कश्मीर, उसकी विरासत और संविधान को अपमानित करने वालों को शर्म करना चाहिए: यूसुफ तारिगामी

0
637

“भारत के स्वतन्त्रता आंदोलन, उसके हासिल संविधान और सारी मुश्किलों को झेल कर भारत को अपना वतन चुनने वाले जम्मू कश्मीर के अवाम को अपमानित करके 05 अगस्त 2019 को कश्मीर से राज्य का दर्जा छीनकर उसे तीन टुकड़ों में बांटने वाली केंद्र सरकार को अपने आचरण पर शर्म करनी चाहिए और देश की जनता को जवाब देना चाहिए कि पिछली दो वर्षों में कश्मीरियों सहित किसी को भी क्या हासिल हुआ है।” जम्मू कश्मीर की भंग विधानसभा के सदस्य मोहम्मद यूसुफ तारिगामी ने मोदी सरकार से इस बारे में एक श्वेत पत्र जारी कर संसद और पूरे मुल्क को उन वादों पर हुए अमल की हालत बताने की मांग की जो उसने इस खूबसूरत प्रदेश को जेलखाना बनाने के बाद देश की जनता से किये थे। इस श्वेतपत्र में सरकार को बताना चाहिए कि दहशतगर्दी का क्या हुआ ? विकास और रोजगार देने और भ्रष्टाचार रोकने के लिए क्या किया गया, लोगों की जिंदगी में क्या सुधार हुआ। तारिगामी ने एक दिन पहले संसद में दिए गृह राज्य मंत्री के उत्तर का हवाला देते हुए पूछा कि जिस सामान्य स्थिति के आने के बाद राज्य का दर्जा बहाल करने की बात वे कर रहे हैं वह सामान्य स्थिति कब और कैसे आएगी ?

शैलेन्द्र शैली स्मृति व्याख्यानमाला 2021 में “कश्मीर के साथ विश्वासघात और उसके बाद” विषय पर दिए अपने व्याख्यान में उन्होंने कहा कि 05 अगस्त 2019 को जो हुआ उसका आतंकवाद ख़त्म करने, विकास करने या अवाम को राहत देने से कोई वास्ता नहीं था। यह कदम नंगे रूप में तानाशाही कायम करने के लिए उठाया गया था। उन्होंने कहा कि देश ने तो महामारी और सरकार की नाकामी की वजह से दो लॉकडाउन भुगते, कश्मीर तो लगातार क्रैकडाउन भुगत रहा है। बंदिशों पर बंदिशें हैं। रोजगार मिलने की बजाय खत्म हो रहे हैं। इंटरनेट और टेलीफोन बंद होने का असर छात्र-छात्राओं की पढ़ाई पर पड़ा है। छोटे दुकानदार और व्यापारी तबाह हो रहे हैं।  जम्मू के नागरिक भी अपनी जमीन और रोजगार के छिनने और व्यापार सिकुड़ने की वजह से परेशानहाल है।  सरकार को बताना चाहिए कि उसके वायदे और दावे कहाँ तक पहुंचे हैं। 

यूसुफ तारिगामी ने बताया कि इसी महीने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा बुलाई मीटिंग में वे उनसे साफ़ शब्दों में कहकर आये थे कि ”कश्मीरियों को बार-बार देशभक्ति का पाठ मत पढ़ाइये। “ये कश्मीरी थे जिन्होंने सीमावर्ती और मुस्लिम आबादी की बहुलता के बावजूद मुस्लिम पाकिस्तान का हिस्सा बनना और अलग देश बनने का महाराजा हरीसिंह का इरादा दोनों को ठुकराया था और धर्मनिरपेक्ष भारत चुना था। भारत की सेनाएं तो बाद में पहुँची थीं – पाकिस्तानी शह पर बारामुला तक पहुँच गए कबायलियों के हमलों का कश्मीरियों ने खुद अपने दम पर मुकाबला किया था। कश्मीरियों ने भारत चुना था क्योंकि उनकी परम्परा साथ रहने की थी, धर्मनिरपेक्षता की थी। तारिगामी ने हुक्मरानों को सलाह दी कि कभी कभार इतिहास की किताबें भी पढ़ लिया करें। विभाजन के बाद जब बंगाल और पंजाब की सीमाएं लहूलुहान थी। लाखों लोग मारे जा रहे थे।  यहां तक कि कुछ उन्मादियों ने जम्मू में भी दंगा भड़का दिया था ठीक उस समय कश्मीर की वादी में पूरी तरह अमन था। मुसलमान कश्मीरी और कश्मीरी पंडित शान्ति और भाईचारे के साथ रह रहे थे। बाद के दिनों में जो घटनाएं घटीं भी उनमें कश्मीरी नहीं थे – वे सीमापार की साजिशें थीं। 

