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‘सेव मिडिल क्लास’ कैंपेन और कोविड-19 क्राइसिस में ईएमआई वर्ग का स्यापा

भारत का नौकरीपेशा मध्यवर्ग दक्षिणपंथी कट्टरवाद का कोर-सपोर्टर रहा है। सरकार ने एक तरह से हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की नाल साफ करने का जिम्मा इसी वर्ग के हवाले कर रखा था। सोशल मीडिया से लेकर कॉलोनियों तक इस वर्ग ने आगे बढ़कर सरकार के हर फैसले को डिफेंड किया है।

यही वो वर्ग है जिसने नोटबंदी जैसे आर्थिक महामारी को यूरोप और अमेरिका की तर्ज़ पर कैशलेस होने का विकसित राष्ट्र का पैमाना बताया और डिजिटल पेमेंट को करप्शन के खात्मे से जोड़ा। यही वो वर्ग है जिसने मॉब लिंचिंग को ‘पीपुल्स जस्टिस’ और फेक एनकाउंटर को ‘इंस्टेंट जस्टिस’ कहकर समर्थन किया। यही वो वर्ग है जिसने आसिफा के बलात्कार के उत्तर में लव जेहाद के प्रोपगैंडा को आगे बढ़ाया।

यही वो वर्ग है जिसने गुजरात और मुजफ्फ़रनगर जनसंहार को आतंकवाद का जवाब बताकर जस्टीफाई किया। यही वो वर्ग है जिसने कश्मीरी अस्मिता की रक्षा करने वाले धारा 370 के विखंडन को कश्मीरी लड़कियों और कश्मीरी जमीन की लूट के अवसर के रूप में देखा। बक्सर गढ़चिरौली में आदिवासियों के जनसंहार को विकास के लिए ज़रूरी बताकर जस्टीफाई किया।

यही वो वर्ग है जिसने सीएए-एनआरसी के जरिए समुदाय विशेष के लोगों को नागरिकता से बेदख़ल करके उनसे जीने का अधिकार छीन लेने जैसे फासीवादी एजेंडे का आगे बढ़कर समर्थन किया। यही वो वर्ग है जो लॉकडाउन में खुद की ईएमआई की कार से, या फिर ओला, उबर बुक करके अपने कस्बों, छोटे शहरों को भागा और मजदूरों के पलायन को कोविड-19 का प्रसार करने वाला बताता रहा।

ताली-थाली बजाकर जश्न मनाने वाला वर्ग अब ईएमआई भरने को मोहताज

ताली थाली बजाकर सरकार की अकर्मण्यता को हो हल्ले में उड़ाने वाला ईएमआई वर्ग सोशल मीडिया पर ‘सेव द मिडिल क्लास’ कैंपेन चला रहा है। क्योंकि अब ये वर्ग लगातार होम लोन, कार लोन, लैपटाप और मोबाइल लोन की ईएमआई के लिए संघर्ष कर रहा है। सरकार ने पहले तीन महीने के लिए छूट दी थी। लेकिन अब छूट की मियाद पूरी हो चुकी है। तमाम फाइनेंस कंपनियां अपने बाउंसर से डरा धमकवा रही हैं। कुछ ईएमआई धारकों की आपबीती पढ़िए-

हरि किशन शर्मा अपने ट्विटर हैंडल पर लिखते हैं- “लॉकडाउन के कारण सबसे ज्यादा नुकसान मध्यमवर्गीय परिवार का हुआ है। सरकार किसानों के कर्ज माफ कर रही है। गरीबों के खाते में भी पैसे जा रहे हैं। वहीं मध्यमवर्गीय परिवार के लिए ईएमआई और लोन का ब्याज, बिजली बिल, भरना मुश्किल हो रहा है।”

पुरुषोत्तम पिपरिया वरिष्ठ नागरिकों के ब्याज आय घटने की बात लिखते हैं।

इंडिया टीवी न्यूज के मालिक रजत शर्मा के ट्वीट के जवाब में लिखते हैं- “फिर तो उन घर ख़रीदारों का दर्द भी समझते ही होंगे जो पिछले 10 सालों से घर की राह देख रहे, ईएमआई दे रहे, रेंट पे रह रहे और अब नौकरी के लिए भटक रहे लेकिन हैरानी है कि टैक्स पेयर को हक़ नहीं दिला पा रहे। क्या वो वाकई समझ रहे या।”

आत्मनिर्भर से कंगाल घर खरीदार नामक ट्विटर हैंडल से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वित्तमंत्री सीतारमन, योगी आदित्य नाथ को टैग करते हुए लिखा गया है-“

आप वाकई में ईमानदार टैक्स पेयर की चिंता करते तो घर खरीदार अपने घर के लिए परेशान ना होते। कभी सोचा है, 10 साल से रेंट और ईएमआई देने के बाद आज बचा क्या होगा? सिर्फ डिप्रेशन व निगेटिविटी, देश+ व्यवस्था को लेकर।”

