Saturday, October 16, 2021

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विरोध को कुचलने का हथियार बन गयी है राजद्रोह की धारा 124ए

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“प्रधानमंत्री आतंकी हमले और मौत का इस्तेमाल वोट के लिए कर रहे हैं” 

यही वो बयान है जो वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ ने अपने यूट्यूब शो में कहा था, जिसके आधार पर उन पर राजद्रोह का मुकदमा दायर किया गया था। 

ये बयान किसी भी तरह से नफरत या हिंसा फैलाने वाला नहीं था। इस बात पर देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था सुप्रीम कोर्ट ने भी अब मुहर लगा दी है। पत्रकार विनोद दुआ इस न्यायिक लड़ाई को जीत चुके हैं और निश्चित रूप से न केवल विनोद दुआ बल्कि पूरा पत्रकारिता जगत जो सरकार की गलत नीतियों और कार्यक्रमों का निर्भीकता से विरोध करने का कार्य कर रहा है, उन सबों को सुप्रीमकोर्ट के इस फ़ैसले से बेहद खुशी मिली है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले के दौरान जिस तरह की टिप्पणी की है उसे समझना बहुत आवश्यक है। मेरे अनुसार इस फैसले के बाद एक बार पुनः यह यक्ष प्रश्न हमारे सामने चुनौती के रूप में है कि आख़िर कब तक विचार और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार को कम तर करने वाले ”राजद्रोह कानून’ का दुरुपयोग करने का टूल सरकार के हाथों में सौंपें रखेंगें ? क्यों नहीं आईपीसी की धारा 124 A के ख़ात्मे पर गम्भीरता से विचार किया जाए? 

प्रश्न और भी कई सारे हैं लेकिन उन प्रश्नों की महत्ता को समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम राजद्रोह कानून की धारा 124 A के इतिहास और प्रावधानों को समझें तथा विनोद दुआ केस सहित उन सभी महत्वपूर्ण राजद्रोह के मसलों के दौरान न्यायिक व्यवस्था के द्वारा किए गए प्रावधान और उनकी टिप्पणी को समझें। 

पत्रकार विनोद दुआ के खिलाफ दायर राजद्रोह के मुकदमे को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि आलोचना का दायरा तय है और इस तय दायरे में आलोचना राजद्रोह नहीं है।

विनोद दुआ पर राजद्रोह के केस को खारिज करते हुए सुप्रीमकोर्ट ने कहा, “केदारनाथ सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह मामले की जो व्याख्या की थी उसका कड़ाई से पालन करना जरूरी है, हर पत्रकार केदारनाथ केस में दिए फैसले के तहत प्रोटेक्टेड है।”

आखिर क्या है राजद्रोह कानून की धारा 124 ए? और किन परिस्थितियों में यह लगाया जाता है?

आईपीसी की धारा 124A (राजद्रोह कानून) के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति लिखकर, बोलकर, संकेतों द्वारा, दृष्यरूपण या फिर किसी अन्य तरीके से भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ नफरत, शत्रुता या फिर अवमानना पैदा करेगा, उसको राजद्रोह का दोषी माना जाएगा। इसके लिए तीन वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है। 

राजद्रोह की धारा (IPC section 124-A) का इतिहास :

सर्वप्रथम 1837 में लॉर्ड टीबी मैकाले के नेतृत्व वाले विधि आयोग ने IPC कानून लाया, लेकिन जब 1860 में यह कानून बनकर तैयार हुआ तो इसमें राजद्रोह से जुड़ा कोई कानून नहीं था। बाद में जब वर्ष 1870 में सर जेम्स स्टीफन को अपराध से निपटने के लिए एक विशिष्ट खंड की आवश्यकता महसूस हुई तो उन्होंने आईपीसी (संशोधन) अधिनियम, 1870 के तहत धारा 124A को IPC में शामिल किया। 

भारत में राजद्रोह एक संगीन अपराध है। इसके तहत दोनों पक्षों के मध्य आपसी सुलह का भी कोई प्रावधान नहीं है। धारा 124A के अनुसार, यह एक गैर-ज़मानती अपराध है। इस धारा के तहत सज़ा तब तक नहीं दी जा सकती, जब तक कि अपराध सिद्ध न हो जाए। मुकदमे की पूरी प्रक्रिया के दौरान आरोपित व्यक्ति का पासपोर्ट ज़ब्त कर लिया जाता है। इसके अलावा वह इस दौरान कोई भी सरकारी नौकरी प्राप्त नहीं कर सकता। साथ ही उसे समय-समय पर कोर्ट में भी हाज़िर होना पड़ता है। 

