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सौरव गांगुली रिटायर्ड हर्ट, रजनीकांत राजनीति से आउट

बंगाल में येन केन प्रकारेण सरकार बनाने के लिए भाजपा ने अपने सारे घोड़े खोल दिए हैं और प्रख्यात क्रिकेटर और बीसीसीआई के अध्यक्ष सौरव गांगुली को मुख्यमंत्री के संभावित चेहरे के रूप में आगे करके ममता बनर्जी को चुनावी मैदान में मात देने की तयारी चल रही है। इस बीच सौरव गांगुली को दिल का दौरा पड़ जाने से मामला लटक गया है। यह देखने में जितना साधारण लग रहा है, उतना है नहीं, क्योंकि प्रधानमंत्री के चहेते कॉरपोरेट गौतम अडानी के व्यापारिक हित भी जुड़े हुए हैं और अडानी ने इसकी भूमिका बीते अगस्त से ही बनानी शुरू कर दी है, जब सौरव गांगुली को फॉर्च्यून सोया चंक्स के लिए ‘बल्लेबाजी’ करने के लिए अडानी विल्मर से जोड़ लिया गया। सौरव गांगुली को इसका ब्रांड अंबेसडर बनाया गया है।

दरअसल अडानी ग्रुप का बिजली घर झारखंड में लग रहा है और बंगलादेश को इससे उत्पादित बिजली बेचा जाना है, जिसके लिए टॉवर बंगाल होते हुए बंगलादेश जाने हैं। इसके अलावा अडानी ग्रुप की नजर बंगाल की कड़ी के बंदरगाहों और जलमार्ग पर भी है। बिना किसी राजनीतिक बाधा के यह तभी संभव है, जब बंगाल में मनोकूल सरकार रहे। अब यदि भाजपा के सीएम फेस बनने के लिए गांगुली तैयार होते हैं और बंगाल में भाजपा की अगली सरकार गांगुली के नेतृत्व में बनती है, (जिसकी संभावना फिलहाल नहीं के बराबर है) तो बाबू मोशाय भाजपा के सीएम बनेंगे या अडानी विल्मर के?

बिना विचारधारा के लोकप्रियता के आधार पर सिनेमा या खेल जगत के लोग राजनीति में अपनी चमक दमक का फायदा उठाने के लिए राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव मैदान में उतारे जाएं तो क्या वे आम जन का भला कर पाएंगे? इसे जानना हो तो प्रयागराज आएं, जहां सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने राजीव गांधी का हाथ मजबूत करने के लिए लोकसभा चुनाव न केवल लड़ा था बल्कि हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे कद्दावर नेता को भारी अंतर से हरा भी दिया था। चुनाव के दौरान अमिताभ बच्चन ने विकास के वो-वो सपने दिखाए थे कि लगता था गंगा और जमुना में दूध की धाराएं बहने लगेंगी, लेकिन वे बीच में इस्तीफा देकर मैदान चदकर चले गए थे और उनके विकास के वादे आज तक हवाहवाई बनकर रह गए हैं।

यदि आप यह सोचते हैं कि समय के साथ लालची और विश्वासघाती लोगों की फितरत बदल जाती है तो आप गलत सोचते हैं। समय, काल, देश और परिस्थितियों के अनुसार व्यक्ति और स्टाइल बदल जाती है, रूप बदल जाता है और लोग इस्तेमाल हो कर मीर जाफर की तरह इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाते हैं। यदि लालच के फेर में कोई हनीट्रैप (देह का लालच), विदेश में अपने पाल्यों को पढ़ाने का लालच या धन उगाही के लालच में पड़कर विदेशी ताकतों के लिए जासूसी करने लगता है तो पकड़े जाने पर देशद्रोही करार दिया जाता है और अपनी पूरी जिंदगी माथे पर दाग लेकर घूमता है। उसी तरह आज कॉरपोरेट लालच में कहीं फिल्म के अभिनेता और अभिनेत्री फंस रहे हैं तो कहीं खिलाड़ी, विशेष कर क्रिकेटर, फंस जा रहे हैं और जाने-अनजाने मीर जाफर बन जा रहे हैं, क्योंकि वे आम जनता को छलते हैं।

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि कॉरपोरेट ताकतें पूरे देश के संसाधनों का दोहन करने के लिए अब ऐसे प्रोफेशनलों पर दांव लगा रहे हैं, जिनका सबसे बड़ा पैमाना लोकप्रियता है यानि उनकी लोकप्रियता का लाभ उठा कर कॉरपोरेट उनका इस्तेमाल जिस तरह अपने घटिया उत्पादों को बाजार में खपाने में कर रहे हैं, उसी तरह उनका इस्तेमाल चालाकी से राजनीति में करने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि राजसत्ता पर उनकी मनचाही पार्टी को बैठाया जा सके।

