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Monday, September 20, 2021

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इलेक्टोरल बांड का रिटर्न गिफ्ट है निजीकरण

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देश की अर्थव्यवस्था में हो रही गिरावट को समझने के लिए अर्थ सूचकांकों के अध्ययन करने की बहुत आवश्यकता नहीं है। बाजार और इंडस्ट्रियल एरिया का एक भ्रमण ही यह संकेत देने के लिए पर्याप्त है कि आर्थिक मोर्चे पर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। सरकार के पास एक ही नीति फिलहाल दिख रही है, वह है विनिवेशीकरण की। इसे अगर सपाट शब्दों में कहें तो यह सारी सार्वजनिक कंपनियों को बेच डालने की नीति है।

सरकार को शासन करना चाहिए और उसे व्यापार नहीं करना चाहिए, यह भी एक सिद्धांत है और आज हो रहे इस उन्मादी निजीकरण के पीछे यही तर्क दिया जा रहा है। अगर सभी सार्वजनिक कंपनियों को सरकार बेच कर खाली हो जाए तब सरकार के पास कौन से संसाधन बच जाएंगे? अगर यह नीति भी सरकार की होती कि सरकार कुछ क्षेत्रों में अपनी खुदमुख्तारी बनाए रखेगी और निजी क्षेत्र के साथ-साथ, सार्वजनिक क्षेत्र की भी एक, स्वस्थ प्रतियोगिता का अवसर रखेगी तो न केवल किसी भी सेक्टर का एकाधिकार टूटेगा, बल्कि यह प्रतियोगिता, विकास की गति को भी तेज करेगी, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है।

सरकार सब कुछ जल्दी-जल्दी बेच कर मुक्त होना चाहती है। यह एक प्रकार की डिस्ट्रेस सेल, यानी घबराहट भरी बिकवाली की मनःस्थिति है। ऐसी मनोदशा तब होती है जब, हम यह सोच लेते हैं कि अगले महीने का खर्च कैसे चलेगा और जो कुछ भी घर में है, उसे जल्दी-जल्दी बेचबाच कर खर्च चलाना चाहते हैं।

आज का दौर, इसी निजीकरण या घबराहट भरी बिकवाली का चल रहा है। सरकार समर्थकों के मुंह से निजीकरण के बारे में बहुत कुछ सुनने को मिलेगा, पर जब यह पूछ लीजिए कि निजीकरण या विनिवेशीकरण की आज यकायक इतनी ज़रूरत क्यों है तो वे आकाश की ऊंचाई निहारने लगेंगे। उन्हें न तो यह पता है, और न ही इसका इल्म कि वे अपनी सरकार जिसे वे आराध्य मानते हैं से यह पूछ बैठें कि 2016 के बाद बैंकों की हालत कैसे, क्यों और किन कारणों से लगातार बिगड़ती चली गई।

आरबीआई के एक गवर्नर उर्जित पटेल और एक डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य क्यों रिजर्व फ़ंड के मांगे जाने पर, इस्तीफा देकर चले गए? कैसे और किन कारणों से 2016-17 से जो जीडीपी गिरनी शुरू हुई, वह 2019-20 के अंत तक गिरती ही रही? अब तो कोरोना ही चल रहा है पर 31 मार्च 2020 तक तो कोरोना या लॉकडाउन के केवल एक ही हफ्ते तो हुए थे।

केंद्रीय कैबिनेट ने सरकारी कंपनियों में अब तक के सबसे बड़े विनिवेश को मंजूरी दी है और यह सब कुछ बेचो का महासेल है। सरकार का कहना है कि इससे आर्थिक मंदी से निपटा जा सकेगा। सरकार ने बड़ी और समृद्ध कंपनियों भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल), शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया और ऑनलैंड कार्गो मूवर कॉनकोर में अपनी हिस्सेदारी बेच कर के निजीकरण की ओर बढ़ रही है।

आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी (सीसीईए) की बैठक के फैसले के बाद,
● बीपीसीएल में सरकार की 29 फीसदी हिस्सेदारी बेची जाएगी। इस कंपनी का प्रबंधकीय नियंत्रण भी खरीदने वाली कंपनी के पास रहेगा।
● शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (Shipping corporation of india) में भी सरकार की 75 फीसदी हिस्सेदारी को बेचने का निर्णय लिया है।
● रेलवे की कंपनी कॉनकोर को भी बेचा जाएगा, इसमें सरकार की हिस्सेदारी 54.8 बताई जा रही है।
● टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन और नॉर्थ-ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन लि. की पूरी हिस्सेदारी को बेचने का हो गया है।
उपरोक्त पांचों कंपनियों का प्रबंधकीय नियंत्रण खरीदने वाली कंपनी को मिलेगा।

