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मजदूरों की घर वापसी : सोनिया गांधी के मास्टर स्ट्रोक से भाजपा तिलमिलाई

देश भर में लाखों की तादाद में मजदूर अपने घर जाने की जद्दोजहद में बेबस लाचार भटक रहे हैं। केन्द्र और राज्य सरकारें उनकी घर वापसी का खर्च उठाने के नाम पर पिछले डेढ़ माह से एक दूसरे के सर ठीकरा फोड़ने का खेल खेलते रहे। आखिरकार कॉंग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने सभी मजदूरों के घर पहुंचने का खर्च कॉंग्रेस द्वारा वहन किए जाने की घोषणा कर राजनीति से ऊपर उठकर एक बड़े दिल और सहानुभूति का सशक्त उदाहरण पेश किया। हद देखिए कि सोनिया गांधी की घोषणा के बाद भारतीय जनता पार्टी पैसे वसूलने की ख़बर को ही झूठ बताने में लग गयी । इस प्रयास में भाजपा एक तरह से बेबस मजदूरों को ही झूठा साबित कर रही है, जबकि हर जगह मज़दूर टिकटें दिखा रहे हैं। 

सोनिया गाँधी ने जैसे ही प्रवासी मज़दूरों का ट्रेन किराया कांग्रेस द्वारा देने की घोषणा की, केंद्र सरकार और सकते में आ गई और भारतीय जनता पार्टी तिलमिला उठी। सोनिया गाँधी ने ठीक ही कहा कि सौ करोड़ रुपए एक दिन में केवल ट्रम्प की अगवानी पर ख़र्च किए जा सकते हैं मगर देश का निर्माण करने वाले लोगों पर नहीं।

उनकी इस घोषणा के बाद तो मानो सभी दलों और सरकारों में मजदूरों का खर्चा उठाने की होड़ सी लग गई । बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष तेजस्वी यादव ने भी ऐलान कर दिया है कि बिहार के लोगों को लाने के लिए उनकी पार्टी भी ट्रेनों का ख़र्च उठाएगी तो अपना राजनीतिक नुक़सान देखते हुए नीतीश कुमार भी यात्रा का ख़र्च उठाने के लिए तैयार हो गए और बोनस के तौर पर एक हज़ार रुपया भी देने की बात जोड़ दी ।

सीपीएम के सीताराम येचुरी की टिप्पणी भी ग़ौर करने लायक है कि पहले कुछ मौकों पर विदेशों से लोगों को फ्लाइट से मुफ़्त लाया गया और यह घोषणा सरकार की ओर से संसद में की जा चुकी है। ज़ाहिर है कि वह ख़र्च रेलवे के इस ख़र्च से कहीं ज़्यादा रहा होगा, मगर मज़दूरों पर ख़र्च करना सरकार को चुभ रहा था। वास्तव में सरकार का यह रवैया बताता है कि उसके मानदंड दोहरे हैं। एक अमीरों के लिए हैं दूसरे ग़रीब मज़दूरों के लिए। हालांकि इस बार कोरोना संकट से विदेशों में फंसे भारतीयों को वापस लाने के लिए सरकार भुगतान आधारित योजना पेश की है ।

मामले को तूल पकड़ता देख अब रेल मंत्री कह रहे हैं कि पचासी फ़ीसदी किराया उनका मंत्रालय वहन कर रहा है और केवल पंद्रह फ़ीसदी किराया राज्यों को देना है। इस हिस्सेदारी का विवरण उसने पहले नहीं दिया था। यानि जब गर्दन फंसने लगी तो और चारों तरफ़ से आरोप लगने शुरू हो गए तो उसने यह कहानी गढ़ ली। रेलवे ने बयान जारी कर दिया कि हमने कभी ट्रेन के किराए की बात ही नहीं की जो हास्यास्पद से ज्यादा झूठी और शर्मनाक है।

