Sunday, May 29, 2022

मिर्जापुर ग्राउंड जीरो: चुआड़, नाला और हैंडपंप के जहरीले पानी के भरोसे है यहां आदिवासियों की ज़िंदगी

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अहरौरा, मिर्जापुर। गत 6 मार्च, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव-2022 के आखिरी चरण के मतदान से ठीक पहले का दिन। शाम के करीब पौने छह बज रहे थे। दिन ढल रहा था। सूर्य की किरणें लालिमा बिखेर रही थीं। मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय शहर वाराणसी से करीब छप्पन किलोमीटर दूर वाराणसी-शक्तिनगर राज्य मार्ग (एसएच-5ए) पर भैंसाखोह नाम की जगह पर पहुंच चुका था। यह मिर्जापुर जिले की अहरौरा घाटी में सोनभद्र की सीमा से महज डेढ़ किलोमीटर दूर था।

वाराणसी-शक्तिनगर राज्यमार्ग स्थित अस्थायी टोल प्लाजा। 

पहाड़ी के बीच से सूर्य की किरणें जंगल और सड़क का रास्ता दिखा रही थीं। तभी एक बुजुर्ग महिला दो छोटे-छोटे बच्चों को सड़क पार करा रही थी। सड़क के दूसरी तरफ एक युवा लाल स्वेटर और गमछा में साइकिल लेकर खड़ा था। वह सड़क पार कर रहे बच्चों को संभाल रहा था। बुजुर्ग महिला भी सड़क पार कर उसके पास आ गई। फिर वह सड़क के दूसरी तरफ गया और बोरी में रखे सामान को लाकर साइकिल पर रख लिया। वह साइकिल लेकर जंगल के बीच से जाने वाले पथरीले और उबड़-खाबड़ रास्ते पर पैदल ही पश्चिम दिशा में बढ़ने लगा। उसके पीछे दोनों बच्चे और बुजुर्ग महिला भी चल पड़े। बुजुर्ग महिला एक डंडे के सहारे रास्ता तय कर रही थी। वे सारादह जंगल की ओर पहाड़ी पर चढ़ रहे थे।

अमवां की बिंद बस्ती जा रहा युवक एवं बुजुर्ग महिला। 

जमीनी रपट की तलाश में मैं भी उनके पीछे अपनी स्कूटी से चल पड़ा। बुजुर्ग महिला और युवक से पूछने पर पता चला कि वे अमवां बिंद बस्ती के निवासी हैं। यह बस्ती वाराणसी-शक्तिनगर राज्यमार्ग से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर पहाड़ी पर जंगल के बीच बसी है। करीब पंद्रह कच्चे-पक्के मकानों और झोपड़ी वाली इस बसावट में करीब सौ लोग रहते हैं जो खेती-बाड़ी, मजदूरी और लकड़ी चुनकर जीवन यापन करते हैं।

पहाड़ी पर साइकिल चढ़ाकर अमवां बस्ती पहुंचने की कोशिश कर रहा युवक।

मिर्जापुर जिले में जमालपुर विकासखंड के हिनौता ग्राम पंचायत के तहत आने वाली अमवां बिन्द बस्ती को जाने वाले रास्ते पर डेढ़ किलोमीटर तक आपको कोई घर, मकान या दुकान नहीं मिलेगा। यह पथरीली चट्टानों, पत्थर और मिट्टी का उबड़-खाबड़ रास्ता है जो भैंसाखोह से जंगल में करीब पांच किलोमीटर दूर सारादह स्थित परमहंस खप्पर बाबा आश्रम तक जाता है।

भैंसाखोह से सारादह जंगल को जाने वाला रास्ता।

करीब डेढ़ किलोमीटर दूर जाने पर पहाड़ी पर अमवां बिंद बस्ती दिखी। देखने से यह साफ पता चल रहा था कि यह कोई घनी बस्ती नहीं है। एक-दो घरों वाले दो बसावटों के बीच कम से कम बीस मीटर की दूरी थी। बाशिंदों ने कंटीली लकड़ियों और तारों, पत्थरों और अन्य जंगली लकड़ियों से अपनी जमीनों की घेराबंदी कर रखी थी। खंडहर में तब्दील हो चुके एक मकान को पार करने के बाद मेरी मुलाकात अमवां बिन्द बस्ती निवासी राजकुमार बिन्द और आशीष कुमार से हुई। वे रास्ते पर एक पेड़ के नीचे खड़े थे।

