Mon. Jan 27th, 2020

मुनाफे की बलि बेदी पर चढ़ गयी धान की लहलहाती फसल

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खेतों की बर्बादी।

आखिरकार जिसका डर था वही हो रहा है। हजारीबाग के पकरी बरवाडीह कोयला खदान परियोजना के तहत एनटीपीसी के अधीन त्रिवेणी सैनिक माइनिंग प्राईवेट लिमिटेड कंपनी द्वारा किए जा रहे कोयला खनन से चुरचू इलाके के किसान काफी परेशान हैं। कोयला खनन से निकले मलबे को लहलहाती धान की फसल में डाल दिया जा रहा है और धान के खेतों से होकर कंपनी का हाईवा चलाया जा रहा है। किसानों द्वारा कंपनी की इस दादागिरी के खिलाफ और फसल की बरबादी को लेकर जिला प्रशासन से कई बार शिकायत की गई है, बावजूद इसके किसानों की गुहार को जिला प्रशासन अनसुना करता रहा है। ग्रामीणों द्वारा उपायुक्त हजारीबाग को लिखे पत्र में कहा गया है कि चुरचू के किसानों को एनटीपीसी एवं त्रिवेणी सैनिक कंपनी के पदाधिकारियों द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है, उन्हें मुआवजा देने में धोखाधड़ी भी की जा रही है।

ग्रामीणों ने अपने पत्र में आरोप लगाया है कि क्षेत्र के जमीन मालिकों, एनटीपीसी के पदाधिकारियों, त्रिवेणी सैनिक के पदाधिकारियों, एसपी हजारीबाग तथा अंचलाधिकारी की उपस्थिति में पिछले 18 मई 2019 को हुई बैठक में हुए समझौते का पालन नहीं किया जा रहा है।

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बताते चलें कि एक दशक पूर्व हजारीबाग के पकरी बरवाडीह कोयला खदान परियोजना के तहत शुष्क ईंधन के लिए नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी) का खुली खदान खनन (ओपनकास्ट माइनिंग) की श्रेणी में चयन हुआ था और एनटीपीसी ने परियोजना को अपने अधीन कार्यरत कं. त्रिवेणी सैनिक माइनिंग प्राइवेट लिमिटेड को सौंप दिया। परियोजना को अमली जामा पहनाने की प्रक्रिया में लगभग सात-आठ साल गुजर गए क्योंकि इस परियोजना का क्षेत्र के ग्रामीणों ने जोरदार विरोध किया था। जिसकी वजह यह थी कि यहां के लोगों के पास खेती-बाड़ी के अलावा अजीविका का कोई दूसरा साधन नहीं है। क्योंकि परियोजना के कारण 26 गांवों का अस्तित्व ख़त्म होने का खतरा साफ दिख रहा था। वहीं क़रीब 16,000 लोगों को इन गांवों से विस्थापित कर दिये जाने की आशंका बिल्कुल साफ झलक रही थी। प्रभावित होने वाले सभी किसान हैं।

परियोजना का पहला चरण 39 वर्षों के लिए है और इससे सात गांव प्रभावित होंगे। पहले चरण में 3,319.42 हेक्टेयर के पट्टे वाला क्षेत्र है। पर्यावरण मंजूरी पत्र के अनुसार इनमें से 643.9 हेक्टेयर वन भूमि, 1950.51 हेक्टेयर कृषि भूमि, 159.64 हेक्टेयर बंजर और ऊसर भूमि, 435 हेक्टेयर चारागाह, 101.22 हेक्टेयर मानव बस्तियां और 29 .15 हेक्टेयर में सड़कें और नाला शामिल हैं। यानी 1950.51 हेक्टेयर कृषि भूमि, 101.22 हेक्टेयर मानव बस्तियां और 435 हेक्टेयर चारागाह, कुल मिलाकर 2441.73 हेक्टेयर जमीन की विकास के नाम पर बली की परियोजना तैयार की गई, जो मानव जीवन का आधार रहा है।

ग्रामीणों के इस विरोध के बीच कई सरकारें आईं-गईं, मगर किसी सरकार ने ग्रामीणों के विरोध को झेलने की हिम्मत नहीं दिखाई। 2014 के अंत में रघुवर सरकार सत्ता में आई। इस सरकार ने अपने एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए उक्त परियोजना को 16 फरवरी, 2016 को हरी झंडी दे दी। लेकिन क्षेत्र में परियोजना का विरोध थमने का नाम नहीं लिया और काम शुरू होते ही 1 अक्तूबर को पुलिस की फायरिंग में 4 लोग मार दिए गए जिसमें 16 साल का एक छात्र भी था जो पुलिस द्वारा की जा रही फायरिंग का शिकार हो गया।

