Subscribe for notification

कैबिनेट के आगे समर्पित एक राष्ट्रपति की प्रभावहीन पारी

सन् 2012 में कांग्रेस के वरिष्ठ और बहुत पढ़े-लिखे समझे जाने वाले नेता प्रणब मुखर्जी जब राष्ट्रपति बने तो सिर्फ उनके प्रशंसकों को ही नहीं, अनेक देशवासियों को लगा था कि वह शानदार राष्ट्रपति साबित होंगे। उनमें अच्छा राष्ट्रपति बनने की पूरी संभावना थी। वह एक तपे-तपाये राजनेता के साथ बौद्धिक भी थे। उनके संदर्भ में दूसरी बात बहुत महत्वपूर्ण थी। वह ये कि कांग्रेस ने सन् 2004 और सन् 2009 में उनके बजाय डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया था, जबकि प्रणब सन् अस्सी के दौर से ही इस पद के चिर आकांक्षी थे। इससे वह अपनी पार्टी और उसके संचालकों से आहत भी थे। ऐसे में मेरी तरह बहुत सारे लोगों को लगा था कि वह एक आहत राजनेता हैं, इसलिये राष्ट्रपति जैसे पद पर आसीन होकर इतिहास में अपनी छाप छोड़ना चाहेंगे। वह साबित करना चाहेंगे कि इस देश की सबसे पुरानी पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री न बनाकर कितनी बड़ी गलती की थी! राष्ट्रपति के रूप में वह संवैधानिक उसूलों के दायरे में काम करते हुए जरूरत के हिसाब से सक्रिय हस्तक्षेप भी करेंगे और पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन के शब्दों में उनकी तरह एक कामकाजी राष्ट्रपति साबित होंगे। लेकिन प्रणव ले-देकर कुछ ज्वलंत मुद्दों पर बयान जारी करने वाले या कुछ अच्छे उद्बोधन करने वाले एक ऐसे राष्ट्रपति साबित हुए, जो अपनी सरकार यानी कैबिनेट के आगे आमतौर पर हमेशा समर्पित रहता है। शासकीय-लकीर पर ही चलते रहे, लोकतंत्र, समाज और अवाम के हित में उसे लांघने की कोई कोशिश नहीं की।

अपनी कोई राय नहीं

यूपीए सरकार के दौरान, खासकर जुलाई 2012-अप्रैल 2014 के बीच कई ऐसे कदम उठाये गये, जब राष्ट्रपति भवन से हस्तक्षेप या संवैधानिक मार्गदर्शन की अपेक्षा की जा रही थी। पर राष्ट्रपति मुखर्जी ने डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के उन विवादास्पद कदमों पर किसी तरह का रिजर्वेशन नहीं जाहिर किया। उदाहरण के तौर पर यूआईडी-आधार को जिस तरह किसी संसदीय-मंजूरी के बगैर मनमोहन सरकार ने आगे बढ़ाया (बाद में आई मोदी सरकार ने तो आधार को हर क्षेत्र में लगभग अनिवार्य कर दिया), उस पर संविधान के संरक्षक के तौर पर राष्ट्रपति की तरफ से हस्तक्षेप की उम्मीद की जा रही थी। उक्त मुद्दे पर कई अपीलों-ज्ञापनों के बावजूद राष्ट्रपति भवन खामोश रहा।

