Thursday, October 21, 2021

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बिहार के बक्सर में हर गांव में खड़े पीपल के पेड़ वहां हुई मौतों की गवाही दे रहे

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बिहार के “बक्सर” जिले के हर गांव में खड़े पीपल के पेड़ गवाही दे रहे हैं कि किस गांव में कितनी मौतें हुयी हैं। क्योंकि हर गांव में एक पीपल का पेड़ ऐसा होता है जिस पर गांव में होने वाली हर मौत पर एक घंट बांधा जाता है।” - ये कहना है पुराना भोजपुर गांव के आलोक नाथ का। आलोक नाथ बताते हैं कि इतना ही नहीं सरकार से ज़्यादा भरोसेमंद आंकड़ा बिनडरवा टोले के डोमों के पास है। गौरतलब है कि डोम जाति के लोग घाटों पर लाश जलाने का काम करते हैं।

आलोक नाथ बताते हैं कि लोगों को पहले सर्दी, खांसी, जुकाम, बुखार हो रहा है, फिर फेफड़े में संक्रमण निकल रहा है और फिर लोग मर जा रहे हैं। लगभग सारी मौतें ऐसी ही हुई हैं। वो कहते हैं कि मेरे एक 35 वर्षीय रिश्तेदार को हो गया था लेकिन, समय पर इलाज मिलने के चलते वो बच तो गये पर इतना कमजोर हो गये हैं कि लग ही नहीं रहा कि वे 35 साल के हैं।

आलोक नाथ बताते हैं कि उनके गांव के आस-पास के कोठियां, घरोहीं, चौसा, चौसा गोला आदि हर एक गांव में भी दर्जनों मौतें हुयी हैं, जिसमें युवा उम्र के लोगों से लेकर अधेड़ और बुजुर्ग तक शामिल हैं।

आलोक नाथ के मुताबिक उनके गांव पुराना भोजपुर में किशोरी सिंह (70 वर्ष) का चार दिन पहले निधन हुआ है। जबकि पलिया गांव के चंद्रमा सिंह की मौत भी हाल ही में हुई हो उनमें कोरोना के लक्षण थे, वो अधेड़ उम्र के थे और इलाज के लिये बनारस ले जाते समय रास्ते में उनकी मौत हो गयी। जबकि गजोधर गांव के नागा सिंह की मौत भी दो दिन पहले ही हुई है। नावाडेरा गांव से रघु गोंड की मौत हाल ही में हुयी है वो 80 वर्ष के थे।

अस्पताल बंद, बुखार और सांस की दिक्कत से हो रही मौत

आलोक नाथ चौसा घाट और चरित्रवन घाट के आस-पास के इलाकों में फैले बुखार के बाबत कहते हैं कि हमारे इलाकों में एक बुखार चला है। जो धीरे-धीरे संक्रमण का रूप धर के फेफड़ों तक पहुँच जा रहा है। फेफड़ों तक को संक्रमित कर दे रहा है। और ऐसा कोई गांव नहीं जहां 30-50 लोग बुखार से पीड़ित नहीं हैं। लेकिन सब लोग कोरोना से भयभीत हैं। सामान्य बुखार का भी इलाज इसलिये नहीं करवा रहे कि कहीं कोरोना न निकल जाये।

अलोक नाथ बताते हैं कि कोरोना के चलते अधिकांश अस्पताल बंद हैं। तो ऐसे में जिन लोगों को ब्रेन हमेरेज हो रहा है, या हार्ट अटैक हो रहा है वो कहां जायें। अस्पताल न मिलने पर ऐसे लोगों की मौत भी हो जा रही है।

10 मई वाली घटना के बाद जिला प्रशासन बहुत सख्त हो गया है। प्रशासन ने उन 71 लाशों को जेसीबी से गड्ढ़ा खुदवाकर नीचे गहराई में दफ़न कर दिया है। उसके बाद से भी जो लाशों मिल रही हैं उन्हें जेसेबी से नीचे दबा दिया जा रहा है। अब उस क्षेत्र में लोगों के आने जाने की मनाही कर दी गयी है।  

