Tuesday, October 19, 2021

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पाटलिपुत्र की जंगः क्यों इतना अहम है बिहार का चुनाव

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महामारी के साये में यह भारत के पहले चुनाव हैं और बिहार में लंबे अर्से के बाद पहली बार हो रहा है कि चुनाव लालू प्रसाद यादव और राम विलास पासवान की गैरमौजूदगी में हो रहे हैं। नीतीश कुमार, इस दौरान नरेंद्र मोदी की बीजेपी से गठबंधन में अपनी चमक काफी हद तक फीकी कर चुके हैं। बिसात बिछ चुकी है, पांसे तय हो चुके हैं, पर्दे के पीछे की कवायद पूरी हो चुकी है, जंग का बिगुल बज चुका है। इस राज्य को हमेशा इसके सामाजिक और राजनीतिक अंडरकरंट के लिए देखा जाता है। 2020 के चुनाव में भी सबकी नजर इस पर है।

बिहार का महत्व
ऐतिहासिक रूप से बिहार जमीनी राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों का केंद्र रहा है। इनमें जयप्रकाश नारायण का संपूर्ण क्रांति आंदोलन भी शामिल रहा, जिसने इंदिरा गांधी की सरकार को हिला कर रख दिया था और आपातकाल लगा तथा 1977 में केंद्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी। गैर कांग्रेसी ताकतों के गठबंधन ने सामाजिक न्याय की राजनीति के बीज बोये और बिहार को नीतीश कुमार, लालू प्रसाद और सुशील कुमार मोदी जैसे नेता दिए, हालांकि तीनों अब अलग-अलग राजनीतिक कोनों पर खड़े हैं। 1977 में बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने मुंगेरीलाल आयोग की सिफारिशें लागू कीं और नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में पिछड़ी जातियों को आरक्षण मुहैया कराया। इससे राष्ट्रीय राजनीति में पिछड़ी जातियों की दावेदारी मजबूत हुई जो दशकों तक रही। क्या भाजपा अपने हिंदुत्व नैरेटिव के साथ इसके पार जा पाएगी?

बिहार चुनाव का महत्व
देश की तीसरी सबसे अधिक आबादी वाले प्रदेश में 2011 की जनगणना के अनुसार दस करोड़ चालीस लाख लोग थे। इस चुनाव में लगभग सात करोड़ 29 लाख मतदाता हैं। ये संख्या यूके, फ्रांस या इटली जैसे देशों की कुल आबादी से अधिक है। यह कई सामाजिक सूचकांकों के मामले में देश के अधिकांश हिस्सों के मुकाबले पीछे है, जिससे इसके युवा बाहर रोजगार तलाशते हैं और देश के हर कोने में हैं। लॉकडाऊन के बाद कई लौट भी आए हैं। 2015 में बिहार ने मोदी के विजय रथ को एक बड़ा झटका दिया था। लेकिन, इस बार, नीतीश का जनता दल (यूनाईटेड) बीजेपी के साथ है और लालू भी मौजूद नहीं हैं। क्या बिहार अब भी आश्चर्यजनक नतीजे दे सकता है?

महामारी का प्रभाव
2015 में बिहार का मतदान प्रतिशत 56.8 अब तक का सर्वाधिक था। इस बार हालांकि कोरोना वायरस के कारण चुनाव आयोग ने एहतियाती कदम उठाए हैं पर बूथ पर क्या पर्याप्त संख्या में लोग वोट देने पहुंचेंगे? मतदान कम रहा तो क्या यह विपक्ष के लिए नुकसानदेह हो सकता है, क्योंकि भाजपा के पास समर्पित कार्यकर्ता हैं? या फर्क शहरी मतदान में पड़ेगा, जहां कि भाजपा मजबूत है?

डिजिटल प्रचार
ग्रामीण राज्य माने जाने वाले बिहार में भारत के इतिहास में अधिकांशत: डिजिटल प्रचार देखा जा रहा है। बड़ी पार्टियों के नेताओं ने वर्चुअल रैलियां (भाजपा सबसे आगे है) शुरू भी कर दी हैं और चुनावी सभाओं की भीड़ इस बार नदारद ही होगी। क्या प्रवासी जो प्रदेश में हैं (लगभग 25 लाख), जो अन्य के मुकाबले डिजिटल प्रणाली से ज्यादा वाकिफ हैं, निर्णायक सिद्ध होंगे?

