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सोशल मीडिया पर उठी जज लोया मौत की दोबारा जांच की मांग

जिस दिन से महाराष्ट्र में अन्वय नाइक का केस खुला है और रिपब्लिक के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी पर पुलिसिया कार्रवाई शुरू हुई है, देश भर में यह मांग जोर पकड़ने लगी है कि अगर नाइक का केस फिर से खोला जा सकता है, तो सीबीआई जज रहे जस्टिस बृजगोपाल हरिकिशन लोया की संदिग्ध मौत की जांच दोबारा क्यों नहीं हो सकती है? इसी सिलसिले में नागपुर में ज्यूडिशियल एक्टिविस्ट अभियान बाराहाते ने 4 नवंबर, 2020 को महाराष्ट्र सरकार के गृहमंत्री और महाराष्ट्र सरकार को एक चिट्ठी भी लिखी है।

अभियान ने पत्र लिखकर अर्णब गोस्वामी केस की तर्ज़ पर जस्टिस बृजगोपाल हरिकिशनदास लोया की संदिग्ध मौत के मामले की फिर से जांच कराने और उनके मामले में झूठी फाइनल रिपोर्ट दाखिल करने वालों के खिलाफ़ कार्रवाई करने के लिए निवेदन किया है। आपको बता दें कि अन्वय नाइक के मामले में भी उन पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई हो रही है, जिन्होंने उनके केस में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी।

5 नवंबर को महाराष्ट्र सरकार द्वारा रिप्लाई में अभियान बाराहाते को बताया गया कि आपका ईमेल मुख्यमंत्री कार्यालय को प्राप्त हुआ और आगे की कार्रवाई के लिए गृह विभाग के अतिरिक्त सचिव को फॉरवर्ड कर दिया गया है।

अभियान बाराहाते के सीनियर सतीश महादेवराव यूके बताते हैं कि अन्वय नाइक और उनकी मां की आत्महत्या केस में क्लोजर रिपोर्ट चला गया था। फिर शिकायतकर्ता ने अर्जी दाखिल करके एसमरी को रिइन्वेस्टीगेशन में कन्वर्ट करवाया और कोर्ट ने उसकी अर्जी को स्वीकार किया। यानि जो क्लोजर रिपोर्ट था वो झूठा था तो रिइन्वेस्टीगेशन के लिए भेजा उसी ग्राउंड पर स्टेट ऑफ महाराष्ट्र ने पाया कि अर्णब गोस्वामी दोषी है। इसीलिए उसको अरेस्ट किया। जबकि उस केस में क्लोजर रिपोर्ट पुलिस ने दिया था पहले ही।

मांग ये की है कि जिस पुलिस ऑफिसर ने क्लोजर रिपोर्ट भेजा है उसके खिलाफ़ कार्रवाई हो कि उसने आरोपियों को बचाने की कोशिश किया। इसलिए ये अनुरोध किया है और उसमें ये लिखा है कि इसी तरह से जज लोया मामले में झूठे व हेर फेर करके कागज बनाए गए हैं ओरिजिनल कागज को छुपाया गया और झूठा क्लोजर रिपोर्ट दाखिल किया गया, इसे भी रिओपेन किया जाए ताकि इसमें सही सबूत रिकॉर्ड पर रख के आगे की कार्रवाई हो पाए। ऐसी अप्लीकेशन अभियान बाराहाते ने सरकार को दी है।

बता दें कि जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने भी जज लोया की मौत की जाँच के लिए दायर एक समीक्षा याचिका को खारिज कर दिया था। सुप्रीमकोर्ट बॉम्बे वकीलों एसोसिएशन द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें लोया की मौत की स्वतंत्र जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट के 19 अप्रैल के फ़ैसले की समीक्षा करने की माँग की गई थी। अप्रैल 2018 के अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि न्यायिक अधिकारियों पर विश्वास नहीं करने का कोई कारण नहीं था जो लोया के साथ उनकी मृत्यु के समय मौजूद थे। इसने याचिकाकर्ताओं पर ‘न्यायपालिका का अपमान करने’ की कोशिश करने का आरोप लगाया और उनकी याचिकाओं को ‘निंदनीय और आपराधिक अवमानना’ तक क़रार दिया था।

सोशल मीडिया पर उठी जस्टिस लोया को न्याय दिलाने की माँग

सोशल मीडिया पर कई दिनों से #JusticeForLoya ट्रेंड कर रहा है। विभिन्न क्षेत्रों के तमाम आम-ओ-खास लोग जस्टिस लोया मौत केस को फिर से खोलने की मांग कर रहे हैं। अन्वय नाइक आत्महत्या मामले को रिओपेन किए जाने के बाद जज लोया केस को लेकर भी लोगों की उम्मीद महाराष्ट्र सरकार से जुड़ गई है।

