विनोद दुआ के खिलाफ राजद्रोह हुआ रद्द, देश में छिड़ी विवादित धारा पर बहस

वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ पर फर्जी खबरें फैलाने, सार्वजनिक उपद्रव फैलाने, मानहानि करने वाली सामग्री छापने का आरोप लगाकर हिमाचल पुलिस ने राजद्रोह का मुकदमा कायम किया था जिसे उच्चतम न्यायालय ने रद्द कर दिया। विनोद दुआ के ही बहाने राजद्रोह पर सरकार की निरंकुशता एक बार फिर सामने आ गयी है और यह राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया है।  

उच्चतम न्यायालय ने हिमाचल प्रदेश में स्थानीय भाजपा नेता द्वारा पत्रकार विनोद दुआ के यूट्यूब कार्यक्रम को लेकर उनके खिलाफ राजद्रोह के आरोप में दर्ज करायी गई एफआईआर रद्द कर दी है। उच्चतम न्यायालय ने  कहा कि साल 1962 में देशद्रोह पर केदार नाथ सिंह फैसला हर पत्रकार को ऐसे आरोपों से बचाता है। अब यक्ष प्रश्न यह है कि जब 59 साल पहले दिए गये उच्चतम न्यायालय के फैसले के तहत पत्रकारों को बचाव का कवच हासिल है तो उन्हें केंद्र /राज्य सरकारों द्वारा सरकार की कारगुजारियां और ज्यादतियां उजागर करने पर देशद्रोह जैसे काले कानूनों के तहत फंसाकर उनको मानसिक/दैहिक उत्पीड़न का शिकार क्यों बनाया जाता है? क्या विनोद दुआ मामले को नज़र मानकर अब ख़बरों को लेकर पत्रकारों पर देशद्रोह जैसे काले कानून नहीं लादे जायेंगे? उच्चतम न्यायालय ने हिमाचल पुलिस और राज्य मशीनरी को इस मामले में क्या दंड दिया?

भाजपा नेता की शिकायत के आधार पर विनोद दुआ पर पिछले साल दिल्ली दंगों पर उनके शो को लेकर हिमाचल प्रदेश में राजद्रोह का आरोप लगाया गया था। उन पर फर्जी खबरें फैलाने, सार्वजनिक उपद्रव फैलाने, मानहानि करने वाली सामग्री छापने का आरोप लगाया गया था।मामले को रद्द करते हुए उच्चतम न्यायालय ने दुआ के अनुरोध को खारिज कर दिया कि 10 साल के अनुभव वाले किसी भी पत्रकार के खिलाफ तब तक कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाए जब तक कि हाईकोर्ट के जज की अध्यक्षता वाले पैनल द्वारा मंजूरी न दी जाए। जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस विनीत सरन की पीठ ने कहा कि यह विधायिका के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण होगा।

पीठ ने महत्वपूर्ण रूप से पिछले फैसले का हवाला देते हुए कहा कि हर पत्रकार को ऐसे आरोपों से संरक्षण मिला हुआ है। पीठ ने कहा, ‘देशद्रोह पर केदार नाथ सिंह के फैसले के तहत हर पत्रकार सुरक्षा का हकदार होगा। साल 1962 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहा गया है कि सरकार द्वारा किए गए किसी बदलाव या परिवर्तन के खिलाफ कड़े शब्दों का इस्तेमाल, राजद्रोह नहीं है। शीर्ष अदालत ने पहले कहा था कि दुआ को मामले के संबंध में हिमाचल प्रदेश पुलिस द्वारा पूछे गए किसी अन्य पूरक प्रश्न का उत्तर देने की आवश्यकता नहीं है।

भाजपा नेता श्याम ने शिमला जिले के कुमारसैन थाने में पिछले साल छल मई में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत दुआ के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी और पत्रकार को जांच में शामिल होने को कहा गया था। श्याम ने आरोप लगाया था कि दुआ ने अपने यूट्यूब कार्यक्रम में प्रधानमंत्री पर कुछ आरोप लगाए थे।

दुआ ने इसके खिलाफ देश की सबसे बड़ी अदालत में अपील की थी, जिस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने प्राथमिकी और कार्यवाही को रद्द कर दिया।

दरअसल राजद्रोह का मामला शुरू से ही विवादों के घेरे में रहा है। पांच साल पहले सुप्रीम कोर्ट में इसको लेकर एक अर्जी दाखिल की गई थी और राजद्रोह कानून पर सवाल उठाया गया था। तब सुप्रीम कोर्ट में आरोप लगाया गया था कि राजद्रोह से संबंधित कानून का सरकार दुरुपयोग कर रही है। याचिकाकर्ता ने तब कहा था कि संवैधानिक बेंच ने राजद्रोह मामले में व्यवस्था दे रखी है बावजूद इसके कानून का दुरुपयोग हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट में कॉमनकॉज की ओर से दाखिल अर्जी में कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट ने 1962 में केदारनाथ बनाम बिहार राज्य के मामले में जो व्यवस्था दे रखी है उसका पालन किया जाना चाहिए और इसको लेकर सरकार को निर्देश दिया जाना चाहिए।

