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धन्वंतरि के देश में बेइलाज मरते लोग

आज धन्वन्तरि जयंती है। धन्वन्तरि को आर्युवेंद का प्रादुर्भावक कहा जाता है और दिवोदास, च्यवन, सुश्रुत, चरक को उनकी परंपरा का वाहक माना जाता है, लेकिन मुझे लगता है चूंकि उन्होंने आयुर्वेद के बाबत लिखा था, इसलिए उन्हें प्रादुर्भावक मान लिया गया। आयुर्वेद पद्धति के असली जन्मदाता मूलनिवासी-आदिवासी रहे होंगे, जिनसे समस्त चीजें छीनने के साथ ही ये चिकित्सा पद्धति में छीन ली गई। इसकी पुष्टि रामायण में असुरराज रावण के वैद्य सुखेण द्वारा राम के मूर्छित भाई लक्ष्मण का इलाज करने के जिक्र से होता है। सुखेण वैद्य द्वारा दुश्मन खेमे के योद्धा का इलाज किए जाने में असुर संस्कृति के मानवीय रूप का चरम दिखता है। माने वैद्य (चिकित्सक) का पेशा मानवीय पेशा है। पूंजीवाद ने इसे धंधा बना दिया।

आयुर्वेद पर अभी रामदेव का एकाधिकार है, जो एलोपैथी और आयुर्वेद का घालमेल करके ‘कोरोनिल टैबलेट’ बना बेच रहे हैं। वहीं एलोपैथी पद्धति मुनाफ़ा का सबसे बड़ा जरिया बना हुआ है। दुनिया के तमाम राज्य अपनी समाज कल्याण की भूमिका से पीछे हटते गए और स्वास्थ्य और चिकित्सा क्षेत्र को मुनाफे के लिए इंसान को हलाल करने वाली निजी कंपनियों के सुपुर्द कर दिया गया है। आज देश में दवाइयों पर तो सिर्फ़ कंपनियों का एकाधिकार है। कंपनियों का हित ‘बैद्धिक संपदा अधिकार’ द्वारा संरक्षित किया जाता है। कोरोना काल में सभी नागरिकों को ‘टीका’ सुनिश्चित करना सरकार का उत्तरदायित्व न होकर मत के लिए जनता से बार्गेनिंग का एक जरिया बन गया।

हर साल 5 करोड़ लोग बीमारी के चलते गरीब हो जाते हैं
वर्ल्‍ड बैंक की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि हर साल भारत में पांच करोड़ लोग गरीब हो रहे हैं। वर्ल्‍ड बैंक की इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हेल्‍थ सर्विसेज इतनी महंगी हैं कि इस कारण हर साल पांच करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जा रहे हैं। वर्ल्‍ड बैंक और वर्ल्‍ड हेल्‍थ ऑर्ग्‍नाइजेशन की यह रिपोर्ट हर साल ट्रैकिंग यूनिवर्सल हेल्‍थ कवरेज: 2017 ग्‍लोबल मॉनेटरिंग रिपोर्ट के नाम से जारी होती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत समेत दुनिया की आधी आबादी जरूरी स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं लेने में अक्षम है। रिपोर्ट में कहा गया है कि स्‍वास्‍थय सर्विसेज पर खर्चे के कारण हर साल 10 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जा रहे हैं। उनमें से अकेले भारत में पांच करोड़ लोग हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लगातार बढ़ते चिकित्सा खर्च की वजह से हर साल 23 प्रतिशत बीमार लोग अपना सही इलाज नहीं करा पाते। इसके अलावा स्वास्थ्य की मद में होने वाले खर्च का 70 प्रतिशत लोगों को अब भी अपनी जेब से भरना पड़ता है, जो कि उन्हें गरीबी रेखा के नीचे धकेल देता है। वहीं स्वास्थ्य सेवाओं पर आम लोगों की जेब से खर्च होने वाली भारी रकम से सामाजिक-आर्थिक संतुलन भी गड़बड़ा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, सात फीसदी आबादी हर साल इसी वजह से गरीबी रेखा से नीचे (BPL) चली जाती है। ऐसे लोग इलाज के लिए भारी कर्ज लेते हैं। यही नहीं, 23 फीसदी बीमार लोग तो पैसों की कमी से अपना सही इलाज भी नहीं करा पाते। केंद्र सरकार की ओर से चलाई जा रही आयुष्मान भारत जैसी स्वास्थ्य योजनाओं के बावजूद इस तस्वीर में ज्यादा बदलाव नहीं आया है।

स्वास्थ्य सेवाओं की सेहत खराब
देश की आबादी जितने समय में सात गुना बढ़ गई, ठीक उसी दौरान अस्पतालों की तादाद दोगुनी भी नहीं बढ़ सकी। एक मोटे अनुमान के मुताबिक देश में छोटे-बड़े लगभग 70 हजार अस्पताल हैं, लेकिन उनमें 60 प्रतिशत ऐसे हैं, जिनमें बेडों की संख्या 30 या उससे कम हैं। सौ या उससे अधिक बिस्तरों वाले अस्पतालों की तादाद तीन हजार से कुछ ज्यादा है। इस लिहाज से देखें तो लगभग सवा छह सौ नागरिकों के लिए अस्पतालों में महज एक बिस्तर उपलब्ध है।