‘ऑफिस ऑफ एडवोकेट’ नामक ट्विटर हैंडल से लिखा गया है कि “अभी तो सिर्फ़ मोहरा गिरफ्तार हुआ है। जज लोया के केस में इसके आका की भी गिरफ्तारी होनी चाहिये!! महाराष्ट्र सरकार लोया केस को तत्काल रिओपन करे।”

पत्रकार निखिल ने वागले द हिंदू की रिपोर्ट के हवाले से ट्वीट करके लिखा है कि “जज लोया केस को महाराष्ट्र सरकार द्वारा रिओपेन किया जा सकता है।”

जितेंद्र नारायण नामक ट्विटर हैंडल यूजकर्ता लिखते हैं, “ केंद्रीय मंत्रियों की परेशानी अर्नब की गिरफ्तारी से थोड़े है… डर तो जज लोया का मामला खुलने से…. अभी तो दलाल ही गिरफ्तार हुए हैं….भक्त तो डरे गए हैं अपने भगवान की गिरफ़्तारी से…..!!!”

वहीं इफ्तेख़ार आज़ाद लिखते हैं- “ काश जस्टिस लोया के कातिल सलाख़ों के पीछे होते…..!”

डीएन यादव लिखते हैं- “ इंसाफ़ तो सीबीआई जज लोया की मौत पर भी होना चाहिए।”

गुड़िया ट्वीट करके लिखती हैं, “ ओपेन सर जज लोया केस फाइल, इंडिया विल बी फाइन।”

सरल पटेल लिखते हैं, “यह तो सिर्फ़ झांकी है, अभी तो जज लोया को न्याय दिलाना बाकी है!”

एनडीटीवी और गल्फ न्यूज़ स्तंभकार स्वाति चतुर्वेदी लिखती हैं, “ उद्धव ठाकरे कार्यालय ने सुसाइड केस की फाइल खोली देखकर खुशी हुई। लेकिन जज लोया केस (बेहद महत्वपूर्ण) अब तक नहीं रिओपन किया गया जबकि पवार ने इसे रिओपन करने का वादा किया था।”

कर्नाटक कांग्रेस के नेता श्रीवात्सा ने अर्णब की गिरफ्तारी के तुरंत बाद ट्विटर पर यह मांग की कि अब वक्त आ गया है कि जज लोया का केस फिर से खोला जाए और उसमें भी लोगों की गिरफ्तारी की जाए। फेसबुक, ट्विटर, रेडिट और वॉट्सएप्प जैसे सभी सोशल मीडिया हैंडल्स को अगर जोड़ें तो चार नवंबर के बाद से लाखों लोग अभी तक जज लोया की संदिग्ध मौत की जांच की मांग कर चुके हैं। इसी तरह से वॉट्सएप्प पर जज लोया की मौत की जांच की मांग को लेकर कई तरह के मीम चल रहे हैं।

इन मीमों में सोनिया गांधी, उद्धव ठाकरे और शरद पवार से जज लोया की फाइल फिर से खोलने की मांग की जा रही है। मुंबई में महेंद्र पंडागले की फेसबुक पोस्ट खूब शेयर हो रही है, जिसमें जज लोया मामले में कांग्रेस के मुंबई में हुए प्रदर्शन की फोटो लगाकर जज लोया केस को रिओपेन करने की मांग की गई है। सबसे ज्यादा तो लोग दस जनवरी, 2020 को छपे अनिल देशमुख के बयान को शेयर और रिट्वीट कर रहे हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर सबूत मिले तो फिर से जज लोया की फाइल खुलेगी।

शरद पवार और अनिल देशमुख ने जज लोया केस खोलने के संकेत दिए थे

3 दिसंबर 2019 को एक स्थानीय मराठी न्यूज़ चैनल ‘एबीपी माझा’ को दिये इंटरव्यू में शरद पवार ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि यदि माँग होती है और इसकी ज़रूरत पड़ती है तो सीबीआई जज बृजगोपाल हरकिशन लोया की मौत के मामले की जाँच कराई जानी चाहिए। कार्यक्रम में जब मरहूम जज लोया पर इसी संदर्भ में सवाल किया गया तो शरद पवार ने कहा था- “मुझे पता नहीं है, मैंने अख़बारों के कुछ लेखों में पढ़ा कि महाराष्ट्र के लोगों के बीच (जस्टिस लोया की मौत की) गहरी छानबीन करने के लिए चर्चा चल रही है।

इसके बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है। अगर माँग है (जाँच के लिए) तो किसी को इसके बारे में सोचना चाहिए – वे किस आधार पर यह माँग कर रहे हैं, इसमें सच्चाई क्या है, इसकी जाँच होनी चाहिए। यदि इसमें कुछ है तो शायद फिर से जाँच की जानी चाहिए। यदि नहीं तो किसी पर भी बेबुनियाद आरोप लगाना सही नहीं है।”

वहीं महाराष्ट्र सरकार के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने भी इस साल की शुरुआत में कहा था कि महाराष्ट्र सरकार जज लोया केस दोबारा खोलने पर विचार कर रही है। लोया की मौत के मामले में महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने कहा है कि कई लोगों ने मुझे फोन किया और दावा किया कि उनके पास मामले में नए सबूत हैं। मैंने उनसे कहा कि आओ और मुझसे मिलो लेकिन अब तक कोई भी ठोस सबूत नहीं लाया गया है।

