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Tuesday, September 28, 2021

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बिहार की अगड़ी जातियों के सामने साष्टांग होती आरजेडी!

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राजद का इरादा अब पहले जैसा नहीं रहा। सवर्णों को हमेशा टारगेट करने वाली राजद अब उनके सामने नतमस्तक है। जब तक लालू प्रसाद बिहार में रहकर पार्टी को हांकते रहे तब तक उनका एमवाई समीकरण बुलंद रहा। लालू प्रसाद जेल गए तो ना सिर्फ इस समीकरण में कमजोरी आयी बल्कि यह भी साफ़ हो गया कि केवल इसके दम पर चुनाव जीतना और सरकार बनाना संभव नहीं। लालू खेमे में भी सब कुछ जय-जय नहीं है। महा गठबंधन की अगुवाई कर रही राजद के भीतर भी कई रंग हैं और उन रंगों के कई मायने भी। सामने नीतीश की सेना है और उसके साथ हिंदूवादी संगठनों यानी बीजेपी की वाहिनी। बड़ा विचित्र नजारा है।

समाजवादी और भाजपाइयों का यह गठजोड़ कभी-कभी भ्रमित भी करता है और आकर्षित भी। बिहार में ही यह सब संभव है। साथ मिलकर चुनाव लड़ने का यह खेल बिहार को लुभाता भी है सवाल भी खड़ा करता है। इसी से तो बिहार में बहार का नारा चलता है। एनडीए की पैंतरेबाजी से महागठबंधन को चैन नहीं। ऊपर से सब कुछ ठीक ठाक दिखने की केवल बात ही है ,भीतर तो कोहराम मचा है। राजद को लगा था की बड़े साहब यानी लालू प्रसाद चुनाव से पहले बिहार में एंट्री करेंगे और समा बदल जाएगा लेकिन अब शायद ऐसा ना हो। विरोधी पक्ष किसी भी सूरत में लालू को चुनाव से पहले बिहार में आने देने से रोकने में लगा है। राजद की परेशानी बढ़ी है।

केवल एमवाई समीकरण से बात नहीं बनेगी

महा गठबंधन के भीतर आधा दर्जन से ज्यादा दल हैं। दो बड़ी पार्टियां हैं राजद और कांग्रेस। वैसे अब कांग्रेस की भी कोई पूछ बिहार में नहीं रह गई है। उसके सारे संगठन बिखर चुके हैं। सारे बड़े नेता दल बदल चुके हैं। सारे जातीय समीकरण पलट गए हैं। कभी ब्राह्मण, दलित और मुसलमान कांग्रेस के वोट बैंक हुआ करते थे अब ये सभी जातियां अलग-अलग दलों में दमक रही हैं। कांग्रेस मुक्त आकाश में खड़ी है। जो कहीं नहीं वह कांग्रेस के साथ रहने का दम्भ भर रहा है और जैसे ही मौक़ा मिलता है छिटक जाता है, नेता बन बैठता है। राजद की परेशानी बढ़ी हुई है।

पार्टी के भीतर और लालू प्रसाद के घर के भीतर भी वोट बैंक के आकलन लगाए जा रहे हैं। एमवाई समीकरण को नापा तौला जा रहा है। कभी उम्मीदें बंधती हैं तो कभी बिखर जाती हैं। राजद नेता अब रिस्क नहीं लेना चाहते। तय हुआ कि एमवाई समीकरण के साथ ही सवर्णों को भी पार्टी से जोड़ा जाए। सवर्ण साथ आ जाए तो नैया पार हो सकती है, सरकार बन सकती है। थोड़ा जोर कांग्रेस को भी लगाना होगा। अब राजद के भीतर मान लिया गया है कि केवल  समीकरण से जीत संभव नहीं। जीत के लिए सवर्ण का साथ जरूरी है।

सवर्णों को लेकर राजद में मंथन

विधानसभा चुनाव में बहुमत पाने और हर जाति में पार्टी की स्वीकार्यता को विस्तार देने के लिए राजद हर जुगत भिड़ाने के लिए तैयार है। इस दिशा में वह सबसे पहले एमवाई समीकरण को विस्तारित कर इस चुनाव में अति-पिछड़ों के साथ-साथ अगड़ों पर भी दांव लगाने जा रहा है। राजद के भीतर मंथन में सवर्णों पार दांव लगाने के इस संदर्भ में उसने उन्हें दी जा सकने वाली दो दर्जन से अधिक सीटों की पहचान भी कर ली है। पिछले चुनाव में राजद ने एक ब्राह्मण, तीन राजपूत और एक कायस्थ उम्मीदवार को ही चुनावी समर में उतारा था।