योगेश मणिया लिखते हैं – “सर ईएमआई की अवधि और बढ़ाइए।”

सुनील यादव लिखते हैं- “मोदी जी आए। फिर झुनझुना लाये। करोड़ों की नौकरी गई उस पर चुप। मध्यम वर्ग, नौकरी पेशा की ईएमआई, बिजली का बिल, बैंक का कर्ज कैसे चुके, दाल-रोटी कैसे चले इस पर चुप। पूरे देश मे भाजपाई नियमों की धज्जियां उड़ा रहे इस पर चुप।”

भाजपा समर्थक संगीता शर्मा ट्विटर हैंडिल पर लिखती हैं- “सर, मैं जयपुर से! बजाज फिनसर्व कंपनी ने लॉक डाउन की वजह से ईएमआई नहीं भरने की वजह से कस्टमर को इतना ज्यादा परेशान और टॉर्चर किया जबकि कस्टमर का रिकॉर्ड अच्छा था, कि कस्टमर आत्महत्या करने पर मजबूर हो गया। कंपनी ने घर में घुस कर मारने और बेइज्जत करने की धमकी दी और फिर इस तरह से कस्टमर से जबरदस्ती पैसा वसूल किया।”

देवा अपने ट्विटर हैंडल से लिखते हैं- आरबीआई कहता है कि किसी भी प्रकार की ईएमआई ना भरें। ईएमआई के लिए अगस्त तक छूट दी गई है लेकिन लगता है ये नियम बजाज फिंसर्व पर लागू नहीं होता क्योंकि वे लोग हमारे घर आके पैसे भरने कि धमकी देकर जाते है।

पीयूष लिखते हैं- “कार लोन संबंधी बैंक से मेसेज आया कि कोरोना पैकेज के तहत आपका ईएमआई 3 महीने के लिए बढ़ा दिया गया है। अब अगला ईएमआई सितंबर में कटेगा। हम खुश हुए। आज ईएमआई कट गयी।”

बजर बट्टू रुबिका लियाकत के सांप्रदायिक पोस्ट के जवाब में लिखते हैं- कभी ईएमआई, रेंट, बिजली बिल, स्कूल फीस और नौकरी की बात होगी? हम लोगों से कैसी नफरत है आप जैसे रिपोर्ट्स को जो हमारी बातों को दिखाया भी नहीं जा सकता है?

अशरफ के ट्विटर हैंडल से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, झारखंड पुलिस और झारखंड डीआईजी को टैग करते हुए लिखा गया है- सर महिंद्रा फाइनेंस हजारीबाग एवं उनके एजेंटों द्वारा घर में आकर गाली-गलौज ईएमआई को लेकर कर रहे हैं और लगातार फोन पर भी धमकी दे रहे हैं मुझे मात्र 15 दिनों का समय दिलवा दें। एजेंटों द्वारा ऐसी अभद्रता से पेश आ रहे हैं कि पूरा परिवार भयभीत है और मानसिक रूप से परेशान कृपया मेरी मदद करें लॉकडाउन के कारण मैं समय से ईएमआई नहीं दे सका मैं मात्र 15 दिनों का समय मांग रहा हूं लेकिन वह मानने को तैयार नहीं।

पेट्रोल, डीजल, दवाई, महंगाई

कोरोना संकट के चलते स्वास्थ्य के स्तर पर लगातार पूरा देश संघर्ष कर रहा है। मध्य वर्ग इससे अछूता नहीं है। एक ओर दवाइयों के दाम बढ़े हैं तो दूसरी ओर अस्पतालों में डिलीवरी और दूसरी सामान्य बीमारियों तक के इलाज नहीं हो पा रहे हैं।

अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में पेट्रोल डीजल के दाम प्रति बैरल न्यूनतम बने हुए हैं बावजूद इसके भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। आयुष मंगल नौकरी जाने को पेट्रोल समस्या से जोड़ते हुए तंज करके लिखते हैं – सरकार शायद अब यह कहेगी कि जब नौकरी ही छूट गई है, तो न ऑफिस जाएगा, न पेट्रोल भरवाएगा। अगर मेरी ये बात तर्कहीन लग रही है, तो प्लीज़ बताओ कि जब अंतरराष्ट्रीय दाम कम हो रहे हैं तो अपने यहां दाम बढ़ाने में कौनसा तर्क बैठता है।

