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सीएए के विरुद्ध शांतिपूर्ण आन्दोलन को संवैधानिक मान रही है न्यायपालिका

उच्चतम न्यायालय के पिछले दिनों राष्ट्रवादी मोड़ में कई संवैधानिक और क़ानूनी मसले पर फैसला दिए जाने का असर दिखने लगा है। दरअसल पिछले तीन चीफ जस्टिस के कार्यकाल में उच्चतम न्यायालय के कंधे का इस्तेमाल करके केंद्र सरकार अपने एजेंडे को लागू करने में सफल रही है, चाहे वह सीबीआई का विवाद हो, कश्मीर का हो, तीन तलाक का हो या फिर राफेल विमानों की खरीद का हो या अयोध्या भूमि विवाद का हो। लेकिन वर्तमान में उच्चतम न्यायालय  के किंकर्तव्यविमूढ़ रुख से स्थितियां गडमगड्ड होती जा रही हैं।

जिस संकट या आन्दोलन से निपटने की जिम्मेदारी सरकार की है उसे न्यायालय के कंधे पर बंदूक रख कर सरकार निपटाना चाहती है पर फिलवक्त कतिपय माननीयों को छोड़कर न्यायालय अपने कंधे का इस्तेमाल होने देने से बचने का प्रयास करता दिख रहा है। इसमें सीएए के विरोध में दिल्ली का शाहीनबाग का आन्दोलन हो या देशभर में अन्य स्थानों का आन्दोलन हो न्यायपालिका शांतिपूर्ण आन्दोलन के संवैधानिक अधिकार को मान्यता दे रही है।

एक और उच्चतम न्यायालय के चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को चुनौती देने वाली 143 याचिकाओं पर केंद्र को नोटिस जारी किया और सभी उच्च न्यायालयों को इस मामले पर फैसला होने तक सीएए को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई से रोक दिया है वहीं दूसरी ओर मद्रास हाईकोर्ट ने एक सामाजिक संगठन मक्कल अतिकाराम को सीएए-एनआरसी-एनपीआर के विरोध में होने वाले एक सार्वजनिक सम्मेलन के आयोजन की अनुमति दी है।

इस बीच बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने कहा है कि रैलियां और सार्वजनिक सभाएं सेफ्टी वाल्व के तौर पर काम करती हैं। पुलिस सार्वजनिक सभा करने की इजाजत देने से मात्र इस आधार पर इनकार नहीं कर सकती है कि इससे कानून और व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होगी। पीठ ने उक्त टिप्पणी भीम आर्मी के एक नेता की उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें उन्होंने 22 फरवरी को रेशिमबाग मैदान में रैली को अनुमति नहीं देने के पुलिस के फैसले को चुनौती दी है। पीठ ने कहा कि मौलिक अधिकारों में कटौती नहीं की जानी चाहिए।

मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस एडी जगदीश चंदीरा ने एक सामाजिक संगठन मक्कल अतिकाराम को सीएए-एनआरसी-एनपीआर के विरोध में होने वाले एक सार्वजनिक सम्मेलन के आयोजन की अनुमति दी है। इस सम्मेलन का शीर्षक है, “नागरिकता संशोधन अधिनियम-नागरिक रजिस्टर-राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर को वापस लो, जो भारत के संविधान के धर्मनिरपेक्षता और बुनियादी संरचना को नष्ट करते हैं।” इस सम्मेलन का आयोजन 23 फरवरी, रविवार को थेनुअर संथाई निगम ग्राउंड, त्रिची में किया जाएगा। याचिकाकर्ता एल केज़ियान, मक्कल अथिकाराम के क्षेत्रीय समन्वयक ने राज्य के अधिकारियों द्वारा कानून और व्यवस्था की स्थिति का हवाला देते हुए उक्त सम्मेलन आयोजित करने की अनुमति से इनकार करने के बाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।

राज्य के आदेश का हवाला देते हुए जस्टिस चंदीरा ने याचिकाकर्ता को यह सुनिश्चित करने के बदले में सम्मेलन आयोजित करने की अनुमति दी है कि सम्मेलन आयोजित करने के दौरान कोई कानून और व्यवस्था की समस्या पैदा नहीं होनी चाहिए और संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत भाषण और अभिव्यक्ति के अधिकार पर लगाए गए प्रतिबंधों का सख्त अनुपालन सुनिश्चित होना चाहिए।

जस्टिस चंदीरा ने अपने आदेश में कहा कि अगर इस देश में संवैधानिकता को जीवित रखना है तो यह केवल राज्य की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसके लिए नागरिकों में से सभी को अपने दिलों और आत्माओं में इसे बसाना होगा। यह हो सकता है कि अनुच्छेद 19 (2) के तहत संविधान ने राज्य को अधिकार दिया है कि वह स्वतंत्र भाषण के मौलिक अधिकार पर उचित प्रतिबंध लगाने के लिए कानून बना सकता है, फिर भी एक नागरिक से व्यक्तिगत जिम्मेदारी लेने की अपेक्षा करता है कि वह इसे उचित सीमा के भीतर प्रयोग करेगा, भले ही वह यह मान ले कि अनुच्छेद 19 (2) अस्तित्व में नहीं है।

