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Monday, July 26, 2021

कोवैक्सीन ट्रायल में गंभीर अनियमिततायें

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पीपल्स कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज एवं अनुसंधान केंद्र में फेज-3 के कोवैक्सीन (C0VAXIN) ट्रायल के दौरान गहरी अनियमितताएं सामने आई हैं। इसी विषय को लेकर गैस पीड़ित संगठन और गैस पीड़ित और गैस प्रदूषित भूजल बस्तियों के रहवासी, जोकि इस ट्रायल में शामिल हुए हैं, उन्होंने जूम पर एक प्रेस कान्फ्रेंस में अपनी पीड़ा साझा की।

10 दिसंबर को कोवैक्सीन का ट्रायल वैक्सीन लेने वाले 38 वर्षीय जितेंद्र नरवरिया की हालत वैक्सीन लेने के बाद से ही खराब है। जितेंद्र की मां गुलाब बाई नरवरिया बताती हैं, “10 दिसंबर को मेरे बेटे को टीका लगाया गया, लेकिन हम लोगों को उसके टीके के बारे में कुछ भी नहीं पता था। 14 दिसंबर को जब उसकी हालत बिगड़ गई, हमें तब पता चला कि उसने कोरोना का टीका लगवाया है। हम घबरा गए। जिस अस्पताल में टीका लगा था, वहां इलाज से मना कर दिया गया। डॉक्टर ने कहा कुछ नहीं होगा। दूसरी जगह इलाज के लिए गए तो 450 रुपये मांगे, नहीं थे तो बिना इलाज के ही वापस आ गए। फिर मीडिया में बात पहुंच गई। अख़बार वालों ने पूछा, फोटो खींचा। अगले दिन अस्पताल से फोन आया और फिर उन लोगों ने मेरे बेटे को भर्ती कर लिया है।”

गुलाब बाई बताती हैं कि टीका लेने के पहले उसे कोई दिक्कत, कोई बीमारी नहीं थी। टीका लेने के बाद उसे सर्दी जुखाम हो गई। चक्कर आने लगा। भूख लगना बंद हो गई। कुछ खाता तो उल्टी हो जाती। उसके लीवर में दिक्कत हो गई है। उनका बेटा आरा मशीन पर काम करने वाला दिहाड़ी मजदूर है। उन्होंने बताया, “घर का वो अकेला कमाने वाला है। टीका लगने के बाद से वो बीमार पड़ा है। हम गरीबों को मारना ही था तो वैसे ही मार देते, कोरोना का टीका देकर मारने की क्या ज़रूरत थी।”

अभी टीका लगवाया तो 750 रुपये मिलेंगे, बाद में टीके के देने पड़ेंगे पैसे
70 वर्षीय मान सिंह परिहार मिस्त्री का काम करते हैं। वो बताते हैं, “उनके मोहल्ले में एक गाड़ी आई थी। गाड़ी से माइक पर चिल्ला कर कह रहे थे कि 750 रुपये मिलेंगे, कोरोना के टीके लगवा लो। बाद में पैसे देकर टीके लगवाने पड़ेंगे। मैं ये सोचकर चला गया कि आज नहीं तो कल लगवाना ही है टीका। फिर कल पैसे देकर लगवाने से बेहतर है कि आज ही लगवा लें साथ में 750 रुपये भी मिल जाएंगे।”

मान सिंह परिहार आगे बताते हैं, “उन्हें कोई बीमारी नहीं थी। 21 दिसंबर को जब मैं टीके के लिए गया तो मुझे बारी-बारी से चार कमरों में ले जाया गया। उससे पहले बीपी नापा गया। ख़ून लिया गया। गले में एक पाइप डालकर कुछ लिया गया, और फिर चौथे कमरे में टीके का इंजेक्शन लगाया गया। फिर 18 जनवरी को दूसरे टीके की तारीख बताकर भेज दिया गया। टीका लगवाकर लौटने के तीसरे दिन तबिअत बिगड़ गई। भूख लगना बंद हो गई। सर्दी जुकाम, बुखार सिर दर्द हो गया। नजदीक के दवाख़ाना में एक्सरे किया गया और दवाई ली। डेढ़ सौ रुपये देकर दूसरे डॉक्टर के पास जाकर दवा ली।”