पहले से ही तमाम मीडिया में आता रहा कि रेलवे ने स्पष्ट रूप से किराया लेने की बात की थी । मज़दूरों को उनके प्रदेशों में पहुँचाने का कुल ख़र्च सौ करोड़ रुपए आएगा। ये रेलवे मंत्रालय का ही दिया हुआ आँकड़ा है। सब जानते हैं कि पिछले पाँच साल में रेलवे ने बेतहाशा किराया बढ़ाया है और अंधाधुंध कमाई की है। क्या वह ऐसी मुसीबत के समय में मुसीबत के मारे मज़दूरों पर सौ करोड़ ख़र्च नहीं कर सकता था ? ज़रूर कर सकता था। और विडंबना देखिए कि मजदूरों के रेल किराया भर पाने में असमर्थता जताने वाले रेलवे ने इस बीच 151 करोड़ की राशि पीएम केयर्स को दान में दे दी ।

ये वही मज़दूर हैं जो चालीस दिनों से बिना काम धंधे के अपने ठिकानों में बंद थे और ज़ाहिर है कि उनकी जमा पूँजी भी ख़त्म हो रही होगी। वे बिल्कुल निचोड़े जा चुके हैं। फिर वे वापस घर जा रहे हैं जहाँ उनके पास हाल फिलहाल न तो कोई रोज़गार होगा न जीविका चलाने का कोई और साधन ।

तमाम राजनीति के दांव पेंचों में उलझे मजदूरों को घर वापसी की मदद के लिए इससे पहले कोई सामने नहीं आया। यहां तक कि हर साल 1 मई को दुनिया के मजदूर एक हो का नारा लगाने वाले देश के तमाम ट्रेड यूनियन भी सड़कों पर भटकते अपने मजदूर साथियों के लिए आगे नहीं आए। जिस रेल से वे घर पहुंच सकते थे उस रेलवे का ट्रेड यूनियन देश के सबसे बड़ी यूनियनों में एक है, जिसके कई धड़ों में बंटे होने के बावजूद सभी संगठनों की कुल सदस्य संख्या लगभग 15 लाख है।

मगर रेलवे ट्रेड यूनियन एक बार भी अपने इन बेबस लाचार मजदूरों के लिए, जो आखिर हैं तो उन्हीं के साथी, उनकी मदद के लिए पहल करने की आवश्यकता नहीं समझी। क्या रेलवे ट्रेड यूनियन के सदस्य अपनी एक दिन की तनख्वाह अपने इन मजदूर साथियों की घर वापसी के लिए नहीं दे सकते थे? यदि वो ऐसा कर देते तो न सिर्फ एक बेमिसाल नज़ीर पेश करते बल्कि 1 मई को मजदूर दिवस को सार्थक कर देते जो  सच्ची श्रद्धांजलि भी कही जाती। मगर हमारे ट्रेड यूनियन के पैमाने पर ये दिहाड़ी मजदूर कहीं फिट ही नहीं बैठते ।

सोनिया गांधी के एक मास्टर स्ट्रोक से केंद्र सरकार की श्रमिकों के प्रति खोखली संवेदनशीलता और झूठी सहानुभूति की परतें उधड़ कर जनता के सामने नंगी हो गईं। आज केन्द्र सरकार बैक फुट पर है मगर अपनी गलती मानने की जगह बौखला गई है और अनाप-शनाप आधारहीन तर्क पेश कर सफाई देने में लगी है। केन्द्र सरकार और भाजपा का उद्देश्य न सिर्फ सोनिया गांधी को श्रेय लेने से रोकना बल्कि उनकी नेकनीयत पहल को दिखावटी और मौकापरस्त बताकर अपनी छवि सुधारना है। सोनिया गांधी की इस पहल से एक अच्छी बात तो हुई कि अब मजदूरों की घर वापसी मुफ्त हो सकेगी।

(जीवेश चौबे कवि, कथाकार एवं कानपुर से प्रकाशित वैचारिक पत्रिका अकार में उप संपादक हैं। समसामयिक मुद्दों पर लगातार लिखते रहते हैं।)

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This post was last modified on May 6, 2020 8:16 am

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