कुछ गिनीचुनी कंपनियों में सरकार का शेयर, 51 फीसदी से कम रहेगा। मतलब अब इन कंपनियों पर सरकार का नियंत्रण खत्म हो जाएगा। सरकार इसके अतिरिक्त अन्य सार्वजनिक उपक्रमों जैसे,
● इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन में अपनी हिस्सेदारी 51 फीसदी से कम कर रही है। हालांकि इन पर प्रबंधकीय नियंत्रण सरकार का ही रहेगा। इंडियन ऑयल में सरकार की मौजूदा हिस्सेदारी 51.5 फीसदी है।
● 25.9 फीसदी हिस्सेदारी भारतीय जीवन बीमा निगम की बेची जाएगी।
● ओएनजीसी और ऑयल इंडिया लि. (ओआईएल) के पास है। सरकार ने इन कम्पनियों की 26.4 फीसदी हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया है।

अब डॉ. रघुराम राजन के एक छोटे से लेख का उल्लेख आवश्यक है। डॉ. रघुराम राजन, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर रहे हैं और उन्हें जब वर्तमान सरकार द्वारा द्वितीय कार्यकाल नहीं मिला तो उन्होंने आरबीआई छोड़ दी और फिर अमेरिका में अध्यापन करने चले गए। डॉ. राजन देश के प्रमुख केंद्रीय बैंक के गवर्नर बनने के पहले, मुख्य अर्थिक सलाहकार भी थे। वे पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के समर्थक थे और देश की आर्थिक स्थिति के बारे में अब भी कुछ न कुछ लिखते-पढ़ते रहते हैं। पिछले सप्ताह उन्होंने, लिंक्डइन जो एक प्रकार की प्रोफेशनल समाज की संपर्क वेबसाइट है, में लगभग 1200 शब्दों का एक लेख साझा किया। इसमें उन्होंने, 31 अगस्त को जब जीडीपी या सकल विकास दर के आंकड़े सरकार ने जारी कर दिए तो अपनी बात कही।

उस पोस्‍ट में डॉ राजन ने लिखा है,
“सरकार और उसके नौकरशाहों को आत्‍मसंतोष से बचने और जर्जर अर्थव्‍यवस्‍था को प्रोत्‍साहन देने की जरूरत है।”

उन्‍होंने देश की तिमाही जीडीपी के माइनस 23.9 फीसदी की स्थिति तक अधोगामी हो जाने पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए  यह टिप्‍पणी की है। डॉ. राजन के अनुसार,
“ऐसा लगता है कि सरकार अपने आप में ही सीमित हो गई है और राहत के उपायों के बिना अर्थव्‍यवस्‍था की विकास दर बुरी तरह से प्रभावित होगी।”

लिंक्डइन पर ही यह लेख, जो 7 सितंबर को पोस्ट किया गया है, में उन्होंने लिखा है,
“विकास, ग्रोथ के आंकड़े देश के हर वर्ग  के लिए खतरे का संकेत देने वाले हैं। इस मामले में भारत कोविड-19 से सर्वाधिक प्रभावित दो उन्‍नत देशों अमेरिका और इटली से बदतर स्थिति में है। कोरोना प्रकोप भारत में अभी भी तीव्रता की स्थिति में है, ऐस में जब तक वायरस पर नियंत्रण नहीं पाया जाता, रेस्‍टोरेंट और इससे जुड़े रोजगार को लेकर स्थिति खराब रहने की आशंका है। ऐसे में सरकार की ओर से किए जाने वाले उपाय बेहद महत्‍वपूर्ण हैं।”

डॉ. राजन के अनुसार,
“सरकार भविष्‍य में प्रोत्‍साहन पैकेज देने के लिए आज संसाधनों को बचाने की रणनीति पर काम कर रही है जो आत्‍मघाती है। अगर आप इकोनॉमी को एक मरीज की तरह देखें तो इसे लगातार इलाज की जरूरत है।”

राजन ने माना है,
“सरकार और नौकरशाह काफी मेहनत कर रहे हैं, लेकिन उन्‍हें खुद के कामों को लेकर आत्‍मसंतोषी होने से बचना चाहिए। ऐसे कदम उठाए जाने चाहिए जो परिणाम देने वाले हों।”

मोदी और निर्मला सीतारमन।

डॉ. राजन भी वही सवाल उठा रहे हैं कि ऐसी आर्थिक मंदी से उबरने के लिए सरकार की क्या नीतियां हैं। सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी विचार और नीतिधुंधता है। भाजपा और संघ की पठन पाठन, चिंतन और नचिकेतोपाख्यान से स्वाभाविक बैर है। वे भ्रम और मूर्खता का एक मायाजाल रचते हैं और फिर उसी के व्यामोह में भटकाते रहते हैं।