आलोक नाथ बताते हैं कि चौसा के महदेवा घाट के दस किलोमीटर के क्षेत्र में लगभग पचास गांव के लोग आते हैं। इनमें से कुछ गांव हैं- रामपुर, देउरिया, डेवीडेहरा, नागपुर, पलिया, बुढ़ाडीह, सीधारी, बालूपुर, रघुनाथपुर, सरांव, ललमन के डेरा, रोहिनी भान, डिहरी, चौसा, सोनपा, बनारपुर, सिकरौल आदि।

10 मई को बक्सर के चौसा में महदेवा घाट पर सड़ी गली नोची खरोची हालत में मिली 71 लाशों के संदर्भ में आलोकनाथ बताते हैं कि चौसा में महदेवा घाट उनके घर से 7-8 किलोमीटर की दूरी पर है। पर हमारा वहां अक्सर आना जाना होता है। दो नदियों का संगम है। गंगा वाराणसी से आती हैं और दूसरी नदी से मिलकर एल आकार बनता है जो यूपी का क्षेत्र है।

कई कबीलों में लाश प्रवाहित करने की परंपरा है

आलोक नाथ आगे बताते हैं कि चौसा घाट और चरित्रवन घाट के आस-पास के तमाम गांवों में कई मौते हुयी हैं। हर गांव में 10-15 मौतें हुयी हैं। खुद आलोक नाथ के गांव के एक पीपल के पेड़ में 12-13 घंट बँधे हैं। ये हर गांव की कहानी है। आलोक नाथ बताते हैं कि गरीब गुरबे तबके के जो लोग लाशों को फूँकने का सामर्थ्य नहीं रखते हैं वो लाश के साथ एक बड़ा पत्थर बांधकर गंगा में डुबो देते हैं। लाशों का दाह संस्कार करने के बजाय गंगा में प्रवाहित कर देना ये सिर्फ आर्थिक मसला नहीं है इससे सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू भी जुड़े हुये हैं। बहुत से लोगों में कबीलों में लाशों को जल प्रवाहित करने की परंपरा है। वो लाशों को जलाते नहीं। तो वही लाशें कहीं न कहीं किनारे सड़ जा रही हैं। वो कहते हैं लोग पहले भी गंगा में लाशों को प्रवाहित करते थे। लेकिन अभी संख्या बढ़ गयी है क्योंकि कोरोना के चलते ज़्यादा मौतें हो रही हैं।  

आलोक नाथ घाट के पौराणिक महत्व को रेखांकित करके कहते हैं कि – “बक्सर के चरित्रवन घाट का पौराणिक महत्व है और अभी वहाँ कोरोना के चलते लाशों को जलाने की जगह नहीं मिल रही है इसी के चलते लोग लाशों को 3 कोस दूर चौसा श्मशान घाट पर ले जाकर प्रवाहित कर रहे हैं।”

बता दें कि 10 मई को बिहार के बक्सर जिले के चौसा श्मशान घाट पर गंगा नदी पर सैकड़ों तैरती लाशों के मिलने के बाद अगले ही दिन उत्तर प्रदेश का बलिया व ग़ाज़ीपुर जिले में गंगा से लाशें बरामद हुईं थी। जिसके बाद से बिना जली लाशें चर्चा का केंद्र बन गई हैं। साथ ही दो राज्यों के दो जिलों के प्रसासन के बीच भी आरोप प्रत्यारोप का एक दौर चला। बक्सर जिले में मिली लाशों को बिहार प्रशासन उत्तर प्रदेश से बहकर आयी बताकर अपनी जान बचाना चाहता था तो वहीं यूपी की योगी सरकार अपना। लेकिन फिर अगले ही दिन बक्सर से लगे उत्तर प्रदेश के बलिया और ग़ाज़ीपुर जिले की गंगा से लाशें बरामद होने के बाद यूपी की योगी सरकार भी लगातार सवालों के घेरे में है। मीडिया सूत्रों के मुताबिक़ बलिया के भरौली गांव में पिछले 15 दिनों में बुखार और सासं लेने में तकलीफ के बाद 25-30 लोगों की मौतें हुयी हैं। वहीं बलिया के ही शेरपुर गांव में भी पिछले एक पखवारे में 30 मौतें हुयी हैं।

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