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पुलिस के खौफ से हो गयी झारखंड में एक शख्स की मौत!

झारखंड के गढ़वा जिले में स्थित भंडरिया थाने के नवका गांव के किरपाल मांझी उर्फ पाला (48 वर्ष) की पिछली 30 मई को पुलिस हिरासत में हुई मौत अभी भी रहस्य ही बनी हुई है। एक तरफ जहां पुलिस किरपाल मांझी की मौत पुलिस हिरासत में होने से साफ इंकार कर रही है, वहीं ग्रामीण और किरपाल मांझी के परिजन उनकी मौत का जिम्मेदार पुलिस को ही मानते हैं।

मृतक किरपाल मांझी का बड़ा लड़का जोगेशर मांझी (22 वर्ष) ने बताया कि 30 मई को मेरे पिता सुबह 8 बजे के करीब जंगल से जलावन की लकड़ी व झाड़ी वगैरह लेकर आए और नाश्ता करके घर के सामने के चबूतरे पर बैठे थे कि तभी गांव के चौकीदार जोगेन्दर पासवान के साथ गम्हरिया थाने के चार पांच पुलिस के जवान आए और पिताजी को थाना चलने को कहा। चौकीदार ने कहा कि बड़ाबाबू (थानेदार) ने पूछताछ के लिए बुलाया है। इस पर वहां मौजूद मेरे चाचा ने पूछा कि कैसी पूछताछ? तो उसने बताया कि वह थाना जाने के बाद ही पता चलेगा।

जोगेशर का कहना है कि करीब एक घंटा बाद मेरे चाचा के मोबाइल पर चौकीदार का फोन आया। उसने बताया कि मेरे पिताजी की अचानक तबियत खराब हो गई है, उन्हें गम्हरिया रेफरल अस्पताल में भर्ती किया गया है। चौकीदार ने बताया कि थाना जाने के क्रम में रास्ते में वे कांपने लगे थे और थाना पहुंचते ही बेहोश हो गए।

जोगेशर ने बताया कि जब हम लोग अस्पताल गए तो देखा कि अस्पताल में उन्हें 2 इन्जेशन दिया जा रहा है और महिला डाक्टर बोलीं कि इन्हें घर ले जाइए, एक घंटा बाद ठीक हो जाएंगे। पुलिस द्वारा एक 407 गाड़ी में उन्हें हमारे घर लाया गया। फिर चबूतरे पर उन्हें रखकर पुलिस तुरंत चली गई। हम लोग इंतजार में थे कि वे एक घंटा में ठीक हो जाएंगे। लेकिन एक घंटे के पहले ही उनकी मौत हो गई। मृतक के बेटे और बेटी ने बताया कि उन्हें कोई भी बीमारी नहीं थी।

बता दें कि किरपाल मांझी की पत्नी का पांच साल पहले ही देहांत हो चुका है। उनके दो बेटे और एक बेटी है। छोटा बेटा सदन मांझी की उम्र 15 साल है, वह सातवीं तक पढ़ा है। बड़ा बेटा जोगेशर 8वीं तक पढ़ा है और उसकी शादी हो चुकी है। बेटी 17 साल की है, वह मात्र चौथी तक पढ़ी है। किरपाल दैनिक मजदूरी कर अपना व अपने बच्चों को पेट पालते थे। जिसकी जिम्मेदारी अब जोगेशर के कंधे पर आ गई है। जोगेशर मांझी ने बताया कि वह भईंहार जाति से आते हैं जो ओबीसी की श्रेणी में आती है।

वैसे ग्रामीणों के विरोध को देखते हुए भंडरिया के बीडीओ विपिन कुमार भारती ने पारिवारिक लाभ के तहत 20 हजार रुपए, एक इंदिरा आवास देने की घोषणा की है। वहीं मामले की उच्चस्तरीय जांच करने पर भी सहमति जताई है। जबकि ग्रामीणों ने 31 मई को एक बैठक करके प्रशासन को एक मांग पत्र दिया है जिसमें भंडरिया पंचायत मुखिया सुशीला केरकेट्टा की अध्यक्षता में ग्राम नवका स्थित भुरकादोहर के ग्रामीणों की बैठक की गई।

बैठक में मुख्य रूप से प्रखंड विकास पदाधिकारी विपिन कुमार भारती व थाना कर्मी श्रवण कुमार की उपस्थिति रही।

बैठक में प्रस्तावित बिन्दु थे

ग्रामीणों की माँगें हैं:

1. मृतक किरपाल मांझी उर्फ पाला मांझी की पुलिस हिरासत में रहस्यमयी मौत की उच्च स्तरीय टीम द्वारा निष्पक्ष जाँच एवं दोषियों पर कारवाई की जाए।

2. मृतक के आश्रितों को प्रशासनिक स्तर से उचित मुआवजा दिया जाए ।

3. मृतक के परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी जाए।

उपरोक्त तीनों माँगों के साथ उपस्थित ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से निर्णय पारित करते हुए सहमति देकर अपने हस्ताक्षर किये ।

बताते चलें कि किसी पुराने मामले में पूछताछ के लिए भंडरिया थाना की पुलिस 30 मई की सुबह आठ बजे किरपाल मांझी को थाना लायी थी। उसके बाद उनकी मौत हो गई।  पुलिस का कहना है कि किरपाल की मौत मिर्गी का दौरा पड़ने से हुई है। जबकि दूसरी ओर परिजनों का कहना है कि उन्हें मिर्गी की बीमारी थी ही नहीं। वहीं मामले पर डॉक्टर का कहना है कि बेहोशी की हालत में किरपा को उनके पास लाया गया था, उनकी स्थिति गंभीर देख तत्काल रेफर किया गया था।