आजादी से पहले के समय तक भारतीय राष्ट्रवादियों और स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ इस कानून का इस्तेमाल जमकर किया गया। अंग्रेजी सरकार क्रांतिकारियों के दमन के लिए इस कानून के तहत उन्हें जेल में डाल देती थी। इस केस का पहला प्रयोग बाल गंगाधर तिलक पर किया गया। बाल गंगाधर तिलक ने अपने समाचार पत्र केसरी में ‘देश का दुर्भाग्य’ शीर्षक से एक लेख लिखा था। इसके लिए 1908 में उन्हें धारा 124A के तहत छह साल की सजा सुनाई गई। 

1922 में अंग्रेजी सरकार ने इसी धारा के तहत महात्मा गांधी के खिलाफ केस दर्ज किया था। उन्होंने भी अंग्रेजी सरकार की आलोचना में वीकली जनरल ‘यंग इंडिया’ में लेख लिखे थे। गांधी जी ने कहा था, “आईपीसी की धारा 124A नागरिकों की स्वतंत्रता को दबाने के लिए बनाया गया कानून है।” 

उन्होंने यहां तक कहा था, “मैं जानता हूं इस कानून के तहत अब तक कई महान लोगों पर मुकदमा चलाया गया है और इसलिए मैं इसे स्वयं के लिए सम्मान के रूप में देखता हूं।” ब्रिटिश सरकार ने भगत सिंह, लाला लाजपत राय और अरविंद घोष समेत तमाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की आवाज को दबाने और आतंक कायम करने के लिए राजद्रोह कानून का जमकर दुरुपयोग किया था। 

आजादी के बाद भी इस कानून का दुरुपयोग बंद नहीं हुआ, सत्तारूढ़ सरकार ने इस कानून का इस्तेमाल करके आम नागरिकों की आवाज को दबाने का काम अक्सर किया है। आजादी के बाद राजद्रोह कानून के कई अहम मसले अदालतों तक पहुंचे और इन मामलों के दौरान देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था सुप्रीम कोर्ट की कई टिप्पणियां काफी अहम हैं। 

केदारनाथ सिंह मामला

बिहार के रहने वाले फॉरवर्ड कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य केदारनाथ सिंह पर 1962 में राज्‍य सरकार ने एक भाषण के मामले में राजद्रोह का केस दर्ज किया था। इस पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने भाषण पर रोक लगा दी थी। बाद में इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीमकोर्ट में पांच जजों की एक बेंच ने आदेश देते हुए कहा था कि ‘देशद्रोही भाषणों और अभिव्‍यक्ति में केवल तभी सजा दी जा सकती है जब उसकी वजह से किसी तरह की हिंसा, असंतोष या फिर सामाजिक असंतुष्टिकरण बढ़ा हो।” 

बलवंत सिंह बनाम पंजाब सरकार मामला

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या वाले दिन (31 अक्टूबर 1984) को चंडीगढ़ में बलवंत सिंह नाम के एक शख्स और उसके एक अन्य साथी ने मिल कर ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाए थे। सरकार ने उन पर राजद्रोह का केस दायर किया। बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में कहा था, “महज नारेबाजी करना राजद्रोह नहीं है।”  

सुप्रीम कोर्ट ने कहा,  “नारेबाजी भर से देश को खतरा का मामला नहीं बनता। राजद्रोह तभी बनेगा जब नारेबाजी के बाद विद्रोह पैदा हो जाए और समुदाय में नफरत फैल जाए।”

2008 में समाजशास्त्री आशीष नन्दी मसला

2008 में समाजशास्त्री आशीष नंदी ने गुजरात दंगों पर राज्य सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए एक लेख लिखा था। इस लेख से भड़की सरकार ने उन पर राजद्रोह का मामला दर्ज किया। इस मसले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए मामले को हास्यास्पद बताया था। 

विनायक सेन का मसला

2010 में नक्‍सल विचारधारा फैलाने के आरोप में विनायक सेन पर राजद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया। उनके साथ नारायण सान्‍याल और कोलकाता के बिजनेसमैन पीयूष गुहा को भी दोषी पाया गया था। इन्‍हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। बाद में 16 अप्रैल 2011 को सुप्रीम कोर्ट से विनायक सेन को जमानत मिल गई थी। 

कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी का मामला

मुंबई में 2011 में भ्रष्‍टाचार के खिलाफ चलाए गए एक आंदोलन के समय असीम त्रिवेदी ने एक कार्टून बनाए थे। 2012 में काटूर्निस्‍ट असीम त्रिवेदी को उनकी साइट पर संविधान से जुड़ी भद्दी और गंदी तस्‍वीरें पोस्‍ट करने की वजह से राजद्रोह कानून के तहत गिरफ्तार किया गया। 

