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अपने ही जन के खिलाफ़ युद्धरत एक राज्य

उत्तर प्रदेश में राज्य द्वारा असहमति की आवाजों को और मुस्लिम अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाली कार्रवाई पर कारवां-ए-मोहब्बत की एक रिपोर्ट

कारवां-ए-मोहब्बत की तथ्यों की पड़ताल करने वाली टीम ने 26 दिसंबर 2019 से 14 जनवरी 2020 के बीच मेरठ, मुजफ्फरनगर, फिरोजाबाद और संभल में दंगा-प्रभावित इलाक़ों का दौरा किया। जन-सुनवाइयों के दौरान लखनऊ, कानपुर, वाराणसी और मऊ के भुक्तभोगियों की भी बातें सुनी गईं। यहां इस रिपोर्ट के कुछ अंश प्रस्तुत हैं:

रिपोर्ट के अनुसार हालांकि नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), भारतीय नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (NRIC) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) के खिलाफ देश भर में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए थे लेकिन उत्तर प्रदेश में राज्य द्वारा असंतोष की आवाज़ों को कठोरता पूर्वक कुचलने का काम किया गया। देश के अधिकांश कोनों में लोग, विशेषकर महिलाएं, बड़ी संख्या में  संशोधित नागरिकता कानून का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतरीं। लेकिन केवल यूपी में (और कुछ हद तक तटीय कर्नाटक और बिहार में) ये विरोध हिंसक हो गये। उल्लेखनीय  है कि इन सभी राज्यों में भारतीय जनता पार्टी सरकार में है।

27 दिसंबर 2019 को गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ने बताया कि यूपी में 19 दिसंबर 2019 से विरोध-प्रदर्शन से संबंधित हिंसा में 19 लोगों की मौत हो गई है, 1,113 लोगों को विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है और 5,558 लोगों की निवारक गिरफ्तारियां की गई हैं। तब से संख्या और बढ़ी ही है। इन कार्रवाइयों द्वारा मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने बदला लेने का आह्वान किया,  इसके बाद से पुलिस छापे और हमले और भी क्रूर हो गए। मुस्लिम लोगों को कथित रूप से नष्ट की गई सार्वजनिक संपत्ति की भारी-भरकम भरपाई की नोटिसें भेजी गईं (इसमें पुलिस के उन डंडों की क़ीमत भी शामिल की गई थी जो उनकी पिटाई के दौरान टूट गए थे)। संपत्तियों को नष्ट करने में किसी की जिम्मेदारी साबित किए जाने के लिए आवश्यक विधिक जांच के बिना यह सब किया गया।

जैसे ही यूपी में पुलिसिया हिंसा की खबरें आने लगीं, मुख्यमंत्री ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से शेखी बघारते हुए एक विजयी संदेश जारी किया: “हर दंगाई हतप्रभ है। हर उपद्रवी हैरान है। देख कर योगी सरकार की सख्ती मंसूबे सभी के शांत हैं।” यूपी के कई शहरों में तथ्यों की पड़ताल करने वाले कई नागरिक समूहों ने मुस्लिम घरों का दौरा किया और इन घरों के अंदर भी वर्दीधारियों द्वारा घृणा के तांडव को देखा। कारों और स्कूटरों को पलट दिया गया था और आग लगा दी गई थी,  टेलीविजन और वाशिंग मशीनें चकनाचूर कर दी गई थीं,  नकदी और आभूषण लूट लिए गए थे,  क्रॉकरी और खिलौने तोड़-फोड़ दिए गए थे। एक परिवार द्वारा जिंदग़ी भर जुटाई गई गृहस्थी को मिनटों में तबाह कर दिया गया था।

