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कोरोना की आड़ में श्रम कानूनों पर हमला

मजदूर किसी भी देश की रीढ़ है बिना इनके कोई भी देश विकास की सीढ़ियां नहीं चढ़ सकता यह पहले से ही तय था, परन्तु वर्तमान स्थिति में इसकी सार्थकता और बढ़ गयी है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का दारोमदार इन्हीं के कन्धों पर निर्भर है। मजदूर को अपने श्रम का उचित मूल्य मिल सके और वह एक बेहतर स्थिति में काम कर सके इसके लिए विभिन्न आन्दोलन चले। आन्दोलनों के फलस्वरूप श्रम कानून बने जिससे यह सुनिश्चित हो पाया कि मजदूरों को सम्मानजनक मजदूरी और रोजगार मिले।

कोरोना महामारी से पहले ही भारत सरकार द्वारा पूंजीपतियों के हितों को साधते हुये श्रम कानूनों को ‘4 लेबर कोड’ में बदलने की प्रकिया जारी थी यह बदलाव सरकार द्वारा श्रम कानूनों को खत्म करने का पुरजोर प्रयास था। अब इस महामारी की आड़ में विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा श्रम कानूनों में नकारात्मक बदलाव किये गए हैं। इसका सीधा-सीधा उद्देश्य है पूंजीपतियों के प्रति सरकार का निष्ठा भाव और मजदूरों का शोषण है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने अगले आने वाले तीन सालों के लिए श्रम कानूनों को ताक पर रख दिया है, उनके द्वारा जो कारण बताया गया है वह यह कि कोविड-19 के चलते उद्योग धन्धों पर विपरीत असर हुआ है एवं अर्थव्यवस्था चरमरा गयी है। उनका कहना है कि फिर से अर्थव्यवस्था को जीवित करने के लिए इस तरह के बदलाव की जरूरत है ताकि अर्थव्यवस्था पटरी पर आ सके। जिन कानूनों में ढील दी गई है वह यह है कि अगर कोई मजदूर दावा करता है कि उसे समय पर मजदूरी नहीं मिल रही है या बिना कारण बताये वह नौकरी से निकाल दिया जाता है तो वह गैरकाूननी नहीं होगा। मजदूरों को सवाल पूछने का कोई अधिकार नहीं है कि उन्हें काम से क्यों हटाया जा रहा है।

दूसरा बड़ा बदलाव है स्वास्थ्य सुरक्षा का, अगर काम के दौरान किसी मजदूर के साथ कोई हादसा हो जाता है तो मालिकों द्वारा उस हादसे की कोई जवाबदेही नहीं होेगी और ना ही मजदूर को किसी प्रकार का कोई मुआवजा मिलेगा, अगर वह मजदूर मालिकों के उपयोग का नहीं रहा तो वह उसे निकाल भी सकते हैं। ना ही कोई मजदूर यह मांग कर सकता है वह सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल में काम करने का हकदार है। इतने सालों के संघर्षों के बाद मजदूरों के काम करने के घंटे 8 एवं प्रति सप्ताह 48 घटें का अधिकार प्राप्त किया था, यह बहुत निराशाजनक स्थिति है कि इसे भी बदल कर प्रति दिन 12 घंटे किया जा रहा है।

सवाल यहां यह है कि क्या अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का काम सिर्फ मजदूरों के हकों का हनन करके ही संभव है, क्या मालिकों के मुनाफे को कम नहीं किया जा सकता था। जवाब है पर फिर एक सवाल है कि उसकी पेचीदगी को कौन बया करे। क्योंकि मजदूर सबसे कमजोर कड़ी माना गया है। सरमायेदारों की नजरों में जिसे तोड़ना बहुत आसान है। बदले हुए कानूनों के तहत वे सभी मजदूर शामिल हैं जो किसी भी ट्रेड यूनियन का हिस्सा हैं, ठेका मजदूर और प्रवासी मजदूरों की श्रेणी में आते हैं।

साठ-गांठ से बनी मध्य-प्रदेश सरकार ने भी कोविड-19 को ढाल के रूप में इस्तेमाल करते हुए श्रम कानूनों में बदलाव किया है। नई कंपनियों, दुकानों का पंजीकरण अब 30 दिन की बजाय मात्र एक दिन में होगा। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने कृषि क्षेत्र में सुधार के नाम पर किए गए बदलाव के बाद श्रम कानूनों में भी भारी बदलाव किये हैं। जिसमें कंपनी के पंजीकरण की सुविधा के साथ कंपनी को बार-बार अपने लाइंसेस के नवीनीकरण के लिए नहीं देना होगा, उनका कहना है कि इससे काम करना आसान होगा एवं इस पहल से ईज ऑफ डूईंग बिजनेस को भी बढ़ावा मिलेगा जो कि मोदी सरकार के प्रमुख लक्ष्यों में से एक है।