अमवां बिन्द बस्ती

जब मैं उनसे बस्ती और वहां के लोगों के बारे में जानना चाहा तो वे मुझे चुनावी प्रचार के लिए आने वाले व्यक्तियों का हिस्सा समझकर सवाल करने लगे। मैंने उन्हें बताया कि मैं एक पत्रकार हूं और आपकी समस्याओं को समझने और लिखने के लिए आया हूं तो वे बस्ती और अपनी समस्याओं के बारे में जानकारी देने के लिए राजी हुए। हालांकि इसके लिए उन्होंने बकायदा मेरा साक्षात्कार लिया। उनके सवालों में उस जगह से जुड़े सवाल भी थे, जहां मैं खड़ा था। वाराणसी से आने की बात सुनकर राजकुमार ने मुझसे उस जगह और खंडहर के पुस्तैनी मालिक का नाम तक पूछ डाला। फिर उन्होंने खुद ही जवाब दिया, “ये जमीनें वाराणसी के रहने वाले रवि अस्थाना और उनके परिवार की थीं। रवि अस्थाना ने वाराणसी के जालान्स, खेमका जैसे कई लोगों को जमीनें बेच दी हैं।”

रवि अस्थाना का खंडहरयुक्त मकान। 

रवि अस्थाना का नाम सुनते ही मुझे उनके भाई और काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष संजय अस्थाना की कही वे बातें याद आ गईं, जब मैं पहली बार उनसे मिला था। उन्होंने मेरा पैतृक आवास जानने के बाद अपनी इन पुस्तैनी जमीनों का जिक्र किया था। मैंने राजकुमार और आशीष को जब रवि अस्थाना और उनके आवास के बारे में बताया तो वे बस्ती और वहां की समस्याओं के बारे में जानकारी देने के लिए आश्वस्त हुए।

अमवां बिंद बस्ती निवासी राजकुमार बिन्द

शायद ऐसा इसलिए हुआ होगा क्योंकि उनकी बस्ती की जमीनों के साथ-साथ आस-पास की जमीनों के मालिकाना हक को लेकर न्यायालय में मुकदमा चल रहा है। यह मुकदमा उत्तर प्रदेश वन विभाग ने दायर किया है जो अभी लंबित है। बस्ती के लोगों का दावा है कि वे अपनी जमीनों के संक्रमणीय भूमिधर हैं और उनके नाम से इनकी खतौनियां हैं। बिंद बस्ती निवासी राज कुमार कहते हैं, “मेरी तीसरी पीढ़ी है। हमारी खतौनी भी है। हम लोग अपनी खतौनी की जमीनों में खेती करते हैं और रहते हैं।”

आशीष कुमार हैंडपंप चलाकर पानी दिखाते हुए।

बस्ती से करीब पच्चीस किलोमीटर दूर कोलना स्थित आदर्श जनता महाविद्यालय से भूगोल विषय में स्नातकोत्तर की शिक्षा हासिल कर रहे आशीष कुमार पीने के पानी को लेकर काफी चिंतित नज़र आते हैं। बस्ती के इकलौते सरकारी हैंडपंप के पास ले जाकर वह कहते हैं, “देखिए, इस इकलौते सरकारी हैंडपंप के पानी को। लाल पानी आ रहा है। कुछ देर बाल्टी में रख देने पर ऊपरी सतह पर तेल तैरने लगता है। हम यहीं पानी पीते हैं। अब तो यह हैंडपंप पानी भी छोड़ दे रहा है। गर्मी के दिनों में यहां पानी की समस्या और बढ़ जाती है। हम लोग यह पानी पीकर अक्सर बीमार पड़ जाते हैं। अगर यहां समरसेबुल लग जाए तो हमारी बहुत बड़ी समस्या हल हो जाएगी।” आशीष कुमार बस्ती के सबसे उच्च शिक्षित व्यक्ति हैं। पढ़ाई के साथ खेती भी करते हैं। अगर एक परिवार को छोड़ दें तो सभी लोगों की खेती बरसात के पानी पर निर्भर करती है।

अमवां बिंद बस्ती के एकलौते सरकारी हैंडपंप से निकला लाल पानी।

बस्ती में पीने के पानी की समस्या को लेकर बात हो ही रही थी कि बस्ती की एक किशोरी सिर पर प्लास्टिक की बाल्टी में पानी लेकर आती हुई दिखाई दी। पूछने पर उसने अपना नाम चांदनी बताया।