हाल ही में 3 मार्च को उच्चतम न्यायालय में जम्मू कश्मीर के पूर्व सीएम फारुख अब्दुल्ला का मामला आया था। तब उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि सरकार से अलग मत रखना राजद्रोह नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद-370 पर जम्मू कश्मीर के पूर्व सीएम फारुख अब्दुल्ला के बयान के मामले में उनके खिलाफ दाखिल याचिका को खारिज करते हुए उक्त टिप्पणी की थी। याचिका में कहा गया था कि फारुख अब्दुल्ला ने 370 को बहाल करने का जो बयान दिया है वह राजद्रोह है और उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। 3 मार्च को इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सरकार के मत से अलग मत रखना और व्यक्त करना राजद्रोह नहीं बनता है। अदालत ने याचिकाकर्ता की अर्जी खारिज करते हुए उन पर 50 हजार रुपये का हर्जाना भी लगाया है।

14 सितंबर 2020 को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मदन बी लोकुर ने कहा था कि विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने के लिए राजद्रोह जैसे कानून का इस्तेमाल किया जा रहा है जो चिंता का विषय है। फ्रीडम ऑफ स्पीच एंड ज्यूडिशियरी विषय पर आयोजित कार्यक्रम में लोकुर ने ये बात कही थी। विचार अभिव्यक्ति के मामले में जर्नलिस्टों को जेल में डालने के मामले का हवाला दिया था और कहा था कि विचार अभिव्यक्ति के मामले में अनुमान लगाया जा रहा है और गलत संदर्भ में देखा जा रहा है जो चिंता का विषय है।

इसी तरह 1995 में बलवंत सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब केस में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि सिर्फ नारेबाजी से राजद्रोह नहीं हो सकता। कैजुअल तरीके से कोई नारेबाजी करता है तो वह राजद्रोह नहीं माना जाएगा। उक्त मामले में दो सरकारी कर्मियों ने देश के खिलाफ नारेबाजी की थी। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि नारेबाजी भर से देश को खतरा का मामला नहीं बनता। राजद्रोह तभी बनेगा जब नारेबाजी के बाद विद्रोह पैदा हो जाए और समुदाय में नफरत फैल जाए। 1959 में राम नंदर बनाम यूपी सरकार के वाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आईपीसी की धारा-124 ए को ही गैर संवैधानिक घोषित कर दिया था।

पिछले दिनों एक अन्य मामले की सुनवाई करते हुए मीडिया के खिलाफ देशद्रोह के मामले दर्ज करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर कटाक्ष करते हुए जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने पूछा कि क्या किसी समाचार चैनल के खिलाफ नदी में फेंके गए शव को दिखाने के लिए कोई देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया है? यह चुटकी स्वत: संज्ञान कोविड 19 मामले की सुनवाई के दौरान उस समय ली गई, जब एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा प्रस्तुत कर रही थीं कि शवों के सम्मानजनक दाह-संस्कार के लिए दिशानिर्देश तैयार किए जाने चाहिए।

पीठ में शामिल जस्टिस एल नागेश्वर राव ने तब कहा कि उन्होंने एक समाचार चैनल की रिपोर्ट देखी थी, जिसमें कोरोना से प्रभावित रोगियों के शवों को एक नदी में फेंके जाने के बारे में बताया गया था। इस बयान के बाद, जस्टिस चंद्रचूड़ ने टिप्पणी की कि नहीं पता कि समाचार चैनल के खिलाफ यह दिखाने के लिए राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया है या नहीं।

 स्वत: संज्ञान मामले के ठीक बाद, सुप्रीम कोर्ट ने दो तेलगू समाचार चैनल- टीवी 5 और एबीएन आंध्र ज्योति की तरफ से दायर याचिकाओं पर विचार किया। आंध्र प्रदेश पुलिस द्वारा उनके खिलाफ देशद्रोह का केस दर्ज किया है। उसी के खिलाफ यह याचिकाएं दायर की गई हैं। उच्चतम न्यायालय ने दोनों चैनलों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई पर रोक लगा दी है और जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि यह समय है कि हम देशद्रोह की सीमा को परिभाषित करें।’ कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए (देशद्रोह) और 153ए (सांप्रदायिक नफरत को बढ़ावा देना) के तहत अपराधों के दायरे को परिभाषित करने की जरूरत है, खासकर मीडिया की आजादी के संदर्भ में। राजद्रोह से संबंधित कानून की व्याख्या का ये समय है।

जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि इन दो टेलीविज़न चैनलों पर राजद्रोह का मामला लगाया जाना उनकी आवाज को दबाना है, इसके साथ ही हमें राजद्रोह की सीमा तय करनी चाहिए। उच्चतम न्यायालय के कहने का मतलब यह है कि बात बात में राजद्रोह का मामला लगाना गलत है। राजद्रोह उन्हीं मामलों में लगाया जाना चाहिए जो वाकई सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए हिंसात्मक तरीके से की गई कोशिश हो।

उच्चतम न्यायालय ने यह बात ऐसे समय कही है जब राजद्रोह के प्रावधानों का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा है और कई बार तो विरोधियों का मुँह बंद कराने या आलोचकों को डराने के लिए किया जाता है। इसे कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है।

 (वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

This post was last modified on June 3, 2021 6:13 pm

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