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बाहरी लोगों के इलाज को रोकने के लिए दिल्ली सरकार ने दी अब सुप्रीम कोर्ट में दस्तक

सोशल मीडिया पर लोग सही ही कह रहे हैं कि सरकारें बेशर्म हो गयी हैं और उन्हें न तो संविधान और कानून के शासन की परवाह है न ही न्यायपालिका के आदेशों के प्रति कोई इज्जत है। अब दिल्ली को ही ले लें तो वर्ष 2018 में ही दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को बड़ा झटका देते हुए केजरीवाल सरकार के जीटीबी अस्पताल में केवल दिल्ली के रोगियों को इलाज में प्राथमिकता देने वाले सर्कुलर को खारिज कर दिया था और कहा था कि दिल्ली सरकार का 7 जून, 18 का आदेश असंवैधानिक तथा मानवता के खिलाफ  है।

इसके बावजूद दिल्ली सरकार ने यह हरकत कोरोना की आड़ में किया था और दिल्ली के अस्पतालों में बाहरियों का इलाज न करने का आदेश पारित किया था। अब दिल्ली सरकार हाईकोर्ट के 2018 के फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील दाखिल की है। लेकिन दिल्ली के अस्पतालों में बाहरी लोगों के इलाज को अनुमति देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के 2018 के फैसले पर दिल्ली सरकार की अपील पर उच्चतम न्यायालय में दो हफ्ते के लिए टल गई है।

हालांकि दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल ने सोमवार शाम को आदेश दिया कि राजधानी के सभी सरकारी और निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में निवास के आधार पर बिना किसी भेदभाव के सभी कोविड -19 रोगियों को चिकित्सा सुविधा दी जाएगी। दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर दिल्ली सरकार के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसमें राज्य के सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में बाहरी लोगों के इलाज को प्रतिबंधित करते हुए सिर्फ दिल्ली निवासियों का इलाज करने की बात कही गई है।

उपराज्यपाल के इस आदेश ने दिल्ली सरकार द्वारा रविवार को दिल्ली से इतर निवासियों के चिकित्सा उपचार को प्रतिबंधित करने के लिए पारित आदेश को प्रभावी रूप से रद्द कर दिया। दिल्ली सरकार ने आदेश दिया था कि दिल्ली के अस्पतालों में दिल्ली के निवासियों का ही इलाज होगा। दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अध्यक्ष के रूप में शक्तियों का उपयोग करते हुए, दिल्ली एलजी ने आदेश दिया कि दिल्ली का निवासी नहीं होने के आधार पर किसी भी व्यक्ति के इलाज से इनकार नहीं किया जाना चाहिए। यह सुनिश्चित करने के लिए कि प्रत्येक नागरिक को चिकित्सा सुविधा प्रदान की जाएगी।

एलजी द्वारा आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 18 (3) के तहत शक्तियों के प्रयोग में जारी किया गया आदेश “दिल्ली के एनसीटी में स्थित सभी सरकारी और निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम को दिल्ली के एनसीटी के निवासी होने के आधार पर बिना किसी भी भेदभाव के उपचार के लिए आने वाले सभी कोविड -19 मरीजों के लिए चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार करना है। इस आदेश में  माना गया है कि स्वास्थ्य का अधिकार’ संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत “जीवन का अधिकार” का अभिन्न अंग है।

रविवार को दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग, जीएनसीटीडी के सचिव द्वारा आदेश जारी किया गया था, जो महामारी रोग अधिनियम, 1897 और दिल्ली महामारी रोग, कोविड-19 विनियम 2020 के तहत मिली शक्तियों को लागू करते हुए जारी किया था। दिल्ली में बढ़ रहे कोविड-19 के मामलों की वृद्धि के कारण अस्पतालों में बढ़ रही बिस्तरों की अतिरिक्त मांग का हवाला देते हुए स्वास्थ्य सचिव ने आदेश दिया था कि दिल्ली सरकार के तहत काम करने वाले सभी अस्पताल और सभी निजी अस्पताल और नर्सिंग होम यह सुनिश्चित करें कि इन अस्पतालों में इलाज के लिए सिर्फ दिल्ली के मूल निवासियों को ही भर्ती किया जाए।

इस बीच दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर दिल्ली सरकार के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसमें राज्य के सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में इलाज को प्रतिबंधित करते हुए सिर्फ दिल्ली निवासियों का इलाज करने की बात कही गई है। दिल्ली विश्वविद्यालय के दो छात्रों ने यह याचिका दायर की है। जो मूलतः यूपी और बिहार के निवासी हैं। याचिका में तर्क दिया गया है कि इस फैसले से दिल्ली में रहने वाले उन लोगों की स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जिनके पास दिल्ली के निवास का प्रमाण नहीं है। याचिका में कहा गया है कि दिल्ली सरकार का उक्त आदेश संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करता है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 12 अक्तूबर 2018 को दिल्ली सरकार को बड़ा झटका दिया था। दिल्ली सरकार के जीटीबी अस्पताल में दिल्ली वासियों को इलाज में प्राथमिकता देने वाले सर्कुलर को कोर्ट ने खारिज कर दिया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि राजधानी के सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए किसी भी मरीज के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता है। दिल्ली सरकार द्वारा जारी सर्कुलर को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जीटीबी अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले सभी मरीजों के साथ एक जैसा ही व्यवहार किया जाएगा। दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार के सर्कुलर को भेदभावपूर्ण वाला बताया था। कोर्ट में सर्कुलर को चुनौती देते हुए कहा गया था कि दिल्ली सरकार के सर्कुलर की वजह से दिल्ली के बाहर से आने वाले मरीजों को अस्पताल में इलाज नहीं मिल पा रहा है।

दरअसल दिल्ली हाईकोर्ट में जीटीबी अस्पताल में दिल्ली के मरीजों को प्राथमिकता देने वाले सर्कुलर को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता अशोक अग्रवाल ने जीटीबी अस्पताल में बाहरी मरीजों के इलाज पर रोक लगाने वाले दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग के सर्कुलर को हाईकोर्ट में ये कहकर चुनौती दी थी कि सरकार का आदेश आम लोगों के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है। याचिका में कोर्ट से कहा गया था कि 70 फीसदी गरीब मरीज ही इलाज के लिए सरकारी अस्पताल में जाते हैं।

याचिका में कहा गया था कि दिल्ली सरकार को अपने इस फैसले को वापस लेना चाहिए। अशोक अग्रवाल ने कोर्ट से ये भी कहा था कि अगर सरकारी अस्पताल गरीबों को इलाज नहीं देंगे तो वे कहां जाएंगे। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 यानि जीने के अधिकार के तहत हर व्यक्ति को देश के किसी भी राज्य में आने-जाने और सुविधाएं लेने का अधिकार है। इसके अलावा अनुच्छेद 14 यानी समान अधिकार के तहत भी इस तरह का सरकार का सर्कुलर असंवैधानिक है।

दिल्ली के अस्पतालों में बाहरी लोगों के इलाज को अनुमति देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट  के 2018 के फैसले पर दिल्ली सरकार की अपील पर उच्चतम न्यायालय में दो हफ्ते के लिए टल गई है। बुधवार को ये मामला मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबडे की पीठ के सामने सुनवाई के लिए आया लेकिन याचिकाकर्ता के समय मांगने के चलते मामले की सुनवाई टल गई। दिल्ली सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के 2018 के फैसले को चुनौती दी है जिसमें दिल्ली सरकार के अस्पताल में सिर्फ दिल्ली वालों का उपचार करने के सर्कुलर को रद्द कर दिया गया था।

(वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

This post was last modified on June 11, 2020 11:26 am

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