ग्राउंड रिपोर्ट: साइकिल रिक्शा चलाकर रोटी कमाने वाले लाखों लोगों के सामने भुखमरी के हालात

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प्रयागराज। सुबह 11 बजे का समय है। बालसन चौराहे से शहीद चंद्रशेखर आज़ाद पार्क जाने वाली सड़क पर शीशम के बूढ़े पेड़ के नीचे एक बूढ़ा साइकिल रिक्शा लिए खड़ा है। रिक्शे से सात-आठ हाथ के फासले पर फुटपाथ पर एक बूढ़ा आदमी फ्राइंग पैन में कोंचा (मोटी रोटी) सेंक रहा है। चार ईंट जोड़कर बने चूल्हे में टूटे फूटे होर्डिंग-बैनर से मुक्त लकड़ियां जल रही हैं। दो लकडियों को एकसाथ पकड़कर बूढ़ा इनसे ही चिमटे का काम ले रहा है। मल्लाह समुदाय के इस दुबले-पतले कमज़ोर शरीर वाले बूढ़े व्यक्ति का नाम गेंदालाल है। 

गेंदालाल की उम्र 70 साल है। अब वो रिक्शे पर सवारियां नहीं ढोते, बस उस पर राशन और अपने खाने पीने की चीजें लादे रखते हैं। रात को उसी सड़क पर सेंट एंथनी कॉन्वेंट गर्ल्स इंटर कॉलेज के सामने रिक्शा खड़ा करके उसी पर सो जाते हैं।

जब आप रिक्शा नहीं चलाते तो अपने घर क्यों नहीं चले जाते, यहां इतना कष्ट झेल रहे हैं रहने खाने का। जनचौक संवाददाता के इस सवाल के जवाब में बहुत ही निराश और धीमे स्वर में वो कहते हैं घर में मन नहीं लगता, बहुत उबियावन होता है।

मडैंकागंज नैनी निवासी गेंदालाल की बीबी 15 साल पहले गुज़र गई हैं। सही मायने में पैडल रिक्शा ही उनकी बीबी है और बालसन चौराहा, आजाद पार्क, यूनिवर्सिटी के आस-पास की सड़कें उनका घर। ताउम्र इन्हीं सड़कों पर रिक्शा खींचने वाले गेंदालाल पैडल रिक्शा और इन सड़कों के बिना अपने वजूद को स्वीकार ही नहीं कर पा रहे हैं।

 

फुटपाथ पर खाना बनाते गेंदालाल

गेंदालाल के बेटे जब शहर आते हैं तो घर से कुछ राशन लेते आते हैं उनके लिए। उसी से गेंदालाल का गुज़ारा होता है। वो राशन बासन सब रिक्शे में ही रखे रहते हैं। जब भूख लगती है तो फुटपाथ पर चार ईंट लगाकर बना-खा लेते हैं। 

गेंदालाल के दो बेटे हैं, एक की शादी हुई है। दोनों मल्लाह का परम्परागत काम करते हैं। लेकिन गंगा से बालू निकालने की रोक के बाद उनके सामने भी रोटी-रोजी का संकट है। गेंदालाल के पास कुछ ज़मीन थी। कुछ ज़मीन रेलवे में चली गई। वर्षों पहले उनकी बड़ी बहन और दादा के लड़कों ने उन्हें कुछ खिला पिलाकर बची-खुची ज़मीन बिकवा दी और पैसे हड़प लिये।

अपना दर्द साझा करते हुए गेंदालाल कहते हैं कि “ज़िनग़ी भर रिक्शे से कमाई की, अब केवल ये बीमारी (हाइड्रोसील) ही साथ बची है। बाक़ी तो जो कुछ भी रिक्शा चलाकर कमाया, परिवार जिलाने खिलाने में ही खप गया। कुछ उबरा ही नहीं कि बचाकर रखता।”

दोपहर दो बजे का समय है। स्वरूपरानी अस्पताल के मेन गेट पर एक पैडल रिक्शा खड़ा है। चालक की सीट पर पांव धर कर सवारी वाली सीट पर रिक्शाचालक सो रहा है। शायद सवारी के इंतज़ार और इंतज़ार की ऊब में आंख लग गई।

