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न्यूज चैनलों से फैलते जहर का सुप्रीम कोर्ट ने लिया संज्ञान

बात निकली है तो फिर दूर तलक जाएगी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सच बोलने पर एक ओर उच्चतम न्यायालय प्रशांत भूषण जैसे सामजिक सरोकारों से जड़े वकील की जुबान पर अवमानना का ताला डालना चाहता हैं, तो दूसरी तरफ अर्णब गोस्वामी, अमीश देवगन और सुरेश चौह्वाणके सरीखे लोग हैं जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ऐसी पत्रकारिता परोस रहे हैं, जो समाज में सामजिक समरसता बिगाड़ने में बहुत बड़ी भूमिका निभा रही है।

अब उच्चतम न्यायालय ने  विचारों की अभिव्यक्ति में विभाजनकारी क्षमता का संज्ञान लिया है और सुदर्शन टीवी के एक शो के प्रसारण को रोकने के लिए दाखिल याचिका पर यूनियन ऑफ इंडिया, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन के साथ-साथ सुदर्शन न्यूज को नोटिस जारी करके 15 सितंबर तक जवाब तलब किया है। 

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और केएम जोसेफ की पीठ ने कहा है कि सुनवाई में यह रेखांकित किया गया है कि एक विशेष समुदाय के प्रति अपमानजनक विचारों की अभिव्यक्ति में विभाजनकारी क्षमता है और याचिका में संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा पर असर डालने वाले महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया गया है।

ऐसा करते हुए पीठ ने प्रसारण के लिए दिशा-निर्देशों को निर्धारित करने के लिए एक बड़े परिप्रेक्ष्य में इस मुद्दे की जांच करने के अपने इरादे का संकेत दिया और कहा कि प्रथम दृष्टया, याचिका संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण पर असर डालने वाले महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाती है। मुक्त भाषण और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार के साथ, न्यायालय को स्व-विनियमन के मानकों की स्थापना पर एक विचार विमर्श को बढ़ावा देने की आवश्यकता होगी। मुक्त भाषण के साथ, अन्य संवैधानिक मूल्य हैं, जिन्हें संतुलित और संरक्षित करने की आवश्यकता है, जिसमें नागरिकों के हर वर्ग के लिए समानता और निष्पक्ष उपचार का मौलिक अधिकार शामिल है।

पीठ ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता ने अनुच्छेद 32 के तहत यह याचिका दाखिल की है, इसमें भारतीय संघ, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया, न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन और सुदर्शन न्यूज टेलीविजन चैनल शामिल हैं। पीठ ने कहा कि अगली तारीख पर पीठ एक समाधान की दिशा में सहायता करने के लिए एमिकस क्यूरी की नियुक्ति पर विचार करेगी।

पीठ ने इस स्तर पर शुक्रवार को सुदर्शन टीवी के एक शो के प्रसारण को रोकने के लिए प्रसारण-पूर्व निषेधाज्ञा आदेश पारित करने से इनकार कर दिया। शो में कथित रूप से यूपीएससी में मुसलमानों के चयन को सांप्रदायिक रूप दिया जा रहा था।

पीठ ने फिरोज इकबाल खान द्वारा दाखिल याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि कोर्ट को 49 सेकंड की क्लिप के असत्यापित प्रतिलेख के आधार पर प्रसारण-पूर्व निषेधाज्ञा लागू करने से बचना होगा। न्यायालय को प्रकाशन या विचारों के प्रसारण पर पूर्व प्रतिबंध लगाने के मामलो में चौकन्ना होना चाहिए।

पीठ ने कहा कि वैधानिक प्रावधानों के तहत, सक्षम अधिकारियों को कानून के अनुपालन को सुनिश्चित करने की शक्तियों के साथ निहित किया गया है, जिसमें सामाजिक सौहार्द और सभी समुदायों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से आपराधिक कानून के प्रावधान शामिल हैं। याचिकाकर्ता ने कहा कि कार्यक्रम के दौरान विचारों का प्रसारण केबल टेलीविजन नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम 1995 के तहत नैतिकता और समाचार प्रसारण मानक विनियमों के साथ, प्रोग्राम कोड का उल्लंघन होगा।

एक अन्‍य मामले में, दिल्ली हाईकोर्ट ने सुदर्शन टीवी के शो के प्रसारण पर रोक लगा दी। छात्रों के एक समूह और जामिया मिलिया इस्लामिया के पूर्व छात्रों द्वारा दायर याचिका की तत्काल सुनवाई में जस्टिस नवीन चावला की एकल पीठ द्वारा स्थगन आदेश पारित किया गया।

दिल्ली हाईकोर्ट में, सूचना और प्रसारण मंत्रालय की ओर से पेश केंद्र सरकार के वकील ने निर्देश पर कहा कि मंत्रालय को सुदर्शन टीवी द्वारा टेलीकास्ट किए जाने के प्रस्तावित कार्यक्रम के खिलाफ कई शिकायतें मिली थीं और उसने इसे लेकर नोटिस जारी किया है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश एडवोकेट शादान फरासत ने सुदर्शन न्यूज पर ‘बिंदास बोल’ नामक कार्यक्रम के प्रस्तावित प्रसारण पर रोक लगाने की मांग की थी, जिसे 28 अगस्त के रात आठ बजे प्रसारित किया जाना था, जिसमें कथित तौर पर जामिया मिलिया इस्लामिया, इसके पूर्व छात्रों और बड़े पैमाने पर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ नफरत, हमला और उकसाने वाली सामग्री शामिल थी।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उन्होंने पत्रकार सुरेश चव्हाणके द्वारा अभिनीत शो का ट्रेलर देखा था, जिसमें श्री चव्हाणके जामिया मिलिया इस्लामिया और मुस्लिम समुदाय के छात्रों के खिलाफ अभद्र भाषा और मानहानि का खुला प्रयोग किया था। याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि शो में दावा किया जा रहा था  कि सिविल सेवा परीक्षा 2020 में जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों की सफलता ‘मुसलमानों द्वारा सिविल सेवा में घुसपैठ की साजिश’ का प्रतिनिधित्व करती है।

याचिका में यह आरोप लगाया गया था कि श्री चव्हाणके ने खुलकर ल‌क्षित गैर-मुस्लिम दर्शकों को उकसाया है कि जामिया मिलिया इस्लामिया के जिहादी या आतंकवादी जल्द ही कलेक्टर और सेक्रेटरी जैसे शक्तिशाली पदों पर आसीन होंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on August 29, 2020 9:18 pm

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