हर्बल प्लांटेशन फार्म हाउस से पानी लेकर आती चांदनी।

चांदनी पानी कहां से लेकर आ रही है? पूछने पर आशीष बताते हैं, “करीब पांच सौ मीटर दूरी पर खेमका का हर्बल प्लांटेशन फार्म हाउस है। वहीं से यह पानी लेकर आ रही है। वह पीने के लिए अभी पानी लाने देते हैं लेकिन नहाने और कपड़ा धोने के लिए नहीं। उस पानी में भी तेल की परत जम जाती है। मजबूरी में वही पानी इस समय हम लोग पी रहे हैं। अगर वह हमें पानी नहीं देंगे तो हमें सरकारी नल का जहरीला पानी ही पीना पड़ता है।”

कामधेनु हर्बल प्लांटेशन फार्म हाउस के पानी की ऊपरी सतह पर मौजूद तेलीय पदार्थ

आशीष अपनी बातचीत में जिस खेमका हर्बल प्लांटेशन फार्म हाउस की बात कर रहे थे, वह एक कंपनी द्वारा संचालित है। इसका पूरा नाम “कामधेनु हर्बल प्लांटेशन एण्ड रिसर्च इंटरप्राइजेज (एलएलपी)” है। यह कोलकाता में कंपनी के रूप में पंजीकृत है। 27 जनवरी 2015 को बनी इस कंपनी के मालिकों में रवि अस्थाना, आशुतोष कुमार खेमका, राजाराम खेमका, कृष्ण कुमार खेमका और शिव राम खेमका का नाम दर्ज है।

कामधेनु हर्बल प्लांटेशन एण्ड रिसर्च इंटरप्राइजेज (एलएलपी) का फॉर्म हाउस।

शाम के सवा छह बज चुके थे। सूरज की रौशनी धीमी पड़ गई थी। अंधेरा होने लगा था। तभी मेरी नज़र खेत में खोदे जा रहे गड्ढे पर पड़ी। पास में एक महिला अपनी छोटी सी बेटी के साथ काम कर रही थी। देखने से साफ पता चल रहा था कि वहां मकान बनाने के लिए नींव खोदी जा रही थी। पास जाकर पूछने पर महिला ने अपना नाम रीता बताया। क्या यह सरकारी आवास बनाने के लिए नींव खोदी जा रही है? उन्होंने मजाकिया अंदाज़ में कहा, “हमके साढ़े चार लाख क आवास मिलल हव। ओही के बनावे खातिर इ नेव खोदत हई जा।” जब मैंने बताया कि मैं पत्रकार हूं और लिखने के लिए पूछ रहा हूं तो रीता ने कहा, “कउने आवास नाहीं मिलल हव। इ मट्टी क घर बनावे खातिर नेव खोदले हई जा।”

मकान बनाने के लिए खोदी जा रही नींव और उसके सामने खड़ीं रीता

रीता बताती हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत रसोईं गैस (एलपीजी) का कनेक्शन नहीं मिला है। प्रधानमंत्री आरोग्य योजना के तहत उनका हेल्थ कार्ड नहीं बना है। लॉक-डॉउन में भी उन्हें कोई पैसा सरकार की ओर से नहीं मिला। यहां तक कि बस्ती में कोई पोलियो ड्रॉप भी पिलाने नहीं आता है। अगर बस्ती में कोई बीमार हो गया तो ईलाज के लिए उन्हें यहां से करीब सात किलोमीटर दूर सुकृत या बारह किलोमीटर दूर अहरौरा ले जाना पड़ता है। विद्युत आपूर्ति की व्यवस्था के बारे में पूछने पर बताती हैं कि करीब एक साल पहले ही बस्ती में बिजली आई है।

अमवां बिन्द बिस्ती की एक बसावट। 

रीता परिवार की हालत दिखाने के लिए अपने घर ले गईं जो एक ऐसी झोपड़ी थी जिसकी कुछ दीवारें मिट्टी की बनी हुई थीं। इसी में से एक दीवार पर विद्युत विभाग का स्मार्ट मीटर बता रहा था कि वे लोग ‘न्यू इंडिया’ का लाभ पा रहे हैं लेकिन जीवन व्यतीत करने के लिए उनके पास मूल सुविधाएं ही नहीं हैं। सैंतीस वर्षीय रीता के परिवार में उनके पति राधेश्याम के अलावा तीन बेटियां और दो बेटे भी हैं। उनकी सबसे बड़ी बेटी निशा पंद्रह साल की है जबकि उससे छोटी चांदनी की उम्र बारह साल की है। सबसे छोटी बेटी नंदिनी अभी नौ साल की है। उनकी तीनों बेटियों ने विद्यालय का मुंह तक नहीं देखा है। विद्यालय नहीं भेजने का कारण पूछने पर राधे श्याम बताते हैं कि पास में कोई विद्यालय नहीं है। बस्ती से नजदीकी विद्यालय भी करीब छह किलोमीटर दूर है। करीब डेढ़ किलोमीटर जंगल का सुनसान रास्ता है। ऐसे में लड़कियों को अकेले विद्यालय भेजना खतरनाक है। हालांकि उनका छह साल का बेटा बबलू बस्ती से करीब बारह किलोमीटर दूर अहरौरा स्थित एक निजी विद्यालय में एलकेजी का छात्र है। परिवार का सबसे छोटा सदस्य भोला अभी साढ़े चार साल का है लेकिन विद्यालय नहीं जाता है।