जहां पहले हर साल कंपनियों को अपना लाइसेंस रिन्यू करवाना होता था वहीं अब इसकी अवधि बढ़ाकर 10 साल कर दी गई है। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा श्रम कानूनों में किये गए बदलावों में से मुख्य बदलाव है काम के घंटों को 8 से बढ़ा कर 12 कर देना, दूसरा मुख्य बदलाव यह है कि यदि कोई उद्योगपति लाइसेंस के लिए आवेदन करता है और उसे अधिकारियों द्वारा एक दिन में ही लाइसेंस उपलब्ध नहीं करवाया जाता है तो वह सरकार उस अधिकारी से जुर्माना वसूल कर आवेदन कर्ता को देगी। ऐसे छोटे और मध्यम उद्योग जहां पर 50 से कम मजदूर काम करते हैं उन फर्माें का निरीक्षण नहीं किया जायेगा।

निरीक्षण करने का उद्देश्य होता था कि मजदूर सुरक्षित तरीके से काम कर रहे हैं या नहीं, जहां वे काम कर रहे हैं उस जगह पर काम करने के लिए जरूरी बुनियादी सुविधायें हैं या नहीं। पर बदले नियमों और कानूनों के तहत यह नहीं होगा। यह मालिकों की इच्छा पर निर्भर करता है कि वह चाहे एक ही कमरे में 50 मजदूरों से काम करवाये। इस दयनीय स्थिति पर मजदूर कहीं शिकायत दर्ज नहीं करवा सकता है, साथ ही इस नियम के बाद अब सरकार की भी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है कि वह स्वयं निरीक्षण करे। महिलाओं को रात की शिफ्ट में काम करने की अनुमति तो दे दी परन्तु उनकी सुरक्षा से पल्ला भी झाड़ लिया।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के अलावा राजस्थान, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, और महाराष्ट्र आदि राज्यों ने श्रम कानूनों में बदलाव किया है। इन सभी राज्यों ने मजदूरों को मजदूर न समझते उनकी अस्मिता पर कुठाराघात किया है, जिसके तहत वर्षों के आन्दोलनों के फलस्वरूप मिलने वाला अधिकार जिसमें काम के घंटों को निश्चित किया गया था उसे 8 से बढ़ा कर 12 कर दिया। क्या यही न्यू इंडिया है जो मजदूरों का शोषण करके निर्मित हो रहा है।

केरल सरकार ने मजदूरों के प्रति सकारात्मक रूख अपनाते हुये स्पष्ट किया है कि वह पहले से बने श्रम कानूनों के साथ छेड़छाड़ न करते हुये नये निवेशकों को प्रोत्साहित किया है। उसका कहना है कि यदि वह निवेश करना चाहते हैं तो उन्हें राज्य सरकार द्वारा पूरा समर्थन दिया जायेगा बशर्ते वे मजदूर कानूनों का हनन न करें।

वैश्विक स्तर पर बहस छिड़ी हुई है। कोविड-19 ने जिस तरह से देशों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है उसे चौथी औद्योगिक क्रांति का नाम भी दिया जा रहा है। अनुसंधानकर्ताओं का मानना है कि सीधे तौर पर मजदूरों की छंटनी की जा सकती थी परन्तु उसके मालिकों को भी जवाब देने होते, जो सरकारों की पूंजीपतियों के प्रति निष्ठा पर सवाल होता, वैश्विक स्तर पर मजदूरों के हक अधिकारों का हनन बहुत तेजी से किया जा रहा है। अगर कोविड-19 की त्रासदी न होती तो शायद सीधे तौर पर इतने बड़े बदलाव करना इतना आसान नहीं होता जितने इस महामारी की आड़ में किये जा रहे हैं।

(बलजीत मेहरा स्वतंत्र शोधार्थी और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। पिछले पाँच सालों से अलग-अलग पत्र-पत्रिकाओं में पर्यावरण और मज़दूर सवालों पर लेखन का काम कर रही हैं।)

This post was last modified on May 13, 2020 3:15 pm

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