मानसिंह परिहार कहते हैं कि टीका लगाने के बाद अस्पताल में बुकलेट देकर कहा कि बुखार हो तो इसमें लिखना, जबकि मैं पढ़ लिख नहीं सकता। बस साइन कर लेता हूं। हमें बताया कि सरकारी पैसा है (750 रुपये), सरकारी टीका है, घबराओ नहीं कुछ नहीं होगा, लेकिन अब दूसरा टीका लगवाने नहीं जाऊंगा, वर्ना वो ऊपर ही पहुंचा देंगे।” मानसिंह परिहार पूछने पर बताते हैं कि टीका लगाने के बाद अस्पताल में उनसे ये कभी नहीं कहा गया कि बीमार होना तो वापस अस्पताल आना। बस टीके लगाते वक़्त इतना बताया गया था कि इससे आपको कोरोना नहीं होगा।  

इस टीके से तंदुरुस्त हो जाओगी, कोरोना नहीं होगा
60 वर्षीय चंदा देवी आर्टिफिशियल जूलरी बेचने का काम करती हैं और वो अनपढ़ हैं। वो बताती हैं कि उन्हें मोहल्ले के लोगों ने बताया कि पीपल्स अस्पताल में कोरोना का टीका लगा रहे हैं। साथ में 750 रुपये भी दे रहे हैं, जाओ लगवा लो। 19 दिसंबर को जब वो वहां गईं तो आधार कार्ड की फोटोकॉपी जमा करवाया। फिर ख़ून लिया। बाह में पट्टा लगाया (बीपी), फिर टीके का इंजेक्शन दिया। जब मैंने पूछा ख़तरा तो नहीं है तो मुझसे कहा कि इससे आप तंदुरुस्त हो जाओगी और इससे कोरोना नहीं होगा। उन्होंने बताया कि 19 दिसंबर को टीका लगवाने के तीन दिन बाद ही चक्कर आने लगा। सांस फूलने लगी। शरीर में जलन होने लगी। कमर दर्द के मारे खड़ी नहीं हो पाती हूं। भूख लगना बंद हो गई। नींद नहीं आती। न ही आंखें बराबर खुलती हैं। टीका लेने के बाद से काम पर नहीं जा पाई हूं।

वैक्सीन लगाने के बाद बताया, कोरोना है
26-27 वर्षीय छोटू दास बैरागी बताते हैं कि एक वैन उनके मोहल्ले में एनाउंस करके गई कि बाद में लगवाओगे तो पैसे देने पड़ेंगे, अभी लगवाओगे तो पैसे मिलेंगे। 6 दिसंबर को टीका लगाने से पहले फिर मेरे ख़ून की जांच की गई। गले में पाइप डालकर जांच (RTPCR) की गई। फिर टीका लगाकर घर भेज दिया गया। दो दिन बाद फोन करके मुझे बताया गया कि मुझे कोरोना है। साथ ही मुझे भानपुर मेडिकल से दवाई खरीदने को कहा गया। कोरोना होने की जानकारी होते ही मैं 10 दिन घर परिवार से अलग रहा।  

छोटू दास बैरागी बताते हैं, “टीके के टाइम कहा था कि जो होगा दवाई करेंगे, लेकिन जब 3 जनवरी को गया तो कागज जमा करवा लिया और कहा कि अब दूसरा टीका तुम्हें नहीं लगेगा। तुम्हें टीका लगने से पहले ही कोरोना था और मुझे घर भगा दिया। मेरे भाई दीपक दास बैरागी को भी एक दिन बाद टीका लगा था। टीका लगवान के 3 दिन बाद उनकी तबिअत भी खराब हो गई। छोटूदास बैरागी बताते हैं कि जहां हमें कोरोना की वैक्सीन दी जा रही थी, वहां मैंने पूरा दिन गुजारा, लेकिन मुझे वहां टीका लगवाने आए लोगों में से ऐसा कोई व्यक्ति नहीं दिखा जो अमीर हो। सब मोहल्ले के मजदूर और दिहाड़ी करने वाले लोग ही थे।

छोटूदास बैरागी बताते हैं कि वहां एक मैडम थीं, उन्होंने बताया कि तीन महीने शारीरिक संबंध मत बनाना। छोटू दास बैरागी को पढ़ना-लिखना नहीं आता। वहां सिर्फ़ 60 वर्ष के ऊपर के लोगों का वीडियो बनाया जा रहा था। हम लोगों का वीडियो नहीं बनाया गया। छोटू दास बताते हैं कि टीका लगवाने के बाद से ही उनकी रीढ़ की हड्डी में दर्द रहता है।