इस घटना में एएसपी अभियान कुलदीप कुमार व अंचलाधिकारी (सीओ) बड़कागांव शैलेश कुमार सहित एक दर्जन से अधिक लोग घायल हो गए थे, जिसमें सात पुलिसकर्मी भी शामिल थे। गंभीर रूप से घायल एएसपी, सीओ व कांस्टेबल अजय कुमार प्रमाणिक को हजारीबाग से हेलीकॉप्टर से रांची के मेडिका अस्पताल रेफर किया गया था।

झड़प के बाद ग्रामीणों ने एक शव के साथ बड़कागांव रोड को जाम कर दिया था, जिससे बड़कागांव-हजारीबाग मार्ग पर आवागमन पूरी तरह ठप था। मामले में कुछ लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। कुछ दिनों तक पूरे इलाके में तनाव बना रहा।

कुछ दिनों के सन्नाटे के बाद मई 2018 में ओपनकास्ट माइनिंग की शुरुआत की गई। जिसके चलते 26 गांवों का अस्तित्व ख़त्म होने के कगार पर आ गया है। करीब 16,000 लोगों का विस्थापित होने का खतरा बढ़ गया है, जिनकी अब तक जीविका केवल खेती रही है। 

बरकागांव रिज़र्व फॉरेस्ट कोर जोन और बफर जोन में स्थित है। इस खनन क्षेत्र में स्लॉथ बियल जैसे लुप्तप्राय जीव हैं। घाघरी नदी पश्चिम से पूर्व तक 1.5 किमी की दूरी पर खनन भूमि के दक्षिण में बहती है। हाहरो नदी दक्षिण पश्चिम से उत्तर दिशा की तरफ खनन भूमि से 1.5 किमी दक्षिण की दूरी पर बहती है। परियोजना से इनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा इतना तय है।

इस क्षेत्र के अधिकांश लोग कृषि पर ही निर्भर हैं। उनके पास आय का कोई दूसरा स्रोत नहीं है। इन गांवों में भूमि के पूर्ण अधिग्रहण से क़रीब 7,000 से ज़्यादा लोगों की आजीविका पर प्रभाव पड़ेगा।

इलाके के निवासी इतने डरे हुए हैं कि वे पुलिस कार्रवाई के भय से मीडिया से बात तक नहीं करना चाहते हैं।

आजीविका के मुद्दों के अलावा कई अन्य समस्याएं हैं जो ग्रामीणों के अस्तित्व को चुनौती दे रही हैं। दबे स्वर में ग्रामीण दीपक दास बताते हैं कि खुली खदान खनन की वजह से सभी तालाब और कुएं सूख गए हैं जिससे पानी की काफी क़िल्लत हो रही है। खनन के दौरान ज़ोरदार विस्फोट से हमारे घरों को नुकसान पहुंचता है। बच्चे और महिलाएं कई बीमारियों के शिकार हो गए हैं। इसके अलावा कई समस्याएं हैं। सरकार ने हमारे जीवन को इतना नरक बना दिया है कि हम उसकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए तैयार हो जाएं।

बरकागांव और खरादी ब्लॉक में कम से कम 36 कोयले के ब्लॉक हैं जहां तीन चरणों में खनन किया जाएगा, इसके चलते 210 गांव लुप्त हो जाएंगे। अगर स्थानीय लोगों की बात मानी जाए तो इससे क़रीब 1.5 लाख से ज़्यादा लोग प्रभावित होंगे।

प्रभावित गांवों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत सरकार द्वारा किए गए आवंटन को कथित तौर पर रोक दिया गया है। गांव के मुखिया को उससे संबंधित पंचायतों के विकास के लिए दिए गए फंड को खर्च करने से रोक दिया गया है, क्योंकि ये भूमि कंपनी द्वारा अधिग्रहीत की जा चुकी है।

