Friday, April 19, 2024

बिहार के एकांतवास शिविरों में कुव्यवस्था का राज, जगह-जगह हो रहे हैं विरोध-प्रदर्शन

पटना। अव्यवस्था और भ्रष्टाचार, एकांतवास शिविरों की यही हकीकत है। इन शिविरों में प्रवासी मजदूरों को इक्कीस दिन गुजारने हैं। सभी जिलों की एक सी हालत है। केवल उन पंचायत स्तरीय एकांतवास शिविरों की हालत कुछ बेहतर है जहां के मुखिया और पंचायत प्रतिनिधि अपनी जिम्मेवारी समझकर अतिरिक्त रूप से सक्रिय हैं और उन्हें स्थानीय लोगों का सहयोग मिल रहा है। लेकिन कई जगहों पर समुचित चिकित्सा नहीं मिलने से शिविरों के निवासियों की मौत हो रही है, और कई जगहों पर सुरक्षा की यह हालत है कि पानी लेने या शौच जाने के लिए बाहर निकले लोगों के साथ गांव वालों की झड़प हो रही है। 

लगातार इंकार के बाद जैसे-तैसे विशेष ट्रेनों से प्रवासी मजदूरों और छात्रों की  वापसी तो शुरू हुई, पर इन ट्रेनों के भाड़ा को लेकर उठा विवाद भी लंबा चला। एकांतवासों की कुव्यवस्था को ठीक करने की जगह सरकार उनका दूसरा रास्ता निकाला जिसके तहत उनकी ख़बरों के बाहर जाने पर पाबंदी लगा दी गयी।जिलाधिकारियों को निर्देश दिया गया कि एकांतवास में किसी दूसरे व्यक्ति को नहीं जाने दें, साथ ही ट्रेनों से आए लोगों से कोई बात नहीं कर पाएं, इसका पुख्ता इंतजाम करें। इस निर्देश को प्रेस सेंसरशिप के रूप में देखा जा रहा है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा ने इसके खिलाफ अपने गांव में शारीरिक दूरी के नियमों का पालन करते हुए धरना दिया। उनकी पार्टी ने पूरे राज्य में जगह-जगह काला दिवस मनाया। 

इस निर्देश के बाद एकांतवास शिविरों की खबरें एक-दो दिनों के लिए थम गईं। पर कई जगहों पर इतना जोरदार हंगामा हुआ, लोगों ने पास की सड़कों को जाम कर दिया, तोड़फोड़ भी हुई, जिसे संभालने के लिए बड़े अधिकारियों को हस्तक्षेप करना पड़ा। तब इन खबरों को रोकना संभव नहीं रहा। इतना तय है कि शिविरों की व्यवस्था के बारे में सरकारी घोषणाओं और जमीनी वास्तविकताओं में कोई तारतम्य नहीं दिखता है।  

विशेष ट्रेनों की शुरुआत होने के साथ-साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रखंड स्तर पर एकांतवास शिविर बनाने की घोषणा की थी। साथ ही पंचायतों में बने शिविरों को अधिक व्यवस्थित करने का निर्देश भी दिया गया। इनमें चिकित्सकीय जांच और भोजन-पानी, आवास आदि की समुचित व्यवस्था करना शामिल था। बाहर से आए लोगों को इक्कीस दिनों का एकांतवास बिताने के बाद अपने घर जाने की अनुमति मिलनी है। 

मालूम हो कि विशेष ट्रेनों के शुरू होने के बाद भी पैदल और दूसरे साधनों से लोग लगातार आ रहे हैं। एक आंकड़ा है कि उत्तर प्रदेश सीमा से प्रतिदिन ढाई से तीन हजार लोग बिहार में प्रवेश कर रहे हैं। उन्हें सीमा पर रोककर एकांतवास में भेजने के लिए सीमा क्षेत्र में बड़ी संख्या में पुलिस तैनात की गई है। मुखियों को खास जिम्मेवारी दी गई है कि बाहर से आने वाले किसी व्यक्ति को बिना उपयुक्त जांच और एकांतवास के बगैर गांव में प्रवेश नहीं करने दें। खासतौर से वार्ड सदस्यों को बाहर से आने वाले लोगों की सूचना तत्काल प्रखंड विकास पदाधिकारी और स्थानीय थाना को ह्वास्टएप और दूसरे माध्यमों से देनी है।

एकांतवास शिविरों में समुचित व्यवस्था करने के लिए आपदा प्रबंधन विभाग ने प्रति व्यक्ति खर्च भी निर्धारित किया है। यह 2480 रूपया प्रति व्यक्ति है। इसमें भोजन, नास्ता, पेयजल, सफाई और चिकित्सा एवं सुरक्षा के खर्च भी शामिल हैं। पर अपने आसपास के कई शिविरों की हालत का जायजा लेने के बाद झंझारपुर के सामाजिक कार्यकर्ता कामेश्वर कामती ने कहा कि शिविरों में प्रति व्यक्ति खर्च सौ-डेढ़ सौ रुपए से अधिक नहीं किया जा रहा।

