’ हो जाने की लीक पकड़ने से नहीं रोकना।

यहीं शब्द शक्ति की अवधारणा को याद करना चाहिए। यहां तीन शब्द शक्तियों, अभिधा, लक्षणा, व्यंजना। अभिधा में जो कहा जाता है उसका अर्थ शब्दशः होता है। लक्षणा में अभिधा, यानी कहा गया है उस का शब्दशः अर्थ खंडित होता है। लक्षणा में अर्थ शब्द से बाहर जाकर मिलता है। व्यंजना में शब्दशः अर्थ भी सही होता है, लेकिन अभिप्रेत अर्थ भिन्न होता है। अभिधा का अर्थ सत्य के लिए सब से उपयुक्त होता है। लक्षणा और व्यंजना का इस्तेमाल भाषा में अलंकार और निरर्थकता का आनंद रचने में होता है।

निरर्थकता का आनंद किसी को ठगने की विद्या का पहला पाठ होता है। जैसे रेल यात्रा में सीट की तंगी होने पर ‘सीटासीन यात्री’ की हस्तरेखा को देखकर अपनी भाव-भंगिमा और लक्षणा-व्यंजना के प्रयोग से निरर्थकता के आनंद के सहारे सीट का जुगाड़ करना, ऐसा ‘बड़ी हैसियत’ ने अपने धुरफंदिया अनुभव को साझा करते हुए तरंगी मीडिया में सगर्व बताया था। प्रसंगवश, पहले किसी के पढ़ा-लिखा, शिक्षित होने से उस के न्याय संगत, विवेक सम्मत और तार्किक एवं नैतिक होने का, बिगाड़ के डर से ईमान की बात पर पर्दा न डालनेवाला होने का भरोसा जगता था, आज-कल ऐसा कोई भरोसा नहीं जगता है। कैसे जगेगा जब सच बोलने के साहस को बहुत बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया गया है। फिर कहें, सच बोलने का साहस खो चुके समाज के नैतिक गिराव की कोई सीमा नहीं रहती है।

भद्रता की क्षुद्रता अपनी धूर्तता में मुस्कुराती हुई लोकतांत्रिक मैदान पर भोर की सैर करती रहती है। छलछलाती हुई छलकारी आत्मीयता से दुम दबाकर गले लगती आत्महीनता, लोक-मन में भरोसे के आधार को तहस-नहस कर देती है। पिछले दिनों बड़ी हैसियत के लोगों का ‎‘हंसमुख ‎मुखौटा’‎ बहुत तेजी से फटा है। इधर अपराधियों का झुंड समाज और राज में दनदनाता रहे और जनहित के लिए समर्पित संस्थाओं और न्यायालयों में संविधान और लोकतंत्र की धुन पर वसंत‎ की धूप-छांही में “कोमल-मलय-समीर” का खेल भी निर्बाध चलता रहे, ऐसा हो नहीं सकता है।

सच को झूठ के बिना या झूठ को सच के बिना पहचान पाना मुश्किल काम है। ‎सत्य का संघर्ष असत्य और झूठ से नहीं होता है। झूठ सत्य की परछाई ‎होता है। कोई अपनी छाया से संघर्ष नहीं कर सकता है। छाया से युद्ध और संघर्ष नहीं किया जा सकता है। छाया के ‎विरुद्ध जाना, प्रकाश के विरुद्ध जाना है। सत्य को झूठ से लड़ाई करने में उलझाकर ‘विश्वास’ से निकली श्रद्धा और आस्था सत्य को पस्त कर देती है। असल में सत्य का युद्ध और संघर्ष ‎विश्वास और आस्था से होता है।

सत्य सत्यापन का अधीनस्थ और वास्तविक होता है। विश्वास और आस्था का सत्यापन उसी तरह से संभव नहीं है। जिस तरह झूठ का भी सत्यापन नहीं हो सकता है। सत्यापन हो जाये तो फिर झूठ तो झूठ ही नहीं रह जायेगा! चतुर लोग झूठ को झूठ साबित करने के लिए झूठ के सत्यापन की शर्त रखने में कामयाब हो जाते हैं।

चतुर लोगों के ‘जत्था’ का लोकतांत्रिक व्यवस्था की राजनीति में सक्रिय होने के कारण भ्रम का ऐसा वातावरण बनता है कि हाथ के सामने रखे गिलास के पानी पर विश्वास नहीं होता है। जाहिर है कि पानी की जरूरत को पूरा करने के लिए सामान्य लोग फुर्ती से मरीचिका के जलाशय में अपनी आकांक्षा की लुटिया डुबो लेते हैं। तर्क की अपनी शक्ति होती है। शक्ति का अपना तर्क होता है। शक्ति के तर्क के सामने तर्क की शक्ति की एक नहीं चलती है। सत्य की जीत होती है या नहीं यह कहना थोड़ा मुश्किल है, आसानी से तो‎ यह दिखता है कि जिसकी जीत होती है उसे ही सत्य मान लिया जाता है। कहना न होगा कि मान लिया जाना, हो जाना नहीं होता है। यह कि सच न होने पर भी ऐसे झूठ को सच मान लिया जाता है और विडंबना यह है कि सत्य विश्वास और आस्था का शरणागत हो जाता है। इस तरह से सभ्यता में सत्य का विश्वास और आस्था ‎से सदा युद्ध और संघर्ष रहा है। ‎