दूसरी तरफ पुनर्वास तथा पुनःस्थापन और सीएसआर नीति के संबंध में एनटीपीसी बड़ा दावा करती है कि आर एंड आर कॉलोनी जैसी संरचना में सभी आधुनिक सुविधाएं हैं। जैसा कि ये कंपनी दावा करती है कि वह नियमित रूप से परियोजना प्रभावित क्षेत्रों में सीएसआर गतिविधियों का संचालन भी कर रही है। चाहे वह कौशल विकास, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य या कल्याणकारी गतिविधि से संबंधित हो एनटीपीसी वहीं सब कुछ कर रही है।

युवाओं के कौशल विकास के लिए वह राज्य के स्वामित्व में बिजली उत्पादक होने का दावा करती है। वेल्डर, फिटर और इलेक्ट्रीशियन जैसे व्यवसायों के लिए अपनी आईटीआई के माध्यम से लोगों को प्रशिक्षण देने का काम कर रही है। महिला सशक्तिकरण का भी ये कंपनी दावा करती है। जिसमें उसका कहना है कि वह झारक्राफ्ट और सहकारी समिति के साथ मिलकर सिलाई मशीन चलाने का प्रशिक्षण दे रही है।

आर एंड आर गतिविधियों के बारे में और जानकारी देते हुए एनटीपीसी के एक अधिकारी बताते हैं कि एनटीपीसी पकरी बरवाडीह ने 15 से अधिक स्कूलों को मॉडल स्कूल में परिवर्तित कर दिया है। इसने शिक्षा के लिए विभिन्न प्रकार की सहायता जैसे अध्ययन सामग्री, स्कूल यूनिफॉर्म, और मेधावी छात्रों को छात्रवृत्ति, पुस्तकालय के लिए किताबें, विज्ञान के छात्रों के लिए मोबाइल लैब आदि प्रदान किया है।

उनका दावा है कि कंपनी स्कूलों और गांवों में नियमित अंतराल पर स्वास्थ्य शिविर लगाती है जिसके तहत एक महीने में कम से कम 15-16 शिविर लग जाते हैं। साथ ही मुफ्त दवाएं भी वितरित करती है। महिलाओं की चिकित्सा जांच के लिए महिला स्त्री रोग विशेषज्ञ भी तैनात किए गए हैं। स्वच्छ भारत अभियान के माध्यम से एनटीपीसी ने एक जागरूकता कार्यक्रम शुरू किया है और वह लोगों को स्वच्छता के लाभ के बारे में जागरूक कर रही है।

वहीं स्थानीय लोग इस दावे को जुमलेबाज़ी कहते हुए ख़ारिज करते हैं। वहीं के रहने वाले इलियास कहते हैं कि प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए बनाए गए आर एंड आर कॉलोनी का निशान तक नहीं है। यह घटिया गुणवत्ता वाली सामग्री से बनाया गया है। बरसात के मौसम में कई घर गिर गए।

शिक्षा, कौशल विकास और स्वास्थ्य के अन्य दावों को भी लोग खरिज करते हैं। अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर कई लोगों ने बताया कि सब कुछ सिर्फ कागज़ पर है। जो दावा किया गया है उसे ज़मीन पर हमने अब तक कुछ भी नहीं देखा है। कंपनी का आर एंड आर पाखंड के अलावा और कुछ भी नहीं है।

कैलाश कुमार ने बताया कि चुरचू इलाके में खनन वाले कोयले को किसानों की उस जमीन पर डंप कर दिया जा रहा है, जिसका अधिग्रहण नहीं हुआ है।

सुनीता देवी बताती हैं कि कंपनी ने उनके धान के खेतों को बर्बाद कर दिया है। जबकि उनका जीने का यही एक आसरा है।

गोबर्धन दास कहते हैं कि उनकी न तो कंपनी वाले सुनते हैं न ही प्रशासन सुनता है। उनके धान के खेतों पर कंपनी का हाईवा चलाया जा रहा है।

ग्रामीण बताते हैं कि रोजगार के साथ-साथ इलाके में हो रही फसलों की बर्बादी की क्षतिपूर्ति की शर्त पर ही किसानों ने जमीन दी थी, जिसका पालन नहीं हो रहा है।

कुछ किसान मुआवजे से संतुष्ट नहीं हैं और इसका मामला रांची कोर्ट में चल रहा है, बावजूद उसके कंपनी उन जमीनों का भी उपयोग कर रही है जिन पर मुकदमा चल रहा है।

(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल बोकारो में रहते हैं।) 

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