उन्होंने कहा कि भारत के साथ कश्मीर के मेल की बुनियाद साझी विरासत है जिसका धागा भाईचारा, संघीय ढांचा और वह विविधता जो समस्या नहीं है हमारे देश की शक्ति और सम्पदा है। सबसे बड़ी विरासत है उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष जिसकी निरंतरता को बनाये रखने के लिए भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, अशफाकुल्ला खान जैसे अनगिनत युवाओं और भारतीयों ने शहादतें दीं। 

धारा 370 को लेकर आरएसएस और भाजपा द्वारा फैलाये गए झूठों का खंडन करते हुए यूसुफ तारिगामी ने कहा कि यह आजाद भारत के नेतृत्व की साझी समझदारी थी। सरदार पटेल के घर में नेहरू और शेख अब्दुल्ला के साथ हुयी मीटिंग में इस बारे में सहमति बनी थी और पटेल ने ही इसे संविधान सभा में रखा था। उन्होंने याद दिलाया कि संस्कृति और जीवन शैली को विशेष संरक्षण देने वाली धारा 370 अकेली नहीं है – भारत के संविधान में इसी तरह की धारा 371 भी है। मगर आरएसएस ने साम्प्रदायिक इरादे से इसे तूल देकर देश को गुमराह किया है। तारिगामी ने बताया कि किसी बाहरी आदमी के जमीन खरीदने या नौकरी पाने पर लगी रोक कश्मीरी पंडितों और डोगरों के आंदोलन का परिणाम थी और खुद महाराजा हरीसिंह के जमाने में यह आदेश जारी किया। हालांकि आजादी के बाद से ही देश की सरकारों ने इसमें दी गयी स्वायत्तता का उल्लंघन किया। चुनी हुयी सरकार को बर्खास्त करके शेख अब्दुल्ला 1953 में ही गिरफ्तार कर लिए गए। कश्मीर की जनता को तो लोकतांत्रिक तरीके से वोट डालने और सरकार चुनने तक का अधिकार नहीं मिला। कश्मीरी अवाम ने 1977 में पहली बार निष्पक्ष चुनाव देखे थे।

कश्मीर मोदी सरकार की घोर अलोकतान्त्रिकता और असंवैधानिकता का उदाहरण है; तेलंगाना, उत्तराखंड, झारखंड बनते समय जनता में बहसें हुयीं, इन राज्यों की विधान सभाओं में चर्चाएं हुयीं, प्रस्ताव पारित किये गए मगर जम्मू कश्मीर के तीन टुकड़े कर उससे राज्य का अधिकार तक बिना किसी संवैधानिक प्रक्रिया के छीन लिया गया। उन्होंने बताया कि  2003 में आरएसएस ने जब जम्मू कश्मीर लद्दाख के तीन टुकड़ों का प्रस्ताव पारित किया था तब सीपीएम विधायक के रूप खुद तारिगामी द्वारा रखे प्रस्ताव को मंजूर कर जम्मू कश्मीर विधान सभा ने सर्वसम्मति से इसे खारिज कर दिया था। मगर भाजपा तो संविधान और सारी संवैधानिक संस्थाओं को नष्ट-भ्रष्ट करने पर आमादा है ताकि तानाशाही लाई जा सके। इसने पूरे देश के लोकतांत्रिक समाज, संविधान और कश्मीरी अवाम को अपमानित किया है। उन कश्मीरियों को अलग थलग किया है जिन्होंने लगातार पृथकतावादी ताकतों और सीमापार आतंकवाद के खिलाफ मुहिम चलाई और उनके हमलों में अपने परिवारजनों को खोया। 

देश की स्थिति पर बोलते हुए सीपीएम केंद्रीय समिति सदस्य तारिगामी ने कहा कि कोरोना से पहले ही रोजगार घट रहा था। लगातार निजीकरण हो रहा है। आम जनता की खरीदने की क्षमता घट रही है, वहीं मोदी के नजदीकियों के मुनाफों के पहाड़ खड़े हो रहे हैं। इस देश को आजाद कराने वालों ने शहादतें इसलिए नहीं दी थीं कि देसी विदेशी मगरमच्छ इसे हड़पने के लिए झपटें। उन्होंने कहा कि खतरा सिर्फ कश्मीर को नहीं है पूरे देश को है और इस खतरे के खिलाफ कश्मीर से कन्याकुमारी तक मिलकर साथ साथ लड़ा जाएगा। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, आदिवासी, ओबीसी, दलित सब मिलकर आवाज उठाएंगे। जाहिर है कुछ रुकावटें आएंगी – हुक्मरान डर पैदा करने की कोशिश करेंगे। मगर मेहनतकश जनता डरेगी नहीं। कल के सपने देखना और उनकी तामीर के लिए आगे बढ़ने का सिलसिला जारी रहेगा।

व्याख्यान की शुरुआत में उन्होंने कामरेड शैलेन्द्र शैली के साथ सीपीएम केंद्रीय समिति सदस्य तथा एक अच्छे दोस्त के रूप में अपने संबंधों को याद किया तथा उन्हें श्रद्धांजलि दी। 

(शैली स्मृति व्याख्यान द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित)