Monday, October 25, 2021

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‘राइट टू सेनेटरी पैड’ बना दमोह में चुनावी मुद्दा

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Janchowk Official Journalists in Delhi

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दमोह विधानसभा उपचुनाव ज्यों ज्यों निकट आ रहा है जागरुक उम्मीदवार नये नये मुद्दे सामने लाकर अपनी ओर आकृष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं । बिकाऊ, टिकाऊ, रोजगार, पानी और विकास के मुद्दों के बीच निर्दलीय प्रत्याशी एडवोकेट वैभव सिंह ने महिलाओं की माहवारी से जुड़ी बीमारियों, सार्वजनिक शर्मिन्दगी तथा नारी सम्मान की रक्षा के लिए एक एक्ट बनवाने का भी मुद्दा उठा लिया है जो शहरी महिलाओं को भा रहा है।

वैभव सिंह का कहना है कि महिलाओं को यह सुविधा आवश्यक जगहों पर नि:शुल्क मिलनी चाहिए। महिलाओं का अभिमत है कि यह काम ज़रूरी है।  पिछले वर्ष ही स्कॉटलैंड की संसद ने सर्वसम्मति से पीरियड प्रोडक्ट्स बिल के पक्ष में मतदान किया। इसके बाद से सार्वजनिक भवनों में सेनेटरी उत्पादों तक मुफ्त पहुंच एक कानूनी अधिकार बन गया है। ऐसे ही कानून की दरकार भारत सरकार से है ।

क्योंकि जो हालत भारत देश की बहुसंख्यक महिलाओं की इस वक्त होती है वह सब भलीभांति जानते हैं। इस बाबत एक तो महिलाएं अपना कष्ट छुपाती हैं वे अपनी सखी सहेलियों से जो कहती हैं कि वह ही कुछ कुछ सामने आता है वे कहती हैं जहां दो टाइम का खाना मुश्किल से मिलता है और सड़क किनारे रात बितानी हो वहां हर महीने सैनिटरी नैपकिन खरीदना उनके बस का नहीं।

कुछ कपड़े यूज़ करती हैं जिनसे दिक्कत तो बहुत होती है लेकिन क्या करें… ऐसे ही चल रहा है। हमारा चमड़ा छिल जाता है और दाने हो जाते हैं, तकलीफ़ें बहुत हैं और पैसों का अता-पता नहीं। संकोच के कारण दर्द के बावजूद सब करना होता है।

इस संबंध में आपको याद होगा एक यूनिवर्सिटी (जेएनयू) से पीएचडी कर रहीं 27 साल की ज़रमीना ने दिल्ली हाईकोर्ट में सैनिटरी नैपकिन्स से जीएसटी हटाने के लिए जनहित याचिका दायर की थी। उन्होंने इसकी अहमियत बताते हुए कहा था  “मैं उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जैसी छोटी जगह से आती हूं। मैंने देखा है कि ग़रीब औरतें कैसे मासिक धर्म के दौरान अख़बार की कतरनों, राख और रेत का इस्तेमाल करती हैं।”

“मैं उनका दर्द समझती हूं। मैं ख़ुद एक लड़की हूं और समाजशास्त्र की छात्रा हूं। मैं समाज में औरतों के हालात से अच्छी तरह वाकिफ़ हूं। मुझे मालूम है कि ग़रीब तबके की औरतें कैसी तकलीफ़ों का सामना करती हैं। यही वजह है कि मैंने अदालत जाने का फ़ैसला किया। ज़रमीना ने बताया जेएनयू में भी इस मुद्दे पर काफ़ी चर्चा होती थी लेकिन कोई आगे बढ़कर पहल नहीं कर रहा था और आख़िरकार उन्होंने पहल की और 12%जी एस टी हटवाया”।

विदित हो, कॉमन सर्विस सेंटर्स (CSCs) को साथ मिलाकर 2018 में केंद्र सरकार ने महिलाओं के हितों के मद्देनजर स्त्री स्वाभिमान योजना 2020 की शुरूआत महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग ने महिलाओं के लिए सस्ती सेनेटरी पैड उपलब्ध कराने की योजना शुरू की जिसमें प्रत्येक आंगनबाड़ी केंद्र पर आठ सेनेटरी पैड का एक सेट महज पंद्रह रुपये में उपलब्ध होगा जिससे बालिकाओं और महिलाओं में माहवारी जो एक प्राकृतिक बदलाव है, जिसको लेकर खुलकर चर्चा भी होगी क्योंकि जानकारी के अभाव में बेटियां और महिलाएं माहवारी के दिनों में स्वच्छता के प्रति गंभीर नहीं होतीं, जिससे होने वाले संक्रमण के कारण वह कई गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाती हैं। सस्ती दर पर पैड उपलब्ध होने के बाद महिलाएं निश्चित रूप से इन्हें इस्तेमाल करेंगी। लेकिन यह योजना कारगर नहीं हो पाई क्योंकि इसके लिए ग्रामीण महिलाओं के पास राशि नहीं थी। महिलाओं को ही इसे बनाने का काम मिलना था पर वह कुछ क्षेत्रों को छोड़कर कारगर नहीं रहा ।