सत्ता परिवर्तन के बाद क्या होगा! नहीं-नहीं भविष्य में ताक-झांक की बात नहीं है। सामाजिक अन्याय, आर्थिक अन्याय, संवैधानिक अन्याय की राजनीतिक-आर्थिक परिस्थिति के जन-अनुकूल बनने की उत्सुक प्रतीक्षा, उत्पीड़कताओं के दर्द को थोड़ा-सा ही सही कम कर देती है! यह चुनाव अपनी प्रक्रियाओं में सामान्य सत्ता परिवर्तन की उम्मीद के कारण महत्वपूर्ण नहीं है। इस चुनाव से तय होगा कि आजादी के आंदोलन के दौरान अर्जित भारत के संविधान और लोकतंत्र के स्वरूप का क्या होगा! इस चुनाव में सत्ता परिवर्तन न होने की स्थिति इसे ‎‘अति-दक्षिणपंथ’ की फिसलन भरी राह पर डाल देगा।

सत्ता परिवर्तन होने की स्थिति में भारत का शासकीय चरित्र लोकतांत्रिक अभिमुख को वास्तविक लोक-कल्याण की लोकतांत्रिक पद्धति की प्रतिबद्धता की नई राह की तरफ अग्रसर करेगा। आजादी के बाद यह विरला अवसर है जब सत्ता परिवर्तन हो या न हो, दोनों ही स्थिति में भारत को नई यात्रा पर निकलना ही होगा। इनकार नहीं किया जा सकता है कि दस सास के ‎‘अति-दक्षिणपंथी’ बहुसंख्यकवादी रुझान की ‘ऊर्जाओं’ ने संवैधानिक व्यवस्था के भार-साम्य में भयानक खलल पैदा कर दिया है। ‎

कौन झोला उठाकर किधर निकल जायेगा। उस पर क्या बात करना। सवाल तो‎ यह है कि क्या इस चुनाव के बाद भारत किसी नई यात्रा पर बिना किसी विलंब के निकल सकेगा! फूलपुर में विपक्षी गठबंधन (इंडिया अलायंस) की रैली में जनसाधारण के उमड़ने से जन-समुद्र ‎के नजारा की खबर आ रही है, उससे सत्ता परिवर्तन की लहर का तो पता चलता ही है, लोगों की अधीरता का भी संकेत मिलता है। पिछले दिनों लोग इतने छले गये हैं कि वे बहुत दिन तक इंतजार करने की मनःस्थिति में नहीं हैं। सत्ता परिवर्तन की स्थिति में किसी भी कारण से सत्ता परिवर्तन का परिणाम बहुत तेजी से सामने नहीं आया तो बेसब्री में एक भिन्न किस्म का जन-संकट उत्पन्न हो सकता है। इससे राजनीतिक वातावरण में छा जानेवाला दमघोंटू प्रदूषण नये सिरे से ‎‘अति-दक्षिणपंथ’ के प्रभाव विस्तार का रास्ता बनाने लगेगा।

सत्ता परिवर्तन की स्थिति में सबसे पहले नैतिक चक्रव्यूह में फंसी विश्वसनीयता का उद्धार करना होगा। भारत की अर्थ व्यवस्था जिस तरह से ऋण-जाल में (Debt Trap) में फंस गई है, राजस्व रिसाव (Revenue Leakage) के लिए बहुत सारे छिद्र बन गये हैं कि उनका सामंजस्यपूर्ण समायोजन और प्रबंधन बहुत मुश्किल होगा। राजस्व रिसाव की तेज धार और टपकौआ अर्थनीति (Trickle-down Economics) की लगभग अन-उपस्थिति से मचे हाहाकार को शोर कम करने के लिए न्यूनतम आय योजना (न्याय) के किसी-न-किसी स्वरूप को राजनीतिक-आर्थिक परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए लागू करना होगा। राजनीतिक परिस्थिति में परिवर्तित सत्ता से राजस्व अनुशासन में छोटी-सी चूक, गफलत से भयंकर राजनीतिक विस्फोट का खतरा पैदा हो सकता है।

झोला उठाकर चल देनेवालों की बात उन पर ही छोड़ दिया जाये और भारत के भविष्य पर सोचा जाये! यही सृष्टि चक्र है, यही सृष्टि का काल-चक्र है। यह चक्र कभी रुकता नहीं है। आवागमन कभी रुकता नहीं है! कई बार ऐसी परिस्थिति भी होती है, जब आदमी फिर लौटकर वहीं आने के लिए नहीं निकलता है तो‎ इसे नई यात्रा कहा जा सकता है, कहा जाता है। अब लोकतंत्र की नई यात्रा पर भारत को निकलना है, इस मुराद के साथ कि फिर कभी इस तरह के फंदे नहीं फंसना है। लेकिन अभी तो चुनौती इस फंदे से निकलने की है और इंतजार चार जून का है!

(प्रफुल्ल कोलख्यान स्वतंत्र लेखक और टिप्पणीकार हैं)

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