परिवार शोकाकुल थे। पुलिस ने उनके दरवाजे तोड़ दिए। रहम के लिए गिड़गिड़ा रहे बुज़ुर्गों, औरतों और बच्चों तक को पीटा। उन्होंने मुसलमानों के बारे में सबसे अश्लील गालियां बकीं। उन्होंने ज़्यादा मुस्लिम आबादी वाले कई शहरों में हजारों ‘बिना नाम वाली’  पुलिस शिकायतें दर्ज कराईं ताकि इनका इस्तेमाल वे जब मर्जी हो मुस्लिम लोगों को हिरासत में लेने के लिए कर सकें, तथा पुलिस के खिलाफ बयान देने या उसकी शिकायत करने वालों को चुप कराने के लिए हथियार के रूप में कर सकें। लोग उन लोगों से बात करने से डर रहे हैं जिनके हाथों में कैमरा है  और अगर वे बात कर भी रहे हैं  तो वे अपना चेहरा ढंक लेते हैं। शहरी यूपी में पूरी मुस्लिम आबादी के बीच भयावह आतंक भर गया है। पुरुषों को डर है कि उनके खिलाफ गंभीर अपराधों के आरोप लगा दिए जाएंगे तो महिलाओं को डर है कि उनके घरों पर हमले कर दिए जाएंगो। मुस्लिम बस्तियों के बड़े हिस्से खाली हो गए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक यूपी की घटनाओं की प्रकृति और पैमाने को प्रकाश में लाने के लिए 16 जनवरी को दिल्ली में जन सुनवाई आयोजित की गई। इसमें तथ्यों की पड़ताल करने वाली टीमों और व्यक्तियों ने अपने साक्ष्य प्रस्तुत किए। जो तस्वीर उभरती है वह विचलित करने वाली है। यह तस्वीर एक राज्य द्वारा सभी लोकतांत्रिक सिद्धांतों को धता बताते हुए अपने ही नागरिकों के विरुद्ध युद्ध छेड़ देने जैसी है।

राज्य का तंत्र बिल्कुल ध्वस्त

रिपोर्ट के अनुसार विरोध-प्रदर्शनों के दमन के लिए पुलिस ने नागरिकों पर अनुपात से ज्यादा हिंसा का इस्तेमाल किया। मुस्लिम समुदाय की आर्थिक रीढ़ को तोड़ डालने के दीर्घकालीन मक़सद से भय का माहौल बनाने के लिए पुलिस ने लोगों के घरों को लूटा भी और तहस-नहस भी कर दिया। नाबालिग़ों सहित बड़ी संख्या में नागरिकों की ग़ैरक़ानूनी गिरफ्तारियां की गईं और हिरासत में यातनाएं दी गईं। सामान्य क़ानूनी और मेडिको-लीगल प्रक्रियाओं को होने नहीं दिया गया और उनमें हेर-फेर की गई। प्राथमिकी या तो दर्ज नहीं होने दी गई, या ग़लत दर्ज की गई, इसके लिए पोस्ट-मार्टम रिपोर्ट तथा मेडिको-लीगल रिपोर्ट दी ही नहीं गई जिससे परिवारों को न्याय मिलने की संभावना ही न रहे।

मुस्लिम समुदाय के खिलाफ़ कानून को ही हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया। हजारों की संख्या में बिना नाम वाली एफआईआर दर्ज की गईं। मनमाने तौर पर नागरिकों को उनके घरों से और गलियों से उठा लिया गया, उनके नाम उन एफआईआर में डाल कर फर्जी मुक़दमे बनाए गए और संपत्ति के नुकसान की भारी-भरकम भरपाई की नोटिसें भेज दी गईं। इस तरह से नागरिकों की हिफाजत के लिए बनाई गई न्याय-प्रणाली को ध्वस्त करके उनको भयाक्रांत करने के लिए इस्तेमाल किया गया।

नागरिकों के विरोध-प्रदर्शन के अधिकार को पंगु बना दिया गया

नागरिकों द्वारा शांतिपूर्ण ढंग से और निडर होकर अपने असंतोष को दर्ज कराने का अधिकार लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण बुनियाद है। लेकिन 2014 में केंद्र में भाजपा के सत्तासीन होने को बाद से इस अधिकार के प्रति सत्ता का रुख असहिष्णुता पूर्ण का और तानाशाही भरा रहा है। इसने धारा 144 का और इंटरनेट बंद करने का काम बड़े पैमाने पर किया है। यूपी में भी शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को कुचलने के लिए यही किया गया। यह औपनिवेशिक क़ानून सार्वजनिक व्यवस्था के उल्लंघन को रोकने तथा बड़ी सभाओं के हिंसक हो उठने से बचने के लिए उन्हें ग़ैरक़ानूनी घोषित करने के लिए बनाया गया था।

सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णय इसके बार-बार इस्तेमाल के खिलाफ़ आ चुके हैं। लेकिन यूपी पुलिस ने इसी धारा 144 के उल्लंघन के आधार पर सभी तरह के विरोध-प्रदर्शनों को ग़ैरक़ानूनी घोषित करते हुए अधिकांशत: शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के खिलाफ क्रूर हिंसा किया और लोगों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया। वाराणसी में धारा 144 के बावजूद सीएए समर्थक रैली को तो आयोजित होने दिया गया लेकिन सीएए विरोधी रैली पर क्रूर हमला किया गया। यूपी में जब हजारों लोग विरोध के लिए इकट्ठा होने वाले थे उसके एक दिन पहले ही धारा 144 लगा दी गई, जबकि प्रदर्शनों के हिंसक होने का कोई अंदेशा नहीं था।