कोई असहमति नहीं

सन् 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत और केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद साउथ ब्लाक और राष्ट्रपति भवन के बीच बहुत सहज और सहयोगपूर्ण रिश्ते बने। राष्ट्रपति मुखर्जी ने मोदी सरकार के किसी भी विवादास्पद कदम, विधेयक या फैसले पर आमतौर पर अपना सार्वजनिक असहमति नहीं जाहिर की। बाद के दिनों में उन्हें जब यह साफ हो गया कि उन्हें सत्ताधारी दल राष्ट्रपति के रूप में दूसरा कार्यकाल नहीं देगा तो कुछेक मुद्दों, खासकर समाज में बढ़ती असहिष्णुता और प्रेस फ्रीडम जैसे सवालों पर उन्होंने कुछ अच्छे भाषण दिये। लेकिन दलित-अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमलों को लेकर किसी तरह का सक्रिय हस्तक्षेप नहीं किया। शुरू से अब तक के घटनाक्रमों में राष्ट्रपति भवन की भूमिका का आकलन करें तो महामहिम के रूख में बहुत निरंतरता और सुसंगतता नहीं नजर आती। ले-देकर वह एक पारंपरिक राष्ट्रपति की तरह ही नजर आते हैं। उनमें राष्ट्रपति के आर नारायणन जैसा कामकाजी राष्ट्रपति(वर्किंग प्रेसिडेंट) का व्यक्तित्व नहीं नजर आता, जो समय-समय पर सरकार के काम और उसकी दिशा में कुछ विनम्र लेकिन सक्रिय हस्तक्षेप भी करता है।

नारायणन एक मिसाल

प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच होने वाली बैठकों-मुलाकातों में डॉ. मुखर्जी ने कब कैसा हस्तक्षेप किया या कोई चमत्कारिक काम किया, इसका भी कोई ब्योरा अब तक सामने नहीं आया है। जबकि राष्ट्रपति के आर नारायणन ने गुजरात के दंगों के दौरान प्रधानमंत्री वाजपेयी पर ठोस कदम उठाने, खासकर दंगा-प्रभावित क्षेत्रों में अविलंब सेना भेजने के लिये कम से कम अपने स्तर से नैतिक दबाव तो बनाया। राष्ट्रपति मुखर्जी के कार्यकाल में ऐसे किसी महत्वपूर्ण हस्तक्षेप का अब तक खुलासा नहीं हुआ है। शायद इसलिये कि ऐसा कोई चमकदार हस्तक्षेप उन्होंने किया ही नहीं।

राज्यों में राष्ट्रपति शासन पर उठे सवाल

प्रणब की पारी में राष्ट्रपति भवन की सबसे ज्यादा फजीहत राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करने के सरकारी फैसले को लेकर हुई। अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों के उनके फैसलों को सर्वोच्च न्यायालय में न केवल चुनौती दी गई अपितु न्यायालय ने राष्ट्रपति के आदेशों को असंवैधानिक करार दिया। राष्ट्रपति मुखर्जी ने इन राज्यों में मोदी मंत्रिमंडल की सिफारिश पर राष्ट्रपति शासन लगाने की अधिसूचना पर हस्ताक्षर कर दिये थे। राज्यपाल की सिफारिश को आगे बढ़ाते हुए मोदी सरकार ने माना कि उक्त दोनों राज्यों में राजनीतिक-प्रशासनिक अस्थिरता पैदा हो गई है, इसलिये राष्ट्रपति शासन एक मात्र विकल्प है, जबकि विपक्षी दल सरकार की इस दलील को दलगत-राजनीति से प्रेरित मान रहे थे। राष्ट्रपति भवन ने इस बाबत अपना होमवर्क नहीं किया और मोदी सरकार की सिफारिश को महत्व देते हुए महामहिम राष्ट्रपति ने अधिसूचना पर हस्ताक्षऱ कर दिये। अरुणाचल के मामले में सन् 2015-16 के दौरान विवादास्पद राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा और मोदी सरकार ने संवैधानिकता की धज्जियां उड़ाईं। संविधान के रक्षक के तौर पर राष्ट्रपति से अपेक्षा थी कि वह राज्यपाल और केंद्रीय कैबिनेट की सिफारिशों की अपने तंत्र के जरिये पड़ताल कराते और फिर सरकार को पुनर्विचार के लिये बाध्य करते, जैसा राष्ट्रपति नारायण ने कुछ प्रमुख मामलों में किया। पर राष्ट्रपति मुखर्जी ने ऐसा कुछ नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अरुणाचल के राज्यपाल की सिफारिश को अवैध करार दिया था। प्रकारांतर से वह राष्ट्रपति की मंजूरी पर भी बड़ी टिप्पणी था। उत्तराखंड के मामले में भी लगभग ऐसा ही हुआ। अप्रैल-मई 2016 में नाटकीय घटनाक्रम के तहत राज्य में राष्ट्रपति शासन थोपे जाने का फैसला कोर्ट द्वारा निरस्त हो गया। राज्य में फिर से कांग्रेस की हरीश रावत सरकार की वापसी हुई। इन दोनों ऐतिहासिक न्यायिक आदेशों में राज्यपाल की सिफारिश को आधारहीन माना गया। लेकिन प्रकारांतर से यह राष्ट्रपति के विवेक और आकलन पर भी टिप्पणी थी।