नॉमिनी पूछते वक्त भी नहीं बताया गया ख़तरे के बारे में
35 वर्षीय यशोदा बाई सिलाई का काम करती हैं। यशोदा बाई बताती हैं कि 10 दिसंबर को उनके घर के पांच लोगों को वैक्सीन लगाई गई है। घर के पास ही गाड़ी एनाउंस कर रही थी। उनका परिवार एनाउंस सुनकर ही गया था। यशोदा देवी बताती हैं कि उन्हें ट्रायल के बारे में नहीं पता था। उनसे बस इतना बताया गया था टीका लगवा लोगे तो दिक्कत नहीं होगी। पूछने पर यशोदा बताती हैं कि उन लोगों का कोई वीडियो नहीं बनाया गया। यशोदा बाई, उनके पति, देवर और सास को ज्यादा दिक्कत है। पेट फूल रहा है। शरीर में जलन हो रही है। पास के स्टोर से 50 रुपये देकर चार खुराक़ दवा ले आई हैं।

इंश्योरेंस वगैरह के बारे में कुछ नहीं बताया गया था, न ही ट्रायल वैक्सीन के जोखिम के बारे में। अलबत्ता उनसे ये ज़रूर पूछा गया था कि वारिस किसे बनाना चाहती हो। यशोदा भाई बताती हैं कि वो अनपढ़ हैं बावजूद इसके उनको एक बुकलेट दी गई थी, और कहा गया था कि कोई दिक्कत हो तो इसमें लिख देना। ये पूछने पर कि तबिअत खराब होने पर आप उसी अस्पताल क्यों नहीं गईं, जहां टीका लगाया गया था? यशोदा बाई बताती हैं कि तबिअत अचानक खराब होने पर नजदीक के अस्पताल गए। वहां फिर से 50 रुपये किराया खर्च करके जाना अजीब लगा। फिर ये भी नहीं पता था कि वहां जाने पर वो लोग मिलेंगे भी कि नहीं। यशोदा को ये नहीं बताया गया कि वैक्सीन के साथ आपका बीमा भी हो रहा है, और ये कब और किन परिस्थितियों में मिलेगा, या इसका कैसे इस्तेमाल होगा। 7 जनवरी को दूसरे टीके के लिए बुलाया था, लेकिन यशोदा बाई का परिवार नहीं गया। हालांकि इस दौरान उनको दो बार कॉल किया गया।

पैसे के लालच में चला गया
57 वर्षीय मोहन साहू मूंगफली भूनने का काम करते हैं। दिन भर में सौ डेढ़ सौ रुपये की कमाई हो जाती है।  वो बताते हैं कि गाड़ी ने एनाउंस किया था कि कोरोना टीका लगवाने पर 750 रुपये मिलेंगे। वो उसी पैसे के लालच में चले गए थे। 18 दिसंबर को उनको टीका लगाया गया और अगले टीके के लिए 15 जनवरी को बुलाया गया। वो बताते हैं कि उन्हें पहले कोई बीमारी नहीं थी, लेकिन टीके के बाद उनकी सांस फूल रही है। मोहन साहू बताते हैं कि वो अनपढ़ हैं। उनको एक कागज देकर छोड़ दिया गया। कहा गया पढ़ लो ठीक से। रतन लाल गोतिया बताते हैं कि गाड़ी का एनाउंस सुनकर ही टीका लगवाने गए थे। वो कह रहे थे जेपी नगर वालों, पीपल्स अस्पताल आइए। जांच करके कोरोना का टीका लगेगा, 750 रुपये भी मिलेगा।

रतन लाल बताते हैं कि उन्हें घुटने में तकलीफ होती थी, वो उन्होंने बताया था। 14 दिसंबर को उनको टीका लगा फिर 11 जनवरी को दोबारा आने को कह कर घर भेज दिया। रतन लाल बताते हैं कि वो कुल 5-6 घंटे अस्पताल में रहे। एक ही दिन में सब कुछ हो गया। रतन लाल अशिक्षित हैं और उनके पास मोबाइल नहीं है। उन्होंने अपने बेटे का मोबाइल नंबर लिखवाया था। उस पर दो बार कॉल आया था, अस्पताल वालों का।

गैस कांड पीड़ितों की बस्ती में ट्रायल की अनुमति ही क्यों दी गई
भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन की रचना ढींगरा ने बताया कि गैस पीड़ितों और संक्रमित जल क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले शंकरनगर, उड़िया बस्ती, गरीबनगर और जेपी बस्ती के कुल 1750 लोगों को ट्रायल वैक्सीन लगाया गया है। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को न्यूरोलॉजिकल, हॉर्मोनल, इंटेस्टीनल कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं रहती हैं। ऐसे में इन लोगों पर वैक्सीन ट्रायल की अनुमति कैसे दी गई? यहां बस्तियों के कई घरों के सभी लोगों को ट्रायल वैक्सीन लगाई गई है। कोरोना काल में भोपाल में कोविड-19 से भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ित लोगों की मृत्यु दर अन्य लोगों से करीब 6.5 गुना ज्यादा है। दो दिसंबर तक कोविड-19 से भोपाल जिले में कुल 518 लोगों की मौत हुई है, जिनमें से मात्र 102 लोग भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ित थे।