लॉकडाउन से उपजे संकट के चलते मध्यवर्ग की नौकरी जा रही

लॉक-डाउन की मार मध्यवर्ग पर पड़नी शुरु हो गई है। तमाम निजी संस्थानों में कोविड-19 संक्रमण और सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर लाखों लोगों की छँटनी हो चुकी है। अभी लॉकडाउन पूरी तरह खुलने के बाद दूसरे सेक्टर से भी लाखों लोगों की नौकरियां जाएंगी। प्रधानमंत्री ने लॉकडाउन लगाते हुए कहा था किसी की भी नौकरी नहीं जाएगी, न ही किसी का वेतन काटा जाएगा लेकिन हो ठीक उल्टा रहा है और प्रधानमंत्री ने ‘आत्मनिर्भर’ बनने की सलाह देकर बोलना ही बंद कर दिया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना और लॉकडाउन के बाद 13.6 करोड़ लोगों की नौकरी जाने का अनुमान है। कुछ भुक्तभोगियों की पीड़ा देखिए-

29 वर्षीय आशीष एक अंतरराष्ट्रीय ट्रेवल कंपनी में कुछ महीनों पहले ही नई नौकरी ज्वाइन की थी लेकिन लॉकडाउन शुरु होते ही उन्हें टर्मिनेशन लेटर थमा दिया गया। आशीष कहते हैं, “कोरोना वायरस की वजह से नौकरी चली गई, मेरे परिवार में मां-पिता के अलावा पत्नी और एक डेढ़ साल की बेटी है। जो हालात हैं, लॉकडाउन है, मैंने राशन भी जमा नहीं किया है, सच कहूं तो मेरी स्थिति बहुत क्रिटिकल है। माता-पिता बीमार हैं और मैं घर का अकेला कमाने वाला था। अचानक नौकरी जाने से परिवार का भविष्य अनिश्चित हो गया है।

वहीं ट्विटर पर लोग रेल मंत्री पीयूष गोयल के साल 2017 में दिए गए एक बयान को शेयर कर रहे हैं। जिसमें रेलमंत्री ने कहा था- “ नौकरी जाना अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अच्छा संकेत है और भविष्य के युवा सिर्फ नौकरी की चाहत नहीं रखते, बल्कि वे रोज़गार का सृजन करना चाहते हैं।” https://twitter.com/Delkraman/status/1278753130994298880?s=19

भाजपा समर्थक अंजली वाजपेयी लिखती हैं- उनके पति की प्राइवेट नौकरी चली गई है किराए के मकान में रहती हैं समस्या हो रही है।

नौकरी जाने से दुखी युवक ने सीएम आवास के सामने आत्मदाह किया।

मध्यवर्ग में बढ़ रहे हैं खुदकुशी के मामले

लेकिन वो कहावत है ना कि ‘बकरा के माई, कब तक ख़ैर मनाई’ तो अब ये वर्ग भी खुद उसी हिंदुत्व की बलि चढ़ने को अभिशप्त है। कोविड-19 के संक्रमण की चपेट में आने पर ईलाज न मिलने के बाद कई भक्तों की आँखें खुलीं और उन्हें अब एहसास हो रहा है कि मंदिर नहीं अस्पताल ज़रूरी है। ऐसे ही लॉकडाउन में नौकरी जाने और ईएमआई का दबाव इस वर्ग को भारी पड़ रहा है। 

26 जून को दिल्ली से सटे ग़ाजियाबाद के पॉश इलाके इंदिरापुरम के ज्ञान खंड-1 में एक दंपति (निखिल और पल्लवी) ने अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर लिया। दंपति के एक 8 महीने का बेटा भी था। निखिल एक कंपनी में सेल्स मैनेजर थे। निखिल की उम्र 31 वर्ष और पल्लवी की उम्र 29 वर्ष थी। आत्महत्या से पहले करीब 3:45 पर पल्लवी ने ग्रेटर नोएडा में रहने वाली अपनी बहन अंजलि को मेसेज किया था- “ हम दोनों जा रहे हैं, बच्चे को 6 बजे ले जाना।”

वहीं पड़ोसियों का कहना है कि दोनो हमेशा हँसते हुए रहते थे। उनके घर से कभी झगड़े की आवाज़ बाहर नहीं आई।

इससे पहले 5 जून को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में विवेक शुक्ला ने पत्नी व तीन बच्चों समेत खुदकुशी कर ली थी। विवेक शुक्ला ने अपने सुसाइड नोट में आर्थिक तंगी का जिक़्र किया था।

वहीं मार्च में ही हैदराबाद के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने परिवार समेत आत्महत्या कर लिया था।

6 जून को तमिल एक्टर श्रीधर और उनकी बहन जया कल्याणी ने तंगहाली के चलते खुदकुशी कर लिया था।।

15 मई को 32 वर्षीय मनप्रीत ग्रेवाल ने आर्थिक तंगी के चलते आत्महत्या कर ली थी। अपने सुसाइड नोट में मनप्रीत ने आर्थिक तंगी का हवाला दिया था।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on July 5, 2020 1:41 pm

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