गठजोड़ का गणित
ऊपर से नीचे तक जातिगत मतदाता आधार इधर से उधर हो चुके हैं। लोजपा, राजग गठजोड़ से बाहर हो चुका है पर उसके निशाने पर जद (यू) है, बीजेपी नहीं। उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) और जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी अवामी मोर्चा महागठबंधन से निकल चुके हैं।विकासशील इंसान पार्टी और हिंदुस्तान अवामी मोर्चा राजग में शामिल हो चुके हैं और आरएलएसपी ने बहुजन समाज पार्टी और एआईएमआईएम के साथ तीसरा मोर्चा बनाया है, जो सभी बीजेपी को फायदा पहुंचा सकते हैं।

राष्ट्रीय जनता दल, जिसके तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, को मनचाहा गठजोड़ नहीं मिल पाया। उन्होंने कांग्रेस और तीन वाम दलों से गठजोड़ किया है। महागठबंधन में राजद की प्रधानी बनी हुई है पर कांग्रेस व्यापक गठबंधन चाहती थी, लेकिन इसी मोलतोल में उसके हिस्से में 70 सीटें आई हैं, जो कि पिछली बार की 41 सीटों से काफी ज्यादा हैं। उस समय कांग्रेस ने आधी सीटें जीती थीं और जमीनी संगठन सिफर होने के कारण क्या राजद का गणित कांग्रेस की (मुश्किल) सीटों की संख्या पर टिका है?

मोदी फैक्टर
2019 लोकसभा चुनाव, जो मोदी नीत बीजेपी ने जीता था, राजग गठजोड़ (जद (यू), लोजपा समेत) ने बिहार में एक सीट छोड़कर 40 सीटें जीती थीं। एक सीट कांग्रेस ने जीती थी, हालांकि उसके बाद बीजेपी ने झारखंड, दिल्ली और महाराष्ट्र में हार का स्वाद चखा है और हरियाणा में उसे नुकसान उठाना पड़ा। इसके अलावा, लॉकडाउन में बिहार में सर्वाधिक प्रवासी लौटे। पर क्या मोदी की लोकप्रियता के मुकाबले वह काफी होगा?

सुशासन बाबू की विश्वसनीयता
नीतीश 15 साल से मुख्यमंत्री हैं और इसमें लालू के ‘गुंडा राज’ के मुकाबले उनकी ‘विकास पुरुष’ की छवि की भूमिका है।

लालू की अनुपस्थिति
दशकों तक बिहार में राजनीति राजद प्रमुख के आसपास घूमती रही और विधानसभा चुनाव उन्हें सत्ता में लाने के लिए या सत्ताच्युत करने के लिए लड़े गए। पारिवारिक विवाद के बीच उबरे तेजस्वी अपने पिता की परछांई भी नहीं हैं।पिछले महीने लालू के पुराने साथी रघुवंश प्रसाद सिंह ने अपने जीवन के आखिरी दिनों में पार्टी की कार्यप्रणाली को लेकर राजद छोड़ा। आरएसएलपी, हम और वीआईपी ने भी राजद से दूरी बनाई।सूत्रों के अनुसार तेजस्वी मानते हैं कि यह छोटी पार्टियां अपने वोट हस्तांतरित नहीं कर पातीं और चुनाव के बाद उनके विधायक खरीद-फरोख्त के लिए आसान शिकार होते हैं।

31 वर्षीय तेजस्वी की प्रशासनिक अनुभव की कमी भी उनके खिलाफ जाती है, खासकर नीतीश के शासन काल के बरअक्स। लालू, जो जेल में ही हैं, में वह करिश्मा नहीं है। देखना होगा कि क्या वह अब भी नतीजों को उस कदर प्रभावित कर सकते हैं?