देश में स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी खर्च बीते लगभग एक दशक से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 1.3 प्रतिशत पर ही स्थिर है। नेशनल हेल्थ प्रोफाइल, 2018 के मुताबिक, भारत उन देशों में शुमार है, जहां स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकारी खर्च सबसे कम है। यहां वर्ष 2009-10 में स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रति व्यक्ति सालाना सरकारी खर्च 621 रुपये था, जो वर्ष 2015-16 में बढ़ कर 1,112 रुपये (यानि करीब 15 डॉलर) तक पहुंचा। अब भी इसमें खास वृद्धि नहीं हुई है। इसके मुकाबले स्विट्जरलैंड का खर्च प्रति व्यक्ति 6,944 अमेरिकी डालर, अमेरिका का 4,802 डालर और इंग्लैंड का साढ़े तीन हजार अमेरिकी डालर है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की ओर से बीते साल जारी स्वास्थ्य वित्तीय प्रोफाइल में कहा गया था कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च का 67.78 फीसदी आम लोगों की जेब से जाता है, जबकि इस मामले में वैश्विक औसत महज 18.2 फीसदी है। इसका भी सबसे बड़ा हिस्सा लगभग 43 फीसदी दवाओं पर खर्च होता है।

कुल बजट का 4% ही स्वास्थ्य पर खर्च करता है भारत
अमेरिका के बाद भारत कोविड-19 महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित देश है, लेकिन स्वास्थ्य खर्च पर भारत की हिस्सेदारी अफगानिस्तान के बराबर है। यानी दोनों देश अपने कुल बजट का केवल चार फीसदी हिस्सा ही स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं, जबकि यह 15 फीसदी होना चाहिए।

इंटरनैशनल चैरिटी संस्था Oxfam के ताजा सूचकांक ‘Commitment to Reducing Inequality Index 2020’ में यह बात सामने आई है कि भारत का स्वास्थ्य बजट दुनिया में चौथा सबसे कम बजट है। यहां तक कि सबसे ज़रूरी सेवाएं भी देश की केवल आधी आबादी को ही नसीब है। दुनिया भर में 158 देशों में यह सर्वे किया गया था और उनमें से केवल 26 देश ही स्वास्थ्य पर कुल बजट का 15 फीसदी खर्च करते हैं, जबकि भारत ने स्वास्थ्य पर अपने कुल बजट का चार फीसदी से कम हिस्सा खर्च किया और वह हेल्थ स्पेंडिंग इंडेक्स में 158 देशों में 155वें नंबर पर है।

स्वास्थ्य खर्च पर भारत की हिस्सेदारी अफगानिस्तान के बराबर है। यानी दोनों देश अपने कुल बजट का केवल चार फीसदी हिस्सा ही स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं, जबकि दुनिया का दूसरा सबसे गरीब देश बुरुंडी भी स्वास्थ्य पर भारत से तीन गुना ज्यादा खर्च करता है।

विश्व बैंक के डेटाबेस के मुताबिक 2017 में कुल सरकारी खर्च में से स्वास्थ्य पर हुए खर्च के मामले में 206 देशों की सूची में भारत नीचे से 13वें स्थान पर था। भारत ने इस दौरान स्वास्थ्य पर कुल बजट का 3.4 हिस्सा खर्च किया। उसी साल दुनिया के दूसरे सबसे गरीब देश बुरुंडी का स्वास्थ्य पर खर्च 8.5 फीसदी था। अमीर देशों ने स्वास्थ्य पर अपने बजट खर्च का औसतन 18.6 फीसदी खर्च किया, जबकि निचली मध्य आय वर्ग देशों (भारत इसमें आता है) में यह 18.6 फीसदी रहा। जापान ने अपने कुल बजट का 23.6 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च किया। दक्षिण एशियाई देशों में पाकिस्तान ने स्वास्थ्य पर चार फीसदी से अधिक खर्च किया। नेपाल और बांग्लादेश ने अपने कुल बजट का पांच फीसदी से अधिक स्वास्थ्य पर खर्च किया।

चालू वित्त वर्ष 2020-21 के लिए भारत सरकार ने 69,000 करोड़ रुपये हेल्थ सेक्टर के लिए आवंटित किए हैं, जबकि 2019-20 के वित्त वर्ष के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 62,659.12 करोड़ रुपये के बजट की घोषणा की थी। वहीं 2018-19 के वित्त वर्ष का बजट 52,800 करोड़ रुपये था। आंकड़ों में धनराशि कुछ बढ़ती हुई ज़रूर दिखती होगी, लेकिन कुल बजट के प्रतिशत के हिसाब से देखेंगें हेल्थ बजट का प्रतिशत नियत दिखेगा।