सीएए के पारित होने के बाद कानपुर तथा अन्य शहरों में 13 दिसंबर के बाद से ही शांतिपूर्ण प्रदर्शन जारी थे जिनमें शामिल होने के बाद लोग बिना हिंसक हुए वापस अपने घर चले जाते थे।  20 दिसंबर 2019 को हापुड़, मुरादाबाद, सहारनपुर, मुज़फ्फरनगर, शामली, लखनऊ, प्रयागराज, उन्नाव, आगरा, सुल्तानपुर, मऊ, बागपत, मेरठ, बुलंदशहर, आज़मगढ़, गाजियाबाद, कानपुर, पीलीभीत सहित यूपी के कम से कम 18 जिलों में सीएए के विरोध के मद्देनज़र इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर दी गईं। संभवत: इसलिए ऐसा किया गया ताकि लोग प्रदर्शनों और जनसभाओं की सूचनाओं का आदान-प्रदान न कर सकें। जिस तरह से आज इंटरनेट हमारी अपरिहार्य दैनिक जरूरत बन चुका है ऐसे में यह एक गंभीर व्यवधान तो है ही, लेकिन शोधों के अनुसार ऐसे क़दमों से हिंसा नियंत्रित होने की बजाय अनियंत्रित ही होती है।

इंटरनेट शटडाउन की वजह से सामान्य बैंकिंग, नेटबैंकिंग, एटीएम सेवाएं, कैश भुगतान सहित डिजिटल लेनदेन, ओटीपी आधारित सेवाएं, यूपीआई, आधार संबंधी सेवाएं बंद होने से राज्य के लाखों लोगों की जिंदगी प्रभावित होती है, चाहे वे प्रदर्शनों में शामिल हों या न हों। भारत यूं भी इंटरनेट शटडाउन के मामले में चीन, पाकिस्तान, ईरान, चाड और मिस्र से भी आगे है। यूपी प्रशासन ने पक्षपाती तथा असहिष्णु रवैया अपनाया। इंटरनेट बंद करके उसने यह सुनिश्चित करना चाहा कि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना न झेलनी पड़े।

समुदाय के नेताओं को खास करके निशाना बनाया गया

संभल में जिला संघर्ष समिति की शिक्षा, वित्त और नगरपालिका मामलों में अहम भूमिका रही है। 19 दिसंबर को उसे प्रदर्शन करने की अनुमति दी गई थी लेकिन 18 की रात को य़ह अनुमति वापस ले ली गई, उसके अनेक सदस्यों से जबरन हस्ताक्षर करा लिए गए कि वे किसी निजी या सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शन में भाग नहीं लेंगे, कइयों को नज़रबंद कर लिया गया और विरोध-प्रदर्शन के लिए नियत मैदान में पानी भर दिया गया। समुदाय के नेताओं को डराने-धमकाने की ऐसी ही खबरें मुजफ्फरनगर से भी आईं। वार्डों के नेताओं को प्रशासन द्वारा पत्र भेजे गए कि अगर उनके वार्ड से लोगों ने विरोध-प्रदर्शन में भाग लिया तो इसके लिए वे व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराए जाएंगे।

मानवाधिकार समर्थकों की शिनाख्त करना और उन्हें धमकाना

गिरफ्तार किए गए पूर्व आईपीएस और लखनऊ के एक्टिविस्ट एस आर दारापुरी ने बताया कि “मेरी राय से मुझे मानवाधिकारों के पक्ष में तथा फर्जी मुठभेड़ों के खिलाफ और यूपी पुलिस द्वारा की जा रही हिंसा के अन्य रूपों के खिलाफ बोलते रहने के मेरे इतिहास की वजह से मुझे खास करके निशाना बनाया गया।“ वकीलों, एक्टिविस्टों, पत्रकारों तथा अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाले अन्य मानवाधिकार समर्थकों को प्रताड़ित, भयभीत तथा तंग किया जा रहा है और उनके ऊपर अर्बन नक्सल, राष्ट्रविरोधी और आतंकवादी का टैग लगाया जा रहा है।

एक प्रस्तावित राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन से पहले 76 वर्षीय वकील और प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता मेहम्मद शोएब को यूपी पुलिस द्वारा पहले घर में नज़रबंद किया गया, फिर हिरासत में ले लिया गया। ‘रिहाई मंच’ से जुड़े रॉबिन वर्मा को ‘द हिंदू’ के पत्रकार उमर राशिद के साथ एक ढाबे पर खाना खाते हुए सादी वर्दी में चार लोगों ने गिरफ्तार किया। उन्हें हजरतगंज थाने के अंदर साइबर सेल जैसे एक कमरे में ले जाया गया जहां रॉबिन की चमड़े के बेल्ट से और थप्पड़ों से पिटाई शुरू कर दी गई।