वे धर्म की बात करेंगे, पर धर्म में दर्शन की बात नहीं करेंगे। वाद-विवाद और संवाद से वे अक्सर दूरी बरतते ही हैं। दक्षिणपंथ भी एक विचारधारा है, और जब उनसे दक्षिणपंथ की विचारधारा के बारे में ही पूछिए तो, उनकी बहस वामपंथ की आलोचना से शुरू होगी और वामपंथ की आलोचना तक फैलती जाएगी, पर वे दक्षिणपंथी विचार के एक भी सिद्धांत की न तो जानकारी दे पाएंगे और न ही व्याख्या करेंगे।

अब जब उनसे बात आर्थिक नीतियों की, की जा रही है तो उनके पास कोई भी जवाब नहीं है। सत्तारूढ़ दल में दक्षिणपंथी अर्थव्यवस्था के बारे में जानने और समझाने वाला कोई प्रतिभावान चेहरा नहीं है। नीति आयोग जो आज हमारी सरकार का थिंकटैंक है, उसे बस यही पता है कि निजीकरण से ही सारी व्याधियां दूर हो जाएंगी। बिल्कुल कोरोना काल के काढ़े की तरह कि इसे पीते रहिए यह सब रोग दूर रखेगा। अब यह मत पूछ लीजिएगा कि कैसे दूर रखेगा। एक कन्फ्यूज वित्तमंत्री ही ‘एक्ट ऑफ गॉड’ कह सकता है। अंधाधुंध निजीकरण, एक डिस्ट्रेस सेल यानी घबराहट भरी बिकवाली है।

निजीकरण या निजी क्षेत्रों को आमंत्रण या एफडीआई से उद्योगों की स्थापना का मतलब यह नहीं है कि सरकार पहले से स्थापित सभी सरकारी कल कारखानों को औने-पौने दामों में पूंजीपतियों को बेच दे। बल्कि इसका अर्थ यह है कि पूंजीपति जिस भी क्षेत्र में प्रवेश करना चाहते हैं उस क्षेत्र के उद्योग विकसित करें। सरकार ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के रुप में उन्हें उचित दर पर ज़मीन, बिजली और इंफ्रास्ट्रक्चर की सुविधा दे। जैसे यदि कोई रेलवे क्षेत्र में आना चाहता है वह कोच या इंजन या अन्य जो भी बनाना चाहे नयी ज़मीन खरीदे और नई जगह उसे बनाए। यह नहीं कि जाकर डीएलडब्ल्यू खरीद ले और फिर उसकी अतिरिक्त ज़मीन पर फ्लैट बनाए या प्लाट काटने लगे।

सरकारी कारखानों की तरफ निजी क्षेत्र का झुकाव इसलिए भी है कि इन सरकारी उद्योगों के पास अतिरिक्त ज़मीनें बहुत हैं जो या तो फैक्ट्रियों में है या उनकी टाउनशिप में है। सरकारें जब उद्योग या कोई प्रतिष्ठान लगाती हैं तो सदैव ही अधिक भूमि अधिग्रहित कर लेती हैं, ताकि सौ साल बाद भी कुछ विस्तार करना पड़े तो भूमि की कमी न रहे। आज भी देश मे सबसे अधिक ज़मीन, डिफेंस, रेलवे और सरकारी प्रतिष्ठानों के पास हैं और उनके कार्यालय, शो रूम आदि किसी भी शहर के सबसे महत्वपूर्ण तथा महंगे स्थानों पर हैं। यही रियल स्टेट पूंजीपतियों और उनकी शह पर कुछ लोभी राजनेताओं को ललचाता रहता है। नेताओं और राजनीतिक दलों को इलेक्टोरल बांड के माध्यम से धन मिलता है और पूंजीपतियों को सरकारी कंपनियों से।

सरकार को अपने प्रतिष्ठानों का निजीकरण करने के बजाय उनका आधुनिकीकरण और उनके प्रबंधन में व्याप्त कमियों को दूर करना चाहिए। अधिकतर सरकारी प्रतिष्ठान नौकरशाहों के अभयारण्य या चारागाह बन कर रह गए हैं। उन्हें प्रोफेशनल मैनेजमेंट के कुशल प्रबंधकों द्वारा संचालित किया जाना चाहिए।