रीता अपनी झोपड़ी में परिवार के साथ।

राधेश्याम ने यह भी बताया कि बस्ती से करीब दो किलोमीटर दूर जालान्स का एक आवासीय विद्यालय संचालित होता है जिसमें सोनभद्र और झारखंड के आदिवासी बच्चे रहते हैं। जब हम अपने बच्चों को वहां पढ़ाने के लिए गए तो उन लोगों ने स्थानीय लोगों के बच्चों का प्रवेश लेने से इंकार कर दिए।

द्वारा संचालित आवासीय विद्यालय सह फॉर्म हाउस।

रीता के घर पर मेरी मुलाकात उनकी करीब अस्सी वर्षीय सास चमेला से हुई। वे बताती हैं, “बियाह के जब से आइल हई, तब से एही हई।” चमेला देवी के दो बेटे हैं। राधेश्याम और राज कुमार। दोनों ही मिट्टी की दीवारों वाली झोपड़ी में रहते हैं और अपनी जमीन पर बरसात के पानी से खेती करते हैं। शेष दिनों में वे मजदूरी करते हैं।

चमेला देवी।

राज कुमार बताते हैं, “अमवां बिन्द बस्ती में कुल ग्यारह परिवार रहते हैं। इनमें आधा लोगों के पास ईंट का आवास है। शेष लोग छप्पर और कच्चे मकान में रहते हैं।” राज कुमार के आवास पर ही मेरी मुलाकात बस्ती निवासी दुलारे, रत्तन, प्रकाश, गुड्डू, अजय, बब्बन, जीऊत, राम आसरे, सुरेश आदि लोगों से हुई। सभी ने बस्ती में पीने के पानी की समस्या को हल करने की गुहार लगाई। दिन ढल चुका था। अंधेरा छाने लगा था। मैं वहां से घर के लिए निकल लिया।

राजकुमार के आवास के पास मौजूद बस्ती के लोग।

सात मार्च की सुबह वोट देने के बाद मैं सोनभद्र की सीमा पार कर सारादह स्थित परमहंस खप्पर बाबा आश्रम को जाने वाले पथरीले रास्ते पर फिर चल पड़ा। दोपहर के करीब बारह बज रहे थे।

वाराणसी-शक्तिनगर मार्ग स्थित भैंसाखोह से सारादह को जाने वाला मोड़। 

मैं अमवां बिंद बस्ती के शुरुआती बसावट में पहुंचा। यह बसावट राम दुलार बिंद और उनके बेटों का था। राम दुलार वोट देने बिल्लोकुंड (हिनौता) स्थित प्राथमिक विद्यालय गए थे जो बस्ती से करीब आठ किलोमीटर दूर है। घर पर उनकी पत्नी जानकी देवी मिलीं। वह स्वास्थ्य ठीक नहीं होने की वजह से वोटे देने नहीं गई थीं। उन्होंने बताया कि उनका बड़ा बेटा जय प्रकाश बिन्द भी अपनी पत्नी चमेला देवी के साथ वोट देने बिल्लोकुंड गया है।

अमवां बिन्द बस्ती निवासी जानकी देवी।

घर पर जय प्रकाश की बेटियां संध्या और कविता मिलीं। दोनों दसवीं की छात्रा हैं। संध्या अहरौरा स्थित गंगा देवी इंटर कॉलेज में पढ़ती है जबकि कविता मानिकपुर गांव में पुस्तैनी मकान पर रहकर पढ़ाई करती है। जय प्रकाश के दो बेटे सत्य और प्रियांशु भी हैं। दोनों अहरौरा स्थित एक निजी विद्यालय में क्रमशः छठवीं और चौथी कक्षा में पढ़ते हैं। जय प्रकाश के पास ऑटोरिक्शा है जिससे उनके बच्चे पढ़ने जाते हैं। बस्ती में केवल जय प्रकाश की बेटियां ही हैं जो विद्यालय जाती हैं। अन्य किसी भी व्यक्ति की बेटी विद्यालय का मुंह तक नहीं देखी है।