रक्षक ही भक्षक बन गए: प्रदर्शनकारियों पर हिंसक कार्रवाई

राज्य में धारा 144 लगने तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं व सामुदायिक नेताओं को भांति-भांति रूपों में भयभीत किए जाने के बावज़ूद यूपी के अनेक हिस्सों में जुमे की नमाज के बाद स्वत:स्फूर्त ढंग से हजारों लोग इकट्ठा हो गए। ऐसा आपातकाल के बाद पहली बार हुआ था। लेकिन सबके हाथ खाली थे। किसी को इतनी संख्या की उम्मीद नहीं थी। यह मंज़र तेजी से, और बिना किसी उकसावे के, प्रदर्शनकारियों के ऊपर लाठीचार्ज, आंसू गैस और अंधाधुंध पुलिस गोलीबारी में बदल गया।

हिंसक प्रदर्शन या घुसपैठ कराए गए उपद्रवी

पुलिस का कहना यह था कि उसकी कार्रवाई एक प्रतिक्रिया थी, क्योंकि  कुछ शहरों में नागरिकों ने हिंसक मोड़ ले लिया था। 21 दिसंबर 2019 को  यह सूचित किया गया कि कानपुर पुलिस को जवाबी कार्रवाई के लिए उकसाया गया क्योंकि भीड़ ने पुलिस चौकी को आग लगा दी थी और छतों से पथराव शुरू कर दिया था। लखनऊ, गोरखपुर, बुलंदशहर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, भदोही, फिरोजाबाद, बहराइच और जौनपुर में भी ऐसी ही घटनाएँ सामने आईं, जहाँ कथित तौर पर “गुस्से में भीड़” वाहनों को जला रही थी और पथराव कर रही थी। बुलंदशहर और फिरोजाबाद में स्थिति विशेष रूप से तनावपूर्ण हो गई। लेकिन अनिर्बन भट्टाचार्य, 18 ने अपनी गवाही में उल्लेख किया है कि इस तथाकथित “दंगाई भीड़” के भीतर घुसपैठ कराए गए उपद्रवियों के पर्याप्त सबूत हैं।

हालांकि यह हर उदाहरण में सत्यापित करना मुश्किल हो सकता है फिर भी तथ्य यह है कि इस तरह के कुछ बदमाशों की साजिशों को कई जगहों पर नाकाम किया गया था और उत्तेजना फैलाने वाले एजेंट के रूप में इनकी पहचान की गई थी। मिसाल के तौर पर, सदफ जफ़र याद करती हैं कि जब लखनऊ में परिवर्तन चौक पर एक शांतिपूर्ण सभा चल रही थी, अचानक दंगाई वहाँ पहुँच गए। उन सभी ने एक जैसी टोपी और कैफिया पहना हुआ था। उन्होंने दो छोरों पर पथराव और आगजनी शुरू कर दी, जबकि तीसरे छोर पर पुलिस बैरिकेडिंग थी। सदफ ने पुलिस से अपील की कि वह बदमाशों में से एक को पकड़ ले क्योंकि वह करीब आ गया था, लेकिन पुलिस बेपरवाह खड़ी रही। शांतिपूर्ण सभा में शामिल कुछ लोगों ने उसे पकड़ लिया और उसे पुलिस को सौंप दिया, लेकिन पुलिस ने उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।

मेरठ में, प्रदर्शनकारियों पर पुलिस गोलीबारी और दमन को उचित ठहराने के लिए यह खबर फैलाई गई थी कि प्रदर्शन कर रहे लोगों ने इस्लामाबाद पुलिस चौकी को तोड़ दिया था और आग लगा दी थी। जब अधिवक्ता अकरम और अन्य लोग चौकी में सत्यापन करने के लिए पहुँचे, तो उन्होंने पाया कि उक्त इमारत ताज़ा ही रंगी गई थी  और चौकी की कांच की खिड़कियां तक सुरक्षित थीं वहां किसी तोड़फोड़ के निशान नहीं थे। तथ्य का पता लगाने वाली टीम को स्थानीय लोगों ने बताया कि कुछ स्टेशनरी और फाइलें चौकी के एक कोने में भाजपा नेता लक्ष्मीकांत बाजपेयी और उनके गुंडों द्वारा जला दी गई थीं ताकि पुलिस की बर्बरता को वैधता देने के लिए एक कहानी बनाई जा सके।