गैस पीड़ित महिला पुरुष संघर्ष मोर्चा की शहजादी बी कहती हैं, “हमने प्रधानमंत्री कार्यालय और रसायन मंत्रालय को पत्र लिखा है कि बिना लोगों को बताए जो ट्रायल हो रहा है, उससे लोगों को परेशानी हो रही है। 750 रुपये का लालच दे कर लोगों को वैक्सीन ट्रायल में शामिल किया जा रहा है। साल 2010 में भी ऐसे ही भोपाल मेमोरियल अस्पताल में गैस पीड़ितों पर क्लिनिकल ट्रायल किया गया था, जिससे 13 लोगों की मौत हो गई थी, लेकिन उस मामले में भी कोई कार्रवाई नहीं हुई थी। यही कारण है कि जो भी ट्रायल करना होता है, कंपनियां भोपाल गैस पीड़ितों पर करने चली आती हैं। भोपाल गैस त्रासदी के संक्रमित जल क्षेत्रों में रहने वाले 1700 लोगों को इस कोवैक्सीन के ट्रायल में शामिल किया गया है।” कांसेंट लेटर कहता है कि आप क्लिनिकल ट्रॉयल के लिए जाओ तो पहले परिवार से बात करो फिर आओ, पर कुछ भी फॉलो नहीं किया गया। अधिकांश प्रतिभागियों की कोई रिकॉर्डिंग फॉलोअप नहीं है।

अनंत ने कहा, “ लोगो को कांसेट फॉर्म की कॉपी नहीं दी गई। फॉलोअप ट्रीटमेंट नहीं दिया गया। उनका प्रॉपर डेटा नहीं बनाया गया। रिक्रूटमेंट, एडवर्टाइजमेंट, क्लिनिकल ट्रीटमेंट ऑफ पार्टिसिपेंट, डेटा कलेक्शन सब में भारी लापरवाही हुई है। नेशनल गाइड लाइंस का प्रॉपर पालन तक नहीं हुआ है। ICMR इस क्लिनिकल ट्रायल का कोस्पांसर है।

क्लिनिकल रिसर्च आर्गेनाइजेशन द्वारा किए गए इस छोटे पैमाने के ट्रायल पर जब इतनी दिक्कत है तो बड़े पैमाने पर जब इसका इस्तेमाल वैक्सिनेशन के लिए होगा, तो कितने लोगों की दिक्कतें होंगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। कोवैक्सीन के ट्रायल में जो ऑडियो-विजुअल किए गए हैं, उनका ऑडिट किया जाए। क्लिनिकल ट्रायल में एथिक्स का वायलेशन हुआ है। लीगल वायलेशन भी हुआ है। हमें ये भी देखना होगा कि कैसे एक नया प्राइवेट अस्पताल, जिसे वैक्सीन ट्रायल का अनुभव नहीं है, वो 1700 लोगों को जुटाकर उन पर वैक्सीन ट्रायल कर लेता है और सरकारी अस्पताल जिसे अनुभव है, उसे 100 लोगो को वैक्सीन ट्रायल के लिए जुटाने भारी हो जाते हैं।”

प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान कोवैक्सीन ट्रायल में भाग लेने वाले इन लोगों से पूछा गया कि आप लोगों के मन में क्या एक बार भी ये सवाल नहीं आया कि कभी किसी वैक्सीन या टीके के लिए पैसे नहीं मिलते हैं। फिर इस कोरोना वैक्सीन के लिए पैसे क्यों दिए जा रहे हैं। अधिकांश प्रतिभागियों ने का जवाब नहीं में था। कुछ ने कहा कि हमने सोचा शायद सारा दिन अपना काम छोड़कर हम वहां टीका लगवाने जा रहे हैं शायद इसलिए दिया जा रहा है। इनमें से अधिकांश प्रतिभागियों ने बताया कि अब वो दूसरे टीके के लिए नहीं जाना चाहते। अधिकांश प्रतिभागियों ने एक स्वर में बताया कि उनसे ये नहीं बताया गया था कि कोरोना वैक्सीन का टेस्ट उन पर किया जा रहा है। 

वहीं वैक्सीन ट्रायल में भाग लेने वाले प्रतिभागियों के इलाज और उनके फॉलोअप की जिम्मेदारी किसकी है, ये जानने के लिए रचना ढींगरा के संस्थान ने प्रिंसिपल इन्वेस्टीगेटर से संपर्क किया तो उन्होंने बात करने से मना कर दिया, जबकि एथिक्स कमेटी का कोई संपर्क सूत्र ही नहीं मिला।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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