जय प्रकाश के घर पर उनकी बेटियां।

राम दुलार का बीस वर्षीय छोटा बेटा शिवम बिन्द घर पर मिला। वोटर लिस्ट में नाम नहीं होने की वजह से वह वोट देने नहीं गया था। शिवम ने बताया, “हमने खेत में चार सौ फीट गहरी बोरिंग कराई है। इसमें पर्याप्त पानी है। हमारी पूरी खेती आसानी से हो जाती है। पानी बचता है तो हम प्रति घंटा के हिसाब से बस्ती के अन्य लोगों को खेती करने के लिए भी पानी देते हैं।” पूरी बस्ती में राम दुलार के पास ही बोरिंग है। अन्य लोग पीने का पानी भी मांगते फिरते हैं। राम दुलार के पास कुल आठ बीघा जमीन है। उनके दोनों बेटे और उनका परिवार इसी जमीन पर खेती करते हैं। बस्ती में राम दुलार ही ऐसे व्यक्ति मिले जिनकी हालत कुछ सुदृढ़ दिखाई दी।

राम दुलार का खेत एवं घर।

रामदुलार के परिवार की हालत जानने के बाद मैं सारादह जंगल की ओर जाने वाले रास्ते पर आगे बढ़ा। दाहिनी ओर पहाड़ी के नीचे एक गौशाला दिखाई दी जहां करीब एक दर्जन गाएं बंधी हुई थीं। बस्ती के लोगों से जानकारी करने पर पता चला कि इलाके में ऐसी कई गौ-शालाएं हैं जिन्हें जालान्स चलाते हैं। गौशालाओं की फोटो लेने के बाद मैं कच्चे रास्ते पर आगे बढ़ गया।

गौशाला

चुआड़ और नाला का पानी पीते हैं हिनौता के ये बाशिंदे

एक पेड़ के नीचे करीब एक दर्जन लोग बैठे थे। ऐसा लग रहा था कि वे किसी का इंतजार कर रहे हैं। उनसे बात करने पर पता चला कि वे वहां से करीब तीन किलोमीटर दूर सारादह आश्रम के पास नाला किनारे रहते हैं। वे वोट देने बिल्लोकुंड (लतीफपुर) जा रहे थे जो उनकी बस्ती से करीब दस किलोमीटर दूर है। उन्हें ले जाने के लिए ऑटोरिक्शा आने वाला था। वे उसी का इंतजार कर रहे थे। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं एक पत्रकार हूं और उनकी समस्याओं की रिपोर्टिंग के लिए आया हूं तो वे खुलकर अपनी बातें कहने लगे।

अमवां बस्ती के पास पेड़ के नीचे बैठे हिनौता के लोग।

बियार समुदाय की चंद्रबासो देवी बताती हैं, “हम सब इहां से एक कोस दूर सारादह के जंगल में डोंगिया नाला के किनारे रही ला जा। कुल सतरह घर हव। सब लोग चुआड़ क पानी पीही ला जा। उहो नाला में हव। बारिश होला त उहो नाला के पानी में मिल जाला। फिर हम सबके नाला क पानी पीये के होला।” चंद्रबासो का दावा है कि वे लोग जिस चुआड़ का पानी पीते हैं, वह डोंगिया जलाशय से आता है।

हिनौता निवासी चंद्रबासो

चंद्रबासो के साथ उनके पति भगवान भी वोट देने जा रहे थे। वह बताते हैं, “हमहन के बस्ती में कुल सत्रह घर हव। जउने में छह घर बियार, पांच घर मुसहर, दू घर चौहान, दू घर भुइयां आउर दू घर बिंद हउवैं। बस्ती में सरकारी हैंडपंप भी ना लगल हव। बिजली आईल हव त, ओहू क खंभा आधै बस्ती में लगल हउवै।”

बस्ती की अंत्योदय कार्डधारक शहोदरी देवी बताती हैं कि बस्ती में केवल दो लोगों का अंत्योदय राशन कार्ड है। एक मेरा और दूसरा मोहन का। अन्य सभी लोगों का सफेद कार्ड (राष्ट्रीय खाद्यान्न योजना कार्ड) है। हमें राशन लेने के लिए भी करीब दस किलोमीटर की दूरी तय करना पड़ता है।

शहोदरी देवी एवं अन्य

बियार समुदाय की ही कुन्ता बताती हैं कि बस्ती में किसी को भी सरकारी आवास नहीं मिला है। सभी झोपड़ी में रहते हैं जबकि बस्ती के करीब पचास लोगों का नाम वोटर लिस्ट में है। मतदाता पहचान पत्र बना हुआ है। आधार कार्ड भी है। वोट भी देते हैं। इसके बावजूद हमारा जॉब कार्ड नहीं बना है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत एलपीजी गैस का कनेक्शन नहीं मिला है। आयुष्मान योजना के तहत हेल्थ कार्ड भी नहीं बना है।

