Saturday, October 16, 2021

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ट्रेनों के चलाने के दावे खोखले निकले, नन्हें बच्चों-महिलाओं के साथ सैकड़ों मज़दूर पैदल चलने को मजबूर

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रायपुर। कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण लगे तीसरे चरण के लाॅक डाउन के बाद बीजापुर से होते हुए अपने घरों के लिए रवाना हो रहे प्रवासी मजदूरों के पैदल सफर का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। महाराष्ट्र और तेलंगाना से हर रोज सैकड़ों की संख्या में प्रवासी मजदूर जिले की सीमा में दाखिल हो रहे हैं। आज भी झारखण्ड और बिहार के 63 मजदूर जिले के बासागुडा गांव पहुंचे। जिन्हें स्थानीय जन प्रतिनिधियों के सहयोग से बासागुडा स्थित आवासीय विद्यालय में ठहराया गया है। मजदूर बता रहे हैं कि वे तेलंगाना के मनगूर जिले में एक निजी फैक्ट्री में काम कर रहे थे। 

लाॅकडाउन के बाद फैक्ट्री मालिक ने इनका सहयोग करने के बजाय नौकरी से ही निकाल दिया। जिसके बाद वे तेलंगाना से जंगली रास्ते पर सफर करते हुए बीजापुर के बासागुडा गांव पहुंचे। मजदूरों का कहना है कि वे पिछले चार दिनों से पैदल ही जंगल के रास्ते सफर कर रहे हैं। इस दौरान भूख लगने से जंगली फलों से ही उसको मिटाए। लगातार पैदल चलने की वजह से मजदूरों के पैरों में छाले तक आ गये हैं। मजदूरों का आरोप है कि बीजापुर में दाखिल होने के बाद पुलिस जवानों द्वारा उनके साथ दुर्व्यवहार भी किया गया है।

सरकारों ने मजदूरों के घर राशन पहुंचाने या फिर उन्हें अपने घर वापस भेजने के लिए ट्रेनों की व्यवस्था करने के दावे तो बहुत किये लेकिन ये सब दावे खोखले नजर आ रहे हैं। और इसी वजह से मजदूरों को हजारों किलोमीटर का सफर पैदल तय करना पड़ रहा है। महाराष्ट्र सरकार की उपेक्षा के चलते ऐसे ही सैकड़ों मजदूर 8 अप्रैल को मुंबई से पैदल निकालकर आज रायपुर पहुंचे। इन मजदूरों का कहना है कि न तो सरकार ने इनके घर तक राशन पहुंचाया न इन्हें घर तक भेजने की व्यवस्था की। भूखों मरने की नौबत थी। इसलिए पैदल ही हजारों किलोमीटर की सड़क पैदल ही नाप दी।

पैरों में पड़े बड़े-बड़े छालों के साथ महाराष्ट्र से छत्तीसगढ़ को जोड़ने वाले नेशनल हाइवे 53 पर पैदल चलते ये सैकड़ों मजदूर ओडिशा के रहने वाले हैं, जो 8 अप्रैल को पैदल मुंबई से निकले थे और आज करीब 1200 किमी का सफर तय कर रायपुर पहुंचे हैं। मजबूरी की मार झेलकर हजारों किमी का पैदल सफर तय करने वाले इन मजदूरों का कहना है कि महाराष्ट्र के नवी मुंबई स्थित एक कंपनी में काम करते थे। लॉक डाउन हुआ तो मालिक ने हाथ खड़े कर दिए।

कुछ दिन तो निकल गए लेकिन जब राशन खत्म हुआ तो सरकार के हेल्पलाइन नम्बरों पर फोन किया 1 बार मदद मिली फिर वो भी बंद हो गई। घर जाने के लिए आवेदन किया 7 अप्रैल को ट्रेन चलने की जानकारी मिली बसों में भरकर स्टेशन ले जाया गया। ट्रेन में बैठाया भी गया लेकिन फिर ट्रेन से उतारकर कह दिया गया कोई ट्रेन नहीं जा रही। 1 दिन इंतजार किया लेकिन जब भूखों मरने की नौबत आई तो पैदल ही घर के लिए निकल पड़े। घर उड़ीसा में है और हजारों किमी पैदल ही चल दिये।

ऐसे सैकड़ों मजदूर छोटे-छोटे बच्चों को लेकर मुंबई से ओडिशा और झारखंड हजारों किमी पैदल ही चल दिये हैं। सरकार से मदद की दरकार है लेकिन झारखंड के मकबूल अंसारी कहते हैं कि सरकार चल रही है उसे क्या लेना-देना छोटा-छोटा बच्चा भूखों मर रहा है। पैदल चल रहा है। काम बंद होने के बाद सरकार खाने पीने तक की व्यवस्था नहीं कर पाई।

बता दें कि हजारों किमी का सफर तय कर अपने घरों की तरफ निकले इन मजदूरों को रास्ते में कोई कुछ खिला दिया तो खा लेते हैं वर्ना सरकार की उपेक्षाओं के चलते ये खाली पेट ही आगे भी सड़क नापने को मजबूर हैं।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश दिया था कि जो भी प्रवासी मजदूर पैदल आ रहे है उन्हें उनके क्षेत्रों और सीमाओं तक छोड़ा जाए। राज्य सरकार ने प्रवासी मजदूरों के लिए हेल्प लाइन भी चालू कर रखी है। इन सब से हट कर जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। 

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में स्थित टाटीबंध में एक रात का नजारा कुछ यूं था। सैकड़ों प्रवासी मजदूर विभिन्न इलाकों से आए 24 घण्टे से वहीं समय बिता रहे थे। वो इंतजार में थे कि प्रशासन की तरफ से किसी प्रकार की उन्हें मदद मिलेगी। लेकिन राज्य के मुख्यमंत्री के निर्देशों का वहाँ कोई संकेत ही नहीं मिल रहा था। मौक़े पर न तो कोई प्रशासनिक अधिकारी मौजूद था न कोई ज़िम्मेदार वय्क्ति। अलबत्ता सामाजिक संगठन उनके खाने की व्यवस्था और उन्हें सुरक्षित घर पहुंचाने की जद्दोजहद में लगे हुए थे।

बता दें कि तेलंगाना, हैदराबाद से आकर रायपुर पहुंचे हजारों मजदूरों का हुजूम टाटीबंध में उमड़ पड़ा है। शनिवार को ये मजदूर रायपुर से झारखंड, बिलासपुर, गढ़़वा, मुंगेली और बलौदाबाजार जाने के लिए यहां से ट्रक या फिर पैदल रवाना हुए। मजदूरों ने बताया कि सब्जी की गाड़ियों में बैठकर वे एक-एक हजार रुपये किराया देकर यहां तक पहुंचे। जहां वाहन की सुविधा नहीं है, वहां पैदल ही जाना पड़ रहा है। अलग-अलग राज्यों के मजदूरों के पहुंचने का सिलसिला जारी है। मजदूरों को ट्रक और दूसरे साधनों से गृह प्रदेश पहुंचाने में लोग मदद कर रहे हैं। 

लॉक डाउन के तीसरे चरण में फैसला किया गया कि मजदूरों को उनके घर तक पहुंचाने की व्यवस्था की जाए। इस काम के लिए सरकार ने अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। बावजूद इसके मजदूर भटक रहे हैं और पैदल चलने के लिए मजबूर हैं।

(रायपुर से जनचौक संवाददाता तामेश्वर सिन्हा की रिपोर्ट।)

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