जनाब! खुद पर ही लानत भेजता हूँ कि ‘मेरे’ देश की आला अदालत ऐसी ज़ुबान बोलती है, थू है मुझ पर

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मी लॉर्ड, आप संविधान के मुहाफ़िज़ ठहराए गए हैं! इतना निष्ठुर होने की आप से उम्मीद नहीं की जाती। उस जन हित याचिका को आपने अदालत के दरवाज़े से लौटा दिया जो ज़िलाधिकारियों को आपसे बस यह निर्देश भेजे जाने की मांग कर रही थी कि अटके और भटके हुए प्रवासी मज़दूरों को वे चिह्नित करें, ठिकाना-दाना-पानी और सवारी मुहैया कराएँ। आपने यह कह कर याचिका लौटा दी कि ऐसा निर्देश देना राज्यों का काम है।

यही नहीं, आपने याचिकाकर्ता वकील को फटकार भी लगाई कि वह अखबारी कतरनें इकट्ठा करके अपने को बड़ा आलिम-फ़ाज़िल समझने लगा है। और यह कहकर तो आपने हर चीज़ का दोष निरीह मज़दूरों पर ही मढ़ दिया कि उन्हें कैसे रोका जा सकता है, वे तो मानने को राज़ी नहीं हैं। वे जाकर रेलवे लाइन पर सो जाएँ तो कोई भला क्या कर सकता है?

जनाब, अखबार पढ़कर कोई आलिम-फ़ाज़िल तो नहीं बन सकता, पर उन्हें न पढ़ने से बन सकता हो, ऐसा भी नहीं है। आप पंच परमेश्वर के आसन पर जमे हैं और आपको यह भी पता नहीं कि सरकार की क्या ज़िम्मेदारियाँ हैं और वह कैसे उन ज़िम्मेदारियों से अपना पल्ला छुड़ाये बैठी है? वकील को फटकार लगाने के बजाय आप उस सरकार और उसके मुखिया को फटकार लगाते जिसने 23 मार्च की रात को आठ बजे बिना किसी तैयारी के चार घंटे बाद से देश भर में तालाबंदी की घोषणा कर दी, तो आपमें हमारा भरोसा थोड़ा मज़बूत होता।

अगर आपने सरकार से, यानी अदालत में मौजूद महाधिवक्ता से पूछा होता कि अपनी दिहाड़ी ख़त्म हो जाने की असुरक्षा में जो मज़दूर जैसे-तैसे अपने गाँवों की और निकल पड़े, उनके लिए सरकार ने क्या ठोस इंतज़ामात किये, तो आप में थोड़ा भरोसा जगता। आपमें भरोसा जगता अगर आपने सभी राज्य-सरकारों को लाइन हाज़िर होने के लिए कहा होता और उनसे पूछा होता कि अगर सुदूर दक्षिण में एक राज्य अपने यहाँ काम करने वाले प्रवासियों को अतिथि कह कर उनके लिए कैम्प्स में ‘डिस्टेंसिंग’ बरतते हुए तीन बार के भोजन और रहने की व्यवस्था कर सकता है तो यह हर राज्य के लिए क्यों नहीं संभव है?

पर मी लॉर्ड, आप दूसरों से यह सब पूछने के बजाय वकील को ही फटकार लगा रहे हैं और मज़दूर के सिर पर ही हर अव्यवस्था का ठीकरा फोड़ रहे हैं, यह कैसा न्याय है! उदारीकरण ने इस निरीह मज़दूर की श्वास-प्रणाली को, इसके फेफड़ों को पहले से कमज़ोर कर रखा था और लॉकडाउन के वायरस का हमला होने पर जब यह कमज़ोरी सतह पर आ गयी, फेफड़े हक्क-हक्क करने लगे, तो ये प्राणवायु के लिए छटपटाते बाहर निकले हैं।

वकील न सही, आप तो आलिम-फ़ाज़िल हैं! क्या आपको नहीं पता कि पिछले 29 सालों में इन्हें जिस हाल में पहुंचाया गया है, उसके बाद अचानक लॉकडाउन इनके लिए जानलेवा ही हो सकता था। हज़ार-दो हज़ार किलोमीटर के लिए पैदल निकल पड़ना क्या मज़ाक है! क्या जिसके पास अपना या सरकार का दिया कोई भी सहारा हो, वह ऐसा कर सकता है? फिर जनाब, आपके मुंह से यह कैसे निकल गया कि ‘How can anybody stop this when they sleep on railway tracks?’

आपसे तो कुछ कह नहीं सकता, जनाब! खुद पर ही लानत भेजता हूँ कि ‘मेरे’ देश की आला अदालत ऐसी ज़ुबान बोलती है। थू है मुझ पर!

(संजीव कुमार के फ़ेसबुक वाल से साभार।)

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