इसके पहले कोतवाली पुलिस ने कानून व्यवस्था का हवाला देकर रैली को मंजूरी देने से इनकार कर दिया था। जस्टिस सुनील शुक्रे और जस्टिस माधव जामदार ने कहा कि ऐसी रैलियां और सभाएं सेफ्टी वाल्व की तरह काम करती हैं। दमन बहुत खतरनाक है।

इस बीच, कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह देखते हुए कि “जांच दुर्भावानापूर्ण और पक्षपातपूर्ण प्रतीत हो रही है,” 22 लोगों को जमानत दे दी है।मैंगलोर पु‌लिस ने उन लोगों पर घातक हथ‌ियारों से लैस होकर गैर कानूनी सभा करने, मैंगलोर के उत्तर पुलिस थाने को जलाने का प्रयास करने, पुलिस की ड्यूटी में बाधा डालने, सार्वजनिक संपत्त‌ि को नुकसान पहुंचाने और 19 दिसंबर, 2019 को धारा 144 सीआरपीसी के तहत पुलिस आयुक्त, मैंगलोर द्वारा लगाए गए निरोधात्मक आदेश का उल्लंघन करने के आरोप लगाया था। आरोपी कथित रूप से नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध में आयोजित रैली का हिस्सा ‌थे।

जस्टिस जॉन माइकल कुन्हा ने आरोपियों को जमानत देते हुए कहा कि ऐसे अपराध में, जिनमें आरोपियों की संख्या ज्यादा हो, प्रत्येक अभियुक्त की पहचान और भागीदारी को पर्याप्त सुनिश्चितता के साथ तय किया जाना चाहिए। वर्तमान मामलों में, एसपीपी- I द्वारा पेश किए गए केस रिकॉर्डों के अध्ययन से प्रतीत होता है कि कथित घटना में शमिल अभियुक्तों की पहचान उनकी पीएफआई (पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया) से संबद्धता के आधार पर तय की गई है और वे मुस्लिम समुदाय के हैं। हालांकि यह कहा गया है कि याचिकाकर्ताओं की संलिप्तता सीसीटीवी फुटेज और तस्वीरों में कैद है, जबकि न्यायालय के समक्ष ऐसी कोई सामग्री नहीं पेश की गई है, जिसमें किसी भी याचिकाकर्ता की घातक हथियारों से लैस होकर मौजूदगी दिखती हो।

कर्नाटक सरकार की ओर से दी गई एक आपत्ति कि 19 दिसंबर 2019 को मुस्लिम युवाओं द्वारा केंद्र सरकार द्वारा लागू सीएए का विरोध किए जाने की सूचना थी, और उस संबंध में, पुलिस आयुक्त, मंगलुरु ने धारा 144 सीआरपीसी के तहत 18 ‌दिसंबर 2019 रात 9 बजे से 20 दिसंबर 2019 को आधी रात 12 बजे तक निषेधाज्ञा लागू की ‌थी, अदालत ने कहा “यह दावा इंगित करता है कि सभा का सामान्य उद्देश्य सीएए और एनआरसी के कार्यान्वयन का विरोध था जो खुद आईपीसी की धारा 141 के अंतर्गंत ‘गैर-कानूनी उद्देश्य’ नहीं है।

एक महत्वपूर्ण फैसले में बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन के मद्देनजर आयोजित विरोध और प्रदर्शनों को प्रतिबंधित करने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 के तहत पारित एक आदेश को रद्द कर दिया है। जस्टिस टीवी नलवाडे और जस्टिस एमजी सेवलिकर की खंडपीठ ने इफ्तिखार ज़की शेख़ की याचिका पर यह फैसला दिया है।

शेख़ ने बीड़ जिले के मजलगांव में पुराने ईदगाह मैदान में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अनुरोध किया था, हालांकि बीड़ के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट की ओर से धारा 144 लागू किए जाने के आदेश का हवाला देते हुए उन्हें अनुमति नहीं दी गई। अदालत ने कहा कि भले ही धारा 144 के आदेश को आंदोलनों पर लगाम लगाने के लिए लागू किया गया था, लेकिन इसका असली उद्देश्य सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों को चुप कराना था। आदेश में नारेबाजी, गाने और ढोल बजाने पर भी रोक लगाई गई थी।

एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट ने नागरिक संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर कथित हिंसा फैलाने के आरोप में दर्ज एफआईआर पर पुलिस कार्रवाई की संभावना से प्रदर्शनकारियों को अंतरिम राहत देते हुए उदयपुर पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया है कि प्रदर्शनकारियों पर कोई “कठोर कार्रवाई” न की जाए। प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तारी से संरक्षण देने के साथ ही अदालत ने उन्हें जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया है। पुलिस का यह आरोप था कि 29 जनवरी को सीएए के खिलाफ शांतिपूर्ण मार्च हिंसक हो गया और इसीलिए अधिकारियों ने आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत भूपालपुरा पुलिस स्टेशन में दर्जनों नामज़द और अनाम व्यक्तियों के खिलाफ एफआईएआर दर्ज की।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on February 22, 2020 9:57 am

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