झारखंड: मजदूरी के पैसों से बनाया था बिरसा मुंडा निःशुल्क विद्यालय, प्रशासन ने चलाया बुलडोजर

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बोकारो। झारखंड के बोकारो जिले के बोकारो इस्पात नगर सेक्टर 12 और गैर-व्यवसायी एयरपोर्ट की चहारदीवारी के बीच एक स्कूल है बिरसा मुंडा निःशुल्क विद्यालय। जिसमें आज भी पढ़ते हैं इलाके के गरीब, मजदूर, दलित, आदिवासी के बच्चे। जबकि कुछ ही दूरी पर स्थित है राज्य सरकार का एक प्राथमिक विद्यालय, जहां मध्याह्न भोजन की भी व्यवस्था है, बावजूद इसके काफी संख्या में बच्चे बिरसा मुंडा विद्यालय में पढ़ने आते हैं।

60 के दशक में झारखंड (तत्कालीन बिहार) के बोकारो में जब इस्पात संयंत्र की नीव पड़ रही थी, तब देश के कई भागों से लोग रोजगार की तलाश में बोकारो (तत्कालीन माराफारी) आए। उसी दरम्यान उत्तरी बिहार, संताल, कोल्हान, छोटानागपुर आदि क्षेत्रों से आदिवासी, दलित व पिछड़े वर्ग के लोग भी आए।

उन्होंने खाली पड़ी सरकारी जमीनों पर अपना बसेरा बनाया। बोकारो इस्पात संयंत्र यानी बीएसएल कारखाना के विकास के साथ-साथ शहर का भी विकास शुरू होने लगा। इसी विकास के क्रम में दुंदीबाद नाम का एक बड़ा बाजार विकसित हुआ जो सरकारी जमीन पर ही बसता गया। इसके आस-पास की सरकारी जमीनों पर रोजगार की तलाश में आए आदिवासी, दलित व पिछड़े वर्ग के लोग भी बसते गए।

अपने बनाए बिरसा मुंडा स्कूल में परशुराम राम

इन्हीं लोगों के बीच बिहार के सिवान जिला अंतर्गत आंदर थाना के खटईला गांव के परशुराम राम राेजगार के लिए 1970 के दशक में बोकारो आये। राजमिस्त्री के साथ हेल्पर का काम करते हुए अंतत: परशुराम ने राजमिस्त्री का काम सिख लिया। 80 का दशक आते-आते वे राजमिस्त्री का काम भी करने लगे। वर्ष 1985 में बड़े भाई की मौत के बाद भाभी को जीवन संगिनी बना लिया।

उस समय मजदूरी करने वाले मजदूरों में महिला मजदूरों की संख्या अधिक होती थी, जिसे रेजा कहा जाता था। अधिकांश मजदूर आदवासी व दलित वर्ग के थे। न तो ये लोग पढ़े-लिखे थे और न ही इनमें अपने बच्चों को पढ़ाने की कोई उत्सुकता थी। ये लोग अपने साथ अपने बच्चों को भी लाते थे और अपने साथ काम करवाते थे, जिसे देख परशुराम राम को काफी नागवार गुजरता था।

शायद यही वजह रही कि परशुराम राम ने जब दलित, आदिवासी, मजदूर के बच्चों को भी अपने मां-बाप के साथ काम करते देखा, तो उनके मन में एक टीस के साथ सवाल उभरा कि ‘क्या ये बच्चे भी मजदूर ही बनेंगे?’ यह सवाल बराबर उनका पीछा करता रहा और वे अंदर ही अंदर इस सवाल से उत्पन्न समस्या का समाधान ढूंढते रहे।

बिरसा मुंडा स्कूल में परशुराम राम

अंतत: एक दिन उन्हें इसका समाधान सुझा। उन्होंने उन नौजवानों से जो अपनी पढ़ाई के साथ-साथ ट्यूशन वगैरह पढ़ाकर अपनी जीविका भी चलाते थे, को अपने भीतर की टीस के साथ उभरे सवाल से परिचय कराया। तब शुरू हुआ मजदूरों के बच्चों को शिक्षित करने का परशुराम का मिशन। वे शिक्षित नौजवान मजदूरों के बच्चों को पढ़ाने को तैयार हो गए। बदले में परशुराम ने उन्हें अपनी मजदूरी से मिले पैसे भी देते रहे।

परशुराम राम का जन्म 1952 में हुआ था। तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के कारण दलित परिवार में जन्मे परशुराम को स्कूली शिक्षा नसीब नहीं हो पायी। खेलते-कूदते कब जवान हो गए पता ही नहीं चला। मगर जब पारिवारिक स्तर से यह एहसास कराया गया कि उन्हें कमाना होगा, तब वे 1972 में रोजी-रोटी की तलाश में बोकारो आए तो यहीं के होकर रह गए।