आपको बता दें कि मंत्री ने इससे पहले कहा था कि अगर उनके पास ठोस सबूत आते है तो यह मामला फिर से खुल सकता है। गुजरात के चर्चित सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई कर रहे न्यायामूर्ति लोया की एक दिसंबर 2014 को नागपुर में उस समय दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई थी, जब वह अपने एक सहयोगी की बेटी की शादी में शामिल होने गए थे।

किन परिस्थितियों में हुई थी जस्टिस लोया की मौत

गुजरात के बहुचर्चित सोहराबुद्दीन शेख तुलसीराम प्रजापति फेक एनकाउंटर मामले की सुनवाई केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की विशेष अदालत के 48 वर्षीय जज बृजगोपाल हरिकिशनदास लोया कर रहे थे। इस केस में सुनवाई करते हुए उन्होंने अपने पूर्ववर्ती दो न्यायाधीशों की तरह ही केस में सीबीआई की धीमी प्रक्रिया के लिए फटकार लगाते हुए सवाल किया था कि अमित शाह को अब तक कोर्ट में क्यों नहीं पेश किया गया। साथ ही उन्होंने 15 दिसंबर 2014 की तारीख मुकर्रर करते हुए सीबीआई को सख्त आदेश दिया कि वो अमित शाह को कोर्ट में पेश करे। लेकिन 15 दिसंबर से ठीक 15 दिन पहले यानि 1 दिसंबर 2014 को नागपुर में उनकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई, जिसकी वजह उस वक्त दिल का दौरा पड़ना बताया गया था। वे नागपुर अपनी सहयोगी जज स्वप्ना जोशी की बेटी की शादी में शरीक होने गए हुए थे।

जस्टिस लोया की मौत के बाद इस केस में नए विशेष जज बनकर आए जज एम बी गोसावी ने लोया की मौत के ठीक 29 दिन बाद यानी 30 दिसंबर 2014 को पहली ही सुनवाई में अमित शाह को सोहराबुद्दीन हत्याकांड से बरी कर दिया था। चूँकि इशरत जहाँ फर्जी एनकाउंटर मामले में पहले जज का तबादला नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के एक महीने के अंदर 25 जून को कर दिया गया था। अतः इस केस में सुप्रीम कोर्ट का आदेश था कि सोहाराबुद्दीन-तुलसी प्रजापति एनकाउंटर केस की सुनवाई शुरू से आखिर तक एक ही जज करेगा। जब इस केस को सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई ट्रांसफर किया था तब से ही इसे सीबीआई के स्पेशल जज जस्टिस जेटी उत्पत देख रहे थे।

जस्टिस जेटी उत्पत ने अमित शाह के वकीलों को सुनवाई के दौरान लगातार गायब रहने पर चेतावनी दी थी। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश की अवहेलना करते हुए मोदी सरकार ने रूटीन ट्रांसफर बताकर उनका तबादला कर दिया इसके साथ ही इस केस से जुड़े सीबीआई के दो अधिकारियों का ट्रांसफर कर दिया गया। ये दोनों अधिकारी इस केस के तमाम पहलुओं को अच्छी तरह से समझते थे। सीबीआई के स्पेशल प्रॉसिक्युटर एजाज खान को मध्य प्रदेश में प्रमोशन के साथ ट्रांसफर कर दिया गया। इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर संदीप तमगाड़े भी इस केस में लंबे वक्त तक नहीं रहे।

इसके बाद बृजगोपाल लोया आये, उन्होंने भी अमित शाह के उपस्थित न होने पर सवाल उठाते हुए सुनवाई की तारीख 15 दिसम्बर 2014 तय की, लेकिन 1 दिसम्बर 2014 को ही उनकी मौत हो गयी। उनके बाद सीबीआई स्पेशल कोर्ट में यह मामला जज एमबी गोसवी देखने लगे, जिन्होंने दिसम्बर 2014 के आखिर में अमित शाह को इस मामले से बरी करते हुए कहा कि उन्हें अमित शाह के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिला! नए स्पेशल प्रॉसिक्युटर पीवी राजू ने अमित शाह के खिलाफ मुकदमा को 45 मिनट की बहस में खारिज कर दिया। तब इनके समकक्ष ने सीबीआई के स्पेशल जज एमबी गोसावी के आने से पहले दो दिनों में केस को तैयार किया था!

अमित शाह के खिलाफ दूसरी एफआईआर रद्द करने का फैसला देने वाले सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सदाशिवम को रिटायर होने के हफ्ते भर के अंदर ही भाजपा ने केरल का राज्यपाल बना दिया। जबकि अमित शाह का मुकदमा लड़ने वाले वरिष्ठ वकील उदय ललित सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on November 11, 2020 1:15 am

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