ग्रामीणों का आरोप है कि पुलिस ने दबाव बनाकर परिजनों से सादे कागज पर हस्ताक्षर करा लिया है। दूसरी ओर एसपी श्रीकांत एस खोत्रे ने कहा है कि मामले की जांच करायी जायेगी और दोषी पर कार्रवाई होगी। थाना प्रभारी लक्ष्मीकांत ने कहा है कि थाने में मौत नहीं हुई है। एक पुराना मामला कांड संख्या 34/2001 में पूछताछ के लिए उन्हें थाना लाया जा रहा था कि रास्ते में आरोपी को मिर्गी का दौरा पड़ा और तबियत बिगड़ गई।

पर अहम सवाल यह है कि कौन सा ऐसा मामला है जिसके बारे 20 साल बाद पुलिस की नींद खुली। पुलिस इस बारे बताने से भी कतरा रही है।

अब तक यह खुलासा नहीं हो पाया है कि आखिर पुलिस किरपाल को गिरफ्तार कर क्यों ले गई? जबकि किरपाल का किसी भी तरह का कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं है।

दूसरी तरफ गांव वाले यह आशंका व्यक्त कर रहे हैं कि पिछली मार्च में होली के दिन गांव की ही एक विधवा महिला (45 वर्ष) की हत्या हो गई थी। उसके पति की मौत तीन साल पहले हो गई थी। उसकी कोई संतान नहीं थी, तथा उसका कोई रिश्तेदार भी नहीं था। वह अकेले रहती थी। हत्या के दिन उसे बाजार से लौटते हुए देखा गया था। उसके बाद उसकी लाश रेलवे क्रासिंग के पास मिली थी। पुलिस इस मामले स्वतः संज्ञान में लेकर जांच कर रही थी।

बताया जाता है कि घटना के बाद गम्हरिया पुलिस ने पूछताछ के लिए जग्गू मांझी (60 वर्ष) को ले गई थी तथा पूछताछ के क्रम में उसे चार-पांच थप्पड़ और चार-पांच डंडे मारे गए थे। थप्पड़ का इतना असर हुआ कि आज भी जग्गू के कान सुन्न हैं। बता दें कि जग्गू किरपाल मांझी का रिश्तेदार है। उसी समय गांव का रघुनाथ मांझी (45 वर्ष) से भी पुलिस ने पूछताछ की थी, बताया जाता है पुलिस ने उसे जमकर पीटा था। लेकिन हत्या का कोई खुलासा नहीं हुआ। लोग किरपाल की गिरफ्तारी को इसी मामले से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि पुलिस कुछ बताने को तैयार नहीं है।

किरपाल मांझी की मौत पुलिस पर कई सवाल खड़े करती है। अगर पुलिस की बात पर यकीन किया जाए कि मृतक का कोई टार्चर नहीं किया गया। वह अचानक बेहोश हो गया और उसकी मौत हो गयी, तो सबसे बड़ा सवाल यह बनता है कि ऐसा क्यों हुआ? जाहिर है लोगों के भीतर पुलिस का भय बरकरार है। संभवतः पुलिस के डर से उसका ब्रेन हैमरेज हो गया हो और वह उसकी मौत का कारण बना। तो क्या ऐसे में पुलिस पर गैर  इरादतन हत्या का मामला नहीं बनता है?

गांव के ही समाजसेवी प्रशांत टोप्पो कहते हैं कि किरपाल मांझी की मौत भले ही पुलिस टार्चर से नहीं हुई हो, लेकिन इलाके में पुलिस का दहशत इतना है कि लोग पुलिस का नाम सुनते परेशान हो जाते हैं।

जबकि किरपाल मांझी काफी सीधा- सादा आदमी था। उसका कभी भी पुलिस से पाला नहीं पड़ा था। वहीं वह पुलिस के टार्चर के किस्से सुन रखे थे। संभवत पुलिस के भय से वह  बीमार पड़ गया और बेहोश हो गया। उसके बाद उसकी मौत हो गई। सबसे बड़ी बात है कि उसके खिलाफ कोई मामला नहीं था, फिर पुलिस उसे पूछताछ करने क्यों बुलाई? जाहिर इसी भय से उसकी मौत हो गई। जिनकी जिम्मेदारी पुलिस पर जाती है। ऐसे में पुलिस पर गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज होना चाहिए।

प्रशांत टोप्पो ग्राम पोस्ट थाना भंडरिया जिला गढ़वा के रहने वाले हैं और वे एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनका मानना है कि किरपाल मांझी दिमागी तौर पर परेशान हो गए होंगे,  जिसके कारण उनकी मौत हो गयी। इससे साफ पता चलता है कि पुलिस प्रशासन का खौफ ग्रामीणों पर बना हुआ है जबकि पुलिस प्रशासन ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए है। यदि पुलिस प्रशासन का खौफ इतना ज्यादा है तो साफ पता चलता है कि पुलिस प्रशासन द्वारा ग्रामीणों को उनके अधिकारों के प्रति अपनी जिम्मेदारियां नहीं निभा पा रही है।

बीजेपी ने हेमंत सोरेन पर निशाना साधते हुए पूछा है कि आखिर पुलिस कस्टडी में हुई मौत का दोषी कौन है?

इधर प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद दीपक प्रकाश ने इस घटना को दुःखद बताते हुए कहा कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो आम जनता का दुःख कौन दूर करेगा। उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से सवाल पूछा कि गढ़वा के भंडरिया में पूछताछ के लिए युवक को घर से उठाकर पुलिस ले जाती है और कुछ घंटों में उसकी लाश बिना पोस्टमार्टम के उसके घर पहुंचा देती है, आखिर पुलिस कस्टडी में हुई मौत का दोषी कौन है?

(झारखंड से विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on June 1, 2021 10:16 pm

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