Tuesday, September 27, 2022

झारखंड में ‘प्रभात खबर’ और ‘हिंदुस्तान’ ने पत्रकारिता को बेच खाया है!

ज़रूर पढ़े

क्या झारखंड में ‘प्रभात खबर’ और ‘हिन्दुस्तान’ अखबार सीआरपीएफ से डरते हैं? सवाल थोड़ा अटपटा जरूर है, लेकिन जब आप इस खबर को पढ़ेंगे, तब आपको इस सवाल का जवाब भी मिल जाएगा। दरअसल झारखंड ही नहीं पूरे देश में ‘मुख्यधारा’ का प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की यही सच्चाई है कि किसी भी गिरफ्तारी में पुलिस द्वारा दी गयी प्रेस विज्ञप्ति या बाइट को ही सौ प्रतिशत सच मानकर खबर चला दिया जाता है। पुलिस जिस पर आरोप लगाती है, उससे सच जानने का प्रयास बहुत ही कम हमारी मीडिया करती है।

लेकिन अगर पुलिस द्वारा जनता की पिटाई का मामला हो तब अधिकांश मीडिया घराने दोनों तरफ की खबर बनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन झारखंड में ऐसा बहुत कम ही देखने को मिलता है। खासकर माओवादी मामले में मीडिया पुलिस के बयान को ही हूबहू छापती है और जनता पर पुलिसिया दमन की खबर व्यापक आंदोलन के बाद ही बनती है।

हालिया मामला झारखंड के चाईबासा (पश्चिम सिंहभूम) जिले का है। इस जिले के गोईलकेरा थानान्तर्गत चिड़ियाबेड़ा टोला में 15 जून को मुफस्सिल थाना के अंजेड़बेड़ा गांव के लोग एक घर की छावनी कर रहे थे। ग्रामीणों के अनुसार, दोपहर 12:30 बजे वर्दीधारी सीआरपीएफ के जवान वहां पहुंचते हैं और घर छा रहे आदिवासियों की लाठी-डंडे व बंदूक के बट से जमकर पिटाई करते हैं। बीच-बचाव करने आए ग्रामीणों को भी सीआरपीएफ पीटती है, जिसमें 7 लोग गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं।

पिटाई से गुना गोप और बामिया सुरीन का हाथ-पैर टूट जाता है और माधो कायम, गुरुचरण पूर्ति, सिंगा पूर्ति, सीनू सुंडी और सिदियू जोजो घायल हो जाते हैं। इसके बाद राम सुरीन के घर के सभी सदस्यों का आधार कार्ड व 35 हजार रुपये भी सीआरपीएफ के जवान लेकर चले जाते हैं। बाद में ग्रामीण सभी को चाईबासा सदर अस्पताल में भर्ती कराते हैं। 16 जून को ग्रामीण सीआरपीएफ के जवानों पर एफआईआर दर्ज कराने के लिए मुफस्सिल थाना पहुंचते हैं, लेकिन गोईलकेरा थाना का मामला बताकर एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया जाता है।

अब 17 जून को अखबारों में यह खबर कुछ इस तरह से बनती है। चाईबासा संस्करण के चार बड़े समाचारपत्रों में से एक हिन्दुस्तान समाचार पत्र की हेडलाइन ‘नक्सलियों ने 7 ग्रामीणों को पीटा, अस्पताल में इलाज रत’, प्रभात खबर की  हेडलाइन ‘खिड़ीबेड़ा में माओवादियों ने सात ग्रामीणों को पीटा, भर्ती’ से खबर छपी यानि कि पूरी खबर को ही दूसरा कोण दे दिया गया। जबकि ग्रामीणों ने माओवादियों का नाम ही नहीं लिया है। अब दैनिक भास्कर की हेडलाइन देखिए ‘गोईलकेरा: घर छा रहे ग्रामीणों को वर्दीधारी ने लाठी-डंडे व बंदूक से पीटा, भर्ती’, लेकिन इसने नीचे खबर में लिखा है कि ‘सुरक्षा बल जैसे वर्दी पहने लोगों ने पीटा।’ अब देखते हैं दैनिक जागरण की हेडलाइन ‘ग्रामीणों ने लगाया सीआरपीएफ पर पिटाई का आरोप।’

अब इन चारों समाचारपत्रों की खबर का आप खुद विश्लेषण कीजिए और तय कीजिये कि ग्रामीण स्तर की खबर को कैसे अखबारों द्वारा पूरी तरह से घुमा दिया जाता है। वैसे खबर को दूसरा एंगल देने के लिए हमेशा ‘दैनिक जागरण’ ही कुख्यात रहा है (पता नहीं इस मामले में इसे सद्बुद्धि कहाँ से आ गई?) और प्रभात खबर सही खबरों के लिए आज से कुछ वर्ष पहले तक जाना जाता था। लेकिन हाल के कुछ वर्षों में प्रभात खबर ने भी अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह से खो दी है।

(रूपेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल झारखंड के रामगढ़ में रहते हैं।)

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