आक्सीजन और वैक्सीन की कमी से अनुच्छेद 21 के तहत निहित जीवन का अधिकार खतरे में

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आक्सीजन और वैक्सीन की कमी से देशभर में कोविड-19 के संक्रमण से बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो रही है,ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निहित जीवन का अधिकार उच्चतम न्यायालय से लेकर देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों के लिए चिता का विषय बन गया है,क्योंकि इससे संवैधानिक संकट उत्पन्न हो रहा है। पिछले दिनों सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से कहा था कि वो अपनी वैक्सीन नीति पर फिर से विचार करे क्योंकि पहली नजर में ऐसा लगता है कि इससे संविधान अनुच्छेद 21 के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य के अधिकार को क्षति पहुंचती है। जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ कोरोना वायरस से संक्रमित होने के कारण स्वत: संज्ञान मामले की 13 मई को होने वाली सुनवाई स्थगित कर दी गयी है।  

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य बुनियादी मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में अपने मौलिक दायित्व में विफल रहा है यानी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निहित जीवन का अधिकार। बॉम्बे हाईकोर्ट के गोवा बेंच ने कहा कि अगर लोग ऑक्सीजन की कमी के कारण मर रहे हैं तो यह अनुच्छेद 21 का पूरी तरह से उल्लंघन है। पटना हाईकोर्ट ने कहा कि  नागरिकों को स्वास्थ्य सुविधा मुहैया करा पाने में विफलता अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी अनुच्छेद 21 के  उल्लंघन पर यूपी सरकार से जवाब तलब किया।

बॉम्बे हाईकोर्ट (गोवा पीठ) के जस्टिस  एमएस सोनक और जस्टिस एनडब्ल्यू साम्बरे की खंडपीठ ने कहा कि राज्य में आक्सीजन की कमी से कई मौतें हो रही हैं और न्यायालय और प्राधिकरण इनकार नहीं कर सकते।अगर लोग ऑक्सीजन की कमी के कारण मर रहे हैं तो यह अनुच्छेद 21 का पूरी तरह से उल्लंघन है।खंडपीठ ने बुधवार को राज्य और अन्य अधिकारियों को राज्य की ऑक्सीजन जरूरतों को पूरा करने के लिए सभी प्रयास करने के लिए कहा और कहा ऑक्सीजन की कमी के कारण मरने वाले कोरोना  पॉजिटिव मरीजों को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का घोर उल्लंघन है।खंडपीठ ने कहा कि राज्य में आक्सीजन की कमी से कई मौतें हो रही हैं और न्यायालय और प्राधिकरण इनकार नहीं कर सकते।

पटना हाईकोर्ट ने सोमवार को बिहार में कोविड मामलों की वर्तमान वृद्धि को रोकने के लिए राज्य सरकार की किसी भी व्यापक कार्य योजना के अभाव पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए बिहार मानवाधिकार आयोग से हस्तक्षेप करने को कहा। जस्टिस सीएस सिंह और जस्टिस मोहित कुमार शाह की खंडपीठ ने कहा कि विशेष रूप से एक महामारी के बीच में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल की कमी नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन है।भारत के संविधान के अनुच्छेद 12 के अर्थ के तहत विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के बीच में राज्य की ओर से अपने नागरिक को पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने में कोई निष्क्रियता भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन होगा।पीठ ने चिकित्सा उपयोग के लिए ऑक्सीजन की आपूर्ति की तीव्र कमी के खिलाफ भी कड़ा रुख अपनाया और कहा कि यह सीधे तौर पर किसी नागरिक के मौलिक अधिकार से संबंधित हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस विपिन सांघी और जस्टिस रेखा पल्ली की खंडपीठ ने कोविड-19 महामारी के खिलाफ लड़ाई में दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी पर सुनवाई के दौरान पेश हुए एक वकील के, जिसके रिश्तेदार की आईसीयू बेड ने मिलने के कारण मृत्यु हो गई थी, अदालत ने यह कहते हुए अपनी सहानुभूति व्यक्त की और कहा कि राज्य बुनियादी मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में अपने मौलिक दायित्व में विफल रहा है यानी अनुच्छेद 21 के तहत निहित जीवन का अधिकार।खंडपीठ ने विभिन्न मामलों में आदेशों की एक श्रृंखला पारित की।

उच्चतम न्यायालय में केंद्र सरकार  ने वैक्सीन लगाने से आर्टिकल 21 के  कनेक्शन पर सफाई देते हुए कहा कि जो नीति बनाई गई है वो संविधान के आर्टिकल 21 के अनुरूप ही है। काफी विचार विमर्श के बाद वैक्सीन की पॉलिसी तैयार की गई है। विश्वास कीजिए हम पर इस पर कोर्ट के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। उच्चतम न्यायालय की ओर से केंद्र से वैक्सीन पॉलिसी को लेकर दोबारा विचार करने को कहा गया था जिस पर अब सरकार ने अपना जवाब दाखिल कर दिया है। केंद्र सरकार की ओर से कहा गया है कि वैक्सीन पॉलिसी न्यायसंगत है और इसमें उच्चतम न्यायालय के दखल की कोई जरूरत नहीं है।

केंद्र सरकार ने अपनी वैक्सीनेशन पॉलिसी का बचाव करते हुए कहा है कि बड़े जनहित में ये फैसला कार्यपालिका पर छोड़ दें। इसमें किसी प्रकार के न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। केंद्र की ओर से यह भी कहा गया है कि एक्सपर्ट और वैज्ञानिक सलाह के आधार पर ही वैक्सीन पॉलिसी बनाई गई है। केंद्र सरकार ने कहा है कि जो नीति बनाई गई है वो संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 के जनादेश के अनुरूप ही है। काफी विचार विमर्श के बाद वैक्सीन की पॉलिसी तैयार की गई है। विश्वास कीजिए हम पर इस पर कोर्ट के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।

केंद्र सरकार ने कहा कि इस समय कोरोना वैक्सीनेशन का काम चल रहा है। सरकार का फोकस वैक्सीन के प्रोडक्शन और इसकी उपलब्धता को लेकर है। केंद्र सरकार की ओर इसकी कीमत को लेकर कहा गया है कि वैक्सीन उत्पादकों से बात करने के बाद ही कीमत तय की गई है। राज्य सरकारों को समान दर पर वैक्सीन मिलेगी।

अनुच्छेद 21भारत के प्रत्येक नागरिक को जीवन जीने और उसकी निजी स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है। इसमें कोई अन्य व्यक्ति या संस्था किसी व्यक्ति के इस अधिकार का उल्लंघन करने का प्रयास करता है तो पीड़ित व्यक्ति को सीधे सुप्रीम कोर्ट तक जाने का अधिकार होता है। इस आर्टिकल के अन्तर्गत स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य की सावधानी का अधिकार वैसा ही होता है जैसे जीवन जीने का अधिकार।

इस बीच उच्चतम न्यायालय के जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए हैं। उच्चतम न्यायालय ने एक नोटिस जारी किया जिसमें कहा गया है गुरुवार 13मई21 को जस्टिस  चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष कोविड-19 महामारी के दौरान आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने से संबंधित स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई होनी थी, जिसे पीठ के एक न्यायाधीश के कोरोना वायरस से ‘संक्रमित’ पाए जाने के बाद स्थगित कर दिया गया है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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