यूपी के भी चुनावी मैदान में उतरे ओवैसी, फिलहाल बड़े दलों ने किया किनारा

दिन प्रतिदिन उठा-पटक, दाव-पेंच, लुभाने-रिझाने, मनाने-तोड़ने की राजनीति से गुजर रहे उत्तर प्रदेश की सियासी हवाओं में इन दिनों वे पार्टियां भी डंके की चोट पर अपनी किस्मत आजमाने उतर रही हैं, जिनका वजूद यूपी की राजनीति में अभी नया है। इन्हीं में से एक है असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM)।

बिहार और पश्चिम बंगाल में अपनी किस्मत आजमा चुकी एआईएमआईएम ने भले ही पश्चिम बंगाल में मुंह की खाई हो लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव में पांच सीटें जीत कर बुलंद हौसलों के साथ उत्तर प्रदेश में भी जोर आजमाईश की तैयारी में है।

यूपी में अपने पैर पसारने और जमाने के लिए एआईएमआईएम की किसी बड़े विपक्षी दल से गठबंधन की योजना तो है लेकिन, उत्तर प्रदेश के तमाम सियासी दलों ने एआईएमआईएम से दूरी बना ली है। हालांकि पिछले साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव में बसपा और एआईएमआईएम ने गठबंधन किया था, जिसके चलते AIMIM ने बिहार में पांच विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की थी, तो इसी गठबन्धन को आधार बनाकर कयास लगाए जा रहे थे कि उत्तर प्रदेश में भी दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन हो सकता है, लेकिन इन कयासों पर विराम लगाते हुए  हालांकि, बसपा सुप्रीमो मायावती ने पहले ही एआईएमआईएम के साथ गठबंधन की बात को नकार दिया। तस्वीर को साफ करते हुए पिछले दिनों एक ट्वीट करते हुए मायावती ने लिखा कि “अगला विधानसभा चुनाव बसपा और एआईएमआईएम एक साथ लड़ेंगे, इन खबरों में जरा भी सच्चाई नहीं है। बसपा 2022 का विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी” मायावती ने स्पष्ट शब्दों में जाहिर कर दिया कि बसपा का ओवैसी और एआईएमआईएम से नजदीकी बढ़ाने का कोई इरादा नहीं है।

वहीं दूसरी तरफ अटकलें तेज थीं कि ओवैसी की पार्टी समाजवादी पार्टी के साथ गठबन्धन कर सकती है। अटकलें, अंदाजे लगना स्वाभाविक ही था, क्योंकि खबरों के बाज़ार में चर्चा थी कि इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-ए-मुस्लमीन (एआईएमआईएम) ने शर्त रखी कि अगर समाजवादी पार्टी यूपी में गैर भाजपा सरकार बनने पर भागीदारी मोर्चे के किसी वरिष्ठ मुस्लिम विधायक को उप मुख्यमंत्री बनाने को तैयार हो तो उनकी पार्टी और मोर्चे का सपा से गठबंधन हो सकता है। हालांकि जल्दी ही इन कयासों पर भी विराम लग गया, जब सपा ने भी ऐसे किसी गठबन्धन से इंकार कर दिया और उधर एआईएमआईएम उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष शौकत अली का बयान आता है कि यह कभी नहीं कहा गया कि एआईएमआईएम सपा के साथ इस शर्त को लेकर गठबंधन कर सकती है कि सत्ता में आने पर अखिलेश यादव किसी मुस्लिम नेता को उप-मुख्यमंत्री बनाएंगे। उनके मुताबिक उनकी पार्टी इस बात से स्पष्ट तौर पर इनकार करती है, क्‍योंकि ना तो कभी उन्होंने और न ही कभी एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने ये बयान दिए हैं।

वे कहते हैं ‘हमने केवल यह कहा था कि सपा पिछले चुनावों में 20 फीसदी मुस्लिम वोट पाकर सत्ता में आई थी, लेकिन उन्होंने किसी मुस्लिम को उपमुख्यमंत्री नहीं बनाया इसके अलावा गठबन्धन की कोई बात नहीं हुई’।