स्थानीय डॉक्टरों ने बताया कि पुलिस द्वारा गोली पहले चलाई गई थी और इस आगजनी का मंचन बाद में किया गया था। वीडियो साक्ष्यों में बसों पर पथराव करते ऐसे लोगों को पहचाना गया है जो पुलिस के लिए मुखबिर का काम करते हैं। इसी तरह स्थानीय वाल्मीकि समाज को भाजपा मुसलमानों के खिलाफ लामबंद कर रही है और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को उकसाने के लिए उन पर पथराव इन्हीं से कराया गया था।

पश्चिमी यूपी में, यूपी सरकार ने ‘पुलिस-मित्र’ के रूप में भर्तियां की हैं। इन लोगों को किसी भी विज्ञापन, योग्यता, नियमों और विनियमों के बिना भर्ती किया जाता है, संभवतः विभिन्न स्थितियों में पुलिस की सहायता करने के लिए। इन ‘पुलिस-मित्रों’ को लाठियां, बिल्ला, जैकेट, आईडी कार्ड जारी किए गए हैं। रिपोर्टों के अनुसार पुलिस को लोगों की संपत्ति को नष्ट करने, हिंसा करने और तोड़फोड़ करने में इन लोगों ने पुलिस का साथ दिया। तथ्य-खोजी टीमों ने सुना कि मुजफ्फरनगर में, ‘आधी-वर्दीधारी’ लोग (नागरिक कपड़ों में, लेकिन पुलिस जैकेट और हेलमेट पहने हुए) संपत्ति नष्ट करने के लिए घरों में घुस गए। फिरोजाबाद में  स्थानीय कार्यकर्ताओं ने बताया कि पुलिस के साथ सादे कपड़ों में लोग थे जो अपने चेहरे ढके हुए थे। वे संभवतः इस पुलिस-मित्र समूह का हिस्सा थे। यह ध्यान देने योग्य है कि, जबकि स्थानीय मीडिया और पुलिस ने ‘हिंसक प्रदर्शनकारियों’ की इस धारणा को खूब फैलाया।

गोलियां चलाने वाली पुलिस: हिंसा में बेहिसाब बढ़ोत्तरी

मुजफ्परनगर का एक टेम्पो चालक नूर मोहम्मद 20 दिसंबर को गलती से प्रदर्शन वाली सड़क पर आ गया था। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग शुरू कर दिया। वह जान बचाने के लिए टेम्पो छोड़ कर भागा लेकिन पुलिस की गोली का शिकार हो गया। उसके परिवार में गर्भवती पत्नी और दो साल की बेटी है। वह परिवार का अकेला रोटी जुटाने वाला था। मेरठ, मुजफ्फरनगर, संभल, फिरोजाबाद, बिजनौर, कानपुर, गोरखपुर, और कई अन्य शहरों में पुलिस ने फायरिंग किया।

मेरठ में 28 वर्षीय मोहसिन को सीने में गोली लगी, जहीर(40 वर्ष) को गोली उनकी एक आंख में घुस गई, 23 वर्षीय अलीम के सिर में गोली लगी, आसिफ(20 वर्ष) गोली उसके सीने में लगी, 33 वर्षीय आसिफ की पीठ पर एक गोली लगी। संभल में 31 वर्षीय बिलाल  के निचले होंठ के नीचे गोली लगी, शेहरोज(19 वर्ष) को पेट में गोली लगी। मुजफ्फरनगर में  नूरा (25 वर्ष) को छाती पर मारा गया। फिरोजाबाद में 19 वर्षीय  मुकेम को पेट में मारा गया, 27 वर्षीय राशिद को सिर पर गोली लगी, अरमान(24 वर्ष) को सीने में गोली लगी, हारून को जबड़े में गोली लगी, शफीक (39/40 वर्ष) को  कान के पास मारा गया।

पुलिस ने संवेदनहीन तरीक़े से आंसू गैस के तुरंत बाद रबर की गोलियों या पानी की तोपों का उपयोग किए बिना सीधे आग्नेयास्त्रों का सहारा लिया। पुलिस ने भीड़ पर कमर से ऊपर गोलियां चलाईं। मुजफ्फरनगर में तो आचार-संहिता के खिलाफ पहले गोलियां चलाई गईं और बाद में कम घातक उपाय अपनाए गए। पश्चिमी यूपी में मारे गए सभी 16 मुस्लिम श्रमिक वर्ग के परिवारों के युवक हैं। उनके लगभग सभी परिवारों ने कहा कि वे जुलूस का हिस्सा नहीं थे, वे गलत समय पर गलत जगह पर थे। गोली लगने से उनकी मौत हो गई। 16 में से 14 को कमर से ऊपर की तरफ – छाती, चेहरे, सिर, गर्दन पर गोलियां लगीं।