कोई चमकदार नज़ीर नहीं

अतीत में कई उदाहरण हैं, जब राष्ट्रपतियों ने राज्यपाल की सिफारिश और केंद्रीय कैबिनेट की इच्छा के अमल करने की संवैधानिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया। लेकिन मुखर्जी अपने कार्यकाल में ऐसा कोई चमकदार नजीर नहीं पेश करते दिखे। प्रधानमंत्री मोदी को उनसे कभी किसी तरह की शिकायत या असहजता नहीं रही। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें पिता-तुल्य कहकर उनसे अपनी निकटता और उनके प्रति सम्मान जताया।

सबसे ज़्यादा दया याचिका खारिज

हमारे जैसे गणराज्य में न्याय दंड विधान अमीर-पक्षी है। कोर्ट-कचहरी में बहुत सारा खर्च होता है। महंगे वकीलों के बल पर बड़े लोग अपने बड़े-बड़े गुनाहों से भी अपना दामन बचा लेते हैं। लेकिन एक साधारण, गरीब या निम्न मध्यवर्गीय आदमी के लिये ऐसा संभव नहीं। यही कारण है कि भारतीय जेलें गरीबों, दलितों-आदिवासियों, पिछड़ों और अल्पसंख्यक समुदाय के कैदियों से अटी पड़ी हैं। फांसी जैसे न्यायिक फैसलों से भी सबसे ज्यादा इन्हीं वर्गों के लोग प्रभावित होते हैं। ऐसे अनेक लोगों के लिये राहत या माफी का अंतिम मुकाम होता है राष्ट्रपति भवन। वे राष्ट्रपति के समक्ष माफी की अर्जी देते हैं। यह राष्ट्रपति पर निर्भर करता है कि वे इन अर्जियों को मंजूर करें या खारिज करें! राष्ट्रपति मुखर्जी ने अपने पांच वर्षों के कार्यकाल में ऐसी ज्यादातर अर्जियों को नामंजूर कर फांसी की सजा पाये कैदियों के जीवन के अंत के अदालती फैसले पर अपनी मुहर लगाई। अपने कार्यकाल के शुरुआती एक वर्ष के अंदर ही उन्होंने फांसी माफी की अर्जी खारिज करने के मामले में पूर्व राष्ट्रपतियों के सारे रिकार्ड तोड़ दिये।

पारंपरिक राष्ट्रपति की भूमिका

महाराष्ट्र के विवादास्पद गोवंश संरक्षण विधेयक, जो सिर्फ गाय ही नहीं, उसके वंश के तमाम पशुओं के बूचड़खाने भेजे जाने या उनके मांसाहार पर कड़े प्रतिबंध का प्रावधान करता है, बीते कई बरसों से राष्ट्रपति की मंजूरी के लिये लंबित था। प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल में उसे तत्काल मंजूरी मिल गई। ऐसे कई अन्य मामलों में उनकी भूमिका एक ऐसे पारंपरिक राष्ट्रपति की रही, जो अपनी सरकार यानी कैबिनेट से आमतौर पर किसी तरह की असहमति होने की गुंजाइश नहीं रहने देता। इतिहास उन्हें एक महात्वाकांक्षी राजनेता और लकीर के फकीर राष्ट्रपति के रूप में याद करे तो उनके साथ यह कत्तई अन्याय नहीं होगा! इस महीने के आखिर में अपना कार्यकाल समाप्त कर रहे राष्ट्रपति मुखर्जी के स्वस्थ और सुदीर्घ जीवन की शुभकामनाएं।

This post was last modified on December 16, 2019 11:47 am

Share