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संविधान और कानून नहीं व्यवहारवाद पर आधारित है सबरीमला विवाद का न्याय

अनुच्छेद 370, कश्मीर में इंटरनेट एवं मीडिया पर पाबंदी, राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद भूमि विवाद, संशोधित नागरिकता कानून जैसे मामलों में, जिनमें संविधान और संवैधानिक मूल्य दांव पर हों, त्वरिच न्यायिक हस्तक्षेप की बात गुजरे ज़माने की बातें रह गयीं हैं। अब न्याय की देवी अंधी नहीं रह गयी। अब न्याय संविधान और कानून के शासन पर आधारित नहीं रहा बल्कि व्यवहार वाद पर आधारित है, जिसमें आस्था का भी बहुत महत्व है।इसका सबसे बड़ा ज्वलंत उदाहरण सबरीमाला मंदिर का है जिसमें उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि यह एक “भावनात्मक मुद्दा” है और अदालत हिंसक प्रतिक्रियाओं को रोकने के लिए राहत के रूप में अपने विवेक का इस्तेमाल करना पसंद करेगी। उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि हम जानते हैं कानून आपके पक्ष में है, लेकिन हम कोई आदेश जारी नहीं करेंगे।
ये मानते हुए कि सबरीमला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देने के फैसले पर कोई रोक नहीं है, उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को स्वामी अयप्पा मंदिर की यात्रा करने वाली महिलाओं के लिए सुरक्षा आदेश पारित ना करने का फैसला किया। चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने कहा कि यह एक “भावनात्मक मुद्दा” है और अदालत हिंसक प्रतिक्रियाओं को रोकने के लिए राहत के रूप में अपने विवेक का इस्तेमाल करना पसंद करेगी। चीफ जस्टिस बोबडे ने वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजाल्विस और इंदिरा जयसिंह, जो याचिकाकर्ता रेहाना फातिमा और बिंदू अम्मिनी के लिए उपस्थित हुए थे, से कहा कि यह एक परम्परा है, जो हजारों वर्षों से चल रही है। सुविधा के संतुलन के लिए आवश्यक है कि अब आपके पक्ष में कोई आदेश पारित नहीं किया जाना चाहिए। यदि मामला, जिसे संदर्भित किया गया है, आपके पक्ष में आता है, तो हम निश्चित रूप से जो आदेश आप चाहते हैं वो पारित करेंगे। चीफ जस्टिस ने कहा कि फिलहाल स्थिति विस्फोटक है। हम कोई हिंसा नहीं चाहते हैं।
चीफ जस्टिस बोबडे ने यह भी आश्वासन दिया कि वह इस मुद्दे के निपटारे के लिए जल्द ही सात न्यायाधीशों की पीठ का गठन करेंगे। पीठ ने यह स्पष्ट किया कि वह मंदिर जाने वाले याचिकाकर्ता का विरोध नहीं हैं, अगर वह जा सकती हैं। हम यह नहीं कह रहे हैं कि उन्हें अंदर जाने की अनुमति नहीं है, लेकिन हम अभी कोई आदेश पारित नहीं कर रहे हैं। यदि वह जा सकती हैं और प्रार्थना कर सकती है तो हमें कोई समस्या नहीं है। हमें आपकी बात भी समझ में आती है कि अदालत इस तरह के आदेश को पारित करें। हालांकि हम अपने विवेक का उपयोग कर रहे हैं और किसी भी आदेश को पारित नहीं करेंगे।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि सबरीमला की पुनर्विचार याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट के 14 नवंबर के आदेश के बाद, केरल सरकार ने मंदिर में 10-50 साल की उम्र में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगा दी है। बिंदू अम्मिनी, जो कानून की शिक्षिका हैं, ने कहा कि उन्होंने 26 नवंबर को कोच्चि शहर के पुलिस आयुक्त के कार्यालय का दौरा करने का प्रयास किया था। उन्होंने मंदिर की तीर्थयात्रा करने के लिए पुलिस सुरक्षा की मांग की। उन्होंने महाराष्ट्र की कुछ महिलाओं- तृप्ति देसाई और सरस्वती महाराज के साथ उस दिन मंदिर जाने की योजना बनाई थी।
28 सितंबर, 2018 को दिए गए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने 10-50 आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को असंवैधानिक करार देने के बाद 2 जनवरी 2019 को कनकदुर्गा नामक एक अन्य महिला के साथ बिंदू मंदिर में प्रवेश किया था। इसके बाद, दोनों ने आंदोलनकारी प्रदर्शनकारियों से जान को खतरा होने की शिकायत करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 18 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार को उन्हें “चौबीस घंटे” सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया।
अयोध्या मामले में फ़ैसला देते समय भी उच्चतम न्यायालय का ज़ोर तथ्यों पर कम और शांति क़ायम करने पर ज़्यादा था। ऐसा इसलिए भी लगता है कि विवादित परिसर पर स्वामित्व के मामले में उच्चतम न्यायालय भी उसी नतीजे पर पहुंचा था जिस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुँचा था कि पिछले कई सौ सालों से हिंदू और मुसलिम दोनों समुदायों का उस परिसर पर स्वामित्व था। लेकिन चूँकि उच्चतम न्यायालय को ‘शांति और इत्मिनान का माहौल’ क़ायम करना था, इसलिए उसने फैसले में मुस्लिम पक्ष के लिए कलमतोड़ टिप्पणियाँ किन लेकिन हिंदू पक्ष को पूरी ज़मीन दे दी,जिसने न केवल 1949 में बाबरी मस्जिद के मुख्य गुम्बद के नीचे रामलला की मूर्तियाँ रख दिन बल्कि 6दिसम्बर 1992 को जबरन विवादित ढाँचे को ध्वस्त कर दिया।
सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश, कश्मीर पर ढुलमुल रवैये,राफेल पर न्यायालय के लचर तर्कों से लेकर अयोध्या विवाद मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसलों से स्पष्ट है कि उच्चतम न्यायालय अब कानून के शासन और संविधान की अवधारणा पर कम, व्यवहारवाद और शांति व्यवस्था क़ायम करने पर अपने फैसलों में ज़्यादा बल दे रहा है।
ऐसे में सवाल यह है कि क्या संविधान और कानून के शासन की अवधारणा समाप्त हो गयी है? ऐसे में न्याय कैसे सम्भव होगा?जिस तरह सबरीमाला मामले की पुनर्विचार याचिका को 7 जजों की पीठ को संदर्भित कियाउससे सवाल उठता है कि संविधानपीठ कानून के शासन और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर फैसला करेगी या हजारों साल की आस्था पर?क्या अनुच्छेद 370 पर शुरू से उच्चतम न्यायालय राष्ट्रभक्ति मोड़ में है और जिस तरह सुनवाई चल रही है उससे लगता है यह मामला अनिश्चित काल के लिए लटकेगा। नागरिकता संशोधन क़ानून को उच्चतम न्यायालय शांति कायम करने के रूप में विचार करेगा या राष्ट्रहित मोड़ में यह अभी सामने आना बाकी है।

This post was last modified on December 17, 2019 1:26 pm

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