Sun. Dec 8th, 2019

पंजाब: राजोआना की फांसी पर सियासत

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राजोअना पुलिस कस्टडी में।

तीन दिसंबर को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जैसे ही लोकसभा में बताया कि पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह राजोआना की फांसी की सजा बरकरार है और उसे किसी किस्म की कोई माफी नहीं दी गई है, वैसे ही पंजाब की राजनीति में नया तूफान आ गया। दरअसल, अभी तक माना जा रहा था कि पटियाला जेल में बंद फांसी की सजा पाए राजोआना को माफी देकर, उसकी सजा उम्रकैद में तब्दील कर दी गई है। अकाली-भाजपा गठबंधन के वरिष्ठ नेता इसे मोदी शाह की सिखों के प्रति हमदर्दी बताते नहीं थकते थे।

प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर सिंह बादल तो इस बात का भी श्रेय ले रहे थे कि उनकी कोशिशों के चलते केंद्र ने राजोआना की सजा में तब्दीली की है। अब अमित शाह के लोकसभा में दिए गए पुष्टिनुमा बयान के बाद अकाली खेमा सन्न है और इसे केंद्र का सिखों के साथ धोखा बता रहा है। अन्य पंथक और सिख संगठन भी भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार को सीधे निशाने पर ले रहे हैं। पंजाब की राजनीति में जबर्दस्त उबाल है।             

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श्री गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाशोत्सव के मौके पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आठ सिख कैदियों की पूर्व रिहाई और बलवंत सिंह राजोआना की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने की बात कही थी। तब मान लिया गया था कि अब राजोआना को फांसी नहीं दी जाएगी। शिरोमणि अकाली दल तभी से इसका श्रेय लेकर सिखों में अपनी पैठ मजबूत कर रहा था और लगातार यह प्रभाव दे रहा था कि बादलों की अगुवाई वाला अकाली दल ही सिखों का सबसे बड़ा अभिभावक और प्रवक्ता है। गृहमंत्री अमित शाह के एक बयान अथवा फैसले ने अकालियों तथा बादलों को गहरे सकते में डाल दिया है। हक्के-बक्के हुए शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सांसद सुखबीर सिंह बादल की फौरी प्रतिक्रिया आई कि अमित शाह के बयान ने सिख जनमानस को गहरी ठेस पहुंचाई है और यह सिख कौम के साथ  बेइंसाफी है।

एसजीपीसी (शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी) के प्रधान गोविंद सिंह लोंगोवाल ने इसे सिखों के साथ केंद्र का नया धोखा करार दिया तो श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने केंद्र के नए पैंतरे को सिखों के साथ बहुत बड़ी गद्दारी बताया है। यानी पहली कतार के सिख संगठन और सियासी दल इस प्रकरण में केंद्र और भाजपा से न केवल खासे खफा हैं बल्कि उसके खिलाफ हमलावर भी हो गए हैं।

लोकसभा में मरहूम पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते और लुधियाना से कांग्रेसी सांसद रवनीत सिंह बिट्टू के सवाल के जवाब में अमित शाह ने दो टूक जो कहना था कह दिया लेकिन उनके बयान ने पंजाब की सियासत में बहुत बड़ा धमाका कर दिया और चंद पलों में शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के रिश्तों के बीच एक लकीर भी खिंच गई। खटास तो भीतर खाने दोनों दलों के बीच पहले ही चल रही थी। अब ताजा हालात में बेपर्दा हो रही है।                             

पंजाब पुलिस के पूर्व सिपाही बलवंत सिंह राजोआना ने पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या की साजिश रची और उसे बाकायदा अंजाम तक पहुंचाया। गिरफ्तारी के बाद वह एक बार भी न तो अपनी इस कारगुजारी से मुकरा और कभी शर्मिंदगी भी जाहिर नहीं की। नतीजतन अदालत ने 2007 में उसे फांसी की सजा सुनाई और गर्मपंथियों ने उसे अपना ‘महानायक’ माना तथा अब भी मानते हैं। उसे 2013 तक फांसी पर लटकाना तय था लेकिन यह लगातार टलता रहा तो इसके पीछे भी वजहें सियासी थीं क्योंकि तब सूबे में प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में अकाली-भाजपा गठबंधन सरकार का शासन था।