मुस्लिम वोट
पारंपारिक रूप से बिहार में मुस्लिम, लालू के मुस्लिम-यादव वोट आधार का एक हिस्सा थे, लेकिन मोदी सरकार में किनारे किए जाने, सीएए और एनआरसी की योजना के कारण अलग-थलग हुए और दिल्ली दंगों से चिंतित और अयोध्या फैसले से निराश बिहार में किसी और के पास जा सकते हैं। फायरब्रांड एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने मौका देख कर समूचे बिहार में चुनाव लड़ने की घोषणा की है। 2015 में पार्टी ने छह सीटों पर चुनाव लड़ कर केवल एक सीट जीती थी, लेकिन पिछले साल अक्तूबर में किशनगंज उपचुनाव में जीतकर एआईएमआईएम ने अपने आगमन की घोषणा की थी। एआईएमआईएम ने आरएलएसपी, बसपा और राजद के पूर्व सांसद देवेंद्र प्रसाद यादव के समाजवादी जनता दल (लोकतांत्रिक) से गठजोड़ किया है।बाबरी मामले में आरोपियों को बरी किए जाने के निर्णय पर तेजस्वी चुप रहे थे। यह लालू ही थे, जिन्होंने अक्तूबर 1990 में एलके आडवाणी की रथ यात्रा को रोका था। क्या मुस्लिमों में राजद के लिए सद्भावना बाकी है?

दलित वोट
अनुसूचित जातियों के लोगों की आबादी प्रदेश में 16 फीसदी है, जिनमें पासवान (5.5 फीसदी और रविदास 4 फीसदी) बड़े समूह हैं। जब लालू अपने चरम पर थे, राजद को अधिकतर अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी), मुस्लिमों और दलितों का समर्थन था।पिछले कुछ सालों में नीतीश ने ईबीसी-महादलित पर ध्यान केंद्रित करते हुए इसमें सेंध लगाई है, लेकिन इस समय पहेली उलझी हुई है। लोजपा एनडीए में नहीं पर ‘मोदी के साथ’ है। ढाई फीसदी आबादी मुसहरों के प्रभावशाली नेता मांझी राजग के तंबू में शामिल हो चुके हैं। राजद ने दलित वोटों को लेकर पूर्व राज्य मंत्री श्याम रजक को वापस ले लिया है और चंद्रशेखर के भीम आर्मी और बसपा के कारण चुनावी मैदान में भीड़ बढ़ गई है।

बिहार में बसपा भले शक्तिशाली न हो पर सासाराम, बक्सर और औरंगाबाद में सहयोगी आरएलएसपी उसकी मदद कर सकता है। पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र सिंह कुशवाहा के नेतृत्व में आरएलएसपी का कुशवाहा (कोएरी समेत बिहार की 8 फीसदी आबादी) के समर्थन का दावा है। वीआईपी के मुकेश साहनी मल्लाह वोटों को भाजपा के पास ले गए हैं जो कुछ सीटों पर कड़े मुकाबले में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

तेजस्वी गैर यादव वोटों को वापस खींचने के लिए कोशिश कर रहे हैं और लालू राज के समय की गलतियों के लिए माफी मांग चुके हैं। चुनाव के समय कांग्रेस हाथरस में दलित महिला की मौत का मामला और उस प्रकरण में योगी सरकार के रवैये का मुद्दा उछालने वाली है। क्या वह जाति समीकरण के लिए पर्याप्त होगा?

राष्ट्रीय संदेश
बिहार कैसे वोट करेगा, न सिर्फ राजग के स्टार कैंपेनर मोदी (नीतीश को लेकर चाहे जितना शोर मचाया जाए) के लिए बल्कि विपक्ष के लिए भी संकेत होगा। नतीजों को मोदी सरकार के महामारी से निबटने और अर्थव्यवस्था के प्रबंधन पर प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाएगा।इसके अलावा, यह पश्चिम बंगाल के अप्रैल-मई 2021 में होने वाले चुनावों पर भी असर डाल सकता है, जिस पर भाजपा की नजरें हैं।

(इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित विश्लेषण का हिंदी अनुवाद।)

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