भूमिहार जाति से एक भी प्रत्याशी नहीं दिया था। पार्टी ने इस बाबत भूमिहारों की नाराजगी अमरेंद्र धारी सिंह को राज्यसभा में पहुंचा कर दूर करने की कोशिश की है। इस बार राजद से भूमिहार भी उम्मीदवार होंगे। इसके साथ ही दर्जन भर से ज्यादा ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थ समाज के लोग भी राजद से चुनाव लड़ेंगे और कई सीटों पर प्रभाव भी डालेंगे।

प्रदेश के सियासी समीक्षकों के मुताबिक अगड़ों को दी गयी सीटों पर चुनाव परिणाम उतने निराशाजनक नहीं थे। यह देखते हुए कि अगड़ों को कुल दी गयी पांच में पार्टी ने तीन पर जीत हासिल की थी। इनमें ब्राह्मण एक और दो राजपूत प्रत्याशियों ने जीत हासिल की थी। कायस्थ उम्मीदवार ने अपनी सफलता नजदीकी मुकाबले में गंवा दी थी। इस परिदृश्य में राजद ने इस बार पिछले समय से कई गुना ज्यादा सीट देने की रणनीति बनायी है। सीटों की अंतिम संख्या महागठबंधन के अन्य घटक दलों को सीट देने के बाद घट और बढ़ सकती है। दरअसल राजद के राजनीतिक विश्लेषकों ने माना है कि पिछले चुनावों में अगर कुछ अगड़े प्रत्याशी और उतारे होते, तो चुनावी वोट प्रतिशत में सम्मानजनक सुधार हो सकता था।

राजद के एमवाई के साथ कांग्रेस का बीबी प्लान

बिहार में माना जाता है कि मुस्लिम+यादव लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल का कोर वोटर है। वहीं 1990 के पहले राज्य के ब्राह्मण और भूमिहार कांग्रेस पर भरोसा करते रहे। 1990 से 1995 के दौर में ये वोटर समाजवाद के नाम पर छिटककर आरजेडी के साथ भी गए। वहीं राम मंदिर के मुद्दे की वजह से कुछ वोटर बीजेपी के साथ चले गए। बाद के दौर में ब्राह्मण और भूमिहार वोटर लगभग पूरी तरह से बीजेपी से साथ हो गए। उन्हीं वोटरों को दोबारा पाने के लिए कांग्रेस कोशिश कर रही है। बिहार में ब्राह्मण और भूमिहार वोटरों की आबादी करीब दस फीसदी से ज्यादा है। याद रहे पिछले चुनाव में कांग्रेस को जो वोट मिले थे उसमें इस समाज का बड़ा रोल था। 

इस वक्त बिहार कांग्रेस संगठन पर नजर डालें तो प्रदेश अध्यक्ष ब्राह्मण, चार कार्यकारी अध्यक्ष में दो उच्च जाति का और एक-एक दलित और मुस्लिम हैं। प्रचार समिति का प्रमुख भी अगड़ी जाति के नेता हैं। हालिया विधान परिषद के चुनाव में भी कांग्रेस ने अगड़ी जाति के समीर कुमार सिंह को चुना। इसके अलावा 2015 में जब महागठबंधन की सरकार बनी तो भी कांग्रेस के कोटे से चार मंत्री में दो अगड़ी जाति से और एक-एक मुस्लिम दलित बने थे।

महा गठबंधन सत्ता में पहुँच सकता है बशर्ते

बिहार में हुए पिछले कुछ चुनावों का आकलन करें तो पता चलता है कि राजद  के पास मुस्लिम+यादव का सबसे बड़ा कोर वोट बैंक है। लेकिन यह समीकरण सत्ता दिलाने में सफल नहीं है। क्योंकि मुस्लिम+यादव को मिलाकर करीब 30 फीसदी वोट होते हैं। ऐसे में करीब 70 फीसदी वोट दूसरे खेमे में हो जाते हैं। सत्ता तक पहुंचने के लिए इन कोर वोटरों के साथ और भी जातियों का वोट जरूरी है। इसके लिए कांग्रेस कोशिश में है कि वह भूमिहार 4.7% और ब्राह्मण 5.7% वोटर को गठबंधन के पक्ष में लाने की कोशिश करे। इसके साथ गठबंधन का यह भी प्लान है कि भूमिहार और ब्राह्मण वोटर काफी हद तक अपने प्रभाव से समाज की दूसरी जाति के वोटरों को भी जोड़ने में सफल रहते हैं। ऐसे में गठबंधन को उम्मीद है कि अगर यह प्लान सफल होता है तो कांग्रेस+राजद बिहार में सत्ता तक पहुंच सकती हैं।

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं। और बिहार की राजनीति पर गहरी पकड़ रहते हैं।)

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