बाद में बंबई उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अमजद सैयद की पीठ ने मामले की सुनवाई करते कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को तुच्छ आधार पर तथा बिना सोचे समझे गिरफ्तार करने के लिए मुंबई पुलिस को कड़ी फटकार लगाई और कहा, “पुलिस की इस कार्रवाई से असीम की बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन हुआ है।”

■ 2012 में तमिलनाडु सरकार ने कुडानकुलम परमाणु प्‍लांट का विरोध करने वाले सात हजार ग्रामीणों पर राजद्रोह की धाराएं लगाईं थीं। 2012 में ही अपनी मांगों को लेकर हरियाणा के हिसार में जिलाधिकारी के दफ्तर के सामने धरने पर बैठे दलितों ने मुख्यमंत्री का पुतला जलाया तो उनके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा हुआ था।

■ वर्ष 2014 में तो झारखंड में विस्थापन का विरोध कर रहे आदिवासियों पर भी राजद्रोह कानून की धारा का प्रयोग किया गया था। 

■ 2015 में गुजरात मे हार्दिक पटेल पर पाटीदारों के लिए आरक्षण की मांग करने के कारण गुजरात पुलिस की ओर से उन्हें राजद्रोह के मामले के तहत गिरफ्तार किया था। 

■  3 मार्च 2021 को अनुच्छेद-370 पर जम्मू कश्मीर के पूर्व सीएम फारुख अब्दुल्ला के बयान के मामले में उनके खिलाफ दाखिल याचिका को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सरकार से अलग मत रखना राजद्रोह नहीं है।

■ जेएनयू के छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष व कम्युनिस्ट नेता कन्हैया कुमार पर राजद्रोह का मसला काफी चर्चित मसला रहा है जो आज भी अदालत में लंबित है।

आईपीसी की धारा 124 ए का औचित्य ?

विधि के जानकारों का कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 19 (2) में पहले से अभिव्यवक्ति की स्वतंत्रता पर सीमित प्रतिबंध लागू है, ऐसे में 124A की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए । 

2018 में विधि आयोग ने ‘राजद्रोह’ विषय पर एक परामर्श पत्र में कहा था कि देश या इसके किसी पहलू की आलोचना को राजद्रोह नहीं माना जा सकता। विधि आयोग ने स्पष्ट कहा, “सरकार की आलोचना राजद्रोह नहीं है।” यह आरोप केवल उन मामलों में लगाया जा सकता है जहां हिंसा और अवैध तरीकों से सरकार को अपदस्थ करने का इरादा हो। 

अगस्त 2018 में भारत के विधि आयोग ने एक परामर्श पत्र प्रकाशित किया जिसमें सिफारिश की गई थी कि यह समय राजद्रोह से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 124A पर पुनः विचार करने और उसे निरस्त करने का है। 

परामर्श रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं-

-विधि आयोग ने अपने परामर्श पत्र में कहा है कि एक जीवंत लोकतंत्र में सरकार के प्रति असहमति और उसकी आलोचना सार्वजनिक बहस का प्रमुख मुद्दा है।

– इस संदर्भ में आयोग ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 124A, जिसके अंतर्गत राजद्रोह का प्रावधान किया गया है, पर पुनः विचार करने या उसे रद्द करने का समय आ गया है।

– आयोग ने इस बात पर विचार करते हुए कि मुक्त वाक् एवं अभिव्यक्ति का अधिकार लोकतंत्र का एक आवश्यक घटक है, के साथ “धारा 124A को हटाने या पुनर्परिभाषित करने के लिये सार्वजनिक राय आमंत्रित की जानी चाहिए।

– पत्र में कहा गया है कि भारत को राजद्रोह के कानून को क्यों बरकरार रखना चाहिए, जबकि इसकी शुरुआत अंग्रेज़ों ने भारतीयों के दमन के लिए की थी और उन्होंने अपने देश में इस कानून को समाप्त कर दिया है।

– आयोग ने कहा कि राज्य की कार्रवाइयों के प्रति असहमति की अभिव्यक्ति को राजद्रोह के रूप में नहीं माना जा सकता है। एक ऐसा विचार जो कि सरकार की नीतियों के अनुरूप नहीं है, की अभिव्यक्ति मात्र से व्यक्ति पर राजद्रोह का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। 

गौरतलब है कि अपने इतिहास की आलोचना करने और प्रतिकार करने का अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत सुरक्षित है। राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा करना आवश्यक है, लेकिन इसका दुरुपयोग स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर नियंत्रण स्थापित करने के उपकरण के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।

