Monday, August 8, 2022

उत्तराखंड: फिर अंगड़ाई लेने लगी आंदोलनों की धरती

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हेलंग (जोशीमठ)। जन आंदोलनों की धरती उत्तराखंड एक बार फिर अंगड़ाई लेती प्रतीत होने लगी है। वजह एक बार फिर गौरा देवी के चिपको आंदोलन की धरती बनी है, यानी जोशीमठ घाटी। चमोली जिले के हेलंग में महिलाओं से घास छीनने की घटना के बाद राज्यभर के आंदोलनकारियों और विभिन्न संगठनों के लोगों का इस सुदूरवर्ती गांव में जमा होना और इसके साथ ही पूरे राज्य में हेलंग को लेकर धरने-प्रदर्शनों का दौर शुरू होना, कुछ संकेत तो दे ही रहा है। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के बाद जब उत्तराखंड राज्य बना तो यहां के लोगों ने कई सपने देखे। लेकिन पिछले 22 वर्षों में उत्तराखंड का आम जनमानस लगातार छला जाता रहा। हेलंग के बहाने पिछले 22 वर्षों का गुस्सा एक बार फिर उबलता प्रतीत हो रहा है। 24 जुलाई को हेलंग में हुआ विरोध प्रदर्शन वैसे तो शांतिपूर्वक निपट गया। न तो आंदोलनकारियों की ओर से कोई जोर-जबदरस्ती की गई और न पुलिस ने किसी को रोकने की कोशिश की। पुलिस बल मौके से 5 किमी दूर तैनात किया गया। 

हेलंग प्रदर्शन में राज्य के लगभग सभी जिलों से लोगों ने भागीदारी की। उत्तराखंड आंदोलन के बाद यह पहला मौका था, जब किसी एक जगह पर सभी राज्यों के आंदोलनकारी एकत्रित हुए। पहली बार में यह संख्या बेशक कुछ कम रही हो, लेकिन जो ध्वनि इस प्रदर्शन से निकली, उसकी गूंज लगातार आगे बढ़ेगी, ऐसा राज्यभर के लोगों के रुख से प्रतीत हो रहा है। इस प्रदर्शन के बाद आंदोलनकारियों ने स्पष्ट रूप से कुछ मांगें रखी हैं। पहली मांग चमोली के डीएम का स्थानान्तरण करने की है। आरोप लगाया गया है कि महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार का वीडियो वायरल होने के बाद डीएम पूरी मजबूती के साथ ग्रामीण महिलाओं के खिलाफ खड़े नजर आये और उन्होंने महिलाओं को झूठा साबित करने के लिए ग्राम प्रधान और कुछ अन्य लोगों के वीडियो बनवाकर अपने सोशल मीडिया अकाउंट से जारी किये। 15 जुलाई को जिन पुलिस और सीआईएसएफ के कर्मचारियों ने महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया उनके साथ ही महिलाओं के साथ ही दो साल की बच्ची को कई घंटे अवैध रूप से हिरासत में रखने के जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कार्रवाई करने की मांग की गई है। 

आंदोलनकारियों का आरोप है जिस जमीन पर विद्युत परियोजना बना रही कंपनी प्रशासन की शह पर कब्जा करके डंपिंग ग्राउंड बनाना चाहती है वह चरागाह भूमि है। इसे गैरकानूनी तरीके से कंपनी को दिया गया है। इस तरह से यह वन पंचायत नियमावली और वनाधिकार कानून 2006 का उल्लंघन है। ऐसे में जमीन कंपनी को देने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। विवादित भूमि पर पेड़ काटने और मलबा अलकनन्दा नदी में डालने के लिए टीएचडीसी पर मुकदमा दर्ज करने की भी मांग की गई है। इसके साथ ही महिलाओं के साथ हुई घटना की हाईकोर्ट के सेवारत अथवा सेवानिवृत्त न्यायाधीश से जांच करवाने की भी मांग की गई। 