बादल नहीं चाहते थे कि उन्हें सिख अथवा पंथक विरोधी माना जाए। इसलिए राजोआना की फांसी को किसी ना किसी बहाने लंबित रखा जाता रहा। भाजपा भी पूरी तरह खामोश रही। वैसे भी वह वो वक्त था जब पंजाब भाजपा को ‘बादल भाजपा’ कहा जाता था। राजोआना की फांसी के सवाल पर तब शासन व्यवस्था पर काबिज प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर सिंह बादल मीडिया द्वारा यदा-कदा पूछे जाने पर या तो खामोशी अख्तियार कर लेते थे या फिर आदतन गोलमोल जवाब दे देते थे। केंद्र में कांग्रेस का राज था और यह भी कह दिया जाता था कि फांसी की बाबत फैसला केंद्रीय गृह मंत्रालय के जरिए होना है।

खुद राजोआना ने कभी फांसी-माफी के लिए अपील नहीं की। अलबत्ता उनकी बहन ने जरूर फांसी टलवाने के लिए अपील और लगातार पैरवी की। विदेशी गरम ख्याली सिख संगठनों ने तगड़ी आर्थिक मदद की।

अफजल गुरु को फांसी के फंदे पर लटकाने वाली कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार के आगे दिक्कत यह थी कि वह अपने ही मुख्यमंत्री के हत्यारे और मुख्य साजिशकर्ता को किसी भी किस्म की राहत क्यों देती? राज्य के कांग्रेसी भी इस मुद्दे पर हमेशा खामोश रहे।                                                                     

आलम बदला जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी और इधर पंजाब में कुछ सालों के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह की कांग्रेस सरकार वजूद में आई। राजोआना की फांसी पर ‘राजनीति’ का नया दौर शुरू हुआ। इसका एक खास मुकाम इस साल तब आया, जब बड़े पैमाने पर श्री गुरु नानक देव के 550वें प्रकाशोत्सव के समागम शुरू हुए। 11 अक्तूबर को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आठ सिख कैदियों की पूर्व रिहाई और बलवंत सिंह राजोआना की फांसी की सजा को उम्र कैद में तब्दील करने के लिए पत्र जारी किया।

11 अक्तूबर को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने चंडीगढ़ प्रशासक के सलाहकार को भेजे पत्र में कहा है कि केंद्र ने राजोआना की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने को मंजूरी दे दी है। पत्र में 8 कैदियों को संविधान के आर्टिकल-161 के तहत और एक सिख कैदी को आर्टिकल-72 के तहत सजा से राहत की प्रक्रिया शुरू करने को कहा गया है। राजोआना यूटी (चंडीगढ़) प्रशासन का कैदी है, इसलिए धारा 72 के तहत राष्ट्रपति को केस भेजने की कार्यवाही यूटी प्रशासन ने करनी है। बेअंत सिंह हत्याकांड की जांच सीबीआई ने की है इसलिए उसकी भी पूरे प्रकरण में अहम भूमिका है। यूटी प्रशासन और सीबीआई दोनों केंद्र के अधीन हैं।                                                   

पर्दे के पीछे का सच तो यह है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय राजोआना की फांसी के मामले में बाकायदा रणनीति के तहत पलटा है। अपने रुख की उसने बादलों को भी भनक नहीं लगने दी। बेअंत सिंह के पोते सांसद रवनीत सिंह बिट्टू ने जैसे ही राजोआना की माफी की बाबत सदन में सवाल उठाया तो लगे हाथ केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने दो टूक कह दिया की मीडिया रिपोर्टों पर मत जाइए, सजा बरकरार है!                     