खुद के अनपढ़ होने की उनकी अंतरपीड़ा मजदूर के बच्चों को देखकर और बढ़ गई थी। यही वजह रही कि वे अपनी कमाई का कुछ हिस्सा मजदूरों के बच्चों पर खर्च करने लगे थे।

बिरसा मुण्डा नि:शुल्क विद्यालय परिसर

नब्बे के दशक में उन्हें लगा कि उनके प्रयास से मजदूरों के बच्चे केवल साक्षर भर हो रहे हैं। उन्हें जब स्कूल की पढ़ाई और वैसी पढ़ाई का फर्क समझ में आया, तब उन्होंने 1992 में बोकारो के सेक्टर 12-ए स्थित हवाई अड्डे की बाउंड्री के पीछे एक झोपड़ी बनाकर विधिवत रूप से ”बिरसा मुण्डा नि:शुल्क विद्यालय” की शुरूआत की।

मात्र 15 बच्चों से शुरू हुए इस विद्यालय में अगस्त 2019 के पहले तब लगभग 150 बच्चे थे। इस दो दशक के बीच कई बच्चों ने यहां की निचली क्लास की पढ़ाई के बाद उच्च शिक्षा पाकर सरकारी नौकरियां भी कर रहे हैं।

परशुराम राम के इस मिशन में उनकी पत्नी पाना देवी का बड़ा सहयोग रहा है। वे धाई (प्रसव कराना) का काम करके परिवार का भरण-पोषण करती रहीं और परशुराम अपनी मजदूरी के पैसों को इन मजदूरों के बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करते रहे। परशुराम के चार बच्चे हैं, दो लड़का और दो लड़की। दोनों लड़की की शादी हो गई है, जबकि दोनों लड़के अपनी पढ़ाई पूरी करके रोजगार की तलाश के साथ साथ बिरसा विद्यालय में भी पढ़ाते हैं और बाहर के बच्चों को ट्यूशन वगैरह पढ़ाकर अपना खर्च वहन करते हैं।

बिरसा मुंडा स्कूल में पढ़ते बच्चे

स्कूल चलाने के लिए कुछ लोगों की सलाह पर परशुराम राम ने 2006 में सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट 21.1860 के तहत ‘जन कल्याण सामाजिक संस्था’ का निबंधन कराया, जिसका निबंधन संख्या—320/06-07 है। जिसमें निबंधित कार्यालय का पता झोपड़ी पट्टी सेक्टर-12/ए लिखा हुआ है। लेकिन आजतक उनकी इस संस्था को किसी भी तरह का सरकारी अनुदान नहीं मिला है।

इस बाबत परशुराम बताते हैं कि “एक बार कुछ लोगों के कहने से मैं बोकारो के डीसी से मुलकात कर विद्यालय में सहयोग करने की मांग की थी, उन्होंने अनुशंसा भी कर दी थी। मगर ऑफिस में फाइल को आगे बढ़ाने के लिये पैसों की मांग की गई। मैंने इंकार कर दिया और उसके बाद कभी भी प्रयास नहीं किया, क्योंकि मुझे एहसास हो गया कि इस भ्रष्ट सिस्टम में बिना समझौता किए कुछ नहीं हो सकता है। अत: मैंने समाज के लोगों पर ही भरोसा किया और मेरा भरोसा आज भी बरकरार है।”

परशुराम राम ने इन दलित, आदिवासी मजदूरों के बच्चों की निर्बाध पढ़ाई के लिये समाज के लोगों से सहयोग मांगना शरू किया। कुछ लोग कतराए तो कुछ ने दिल खोल कर परशुराम की मदद की। ऐसे लोगों ने स्कूल के बच्चों के लिए ड्रेस, कापी-किताब, बेंच-डेस्क, कुर्सी आदि की व्यवस्था की। कुछ ने बच्चों के लिए खिचड़ी की भी व्यवस्था की।

बिरसा मुंड़ा स्कूल में बच्चे

परशुराम राम के समर्पण को देखकर 2003 में भारतीय स्टेट बैंक की बोकारो सेक्टर-4 शाखा ने बच्चों की पढ़ाई के लिए सारी सुविधा उपलब्ध कराई। बैंक ने आठ लड़कियों को गोद लेकर उनके ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई का जिम्मा लिया था। वहीं 1997-98 में बोकारो के रितुडीह स्थित मामा होटल के संचालक रामेश्वर प्रसाद गुप्ता (अब स्वर्गीय) ने बच्चों के लिए स्कूल ड्रेस एवं उनके लिए सप्ताह में एक दिन खिचड़ी की व्यवस्था दी थी।

इस विद्यालय में अगस्त 2019 के पहले तब लगभग 150 बच्चे थे। क्योंकि पिछले 30 अगस्त 2020 को विद्यालय के पीछे अवस्थित हवाई पट्टी के विस्तारीकरण के नाम पर आसपास में बसे गरीबों की छोपड़पट्टी सहित बिरसा मुंडा नि:शुल्क विद्यालय को तोड़ दिया गया। तिनका-तिनका जोड़ कर तैयार हुआ ”बिरसा मुण्डा नि:शुल्क विद्यालय” एक झटके में बिखर गया।