देहरादून में भूकानून को लेकर आंदोलन तेज करने का आह्वान।

इस आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए पहली अगस्त को सभी जिला मुख्यालयों और जितना संभव हो उतने तहसील मुख्यालयों पर धरने-प्रदर्शन आयोजित करके इन मांगों को लेकर ज्ञापन देने का फैसला किया गया। इसके अलावा आने वाले दिनों में अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों से मिलने और सीएम आवास का घेराव करने का प्रस्ताव भी रखा गया, हालांकि इसके लिए अभी दिन तय नहीं किया गया है। हेलंग के आंदोलन में यह भी देखा गया कि प्रशासन ने हालांकि सीधा टकराव नहीं किया, लेकिन प्रदर्शन को नाकाम करने के हर संभव प्रयास किये गये। पटवारी और अन्य अधिकारियों के स्तर पर ग्राम प्रधानों और सरपंचों के साथ ही महिला मंगल दलों को भी फोन करके प्रदर्शन में हिस्सा न लेने की सलाह दी गई और इसका असर भी देखा गया। प्रदर्शन में स्थानीय महिलाओं की भागीदारी अच्छी रही, लेकिन पुरुषों की संख्या कम रही।

हेलंग के वायरल वीडियो को कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने भी शेयर किया है। लेकिन, स्थानीय स्तर पर कांग्रेसियों की भूमिका हेलंग मसले को लेकर पूरी तरह से नकारात्मक रही। वीडियो वायरल होने और राज्य के विभिन्न हिस्सों में पहले दौर के धरने-प्रदर्शनों के बाद बदरीनाथ विधायक राजेन्द्र भंडारी ने एक बयान जारी किया। इससे ज्यादा किसी कांग्रेसी ने कोई बयान नहीं दिया। और तो और हेलंग के प्रदर्शन में भी कांग्रेस के पदाधिकारी नदारद रहे। दरअसल हेलंग के ग्राम प्रधान कांग्रेस से जुड़े हैं। यह वही ग्राम प्रधान हैं, जिन्होंने फर्जी तरीके के प्रस्ताव बनाकर कंपनी को जमीन सौंपी है। माना जा रहा है कि कांग्रेस के कुछ अन्य पदाधिकारी भी कंपनी से साठ-गांठ में शामिल हैं। ऐसे में अब जबकि प्रियंका गांधी ने वीडियो शेयर किया है तो स्थानीय कांग्रेसियों के लिए एक असहज कर देने वाली स्थिति पैदा हो गई है।

इस बीच देहरादून में भू-कानून को लेकर भी आंदोलन गति पकड़ रहा है। भू-कानून संयुक्त संघर्ष मोर्चा का गठन करके इस आंदोलन को आगे बढ़ाया जा रहा है। 24 जुलाई को ही देहरादून में भू-कानून संयुक्त संघर्ष मोर्चा के बैनर तले प्रदर्शन किया गया। इस धरने में हेलंग के प्रदर्शन को पूरी तरह से समर्थन देने और इसके लिए होने वाले हर आंदोलन में हिस्सा लेने का संकल्प लिया गया। इस धरने के माध्यम से 2019 में लागू किये गये भू-कानून को रद्द करने की मांग की गई। कहा गया कि इस कानून में उत्तराखंड में किसी को भी असीमित जमीन खरीदने की छूट दी गई है, जबकि पहले ऐसा नहीं था। इस धरने के माध्यम से राज्य में हिमाचल प्रदेश और अन्य कई हिमालयी राज्यों की तरह भू-कानून बनाने की मांग भी की गई। 

दरअसल हेलंग के बहाने भी एक तरह से पहाड़ों में जल, जंगल और जमीन बचाने की ही मांग तेज हुई है। भूकानून के लिए किया जाने वाला आंदोलन भी इसीलिए है। 2019 में उत्तराखंड भू-कानून में किये गये बदलाव के बाद राज्य में जमीनों की भारी खरीद-फरोख्त शुरू होने की बात कही जा रही है। भू-कानून संयुक्त संघर्ष मोर्चा ने 30 जुलाई को बैठक बुलाई है। इस बैठक में आंदोलन की आगे की रणनीति तय की जाएगी। ज्यादातर लोग ये मानकर चल रहे हैं कि हेलंग आंदोलन और भू-कानून आंदोलन अलग-अलग न चलाकर एक साथ चलाए जाएं और यह सिलसिला लगातार देहरादून और राज्य के अन्य हिस्सों में जारी रखा जाए।

(हेलंग, जोशीमठ से वरिष्ठ पत्रकार और एक्टिविस्ट त्रिलोचन भट्ट की रिपोर्ट।)

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