सरकारी प्रतिष्ठान घाटे में हैं तो उन्हें घाटे में जाने देने की जिम्मेदारी किस पर है? सरकार की नीतियां और उसे बनाने वाले खुद ही ऐसी नीतियां बनाते हैं, जिससे सरकारी प्रतिष्ठान घाटे में जाने लगते हैं। जैसे एयर इंडिया को बर्बाद करने के लिए विजय माल्या के किंगफिशर एयरलाइंस को जानबूझकर कर कमाने वाले रूट और समय दिए गए। परिणाम स्वरूप एयर इंडिया घाटे में आती चली गई।

यही फेवर जिओ के लिए भी सरकार ने किया। जब जिओ के विज्ञापन पर प्रधानमंत्री सुशोभित हो रहे थे, तब बीएसएनल को 4जी का लाइसेंस भी इसी सरकार ने नहीं दिया था। पेटीएम को सरकार ने बढ़ावा दिया, पर ऐसा कोई सरकारी ऐप सरकार ने इतने धूम-धड़ाके के साथ नहीं शुरू किया। आज अभी सरकार यही कर दे कि निजी क्षेत्र अपने उद्योग नयी जगह पर लगाएं तो शायद कोई बहुत उत्साहजनक प्रतिक्रिया, पूंजीपतियों के खेमे से नहीं मिले। पूंजीपति इस पर भी रोने लगेंगे। मैंने बड़े-बड़े धनपतियों को भी उनके व्यवसाय के बारे में कुछ पूछने पर उन्हें रोते ही देखा है!

सरकारी प्रतिष्ठान पा लेने के बाद उन्हें उसके रूप में, बस थोड़ा बहुत उसका आधुनिकीकरण करके प्रबंधन करना होता है और साथ ही, इसका लाभ उन्हें, उस प्रतिष्ठान के ब्रांड का भी मिलता है। निजीकरण, नेता, नौकरशाही और पूंजीपतियों के एक कॉकस का बेहद शातिर खेल है, जिसे कभी-कभी मज़दूर संगठन भी समझ नहीं पाते हैं और कभी-कभी इस कार्य में वे पूंजीपतियों की तरफ खड़े भी नज़र आते हैं। मीडिया या सामान्यजन हम सबकी यही धारणा बनाते रहते हैं कि सरकारी प्रतिष्ठान, स्कूल, अस्पताल आदि बेकार की चीजें हैं। उनसे देश और समाज को कोई लाभ नहीं है।

सरकार के समर्थक बेचारे सरकार से यह भी नहीं पूछ सकते हैं कि कैसे और किन कारणों से, 2016 के बाद बेरोजगारी बढ़ने लगी और उस बढ़ती बेरोजगारी को रोकने के लिए क्या-क्या उपाय किए गए? बेरोजगारी है, बाजार में मंदी है, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर लगभग शून्य पर है पर इस सबका सरकार के पास एक ही उपाय है बैंकों से लोन लीजिए और शेष ईश्वर पर छोड़ दीजिए। बिल्कुल हिंदी फिल्मों के एक बंधे हुए संवाद की तरह कि अब इन्हें दवा की नहीं दुआ की ज़रूरत है।

देश की अर्थव्यवस्था जिन इंफ्रास्ट्रक्चर के संसाधनों से मजबूत होती है, सरकार वे सारे संसाधन, चहेते पूंजीपतियों को बेच दे रही है। निजीकरण से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होगी, बल्कि इन पूंजीपतियों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। पूंजीवाद का मूल उद्देश्य ही मुनाफा कमाना होता है। अधिकांश को देश और समाज से कोई सरोकार नहीं रहता है। यदि उस कंपनी को देश की किसी भी कीमत पर अपना मुनाफा मिल रहा होता तो उसके कदम स्वतः मुनाफे की ओर ही बढ़ेंगे।

इन्हीं पूंजीपतियों की दुरभिसंधि में फंस कर, सरकार श्रम कानूनों में संशोधन कर रही है। इन कानूनों के लिए दुनिया भर में मेहनतकश समाज ने लंबी और निर्णायक लड़ाइयां लड़ाई हैं। पूंजीपतियों के हित को ही देशहित समझने और सबको समझाने की यह मानसिकता श्रमिकों को कंपनियों का बंधुआ बनाने की ओर बढ़ रही है। राजनीति का यह विद्रूपता भरा कॉरपोरेटीकरण है। देश के इस पागलपन निजीकरण से अधिक नुकसान नौकरीपेशा व्यक्ति का होगा। पहले से ही रोजगार के अभाव में श्रमिकों का शोषण चरम पर है। अब जब पूरी व्यवस्था निजी कंपनियों के हाथों में आ जाएगी तो यह शोषण अत्याचार में बदलना शुरू हो जाएगा। सरकार भी सब कुछ बेच बाच कर इन्हीं पूंजीपतियों के पे रोल पर आ जाएगी। संविधान में दिया गया लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा बस इतिहास बन कर रह जाएगी।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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