अक्तूबर के बाद शिरोमणि अकाली दल की सियासी सभाओं में लगातार जोर देकर कहा जाता रहा था कि बादलों की पहल और सलाह से राजोआना समेत बाकी सिख कैदियों को सजा से राहत का फैसला केंद्र ने किया है और इसके लिए बाकायदा नरेंद्र मोदी और अमित शाह का धन्यवाद भी किया जाता था। अब शाह के झटके के बाद सुखबीर बादल को तल्ख तेवरों के साथ सख्त नाराजगी जाहिर करनी पड़ी।                 

जाहिर है शिरोमणि अकाली दल की इस मामले में आम सिखों और पंथक हलकों में जबरदस्त फजीहत होगी। प्रतिद्वंदी सिख संगठन तो पहले ही बादलों को मोदी-शाह के हाथों का खिलौना बता रहे थे।                 

दरअसल, राजोआना को फांसी की सजा से राहत के मामले में भाजपा को अपना हिंदू आधार कमजोर होने का खतरा दिख रहा था। फिर पिछले कुछ समय से शिरोमणि अकाली दल भी उसे आंखें दिखा रहा था। हरियाणा के विधानसभा चुनाव में उसने गठजोड़ तोड़ लिया था। पंजाब में अकाली-भाजपा गठबंधन कायम है तो इसकी एक बड़ी वजह बादल बहू का केंद्रीय काबीना में मंत्री होना भी है।

यह पहलू भी अपनी जगह कायम है कि ईडी और सीबीआई को थोड़ी सी भी हरी झंडी मिल जाए तो पंजाब को ड्रग्स की नरक-मंडी मे तब्दील करने वाले जो गुनाहगार सलाखों के पीछे होंगे, उनमें बादल घराने  से ताल्लुक रखने वाले कतिपय अकाली नेता यकीनन होंगे। उनके नाम पंजाब का बच्चा-बच्चा जानता है। इसलिए मजबूरियों का यह गठबंधन तोड़ना अकालियों के लिए फिलहाल मुफीद नहीं। राजोआना प्रकरण ने उन्हें अजीब कुचक्र में फंसा दिया है।                                           

अक्तूबर में गृह मंत्रालय की सजा में राहत देने की चिट्ठी और 3 अक्तूबर को लोकसभा में गृहमंत्री के बयान के बीच कहीं न कहीं ‘हिंदू भावनाएं’ भी आती हैं। भाजपा खुले तौर पर हिंदू राजनीति के रथ पर सवार है। ‘अल्पसंख्यक आतंकवाद’ के खिलाफ उसकी ज्यादा नरमी उसके ‘हिंदू राष्ट्र’ के संकल्प को कमजोर करती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सिखों को अलहदा कौम नहीं बल्कि अपना एक अहम अंग मानता है। अंदरखाने उसे बर्दाश्त नहीं कि सिख और अकाली खुद को अलग धर्म मानें। भाजपा के इतना करीब आकर भी शिरोमणि अकाली दल को आरएसएस का हिंदू राष्ट्र का एजेंडा बर्दाश्त नहीं और न उसका सहयोगी संगठन राष्ट्रीय सिख संगत बरदाश्त है। इसके प्रमाण जमीनी स्तर पर कई बार मिल चुके हैं।                                                                             

राजोआना फांसी-माफी प्रकरण में सियासी पैंतरे अभी बहुत कुछ और भी बेनकाब करेंगे। बेशक आज भाजपा के सिवा फांसी की अवधारणा का पैरोकार थोड़ा-बहुत कोई है तो वह कांग्रेस है। शिरोमणि अकाली दल के सिखों के बीच खिसकते जनाधार पर कब्जे की कवायद में गंभीरता से लगे पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के लिए भी इस प्रकरण से मुश्किल ही खड़ी हुई हैं। जब अक्तूबर में राजोआना को फांसी की सजा से राहत की बात हुई तो उन्होंने इसका स्वागत किया लेकिन बेअंत  सिंह परिवार के पुरजोर विरोध के बाद कैप्टन को खामोश होना पड़ा। तब अकालियों ने उन पर मौकापरस्ती तथा दोहरे मानदंड अपनाने का आरोप लगाया था।

(अमरीक सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल पंजाब लुधियाना में रहते हैं।)

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