एक मुहिम कर्नाटक में सरकारी और गैर सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में अन्य सुविधाओं के साथ मुफ्त में सेनेटरी नैपकिन बांटने की राज्य सरकार की “शुचि योजना “को कड़ाई से लागू करने की मांग वाली याचिका पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की है। दरअसल, सुनवाई के दौरान कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस बी वी नागराथा और जस्टिस जे एम काजी की खंडपीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि लड़कियों के लिए अलग टायलेट और उन्हें नियमित रूप से सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराना न सिर्फ उन्हें सशक्त करता है बल्कि 6 से 14 वर्ष की लड़कियों के लिए अनुच्छेद 21ए यानि शिक्षा के अधिकार के प्रविधानों को लागू करने की तरफ एक कदम है। हाईकोर्ट ने ये भी कहा कि अगर सरकार युवा महिलाओं और बच्चियों को सशक्त करना चाहती है तो ये सुविधाएं उन्हें दी जाएं। आपको बता दें कि कर्नाटक में सरकारी स्कूलों में मुफ्त सैनेटरी पैड बांटने की ‘शुचि’ योजना चल रही है। लालकिले से भाषण के दौरान प्रधानमंत्री ने भी महिला सशक्तिकरण के लिए अपनी सरकार के प्रयासों के बारे में बताया था। पीएम मोदी ने संबोधन के दौरान सैनिटरी पैड का जिक्र किया। उनकी तारीफ भी हुई । लोगों का कहना है कि मासिक धर्म जैसे विषय जिन पर समाज में आसानी बात नहीं की जाती है, उसके बारें में बोलकर प्रधानमंत्री ने एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत किया है।

पीएम मोदी ने कहा, “यह सरकार हमेशा हमारी बेटियों और बहनों के स्वास्थ्य के बारे में चिंतित रही है। 6,000 जन औषधि केंद्रों के माध्यम से, लगभग 5 करोड़ महिलाओं को एक रुपये में सैनिटरी पैड मिले हैं। उनकी यह कोशिश रुक क्यों गई ? शुरू रहनी चाहिए थी।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (International Womens Day) के मौके पर नोएडा से ग्रेटर नोएडा (Greater Noida) के बीच यात्रा करने वाली महिलाओं के लिए खुशखबरी दी थी। वह एक्वा लाइन की इन सभी स्टेशनों पर मुफ्त सेनेटरी पैड उपलब्ध हो रही है। वहीं मेट्रो प्रशासन महिला सशक्तिकरण के लिए इस लाइन के 2 स्टेशनों को पिंक स्टेशन के तौर पर नामित किया है जो सराहनीय कदम है। कतिपय समाजसेवी संस्थाएं भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर महिलाओं तक नि:शुल्क पेड उपलब्ध करा रहीं हैं। लेकिन ये भारत जैसे विशाल देश की लगभग 47% महिलाओं के लिए ऊंट के मुंह में जीरा की तरह हैं ।

इसलिए दमोह उपचुनाव के दौरान राइट टू सेनिटरी पैड का मुद्दा एक आवश्यक मुद्दा बनने वाला है मेरा पेड मेरा अधिकार सरकार को देना ही होगा । अगर सरकार महिलाओं के इस गंभीर और ज़रूरी मुद्दे पर विचार कर उसकी नि:शुल्क व्यवस्था नहीं करती है, तो वैभव सिंह कानून बनाने के लिए अदालत में अर्जी दाखिल करेंगे । ज्ञातव्य हो दमोह के ये निर्दलीय प्रत्याशी जबलपुर उच्च न्यायालय के जाने माने अधिवक्ता भी हैं। इस ज़रूरी और आवश्यक पहल पर सैकड़ों सामाजिक कार्यकर्ता उनके साथ हैं। उम्मीद की जाती है कि इस विषय को केंद्र सरकार गंभीरता से लेगी। अंत में पूनम महानंद की कविता शायद महिलाओं की तकलीफ़ में आपको शामिल कर सके —मैं अभिशप्त हूं/ क्योंकि मैं रजस्वला स्त्री हूं/मैं परित्यक्त हूं/क्योंकि मैं रजस्वला स्त्री हूं /पूजा हवन में अशुभ हूं /क्योंकि मैं रजस्वला स्त्री हूं/लेकिन तुम यह क्यों भूलते हो/कि तुम हो/तुम,तुम हो/मैं रजस्वला स्त्री हूं/योनि से बहता रक्त गर्व है मेरा/मैं प्रकृति के समकक्ष हूं/जिस पर संपूर्ण ब्रह्मांड टिका/मैं वो अक्ष हूं।

(सुसंस्कृति परिहार स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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