ई-श्रम कार्ड के मामले में भुइयां समुदाय की शकुन्तला देवी भाग्यशाली निकलीं। उनका ई-श्रम कार्ड बना था। उसे दिखाते हुए वह कहती हैं, “हमार ई-श्रम कार्ड बनल हव लेकिन लॉक-डॉउन में हमके कउनो पैसा ना मिलल।” उत्तर प्रदेश में भुइयां समुदाय सोनभद्र को छोड़कर अनुसूचित जाति वर्ग का हिस्सा है। जनगणना-2011 के अनुसार राज्य में इसकी आबादी 4095 थी। सोनभद्र में भुइयां जाति के लोग अनुसूचित जनजाति वर्ग में आते हैं। बस्ती निवासी प्रमिला, प्रेमा, कुन्ती देवी और मंदीश ने भी बताया कि उनका भी ई-श्रम कार्ड बना हुआ है लेकिन लॉक-डॉउन के दौरान उन्हें कोई पैसा नहीं मिला। अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल मुसहर समुदाय के लोगों की हालत भी ऐसी ही है।

शकुन्तला देवी 

चौहान (नोनिया) समुदाय की किरन बताती हैं कि उन्हें भी आवास नहीं मिला है। वह भी झोपड़ी लगाकर कच्चे मकान में रहती हैं। बस्ती के लोग अरहर, सरसो और आलू की खेती करते हैं। खाली समय वे लोग मजदूरी कर अपना जीवन यापन करते हैं।

दोपहर के करीब पौने एक बज चुके थे। वे लोग जिस ऑटोरिक्शा का इंतजार कर रहे थे, वह भी आ गया था। मैं भी जमीन पर हालात जानने के लिए उनकी बस्ती की ओर निकल पड़ा। पथरीले और भुलभुलैया वाले सुनसान जंगल के रास्ते मैं सारादह जंगल की ओर बढ़ा। कुछ दूर जाने पर रास्ता भूल गया। जंगल के सुनसान रास्ता से निमिषारण्य लगे बोर्ड के पास पहुंच गया। जंगल में किसी ने बाउंड्री कराकर यह सुरक्षित किया था।

निमिषारण का लगा बोर्ड।

थोड़ा आगे जाने पर रास्ता पगडंडी में बदल गया। गलती का अहसास होने के बाद मैं वापस मुड़ गया। कुछ दूर जाने के बाद मैं बस्ती की ओर जाने वाला रास्ता था। मैं उस रास्ते पर आगे बढ़ गया। करीब पच्चीस मिनट जंगल में भटकने के बाद मैं बस्ती पहुंच चुका था। वहां कुछ बच्चे खेल रहे थे। उसमें से सबसे बड़े युवक, जिसका नाम जितेन्दर था, से मैंने बस्ती की पहचान सुनिश्चित की। जितेंदर ने तीसरी के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी और बकरी चरा रहा था।

डोंगिया नाला किनारे बसी हिनौता बस्ती के बच्चे। 

मैंने उससे जंगल में निर्माणाधीन एक पक्के मकान के बारे में पूछा तो उसने किसी चावला जी का मकान बनने की बात कही। उसने यह भी बताया कि वे लोग कभी-कभी यहां आते हैं।

चावला का निर्माणाधीन मकान। 

सामने मिट्टी की दीवारों के सहारे सीमेंट शेड से बने मकान के बारे में पूछा तो उसने कहा, “इ उमेश बियार क मकान हव। उ अभी इहां नाहीं हउअन। उ वोट देवे गयल हउअन।” उमेश की पत्नी प्रमिला भी वोट देने गई थीं। घर पर उनका लड़का था। उन्होंने अपनी जमीन की चौहद्दी जंगली बांस और लकड़ी के फट्ठे से बना रखी थी। अरहर की फसल लहलहा रही थी।

उमेश बियार का मकान।

उमेश के दाहिनी ओर किरन चौहान की झोपड़ी थी। उनका मिट्टी का मकान गिर गया था। झोपड़ी में उनके सामानों की रखवाली एक मुर्गा कर रहा था। उन्होंने अपनी कब्जे वाली जमीन की चौहद्दी को जंगली लकड़ियों से घेर रखा था।