पुलिस द्वारा नफ़रत वाले भाषण

पुलिस द्वारा की गई हिंसा की इन सभी घटनाओं में(सड़कों पर, घरों के अंदर या हिरासत में) एक सामान्य बात है, वह है धार्मिक घृणा से भरी हुई अभद्र भाषा का लगातार और जानबूझकर इस्तेमाल। सांप्रदायिक नफ़रत वाले शब्दों का इस्तेमाल पुलिस और उसके सहयोगियों द्वारा भीड़ से हिंसक प्रतिक्रियाओं को भड़काने के लिए किया गया था। कई स्थानों पर पुलिस ने हिंदू भीड़ को मुस्लिम दुकानों और घरों को जलाने और लूटने के लिए प्रोत्साहित किया, राजी किया और कुछ मामलों में तो मजबूर किया।

फिरोजाबाद में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों का हिंदू बहुल इलाक़ों की सड़कों पर पीछा किया और हिंदू दर्शकों से कहा, “हम हिंदू हैं, तुम भी हिंदू हो, मारो!” उन्होंने आगे यह कहते हुए स्थानीय हिंदू समुदाय को उकसाया कि “ये तो मियाँ भाइयों को हमारे हिन्दू भाइयों ने मुह लगा रखा है, वरना इनकी औकात नहीं है कि ये कुछ बोलें।“ इसके अलावा, पुलिस ने कहा, “हमें अभी दो घण्टे दिए गए हैं, अगर दो दिन दे दिए जाते तो हम इन्हें बता देते कि हम कौन हैं।“  20 दिसंबर को मेरठ में पुलिस अधीक्षक अखिलेश नारायण सिंह, वर्दी में मुसलमानों को धमकी देते हुए कैमरे में कैद हुए। उन्होंने ऐसे वाक्यों का प्रयोग किया जैसे “कहां जाओगे?

मैं इस गली को ठीक कर दूंगा।“ और “ये जो काली पट्टी और नीली पट्टी बांध रहे हो, उन्हें कह दो पाकिस्तान चले जाएं। देश में अगर नहीं रहने का मन है तो चले जाओ भइया … खाओगे यहां, गाओगे कहीं और। ये गली मुझे याद हो गई है, और जब मुझे याद हो जाता है तो मैं नानी तक पहुंच जाता हूं।.. एक-एक घर के एक-एक आदमी को जेल में भर दूंगा मैं।..मैं उन्हें बरबाद कर दूंगा।“ उस दिन पुलिस की गोलीबारी में छह मजदूर वर्ग के लोग मारे गए थे।

अभद्र भाषा का उपयोग पुलिस, आरएएफ और सहयोगियों द्वारा उस समय बड़े पैमाने पर किया गया था जब वे व्यक्तियों और उनके घरों पर हमला कर रहे थे। आमतौर पर “कठमुल्ला”, “जिहादी” और “पाकिस्तानी” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता था। मुजफ्फरनगर में लोगों के घरों में हमलों के हमलावर पुलिस ने उन्हें कहा तुम लोगों के घर छोड़ने के बाद हम लोग तुम्हारे घरों में रहेंगे।

अंधाधुंध गिरफ्तारियां

22 वर्षीय आमिर (बदला हुआ नाम) संभल का रहने वाला है। उसे एक बस स्टैंड से उठाया गया था जहाँ वह अपने दोस्तों के बारे में पूछताछ करने गया था। उसको साथ लेकर पुलिस उनके घरों में गई, तोड़-फोड़ की और अन्य लड़कों को गिरफ्तार किया। उन्हें धनारी पुलिस स्टेशन ले जाया गया। उनके किसी भी रिश्तेदार को वहां पर उनसे मिलने की इजाजत नहीं दी गई, बल्कि उन्हें गिरफ्तारी और हिरासत की धमकी दी गई। आमिर की बहन ने सूचना दी कि उसे हिरासत में बेरहमी से पीटा गया है और 2,63,000 रुपये की रिकवरी की नोटिस दे दी गई है। पुलिस ने तर्क दिया है कि उन्होंने लोगों की पहचान करने के लिए विरोध प्रदर्शन से वीडियो फुटेज का इस्तेमाल किया है।