जो सरकारें बिरसा और आंबेडकर की विरासत को संभालने के लिए करोड़ों खर्च करती रही हैं, उसी के करिंदों को इस विद्यालय की दीवारों पर न तो बिरसा की तस्वीर दिखी, न ही आंबेडकर की तस्वीर। सबसे अहम बात यह है कि हवाई पट्टी के विस्तारीकरण के नाम पर की गई तोड़-फोड़ के बाद विस्तारीकरण की योजना रोक दी गई है।

बिरसा मुंडा विद्यालय को बुल्डोजर से तोड़ दिया गया

इस तोड़ फोड़ के शिकार इस क्षेत्र के लगभग 300 परिवार हुए। सभी ओबीसी, दलित व आदिवासी समुदाय के हैं जो पिछले 40-50 वर्षों से यहां बसे हुए थे। इस तोड़फोड़ के बाद कुछ लोग कहीं दूसरी जगह चले गए तो कुछ लोग किसी तरह वहीं जमे रहे।

परशुराम राम ने भी जगह नहीं छोड़ी और प्लास्टिक वगैरह लगाकर विद्यालय में पढ़ाई को निरंतर जारी रखा, लेकिन बच्चों की संख्या काफी कम हो गई। आज 30-40 बच्चे रह गए हैं। लेकिन परशुराम राम के उत्साह में कोई कमी नहीं आई है। वे इस प्रयास में हैं कि बीएसएल उनके इस निःशुल्क विद्यालय के लिए कोई स्थाई जगह मुहैय्या कराए।

इस बावत उन्होंने बोकारो इस्पात संयंत्र के निदेशक प्रभारी अमरेन्द्र प्रकाश को एक पत्र देकर उजाड़े गए बिरसा मुण्डा निःशुल्क विद्यालय के पूनर्वास की मांग की है। उन्होंने अपने मांग पत्र में कहा है कि बिरसा मुण्डा निःशुल्क विद्यालय के द्वारा विगत 28 वर्षो से समाज के अंतिम पायदान पर बैठे अति गरीब, दलित, पिछड़ा वर्ग के परिवारों के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जा रही है।

बीएसएल के निदेशक प्रभारी को मांग पत्र देते परशुराम राम

पत्र में उन्होंने कहा कि विद्यालय हवाई अड्डा बोकारो की बाउण्ड्रीवाल से बहुत बाहर था। जिला प्रशासन और बीएसएल प्रबंधन के द्वारा आश्वासन मिला था कि इन गरीब बच्चों के विद्यालय को नहीं तोड़ा जाएगा। फिर भी शिक्षा के इस मंदिर पर बुलडोजर चला दिया गया। आज गरीब परिवारों के बच्चे खुले आसमान के नीचे शिक्षा ग्रहण करने को विवश हैं। अतः आग्रह है कि इन गरीब बच्चों के विद्यालय हेतु एक वैकल्पिक व्यवस्था करें, जिससे इन्हें अनवरत शिक्षा मिलती रहे।

उन्होंने कहा कि बोकारो इस्पात के बहुत सारे विद्यालय खंडहर होते जा रहे हैं और जुआरियों, नशेड़ियों का अड्डा बन गए हैं। सेक्टर-12/ए स्थित विद्यालय अगर बिरसा मुण्डा निःशुल्क विद्यालय को स्वीकृत किया जाए तो बच्चे शिक्षा भी ग्रहण करेंगे और विद्यालय भी सुरक्षित रहेगा।

इस संबंध में बोकारो इस्पात संयंत्र प्रबंधन को आरक्षित करने का निर्देश प्रदान किया जाए या बिरसा मुण्डा निःशुल्क विद्यालय जहां पर है उसे वहीं पर पुनः स्थापित करने का आदेश किया जाए, या सेक्टर-12 स्थित विभिन्न खाली स्थानों में बोकारो इस्पात प्रबंधन के द्वारा आपके निर्देशानुसार एक भूखण्ड आवंटित किया जाए, जिस पर बिरसा मुण्डा निःशुल्क विद्यालय में गरीब, दलित, पिछड़े परिवार के बच्चों को निरंतर शिक्षा प्रदान किया जा सके।

बोकारो इस्पात संयंत्र के निदेशक प्रभारी को दिया गया मांग पत्र

देखना है परशुराम राम की मांग को बीएसएल प्रबंधन कितनी गंभीरता से लेता है। वैसे वर्तमान बीएसएल के निदेशक प्रभारी अमरेन्द्र प्रकाश को सेल का चेयरमैन चयनित किया जा चुका है। मतलब ये बीएसएल में बस कुछ ही दिनों के मेहमान हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट)

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