उसके बाद मुझे कल्लू का कच्चा मकान मिला जिसकी छतें घास-फूंस और तिरपाल से बनी थीं। मकान के कुछ हिस्सों में मिट्टी से दीवार बन रही थी। उनके सामने की दीवार पर विद्युत विभाग का स्मार्ट मीटर बता रहा था कि वे ‘न्यू इंडिया’ में रह रहे हैं जहां कंपनियों की बिजली तो मिलती है लेकिन जीने के लिए पीने योग्य पानी नहीं।

कल्लू का मकान

आगे बढ़ने पर दर्जनों की संख्या जानवर दिखाई दिए जो अरहर की खेत के पास घास चर रहे थे लेकिन वहां उनकी देखभाल के लिए कोई नहीं था। पूरा मैदान खाली था।

खेत में घास चर रहे जानवर।

आगे बढ़ने पर मेरी मुलाकात ग्यारह साल के रंगीला से हुई। मटमैले और फटे पैंट को वह किसी तरह से संभालकर पहने हुए था। उसकी पीली शर्ट का नीचे की बटन टूटी हुई थी। जब मैंने उससे उसकी एक फोटो खींचने की बात कही तो वह सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया। फिर मैंने उसको अपनी स्कूटी पर बैठाकर लोगों के घरों के हालात को जानने आगे बढ़ गया।

ग्यारह वर्षीय रंगीला

आगे जाने पर मुझे करीब दस बिस्वा में अरहर का खेत लहलहाते हुए मिला। पूछने पर रंगीला ने बताया कि यह रमपथरा गांव निवासी पप्पू पत्रकार का है। मैंने जब उससे जानना चाहा कि क्या वह किसी संस्थान में काम करते हैं तो वह जवाब नहीं दे पाया।

पप्पू पत्रकार की अरहर की फसल।

उसके दाहिनी ओर खपरैल का एक कच्चा मकान मिला जिसकी चौहद्दी जंगली लकड़ियों और झाड़ों से घिरी थी। रंगीला ने बताया कि यह मंदीश का घर है। मंदीश के घर पर उनकी दो बेटियां थीं। उनकी बड़ी बेटी चांदनी राजगढ़ विकास खंड के मेड़रियां स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय में कक्षा सात में पढ़ती है जो डोंगिया नाला के पार करीब तीन किलोमीटर दूर है। उनकी छोटी बेटी भी वहीं के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ती है।

मैंने चांदनी से पूछा, “पीने का पानी कहां से लाती हो?” वह कहती है, “हम लोग कुआं से पानी लाकर पीते हैं।” मैंने उससे कुआं दिखाऩे के लिए कहा तो वह रंगीला को अपने साथ लेकर मुझे कुआं दिखाने चल पड़ी। साथ में उसने प्लास्टिक की बाल्टी भी साथ ले ली। चांदनी का कुआं (चुआड़) उसके घर से करीब तीन सौ मीटर डोंगिया बांध से निकलने वाले नाले में था।

डोगिंया नाला में स्थित चुआड़ को जाने वाला रास्ता और रंगीला। 

नाला के किनारे वाली तलहटी में पत्थरों के बीच करीब दो-से तीन फीट गहरा एक गड्ढा था जिसमें पानी भरा था और वह जमीन के अंदर से आ रहा था। स्थानीय बोलचाल में इसे चुआड़ कहा जाता है। चांदनी इसी चुआड़ को कुआं कह रही थी। इससे थोड़ी ही दूरी पर नाला का पानी बह रहा था। वहां पत्थर की चट्टानों पर बस्ती के बच्चे कपड़े साफ कर रहे थे और नहा रहे थे।

चुआड़ के पास कपड़े धो रहे बस्ती के बाशिंदे। 

चांदनी इसी गड्ढे में अपनी प्लास्टिक की बाल्टी डूबाई और इसमें पानी भर गया। इसी पानी के साथ उसने बाल्टी अपने सिर पर रखा और घर की ओर चल दी। बस्ती वालों की बातों पर विश्वास करें तो वे लोग इसी पानी को पीते हैं। चुआड़ की भौगोलिक स्थित से यह साफ था कि नाले में पानी बढ़ने पर यह चुआड़ डूब जाता होगा। इसके बाद वे नाले का पानी पीने को मजबूर हो जाते होंगे। चांदनी इसकी पुष्टि भी करती है।