सवारी का इंतजार

पैंट-शर्ट पहने रिक्शा चालक की उम्र 45-50 साल के बीच है। यह उसका खुद का रिक्शा है। इसलिए जैसे-तैसे किसी तरह काम चल रहा है, बेंचने जाएंगे तो तौलकर बिकेगा, कबाड़ के दाम।

शाम चार बजे का समय है। भंढ़वा गांव नैनी निवासी छोटेलाल सिविल लाइन्स की सड़क पर बिना सवारी ही पैडल रिक्शा खींचते मिल गये। छोटेलाल जाटव समुदाय से आते हैं। 55 साल के छोटेलाल बताते हैं कि जब से बैटरी रिक्शा आया है पैडल रिक्शा पर सवारियां नहीं बैठतीं। दिन भर में कितना कमा लेते हैं पूछने पर छोटेलाल बताते हैं कि 300 रुपये का आंकड़ा छूना दूभर हो गया है।

छोटेलाल ये रिक्शा किराये पर लेकर चलाते हैं। पहले 50 रुपये किराया देते थे अब 30 रुपये देते हैं। उनके तीन लड़के हैं, सब ड्राईवर हैं। बीपीएल कार्ड बना है लेकिन कोई पेंशन नहीं मिलती।

छोटेलाल भूमिहीन है। कॉलोनी नहीं मिली। बच्चे झुग्गी डालकर रहते हैं। छोटेलाल सिविल लाइन्स में ही फुटपाथ पर सोते हैं। महीना-पाख में कभी घर जाते हैं।

रिक्शा चालक छोटेलाल

किस रिक्शा में सहूलियत ज़्यादा होती है, बैटरी रिक्शा या पैडल रिक्शा, पूछने पर छोटेलाल बताते हैं कि जाहिर है बैटरी रिक्शा में ज़्यादा सहूलियत होती है। उसमें मेहनत नहीं लगती और उसमें सवारियां भी बैठती हैं।

फिर आप बैटरी रिक्शा क्यों नहीं चलाते पूछने पर छोटेलाल बताते हैं कि उसका एक दिन का किराया 300 रुपये है, दूसरा वो बहुत जल्दी पलट जाता है, उनसे संभलता नहीं है।

वो बताते हैं कि पैडल रिक्शा में बैलेंस हाथ और पैर दोनों से बनता है। बैटरी रिक्शा में पूरा बैलेंस हाथ से बनाना पड़ता है। जो अंतर साईकिल और मोटरसाईकिल में है वही अंतर पैडल रिक्शा और बैटरी रिक्शा में है।

पिचके गाल, बिखरे बालों में गर्द-ओ-गुबार और पेट भूख से आंत में घुसा हुआ। पेट की भूख मिटाने लिट्टी चोखा के ठेले के सामने रिक्शा लिये खड़े राम चंदर कहते हैं–“चार लिट्टी खाय लो तो दिन भर पेट में टिकी रहती है, जल्दी भूख नहीं लगती। मंहगाई के ज़माने में पेट साला दुश्मन हुआ जाता है।”

लिट्टी चोखा की दुकान पर राम चंदर

परिवार, सरकार और व्यवस्था से नाराज़ राम चंदर की हर बात में गुस्सा झलकता है। भूख और लाचारी का गुस्सा। मऊआईमा सोरांव निवासी राम चंदर पैडल रिक्शा चलाते हैं। वो बताते हैं कि सवारियां अब पैडल रिक्शा पर नहीं बैठतीं। कभी कोई सवारी मिल जाती है कभी वो भी नहीं मिलती। भूखे मरने की नौबत आ गई है।

राम चंदर सिविल लाइन्स हनुमान मंदिर के पास रहते हैं। उनके परिवार में 5 लड़के और 1 लड़की है, पर सब अलग हैं। खुद मियां-बीबी अकेले रहते खाते हैं।

राम चंदर या उनकी बीबी को कोई सरकारी पेंशन नहीं मिलती। राम चंदर दलित समुदाय से आते हैं। 3-4 चार दिन काम करके घर चले जाते ।

रिक्शा चालक राम चंदर

शाम के छः बज रहे हैं, दिन ढलने को है। परिंदे वापस अपने घरों की ओर लौट रहे हैं। चुंगी से थोड़ा आगे बाईं तरफ दर्जनों कबाड़ रिक्शों के बीच इकबाल मियां अपना रिक्शा पेड़ के सटाकर उसे सुरक्षा की जंजीरे पहना रहे हैं।