-आयोग ने कहा कि लोकतंत्र में एक ही पुस्तक से गीतों का गायन देश भक्ति का मापदंड नहीं है। लोगों को उनके अनुसार देश भक्ति को अभिव्यक्त करने का अधिकार होना चाहिए। 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (National Crime Records Bureau -NCRB) ने साल 2014 से राजद्रोह के केस के आंकड़े जुटाना शुरू कर दिया है। एनसीआरबी के रिकार्ड के अनुसार 2014 से 2016 के दौरान राजद्रोह के कुल 112 मामले दर्ज हुए, जिनमें करीब 179 लोगों को इस कानून के तहत गिरफ्तार किया गया, लेकिन केवल दो लोगों को ही सजा मिल पाई।

राजद्रोह के कानून को जन्म देने वाले ब्रिटेन ने खुद इंग्लैंड में 2010 में इस कानून को खत्म करते हुए कहा कि-  “दुनिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में है”

इसके अलावा आस्ट्रेलिया ने 2010 में, स्काटलैंड ने भी 2010 में, दक्षिण कोरिया ने 1988 में इंडोनेशिया ने 2007 में देशद्रोह के कानून को खत्म कर दिया। 

राजद्रोह के कानून का कई मौकों पर दुरुपयोग करने वाली कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनावों में अपने घोषणा पत्र में राजद्रोह के कानून को खत्म करने का वादा किया था, लेकिन पार्टी चुनावों में बुरी तरह हार गई और उसका वादा घोषणा-पत्र तक सिमट कर रह गया। 

हालांकि अब एक बार फिर से राजद्रोह की धारा 124-A की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई हैं, और सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब भी मांगा है।

IPC की धारा 124-A की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में मणिपुर और छत्तीसगढ़ के पत्रकार किशोरचंद्र वांग्केमचा और कन्हैयालाल शुक्ला ने संयुक्त रूप से एक रिट याचिका दायर की है, जिसमें इस धारा 124 A को असंवैधानिक बताया गया है। 

याचिका में कहा गया है कि धारा 124 A भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन है, जो कि संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(A) के तहत दिया गया है। याचिका में इस धारा को असंवैधानिक और शून्य घोषित करने की मांग की गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी इस एक रिट याचिका के आधार पर भारतीय दंड संहिता (IPC) 1860 की धारा 124-A की संवैधानिक वैधता  की जांच करने का महत्वपूर्ण फैसला किया है। जस्टिस उदय उमेश ललित, जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस के एम जोसेफ की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार को एक नोटिस जारी किया है और 12 जुलाई, 2021 तक इस पर जवाब देने को कहा है।

ऐसे अनेकों वाद हैं जिसमें न्यायालय के फैसले और टिप्पणियों के गहन अवलोकन से एक बात साथ दिखती है कि आईपीसी की धारा 124 ए की प्रासंगिकता पर गम्भीर प्रश्न चिन्ह है। 

1959 में राम नंदर बनाम यूपी सरकार के मसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तो आईपीसी की धारा-124  ए को ही गैर संवैधानिक घोषित कर दिया था।

राजद्रोह के कानून, इसके इतिहास, इससे जुड़े विभिन्न चर्चित मसलों तथा इस कानून के संदर्भ में हाईकोर्ट/सुप्रीमकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियों और विधि आयोग के परामर्श पत्र की अहम बातों को अगर एक साथ एक फ्रेम में समेट कर देखने की कोशिश की जाए तो आज यह बात बिल्कुल साफ दिखती है कि एक मजबूत लोकतंत्र में विचार और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार को सीमित करने वाली धारा 124 ए के निरसन अथवा शून्य करने का समय आ गया है, अतएवं न केवल न्यायिक व्यवस्था बल्कि सरकार को भी इस दिशा में एक ईमानदार प्रयास करने चाहिए।

वैसे भी अगर सूक्ष्मता से देखे तो ‘राजद्रोह’ का आशय राज्य की सत्ता (सरकार) से द्रोह है, और देश की सरकार से असहमति या शासक की आलोचना या उपहास कतई भी ‘देशद्रोह’ नही है। जबकि सत्तासीन सरकारें राजद्रोह के आरोपियों को देश के दुश्मन के रूप में (देशद्रोही) प्रचारित करती रही हैं। यह मानसिकता आम जनमानस को भ्रमित करने वाला और दुर्भाग्यपूर्ण है। 

इसमें कोई शक या संदेह नहीं कि राष्ट्र के खिलाफ या देश के खिलाफ कभी भी कोई कुछ करता है तो उसे माफ नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन राजद्रोह कानून के आड़ में सत्ता के द्वारा अभिव्यक्ति की आजादी के मौलिक अधिकार को कुचलने का यह सिलसिला कहां तक? राजद्रोह की इस धारा का राजनीतिक तौर पर इस्तेमाल कब तक ? 

(दयानंद विचारक और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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