बंगाल और तमिलनाडु को इसी छल का शिकार बनाने की कार्ययोजना है। तमिलनाडु में रजनीकांत को राजनीति में आने को तैयार किया गया था, लेकिन गंभीर रूप से बीमार पड़ने के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से तौबा कर ली। बंगाल में सौरव गांगुली पर दांव है, लेकिन दिल के दौरे ने मामला संदिग्ध कर दिया है। इन दोनों के राजनीतिक दर्शन का बैकग्राउंड कोई खास नहीं रहा है।

तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़ा तूफान आते-आते थम गया है। सुपर स्टार रजनीकांत ने एलान किया था कि वे  पॉलिटिक्स में उतर रहे हैं और 31 दिसंबर को बड़ी घोषणा करेंगे, लेकिन इससे ठीक एक हफ्ते पहले रजनी की तबियत बिगड़ गई और उन्हें हॉस्पिटल में एडमिट होना पड़ा। कुछ दिन हॉस्पिटल में रहने के बाद जब वो डिस्चार्ज हुए तो उन्होंने अपना फैसला वापस ले लिया और कहा कि वो राजनीति से फिलहाल दूर रहेंगे और पार्टी नहीं बनाएंगे। रजनीकांत का आना जहां डीएमके, कांग्रेस और एआईएडीएमके के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा था, वहीं भाजपा इसे मौके की तरह देख रही थी। रजनीकांत तमिलनाडु की प्रमुख पार्टियों के वोट काटते और सीधा फायदा भाजपा को होता। ये भी चर्चा थी कि भाजपा रजनीकांत से हाथ मिलाने पर विचार कर रही थी।

पश्चिम बंगाल में विधानसभा की कुल 294 सीटें हैं। 2016 विधानसभा चुनावों में तब ममता बनर्जी का एकछत्र राज था। इस चुनाव में टीएमसी ने 294 सीटों में से कुल 211 सीटों पर जीत दर्ज की थी। दूसरा नंबर कांग्रेस का था, जिसने 44 सीटें जीती थीं, लेकिन भाजपा पश्चिम बंगाल में सिर्फ तीन सीटें ही जीत पाई थी। साल 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में 42 लोकसभा सीटों में से भाजपा ने 18 सीटों पर जीत हासिल की। टीएमसी सिर्फ 22 सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाई। अब चूंकि बंगाल में भाजपा के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं है जो ममता को टक्कर दे सके, इसलिए सौरव गांगुली का नाम आगे किया गया है जो अडानी के भी चहेते हैं।

आपकी जानकारी के लिए सिराजुद्दौला के सेनापति रहे मीर जाफर का इतिहास जानना जरूरी है, जिसने नवाब बनने के लिए सिराजुद्दौला से गद्दारी की और 200 साल तक भारत को गुलामी की जंजीरों में बंधवा दिया। अंग्रेज़ भारत में करीब 200 साल रहे। क्या आप जानते हैं वो कौन सी घटना थी, जिसने अंग्रेज़ों को भारत में पैर जमाने का मौका दिया? मीर जाफर के धोखे की बलि चढ़े थे बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला। नवाब के सत्ता और जान से हाथ धोने की देर थी, बस, फिरंगियों के कदम भारत भूमि पर पड़ चुके थे अगले लगभग 200 सालों तक जमें रहने के लिए।

मीर जाफ़र नवाब सिराजुद्दौला का सेनापति था। 1757 से 1760 तक बंगाल का नवाब था। मीर जाफ़र प्लासी के युद्ध में रॉबर्ट क्लाइव के साथ मिल गया, क्योंकि रॉबर्ट क्लाइव ने मीर जाफ़र को बंगाल का नवाब बनाने का लालच दे दिया था। मीर जाफ़र 1757 से 1760 तक बंगाल का नवाब था। इस घटना को भारतीय इतिहास में महान विश्वाशघात के नाम से भी जाना जाता है।

अब देश में किसान बनाम कॉरपोरेट, आम आदमी बनाम कॉरपोरेट का आंदोलन चल रहा है, इसलिए बहुत जरूरी है कि आम जन कॉरपोरेट और राजनीति की दुरभिसंधि से बचें और इसमें इस्तेमाल हो रहे लोगों को पहचानें।

(लेखक वरिष्ठ हैं और इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on January 4, 2021 2:40 pm

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