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सड़क से संसद तक गूंजना चाहिए रोजगार का नारा

छात्रों-नौजवानों के रोजगार आंदोलन का पुरजोर समर्थन करिये!

यह देश की भावी पीढ़ी के भविष्य को बचाने की लड़ाई है !

यह देश को बचाने की लड़ाई है !

आज यही उचित समय है जब सब के लिए रोजगार का नारा देश में सड़क से संसद तक गूँजना चाहिए और रोजगार के अधिकार को संविधान के मौलिक अधिकार के बतौर स्वीकृति दिलाने के लिए बड़ा जनांदोलन खड़ा होना चाहिए।

अब तो भांडा फूट चुका है।सरकार ने छिपाने की बहुत कोशिश की लेकिन truth इतना compelling है कि वह सात पर्दों के भीतर से फाड़कर बाहर निकल आया है। -23% विकास दर के रसातल में पहुंची अर्थव्यवस्था अपने साथ अभूतपूर्व बेरोजगारी की महात्रासदी ले आयी है।

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर के अनुसार, केंद्र सरकार के job पोर्टल पर 40 दिनों में 69 लाख बेरोजगारों ने रजिस्टर किया जिसमें काम मिला मात्र 7700 को अर्थात .1% लोगों को यानी 1000 में 1 आदमी को।

केवल 14 से 21 अगस्त के बीच 1 सप्ताह में 7 लाख लोगों ने रजिस्टर किया जिसमें मात्र 691 लोगों को काम मिला, जो .1% यानी 1000 में 1 से भी कम है। अपनी अतिमहत्वाकांक्षी आत्मनिर्भर योजना के तहत प्रधानमंत्री ने 11 जुलाई को यह पोर्टल लांच किया था।

हाल ही में CMIE की ताजा रिपोर्ट में बताया गया कि मार्च से जुलाई के बीच देश में 1.9 करोड़ वेतनभोगियों की नौकरी चली गयी है। जुलाई में 50 लाख नौकरियां गयीं, यही अनुमान अगस्त के बारे में है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि हालात अभी और बुरे होंगे।

बेरोजगारी दर 9.1% पहुँच गयी है। यह अभूतपूर्व है। आज़ाद भारत में इतनी ऊँची बेरोजगारी दर कभी नहीं रही। दुनिया के सबसे क्रूर और बिना सोचे-विचारे, बिना योजना के लागू किये गए लॉकडाउन के फलस्वरूप एक समय तो यह बेरोजगारी दर 26 % के अकल्पनीय स्तर पर पहुँच गयी थी, 14 करोड़ लोग सड़क पर आ गए थे।लॉकडाउन खुलने के बावजूद वेतनभोगी नौकरियां जो गयीं, सो गयीं। फिर उनका मिलना असम्भव हो गया। इसीलिए, इस मोर्चे पर स्थिति लगातार बद से बदतर होती जा रही है ।

सरकार  की ओर से यह भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही है कि बेरोजगारी का संकट महामारी की वजह से है और यह तो एक वैश्विक समस्या है। सच्चाई यह है कि CMIE के अनुसार वेतन भोगी जॉब लंबे समय से बढ़ नहीं रहे थे। पिछले 3 साल से वह 8 से 9 करोड़ के बीच गतिरुद्ध था। 2019-20 में यह 8.6 करोड़ था जो लॉकडाउन के बाद 21% गिरकर अप्रैल में 6.8 करोड़ पर आ गया और अब जुलाई के अंत तक और गिरकर 6.72 करोड़ तक आ गया है।

दिहाड़ी मजदूरी के 68 लाख कामगार वापस नहीं आ पाए हैं और बिजनेस में 1 लाख।

बेरोजगारी की विराट आपदा का हल निकालने में नाकाम और अपनी नीतियों से इस संकट को और गहरा कर रही मोदी सरकार इसे स्वीकार करने को ही तैयार नहीं है। वह सच्चाई को छिपाने और तरह-तरह के हथकंडों से युवाओं का और पूरे देश का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है।