बहरहाल सपा और बसपा द्वारा किनारा किए जाने के बावजूद एआईएमआईएम ने यूपी विधानसभा चुनाव 2022 के लिए अपनी तैयारी शुरू कर दी है। एआईएमआईएम ने विधायक उम्मीदवारों के लिए आवेदन पत्र जारी किया है, जिसमें ‘वफादारी कॉन्ट्रैक्ट’ भी शामिल है। इस कॉन्ट्रैक्ट के अनुसार, आवेदक को पार्टी के लिए ईमानदारी से काम करना होगा और चुनाव लड़ने के लिए टिकट न मिलने की स्थिति में भी उसके लिए प्रचार करना होगा। खबरों की मानें तो ओवैसी यूपी की कई क्षेत्रीय पार्टियों के साथ भी संपर्क में हैं। वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने 38 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे लेकिन जीत एक भी सीट पर नहीं मिली थी। इसके चलते पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में यूपी की एक भी सीट पर चुनाव नहीं लड़ा था। हालांकि, ओवैसी ने बीजेपी के खिलाफ प्रचार जमकर किया था।

इसमें दो मत नहीं कि असदुद्दीन ओवैसी कई मौकों पर अखिलेश यादव की तारीफ कर चुके हैं लेकिन, इन सबके बावजूद सपा ने एआईएमआईएम से किनारा किया हुआ है। सियासी दलों की एआईएमआईएम को लेकर बेरुखी को देखकर संकेत मिल रहे हैं कि बंगाल की ही तरह असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी को यूपी में गठबंधन करने के लिए कोई बड़ा राजनीतिक दल शायद ही मिले, लेकिन वहीं दूसरी तरफ पिछले दिनों लखनऊ आए असदुद्दीन ओवैसी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष व ‘भागीदारी संकल्प मोर्चे’ का नेतृत्व कर रहे ओमप्रकाश राजभर से हुई मुलाकात ने यह साफ कर दिया है कि ओवैसी छोटी पार्टियों के साथ गठबन्धन में जा सकते हैं, इस बाबत राजभर और ओवैसी के मध्य गठबंधन को लेकर लंबी बातचीत हुई। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ रहे सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर 2022 के विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के साथ मिलकर ताल ठोकने की तैयारी में हैं। इसके लिए उन्होंने ‘भागीदारी संकल्प मोर्चा’ का गठन किया है। वह अन्य दलों को भी इस मोर्चे के साथ आने का न्योता दे रहे हैं। ओमप्रकाश राजभर के मुताबिक 2022 के विधानसभा चुनाव के लिए छोटे दलों को मिलाकर बनाया गया ‘भागीदारी संकल्प मोर्चा’ किंग मेकर की भूमिका में होगा। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के साथ उनका जो गठबंधन हो रहा है, वह विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने वाला होगा।

एआईएमआईएम पार्टी यूपी की 403 सीटों में से करीब 100 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है। AIMIM ने उत्तर प्रदेश की उन सौ विधानसभा सीटों का चयन किया है, जहां मुस्लिम आबादी 20 फीसदी से ज्यादा है। ये सीटें पश्चिमी यूपी के अलावा पूर्वांचल, रोहिलखंड और मध्य यूपी की हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 38 उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा था लेकिन पार्टी को 2.46 प्रतिशत वोट ही मिले थे। बहरहाल इस बार AIMIM विधानसभा चुनाव का मौका गंवाना नहीं चाहती और एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। ओवैसी का यूपी दौरा शुरू हो चुका है और इसी क्रम में वे अगस्त की शुरुआत में एक बार फिर उत्तर प्रदेश का दौरा कर प्रयागराज, फतेहपुर, कौशाम्बी और आसपास के अन्य जिलों में कार्यकर्ताओं से मिलेंगे। इसके अलावा इसी दौरान वह बुद्धिजीवियों के अलग-अलग समूहों से भी मिलेंगे। इनमें खासतौर पर मुस्लिम, दलित व पिछड़े वर्ग के वकील, अधिकारी, डाक्टर, इंजीनियर व अन्य प्रेाफेशनल भी शामिल रहेंगे। पार्टी के विस्तार के बारे में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली ने कहा कि यूपी में संगठनात्मक ढांचा खड़ा हो गया है। सभी 75 जिलों में जिला अध्यक्ष बना दिये गये हैं, जिला इकाईयां भी गठित हो चुकी हैं। पार्टी यूपी के इस बार के विधान सभा चुनाव में सौ सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करने का एलान पहले ही कर चुकी।

आखिर AIMIM के साथ कोई बड़ी पार्टी गठबन्धन क्यों नहीं करना चाहती, तो इसका एक ही जवाब हो सकता है कि शायद कोई भी बड़ा दल अपने पर यह आरोप नहीं लेना चाहता कि उसका गठबन्धन देश की एक सांप्रदायिक पार्टी के साथ है, तब क्या यह समझा जाए कि इन पार्टियों पर सीधे-सीधे भाजपा का दबाव है, या डर इस बात का कि यदि वे ओवैसी की पार्टी के साथ गठबन्धन करते हैं तो चुनाव में उनके ख़िलाफ़ नकरात्मक प्रचार जाएगा और उनकी छवि भाजपा द्वारा धूमिल करने की कोशिश की जाएगी तो सवाल यह उठता है कि इस देश में शासन करने वाली पार्टी भाजपा आखि़र कौन सी राजनीति करती है?

पिछले दिनों देश के मशहूर शायर मुनव्वर राना जी ने ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी को लेकर एक बयान दिया बयान कुछ यूं था कि यदि ओवैसी की मदद से प्रदेश में भाजपा जीती और योगी आदित्यनाथ दोबारा मुख्यमंत्री बन गए तो वे यूपी छोड़कर कोलकाता वापस चले जाएंगे। ज़ाहिर सी बात उनके इस बयान पर जमकर हंगामा होना था, सो हुआ लेकिन यदि इस बयान की गहराई तक जाएं तो यह बात साफ होती है कि कुल मिलाकर शायद मुनव्वर राना जी का अर्थ इस ओर था कि ओवैसी की पार्टी की वजह यदि ध्रुवीकरण होता है तो इसका सीधे-सीधे फायदा भाजपा को होगा और उसका वोट बढ़ जाएगा। इस पर राजनीति के जानकार मानते हैं कि कुल मिलाकर ओवैसी की मंशा भले ध्रुवीकरण की न हो, भले वे मुस्लिम समाज की समस्याओं और मुद्दों को उठाकर राजनीति करना चाहते हों लेकिन उनके न चाहने से भी ध्रुवीकरण की राजनीति को रोक पाना मुश्किल है, तो यही ध्रुवीकरण भाजपा की बढ़त के लिए एक उपजाऊ जमीन का काम करता है, क्योंकि भाजपा खुद भी ध्रुवीकरण चाहती है, भाजपा की राजनीति को यही सूट करता है। तो क्या इसी ध्रुवीकरण के डर से पार्टी चुनाव न लड़े ? यह सवाल भी अपने आप में वाजिब है। लखनऊ की रहने वाली सामाजिक कार्यकर्ता और राजनैतिक विश्लेषक नईस हसन के मुताबिक दरअसल यह डर वाजिब है कि ओवैसी की वजह से वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है क्योंकि वे जितना भाजपा के ख़िलाफ़ आग उगलेंगे भाजपा को उतना ही इसका फायदा मिलेगा क्योंकि तब ऐसी सूरत में काफी हिन्दू वोट भाजपा की ओर चला जाएगा। वे कहती हैं धर्म की राजनीति से ज्यादा बेहतर है ओवैसी साहब विकास और मुद्दों की राजनीति करें।

बहरहाल इन सब आरोप प्रत्यारोपों के बीच एआईएमआईएम ने चुनावी समर में उतरने के लिए कमर कस ली है। कोई क्या आरोप लगाए इसे दरकिनार कर पार्टी कार्यकर्ता अपनी स्थिति मजबूत बनाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं।

(लखनऊ से स्वतंत्र पत्रकार सरोजिनी बिष्ट की रिपोर्ट।)