उन्होंने विरोध प्रदर्शन खत्म होने के काफी समय बाद लोगों को घरों और सड़कों से उठा लिया। कई मामलों में परिवारों को नहीं पता था कि लोगों को कहाँ हिरासत में रखा गया है। इस तरह की घटनाओं में सामूहिक गिरफ्तारी का यह एक महत्वपूर्ण पहलू है। पुलिस द्वारा पर्याप्त समय के लिए कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती है, और इस प्रकार किसी कानूनी सहायता के बिना जेल में बंद कर दिया जाता है, क्योंकि उनकी गिरफ्तारी उनके परिवारों को भी नहीं पता है।

पुलिस द्वारा संपत्ति पर हमला

आरएएफ और यूपी पुलिस के साथ-साथ ‘पुलिस-मित्र’ ने पूरे राज्य में संपत्ति का व्यापक विनाश किया। कुछ मामलों में, उन्होंने सड़कों पर निजी वाहनों और दुकानों पर हमला किया, दूसरों में, उन्होंने मुस्लिम नागरिकों के घरों में प्रवेश किया और सब कुछ नष्ट कर दिया। तथ्य-खोजी टीमों और मुजफ्फरनगर, मेरठ और कानपुर के प्रमाणों से पता चलता है कि स्ट्रीट लाइट बंद होने के बाद पुलिस और आरएएफ ने सड़कों पर संपत्तियां नष्ट कर दीं। मुजफ्फरनगर में यह रात में लगभग 10:30 बजे किया गया जब उन्होंने मस्जिदों, घरों और दुकानों में प्रवेश किया। मेरठ में स्ट्रीट लाइटों को बंद करने के साथ-साथ पुलिस ने सीसीटीवी कैमरों और अन्य चीजों को भी नष्ट कर दिया है जो संभावित रूप से उन्हें फंसा सकते थे।

मुजफ्फरनगर में पुलिस द्वारा संपत्ति को नष्ट करने की सबसे बड़ी कार्रवाई की गई। स्थानीय लोगों ने तथ्य-खोजी टीम को बताया कि 20 दिसंबर 2019 की रात को, कुछ 250-300 आरएएफ और पुलिस के जवान उपद्रव करने और स्थानीय लोगों को आतंकित करने के लिए इलाके में घुस आए। सादे कपड़ों और चेहरे ढके लोगों के साथ पुलिस मुस्लिम-विरोधी नारे लगा रही थी और बार-बार तंज कसे जा रही थी, ‘’तुम्हें आजादी चाहिए? ये लो आजादी।” हर्ष मंदर ने ट्रिब्यूनल को गवाही दी कि मुजफ्फरनगर में एक-एक घर में उन्होंने देखा कि पुलिस ने खुद घरों में घुसकर संपत्ति, फ्रिज, क्रॉकरी, कटलरी, हर चीज को नष्ट कर दिया था।

दर्जी वाली गली में एक घर और सरवत रोड पर दो घर पुलिस और आरएएफ के जवानों द्वारा पूरी तरह से रौंद दिए गए थे। दर्जी वाली गली में एक मस्जिद का लोहे का बड़ा गेट, बिजली का मीटर और खिड़कियों के शीशे पूरी तरह से चकनाचूर कर दिए गए थे। टूटे हुए पुलिस के डंडे और एक नीली आरएएफ वर्दी टोपी अभी भी घरों में पड़ी हुई थी, साथ ही परिवारों के नष्ट हुए निजी सामान भी। तथ्य खोजने वाली टीम ने एक जूता व्यापारी के घर का दौरा किया जो पुलिस द्वारा पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया था। मालिक ने तथ्य खोज टीम को बताया कि 20 दिसंबर की रात को लगभग 50-60 पुलिस कर्मियों ने मुख्य द्वार को तोड़ दिया और उनके घर में घुस गए।

घर के मालिक उस समय मौजूद एकमात्र पुरुष सदस्य थे और घर की तीन अन्य महिलाएँ थीं। घर के अंदर हमने प्रचंड बर्बरता और संपत्ति के विनाश का एक दृश्य देखा। उनकी मारुति कार (डिजायर) और चार स्कूटर पूरी तरह से तोड़ दिए गए थे, और शौचालय, वॉशबेसिन, फर्नीचर, आलमारी, क्रॉकरी, पंखे, कूलर, फ्रिज, लाइट, वॉशरूम के प्लंबिंग पाइप, और दीवार हैंगिंग सहित अंदर सब कुछ बिखर गया था। बुजुर्ग मालिक को लाठियों से बेरहमी से पीटा गया और महिलाओं को मार डाला गया। पीड़ितों का दावा है कि पुलिस ने उनकी पोती की शादी के लिए घर में रखी सारी नकदी और गहने चुरा लिए थे।