दरअसल लंबे समय से सरकार ने बेरोजगारी से सम्बंधित आंकड़े प्रकाशित करना ही बंद कर दिया है। इसी सवाल पर राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के दो सदस्यों पी सी मोहनन और जे वी मीनाक्षी ने आयोग से इस्तीफा दे दिया था। ठीक इसी तरह NSSO ने जब मंदी की व्यापकता से सम्बन्धित आंकड़े सार्वजनिक किए जो अर्थव्यवस्था की खस्ताहाल सच्चाई बयान कर रहे थे, तो सरकार ने NSSO को ही खत्म कर दिया ।

प्रधानमंत्री अर्थव्यवस्था और रोजगार की मनगढ़ंत सुहानी पिक्चर पेश करते हैं, उप्र के मुख्यमंत्री योगी बीच-बीच में कपोल कल्पित करोड़ों नौकरियां देने की घोषणाएं करते हैं, कुछ-कुछ नौकरियों के विज्ञापन निकाले जाते हैं, बेरोजगारों से फार्म भरने के नाम करोड़ों वसूल किया जाता है, फिर लंबे समय तक चुप्पी रहती है, हो-हल्ला होने पर अनेक स्तरीय परीक्षाओं में से कुछ-कुछ होती हैं, फिर रिजल्ट सालों लटका रहता है, रिजल्ट किसी तरह निकला भी तो कोई न कोई मुकदमा हो जाता है और फिर लंबे समय के लिए छुट्टी !

उत्तर प्रदेश में तमाम विभागों में लाखों पद खाली पड़े हैं उन्हें भरा नहीं जा रहा है। उनके साढ़े 3 साल के कार्यकाल में दर्जनों नौकरियों के लिए फार्म भरने के बाद अपवादस्वरूप ही कहीं-कहीं भर्ती प्रक्रिया अंजाम तक पहुंच पाई है।

बेरोजगारी की चरम हताशा में नौजवान अवसादग्रस्त हो रहे हैं और बड़े पैमाने पर खुदकुशी की घटनाएं सामने आ रही हैं। पिछले दिनों अलवर में 4 युवा दोस्तों ने यह कहते हुए कि नौकरी तो मिलनी नहीं है, ट्रेन के आगे छलांग लगा लिया। यही बेरोजगार नौजवान फासीवादी विचारों के शिकार बनकर उनके हथियारबंद दस्तों का भी काम करते हैं।

आज पूरी युवा पीढ़ी को बेरोजगारी की महा आपदा से बचाने के लिए, अवसाद और फासीवाद का शिकार होने से बचाने के लिए बड़े जनांदोलन की जरूरत है।

आज यही उचित समय है जब सब के लिए रोजगार का नारा देश में सड़क से संसद तक गूँजना चाहिए और रोजगार के अधिकार को संविधान के मौलिक अधिकार के बतौर स्वीकृति दिलाने के लिए बड़ा जनांदोलन खड़ा होना चाहिए।

गांधी जी के विशेष आग्रह पर रोजगार का अधिकार शामिल ज़रूर किया गया हमारे संविधान में, लेकिन नीति निर्देशक सिद्धान्तों में, उसे मौलिक अधिकार का दर्जा नहीं मिल सका।

1989 में जब जनता दल की सरकार बनी, राष्ट्रपति के अभिभाषण में एलान हुआ कि सरकार रोजगार के मौलिक अधिकार के लिए बिल ले आएगी। लेकिन वह वायदा आज भी अधूरा है।

संविधान में प्रदत्त जीवन के अधिकार की आधारशिला है रोजगार का अधिकार। अब समय आ गया है कि यह राष्ट्रीय क्षितिज पर सर्वप्रमुख राजनैतिक मुद्दा बने।

(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। आजकल आप लखनऊ में रहते हैं।)

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This post was last modified on September 4, 2020 8:26 am

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