आज दिन भर में कितनी कमाई हुई दादा? सनई जैसी सफेद दाढ़ी मूंछ वाले चेहरे पर मोटे फ्रेम वाला नज़र का चश्मा ठीक करते हुए इकबाल मियां डूबती आवाज़ में कहते हैं- “का कमाई भवा बचई, बस मुंह पिटावन होइ गवा।”

जब इससे कमाई नहीं होती तो इसे छोड़कर बैटरी रिक्शा काहे नाही चला लेते। इस सवाल के जवाब में वो संवाददाता की ओर मोमिन का शेर उछाल देते हैं- “उमर सारी कटी इश्क-ए बुतां में मोमिन, आखरी बखत में क्या ख़ाक मुसलमां होंगे।” 

यह सिर्फ़ इकबाल मियां का दर्द नहीं है। तकनीकि जब नया उत्पाद लेकर आती है तो बाज़ार से सिर्फ पुरानी तकनीकि वाली चीजों का वजूद नहीं मिटता, उस पर जीवनयापन करने वाले लाखों लोगों के अस्तित्व पर भी संकट आ जाता है।

रिक्शे पर जंजीर लगाते इकबाल मियां

नई पीढ़ी के लोग नई तकनीकि आसानी से सीख लेते हैं, उन्हें तो रोज़गार मिल जाता है लेकिन पुरानी पीढ़ी यानि 50 साल पार कर चुके लोगों के लिए इस उम्र में सीखना, नई तकनीकि से ताल-मेल बिठाना लगभग नामुमकिन हो जाता है।

दलित, मुसलमान और अति-पिछड़े वर्ग के लाखों लोगों का जीवन यापन पैडल रिक्शा से होता आया है। पैडल रिक्शा कम बजट में मिल जाता है। खरीदने की कुव्वत न भी हो तो भी कम किराये पर चलाने को मिल जाता है।

पैडल रिक्शा में शारीरिक श्रम लगता है इसलिए रिक्शा खींचने जैसा काम वो लोग नहीं करते थे जो श्रम, श्रंम-कार्य और श्रम वर्ग से घृणा करते हैं। वो हद से हद ये करते कि रिक्शा ख़रीदकर किराये पर दे देते हैं।

लेकिन बाज़ार में बैटरी रिक्शा आने के बाद श्रम और श्रम से जुड़ी शर्म खत्म हो गयी है। दूसरा इसमें पूंजी का भी समावेश हो गया है। पूंजी का समावेश होने से कार्य की मूल प्रकृति और स्तर दोनों बदल जाते हैं। बाज़ार में बैटरी रिक्शा की क़ीमत 1.5 लाख से 3 लाख रुपये के बीच है। क़ीमत के अलावा इससे जुड़ा दूसरा मुद्दा ड्राइविंग लाइसेंस का है।

बैटरी रिक्शा

एक बैटरी रिक्शा चालक बताता है कि बैटरी रिक्शा चलाने के लिए तीन पहिया, चार पहिया, हल्के वाहन के लिए बनने वाला ड्राइविंग लाइसेंस लगता है। बिना लाइंसेस के बैटरी रिक्शा चलाने पर 5 हजार रुपये का जुर्माना है। जबकि पैडल रिक्शा में लाइसेंस बनवाने का सिरदर्द नहीं है।

छोटेलाल बताते हैं कि 15 साल पहले तक नियम था कि नगर निगम से पहचान पत्र बनवाना पड़ता था। दो फोटो लगती थी बस। 3 साल के लिए मान्य होता था वो। लेकिन अब वह भी नहीं बनवाना पड़ता।

कुल मिलाकर देश के तमाम गांवों और दूर दराज के क्षेत्रों से समाजिक रूप से हाशिये के लोग नजदीकी शहरों-नगरों में पैडल रिक्शा खींचने आते-जाते रहे हैं और आज भी आ और जा रहे हैं, लेकिन तकनीकि ने उनके भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। इन लोगों के पास जिंदा रहने के लिए कोई दूसरा साधन और संसाधन भी तो नहीं है। देश भर में पैडल रिक्शा पर निर्भर लाखों परिवारों का वजूद संकट में है।

(प्रयागराज से सुशील मानव की ग्राउंड रिपोर्ट)

ग्राउंड रिपोर्ट: प्रयागराज माघ मेला उजड़ा, फिर रोजी-रोटी का सवाल

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