चुआड़ से बाल्टी में पानी भर रही चांदनी।

मंदीश के घर पर ही मेरी मुलाकात अहरौरा डीह निवासी राधे श्याम प्रजापति से हुई। वह बस्ती में बीमार पड़े एक व्यक्ति को बुखार एवं दर्द की दवा देने के लिए अहरौरा से करीब पंद्रह किलोमीटर दूर साइकिल से बस्ती में पहुंचे थे। बातचीत में राधेश्याम ने बताया कि जब लोग बीमार पड़ते हैं तो लोग उन्हें फोन करते हैं। मैं उन्हें बुखार और दर्द की दवा देने आ जाता हूं। इसके बदले में कुछ पैसे मिल जाते हैं। दिन भर ऐसे ही मैं इन जंगली इलाकों में दवा देता हूं। फिर शाम को घर लौट जाता हूं।

राधे श्याम प्रजापति। 

गंभीर रूप से बीमार होने पर इलाज कराने लोग कहां जाते हैं? इसके जवाब में चांदनी कहती है, “बुखार और दर्द होता है तो इन्हें फोन कर दिया जाता है और आकर दवा दे जाते हैं। अगर गंभीर बीमारी या दुर्घटना होती है तो हम लोग यहां से करीब 10 किलोमीटर दूर सुकृत या अहरौरा चले जाते हैं।”

चुआड़ से पानी लेकर आती चांदनी।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के आखिरी चरण का मतदान हो रहा था। इस पिछड़े इलाके में चुनावी हालात को समझने के लिए मैं मेड़रियां स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय की ओर चल पड़ा जहां वोटिंग हो रही थी। परमहंस खप्पर बाबा आश्रम के पास मैंने नाला पार किया और पथरीले रास्ते से मेड़रिया विद्यालय की ओर बढ़ चला।

चुआड़ से पानी लेकर आती चांदनी।

रास्ते में मुझे ‘उत्तर प्रदेश सहभागी वन प्रबंध एवं निर्धनता उन्मूलन परियोजना’ की स्थानीय इकाई का कार्यालय मिला जो खंडहर में तब्दील हो चुका था। हालांकि सारादह जंगल महाल की समिति के सदस्यों का नाम आसानी से पढ़ा जा सकता था। यह परियोजना जापान इन्टरनेशनल कोआपरेटिव एजेंन्सी (जायका) से वित्तीय सहायता प्राप्त थी। यह 2008 में उत्तर प्रदेश में वनों के सुधार एवं उन पर निर्भर जन समुदायों की निर्धनता को दूर करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी जो 2016 तक संचालित होती रही।

सारादह जंगल महाल स्थित उत्तर प्रदेश सहभागी वन प्रबंध एवं निर्धनता उन्मूलन परियोजना’ का कार्यालय।

पहाड़ी चट्टानों पर बनी पगडंडी के रास्ते मैं मड़ेरिया स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय पहुंचा। दिन के पौने तीन बज चुके थे। पुलिस की सुरक्षा में मतदान हो रहा था। भीड़ नहीं के बराबर थी। विद्यालय की बाउन्ड्री टूटी हुई थी।

मतदान स्थल

वहां का जायजा लेकर मैं दूसरे रास्ते से अमवां बस्ती की ओर निकल पड़ा। कुछ दूर जंगल में मुझे सुविधा संपन्न एक फॉर्म हाउस दिखा। इसका गेट बंद था। आस-पास कोई भी व्यक्ति दिखाई नहीं दे रहा था। बाद में लोगों से जानकारी मिली कि यह वाराणसी निवासी किसी डॉ. सुबोध का फॉर्म हाउस था। जहां तक मेरी जानकारी है वाराणसी में डॉ. सुबोध कुमार सिंह एक जाने माने प्लास्टिक सर्जन हैं। उनका जी.एस. मेमोरियल प्लास्टिक सर्जरी हॉस्पिटल है। हालांकि इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई कि यह वही डॉ. सुबोध हैं जिनका सारादह के जंगल में फॉर्म हाउस है।

हिनौता के जंगल में डॉ. सुबोध का फार्म हाउस।

जंगल के सुनसान रास्ते से होता हुआ मैं आगे बढ़ा। विद्युत विभाग के खंभों और कच्चे चकरोड की मदद से करीब तीन किलोमीटर की दूरी जंगल में तय किया। फिर मुझे झाड़ियों के बीच की पगडंडी और साइकिल के टायरों के निशान के सहारे पहाड़ी पर करीब दो किलोमीटर की दूरी तय करना पड़ा। तब कहीं जाकर मुझे भैंसाखोह से सारादह को जाने वाला कच्चा रास्ता मिला। फिर मैं अमवां बस्ती से होते हुए वाराणसी के लिए निकल पड़ा।

अहरौरा पहाड़ी में हिनौता का जंगल और उससे गुजरता हुआ रास्ता।

(अहरौरा से शिवदास प्रजापति की रिपोर्ट।)

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