न्याय का खतरनाक स्वप्न: न्याय प्रणाली को भी नागरिकों के खिलाफ हथियार बना लिया गया

बिना नाम वाली एफआईआर जिनमें मनमर्जी किसी का भी नाम डाल दिया जाए

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, कानपुर अनंत देव ने कहा कि “विभिन्न शहर क्षेत्रों में 21,500 लोगों के खिलाफ कम से कम 15 एफआईआर दर्ज की गई हैं और 13 को अब तक गिरफ्तार किया गया है। “अज्ञात दंगाइयों” के खिलाफ इस तरह की अनाम एफआईआर पुलिस द्वारा ऐतिहासिक रूप से समुदाय को आतंकित करने और मनमाने ढंग से गिरफ्तारी या नजरबंदी को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल की जाती रही है।

यह पुलिस प्रशासन को आम लोगों को फंसाने, डराने और आतंकित करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश देता है। यह समुदाय द्वारा महसूस किए जा रहे डर और असुरक्षा की भावना का एक बड़ा कारण है। हर वारदात के लिए एक अलग एफआईआर होनी चाहिए। और फिर उस मामले को किसी एक अन्वेषक को आवंटित किया जाता है। यूपी में जो हो रहा है, वह यह है कि सभी मामलों को एक में जोड़ दिया जा रहा है और एक व्यक्ति को दे दिया जा रहा है।

समुदाय और परिवार को धमकाना

परिवार के ऊपर और समुदाय में उत्पन्न सामान्य भय तो था ही, इसके अलावा पुलिस ने डराने-धमकाने के लिए बहुत ही लक्षित दृष्टिकोण अपनाया है और इसलिए समुदाय के अधिकारों को और अधिक सीमित कर दिया है। कई तथ्यों को खोजने वाली टीमों के वकील और सदस्य सुरूर मंडेर ने ट्रिब्यूनल में गवाही दी कि जब पुलिस के खिलाफ कानूनी सहारा लेने का प्रयास किया गया, तो स्थानीय वकीलों और समुदायों पर राज्य प्रशासन द्वारा जिस तरह का दबाव डाला गया वह बेहद स्पष्ट था।

उसने बताया कि कई कानूनी पेशेवरों, विशेष रूप से वरिष्ठ अधिवक्ताओं को राज्य द्वारा समझौता करने के लिए कहा गया है। उनका उपयोग, खासकर जहां मौतें हुई हैं वहां समुदायों पर दबाव डालने के लिए भी किया जाता रहा है, ताकि लोग उन मामलों में हस्तक्षेप न करें। पुलिस के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को रोकने के इरादे से परिवारों को भी धमकाया गया है। पुलिस ने यह सुनिश्चित करने के लिए कई रणनीतियों का सहारा लिया है कि पुलिसकर्मियों को किसी भी तरह से किसी भी मौत या घायल के मामले में किसी भी तरह से फंसाया न जाए।

फिरोजाबाद में, जब वे घटना स्थल पर पहुंचे, तो उन्हें रशीद का शव जमीन पर मिला, जो तीन अन्य शवों के बगल में पड़ा था, जिनमें से एक 8 वर्षीय लड़के का शव था। जब वे शव को फिरोजाबाद अस्पताल ले गए, तो डॉक्टर ने तुरंत कहा कि वह पुलिस की गोली से घायल हुआ है। पुलिस के दबाव के कारण, राशिद के शरीर पोस्टमार्टम नहीं किया गया। शव को उठाकर अस्पताल ले जाने और फिर उनके घर ले जाने में परिवार के साथ-साथ ही रही।

उन्होंने परिवार पर दबाव डाला कि वह उसको रात में ही दफनाया जाए। पुलिस भी परिवार के साथ गई और रात में शव को दफन करा दिया। उन्होंने परिवार को सख्त हिदायत दी कि वे किसी को भी न बुलाएं, पड़ोसियों तक को नहीं। मेरठ में मृत्यु के सभी मामलों में, परिवारों को शरीर को तुरंत दफनाने के लिए समान रूप से दबाव डाला गया था, और लगभग हमेशा, उन्हें शव को अपने इलाक़े में या दफन करने के पारंपरिक स्थान पर ले जाने की अनुमति नहीं दी क्योंकि पुलिस को डर था कि यह आगे के तनाव को उकसा सकता है।

(रिपोर्ट शैलेश ने तैयार की है। आप स्वतंत्र लेखक और पत्रकार हैं।)

This post was last modified on March 14, 2020 5:15 pm

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Janchowk Official Journalists in Delhi

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