जीवन रक्षक दवाइयों के दाम बढ़ाए सरकार ने
दिसंबर 2019 में नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) ने 21 जीवनरक्षक दवाइयों के दाम बढ़ाने की अनुमति दी थी, जिसके बाद कई दवाइयों के दाम 50 फीसदी तक बढ़ गए थे। भारत के दवा मूल्य नियामक को ज़रूरी दवाइओं के दाम कम करने के लिए जाना जाता था, लेकिन मोदी सरकार में पहली बार ऐसा किया गया कि एनपीपीए ने दाम बढ़ाने की अनुमति दी। एनपीपीए के मुताबिक इन दवाओं की कमी के कारण महंगा विकल्प चुनने वाले रोगियों को रोकने के लिए सार्वजनिक हित में कीमतें बढ़ाई जा रही हैं।

महंगी होने वाली ज्यादातर दवाओं का उपयोग उपचार की शुरुआत में ही किया जाता है। ये दवाइयां सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिए बेहद ज़रूरी हैं। इसमें बीसीजी वैक्सीन जैसे तपेदिक, विटामिन सी, एंटीबायोटिक्स जैसे मेट्रोनिडाजोल और बेंज़िलपेनिसिलिन, मलेरिया-रोधी दवा क्लोरोक्वीन और कुष्ठरोगी दवा डैप्सन शामिल थी। इनमें से अधिकांश दवाओं का उपयोग उपचार की पहली पंक्ति के रूप में किया जाता है और देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण हैं।

देश के गली-गली में सरकारी शराब की दुकान हो सकती है तो सरकारी दवा की क्यों नहीं?
बीमारी से ज्यादा आम नागरिक ‘महंगी दवाओं’ के बोझ से हलकान हैं। सरकार, निजी दवा कंपनियों के मनमर्जी के दाम वसूलने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाने में पूर्णत: नाकाम रही हैं। जन औषधालय आज भी आम मरीज की पहुंच से दूर हैं। वहीं प्राइवेट दवा कपंनियों की संख्या दिन-बदिन बढ़ती जा रही है। ब्रांडिंग के खेल में जेनरिक दवाओं के महत्व को दबाया जा रहा है। आज दवा कपंनियों से मिलने वाला सफेदपोश चिकित्सकों का ‘कमीशन’ कई गुना बढ़ गया है।

प्राइवेट दवा कंपनियों के मेडिकल रिप्रजेंटेटिव की घुसपैठ सरकारी अस्पतालों के अंदर खाने तक हो गई है। निजी दवा कंपनियां, दवा में ब्रांडिंग के नाम पर गरीब जनता को लूट रही हैं। कुछ दवा कंपनियों को छोड़ कर अधिकांश के पास अपना रिसर्च प्रोडक्ट तक नहीं है। देश में अभी तक कुल मिलाकर 12-13 दवाएं ही ईजाद हुई हैं। देश में 95 प्रतिशत बीमारियों का इलाज जेनरिक (पेटेंट फ्री) दवाओं से हो रहा है। फिर भी दवाएं महंगी हैं।

बता दें कि प्राइवेट दवा कंपनियां जेनरिक और एथिकल (ब्रैंडेड) दोनों तरह की दवाएं बनाती हैं। दोनों की कंपोजिशन समान होती है और इन्हें बनाने में कोई फर्क नहीं होता है। यहां तक की दोनों की गुणवत्ता और परफॉर्मेंस भी बराबर होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि ‘जेनरिक’ दवाओं की मार्केटिंग और ब्रांडिंग पर दवा कंपनियां पैसा खर्च नहीं करती हैं, और उन्हें अपनी लागत मूल्य के बाद कुछ प्रॉफिट के साथ बेच देती हैं। जबकि, ब्रांडेड दवाओं के लिए जमकर मार्केटिंग की जाती है। दवा कंपनियों के एमआर डॉक्टरों को इन दवाओं को ज्यादा से ज्यादा मरीजों को प्रिस्क्राइब करने के लिए 10 से 40 फीसदी तक कमीशन और तरह-तरह के उपहारों से नवाजा जाता है और इसके एवज में डॉक्टर एक विशेष ब्रांड लिखता है, केमिस्ट विशेष ब्रांड बेचता है, मरीज विशेष ब्रांड की दवा खाता है और मुनाफा भी एक विशेष दवा कंपनी को होता है।

भारत में पांच सरकारी दवा कंपनियां हैं और इनका सालाना टर्नओवर 600 करोड़ से भी कम है। जबकि इस देश का घरेलू दवा बाजार 2.33 लाख करोड़ से भी अधिक का हो गया है। वहीं विश्व में जेनेरेकि दवाइयों के निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत है।

सरकार सस्ती दाम पर दवाइयां उपलब्ध करवाने की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं कर रही है। जो थोड़े बहुत कदम हैं वो बस विज्ञापनों तक सीमित हैं। आलम ये है कि सरकारी अस्पतालों तक से जेनरिक दवाइयां नदारद हैं। सरकारी दवा की दुकानों को खोलने के दिशा में किसी भी तरह का प्रयास नहीं देखा जा रहा है। ऐसे में यह सवाल उचित ही है कि जब इस देश की गली-गली में सरकारी शराब की दुकानें हो सकती हैं तो सरकारी दवाइयों की क्यों नहीं।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव का लेख।)

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This post was last modified on November 26, 2020 2:37 pm

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