सुप्रीम कोर्ट ने अग्निपथ योजना के बाद रद्द पिछली भर्तियों को पूरा करने की मांग की याचिका को किया खारिज

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केंद्र सरकार की अग्निपथ योजना को इस तरह अब सुप्रीम कोर्ट से भी हरी झंडी मिल गई है। सुप्रीम कोर्ट ने उन याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिसमें भारतीय सेना और वायु सेना के लिए शुरू की गई भर्ती प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी।

भर्ती प्रक्रिया जून 2022 में ‘अग्निपथ’ योजना की घोषणा के बाद बंद कर दिया गया था। याचिकाएं दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखने के खिलाफ दायर की गई थीं।अग्निपथ योजना के तहत साढ़े 17 से 23 साल की उम्र के लोग सशस्त्र बलों में शामिल होने के लिए आवेदन कर सकते हैं, जिनका कार्यकाल चार साल का होगा।

चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने ये कहते हुए याचिकाओं को खारिज कर दिया कि उम्मीदवारों के पास भर्ती प्रक्रिया को पूरा करने का कोई निहित अधिकार नहीं है।

पीठ ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि ‘वचनबद्धता विबंधन का सिद्धांत’ लागू होगा। सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा, “हमारे लिए हस्तक्षेप करने के लिए कुछ भी नहीं है। यह सार्वजनिक रोजगार का मामला है, अनुबंध का नहीं।

लेकिन अग्निपथ योजना के आने से पहले एयरफोर्स में नियुक्ति के लिए इंतजार कर रहे उम्मीदवारों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करने को तैयार हो गया है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में 17 अप्रैल को सुनवाई करेगा।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि अग्निपथ योजना राष्ट्रीय हित में तैयार की गई थी और यह सुनिश्चित करने के लिए कि सशस्त्र बल बेहतर तरीके से तैयार हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दो याचिकाएं दायर की गई थीं।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश एडवोकेट अरुणव मुखर्जी ने शुरू में स्पष्ट किया कि वह इस योजना को चुनौती नहीं दे रहे हैं और यह मामला सेना और वायु सेना के लिए पूर्व में अधिसूचित भर्ती प्रक्रियाओं को पूरा करने तक ही सीमित है।

उन्होंने प्रस्तुत किया कि केंद्र सरकार ने कोविड का हवाला देते हुए कई बार परीक्षा स्थगित की और जून में अचानक अग्निपथ योजना की घोषणा की गई। वकील ने कहा कि वायु सेना के संबंध में परीक्षाएं आयोजित की गईं लेकिन परिणाम प्रकाशित नहीं किए गए। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि परीक्षाएं कभी रद्द नहीं की गईं और केवल स्थगित की गईं।

चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से कहा, “तो जो प्रक्रिया पहले शुरू हुई थी- फिजिकल और मेडिकल टेस्ट हुआ, लेकिन एंट्रेंस टेस्ट नहीं हुआ। और जब नई योजना आई, तो उन्होंने इसे आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया है, लेकिन इस पर कोई निहित अधिकार नहीं है।” वकील ने आग्रह किया कि याचिकाकर्ताओं को शामिल किए जाने पर भी अग्निपथ योजना प्रभावित नहीं होगी।

केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने पीठ को बताया कि दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले ने इन मुद्दों से विस्तार से निपटा है। यह चुनने की प्रक्रिया नहीं है। हमें रक्षा और राष्ट्रीय हित के हित में रिक्तियों को भरना था। एएसजी ने जोर देकर कहा कि अत्यावश्यकता के कारण हमें इस तरह से भर्तियों को संशोधित करने की आवश्यकता थी।

एक अन्य मामले में पेश हुए एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को कई परीक्षण प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद अनंतिम सूची में रखा गया था। फिर एक साल तक वे कहते रहे कि नियुक्ति पत्र जारी किए जाएंगे, लेकिन टालते रहे।

हम पूरी प्रक्रिया से गुजरे और फिर भी भर्ती नहीं हुई। इन लोगों की दुर्दशा की कल्पना कीजिए। तीन साल से वे इंतजार कर रहे हैं। भूषण के अनुरोध पर, पीठ ने 17 अप्रैल को उनकी याचिका पर अलग से विचार करने पर सहमति व्यक्त की, लेकिन अन्य याचिका (जिसमें मुखर्जी पेश हुए) को खारिज कर दिया।

पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती देने वाली एडवोकेट एमएल शर्मा की याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें अग्निपथ योजना को बरकरार रखा गया था। शर्मा का मुख्य तर्क ये था कि योजना को एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से पेश नहीं किया जा सकता और इसके लिए एक संसदीय कानून की आवश्यकता थी।

अग्निपथ योजना के अनुसार 17 से 23 वर्ष की आयु के लोगों को चार साल के कार्यकाल के लिए सशस्त्र बलों में शामिल होने के लिए आवेदन करने के लिए पात्र बनाया गया था।

(जे पी सिंह वरिष्ठ पत्रकार एवं कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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