चिकित्सा और सुरक्षा के मद में स्वास्थ्य और पुलिस विभाग को होने वाले भुगतान इसके अतिरिक्त हैं। वैसे यह महज संयोग भी हो सकता है कि अधिकतर शिविरों के प्रबंधक भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ता हैं। जगह-जगह हो रहे हंगामे को देखते हुए मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया है कि स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी नियमित तौर पर शिविरों का मुआयना करें। पर यह भी नहीं किया जा रहा है। 

एकांतवास शिविरों की संख्या और उनमें रहने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है।10 मई को बिहार में प्रखंड स्तर पर 3665 एकांतवास शिविर संचालित थे जिनमें 1 लाख 22 हजार लोग रह रहे थे, वहीं 2 दिनों बाद यानी 12 मई को एकांतवास शिविरों की संख्या 4163 हो गई जिनमें 1 लाख 89 लोग रहने लगे। इन आंकड़ों का स्रोत बिहार आपदा प्रबंधन विभाग की वेबसाइट है। सिर्फ दो दिनों में 67 हज़ार लोगों की बढ़ोत्तरी हुई है। आने वाले दिनों में यह संख्या कई गुणा बढ़ने वाली है। एक तरफ संख्या बढ़ती जा रही है और दूसरी तरफ़ संसाधनों की कमी है और व्यवस्था भी दुरुस्त नहीं है। प्रखंडों में अधिकतर एकांतवास शिविर स्कूलों और दूसरे सरकारी भवनों में बने हैं। उनकी हालत ऐसी है कि थोड़ी सी बारिश होती है कि छतों से पानी टपकने लगता है। मतलब आने वाले दिनों में कठिनाई बढ़ने वाली है। 

राज्य के जितने जिलों के समाचार आए हैं, सभी जगह एक ही अव्यवस्था की हालत है। अब तो तोड़फोड़ और मारपीट भी होने लगी है। पटना जिले के ही पंडारक के शिविर में भोजन मिलने में देर की शिकायत कई दिनों से की जा रही थी। व्यवस्था दुरुस्त नहीं होने पर गुस्साए लोगों ने परिसर में रखे फर्नीचर तोड़ डाले और पास की सड़क को जाम कर दिया। करीब पांच घंटा जाम रहने के बाद पुलिस पहुंची। अंचल अधिकारी अश्विनी चौबे ने बताया की लोगों को समझा-बुझाकर जाम हटाया जा सका।  

पश्चिम चंपारण के पतिलार, बड़गांव में बने एकांतवास शिविर में रात ग्यारह बजे के बाद प्लास्टिक के पैकेट में बंद भोजन दिया गया। उस ठंडे भोजन को शिविर के निवासियों ने फेंक दिया और अगली सुबह हंगामा करने लगे। सड़क जाम कर लिया। लोगों को शांत करने के लिए जिले से कई अधिकारियों को वहां जाना पड़ा। सीतामढ़ी जिले के कई प्रखंडों में बने एकांतवास शिविरों में सोमवार को जोरदार हंगामा हुआ। बैरगनिया, रीगा, सोनबरसा व डुमरा शिविरों में सरकार और प्रशासन विरोधी नारेबाजी हुई।

वहां घटिया भोजन मिलने का आरोप था। भोजन के अलावा बिछावन, रोशनी और पर्याप्त संख्या में शौचालय की व्यवस्था नहीं होने का आरोप भी सामने आया। बैरगनिया के शिविर में प्रवासियों का गुस्सा तब फूटा जब उन्हें परोसे जाने वाले चावल में कीड़ा निकल आया। उधर भोजपुर जिले के चरपोखरी  में रहने वाले प्रवासियों ने बदइंतजामी को लेकर सड़क जाम कर दिया। मधुबनी के विस्फी में तो ग्रामीणों ने शिविर पर ताला लगा देने का प्रयास किया। उनका आरोप था कि लोग बाहर घूमते हैं जिससे गांव में संक्रमण फैलने की आशंका है।

जहानाबाद के रतनी प्रखंड के सरता मध्य विद्यालय में बने शिविर में शौचालय नहीं होने से प्रवासी मजदूर शौच जाने के लिए बाहर निकले तो ग्रामीण उग्र हो गए।  सरता के गांव के लोगों ने संक्रमण फैलाने का आरोप लगाते हुए पत्थरबाजी करने लगे जिसमें एक प्रवासी मजदूर का सिर फट गया। इस जिले में तीस शिविर बनाए गए हैं। इनमें पहले दिन से ही साफ-सफाई की घोर कमी है। कोशी, सीमांचल और पूर्वी बिहार में भी एकांतवास शिविरों में अव्यवस्था के खिलाफ आए दिन हंगामा हो रहा है।

पेयजल का अभाव और शौचालय की समस्याएं आम हैं। नियमित सफाई भी नहीं हो रही है। भोजन देने में देरी और उसकी गुणवत्ता को लेकर भी आरोप सामने आए हैं। सहरसा जिले के बिहरा शिविर में घटिया भोजन दिए जाने का आरोप लगाते हुए वहां रहने वाले प्रवासियों ने दोरमा-सहरसा मार्ग को जाम कर दिया। कई जगहों पर शिविरों की अव्यवस्था के खिलाफ वहां रहने वाले लोगों के हंगामा करने पर बड़े अधिकारियों को वहां पहुंचना पड़ा है। इससे हंगामे की खबर बाहर आ जा रही है।

(पटना से वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ रिपोर्ट।)

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