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सुप्रीम कोर्ट 45 साल बाद परखेगा इमरजेंसी की संवैधानिकता, विवादों का पंडोरा बॉक्स खुलना तय

उच्चतम न्यायालय अब इस बात की जांच-पड़ताल करने जा रहा है कि 1975 में इंदिरा गांधी सरकार की लगाई हुई इमरजेंसी को क्या ‘पूरी तरह असंवैधानिक’ घोषित किया जा सकता है। एक 94 साल की महिला की याचिका पर कोर्ट ने केंद्र से 14 दिसंबर को जवाब मांगा है। सुनवाई की अनुमति देकर उच्चतम न्यायालय ने पंडोरा बॉक्स खोल दिया है। महिला की ओर से तर्क दिया गया है कि ताकत के गलत इस्तेमाल को ठीक किया जाना चाहिए और कई सालों बाद युद्ध अपराधों की सुनवाई होती है। हालांकि इमरजेंसी तत्कालीन संविधिक प्रावधानों के अनुरूप थी, वर्ना जनता पार्टी सरकार को 1978 में संविधान संशोधन नहीं करना पड़ता।

हो सकता है कि अभी उन तमाम मामलों की फिर से सुनवाई उच्चतम न्यायालय न करे, जिनसे मोदी सरकार की किरकिरी होती हो, पर कौन जाने भविष्य में ऐसी सरकार हो जिसे मोदी सरकार के कार्यकाल से शिकायत हो तो राफेल, राम मंदिर, कोरोना के दोषी, संपत्तियां बेचने, नोटबंदी और जीएसटी घोटाले, गुजरात दंगे, जज लोया की संदिग्ध मौत, गुजरात के फ़र्ज़ी मुठभेड़, कांग्रेस नेता एहसान जाफरी की दंगाइयों द्वारा जला कर हत्या, हरेन पंड्या हत्याकांड, अडानी-अंबानी के लिए देश के आर्थिक हितों से समझौता जैसी कारगुजारियों की नए सिरे से सुनवाई हो सकती है। उच्चतम न्यायालय ने 45 साल बाद इमरजेंसी की सुनवाई करने की स्वीकारोक्ति देकर न्यायिक नजीर बना दी है। पीठ ने कहा कि वो देखेगी कि क्या इमरजेंसी लगाए जाने के 45 सालों बाद इसकी वैधता की जांच करना ‘संभव या वांछित’ है।

उच्चतम न्यायालय में याचिका 94 साल की वीना सरीन ने दायर की है। वीना चाहती हैं कि कोर्ट इमरजेंसी को असंवैधानिक घोषित करे। उन्होंने कहा कि इमरजेंसी में उन्हें और उनके पति को देश छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था और उनकी संपत्तियां छीन ली गईं थीं और मेरे पति इस दबाव की वजह से चल बसे थे। महिला ने बताया कि 1975 में उनका दिल्ली में अच्छा गोल्ड आर्ट्स बिजनेस था और बिना किसी वजह के जेल में डाल दिए जाने के डर से उन्हें देश छोड़ कर जाना पड़ा था। वीना सरीन ने याचिका में इस असंवैधानिक कृत्य में सक्रिय भूमिका निभाने वालों से 25 करोड़ रुपये का मुआवजा दिलाने का भी अनुरोध किया है।

पीठ पहले इस याचिका को मंजूर करने में झिझक रही थी। पीठ ने कहा कि हमें मुश्किल हो रही है। इमरजेंसी ऐसी घटना है जो नहीं होनी चाहिए थी। याचिकाकर्ता के वकील हरीश साल्वे से जस्टिस कौल ने कहा कि कोई घटना 45 साल पहले इतिहास में हुई है, लेकिन अब इस विवाद में जाना? इस याचिका को मंजूर करने में हमें मुश्किल हो रही है। हम इन विवादों को देखते नहीं रह सकते हैं, लोग जा चुके हैं।

हरीश साल्वे ने कहा कि ताकत के गलत इस्तेमाल को ठीक किया जाना चाहिए और कई सालों बाद युद्ध अपराधों की सुनवाई होती है। साल्वे ने कहा कि एक लोकतंत्र के अधिकारों का 19 महीनों तक हनन हुआ था। ये हमारे संविधान पर सबसे बड़ा हमला था। ये राजनीतिक बहस नहीं है और इसे उच्चतम न्यायालय को तय करना चाहिए। साल्वे ने कहा कि याचिकाकर्ता राजनीतिक शख्सियत नहीं हैं, वो इमरजेंसी से प्रभावित हैं और कोर्ट को इमरजेंसी को अवैध करार देना चाहिए।

पीठ ने कहा कि वह इस पहलू पर भी विचार करेगा कि क्या 45 साल बाद आपात काल लागू करने की वैधता का परीक्षण व्यावहारिक है। इस याचिका को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र को नोटिस जारी किया है। बता दें कि आपातकाल को 45 साल बीत चुके हैं।

देश में 25 जून, 1975 की आधी रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी थी। यह आपातकाल 1977 में खत्म हुआ था। इंदिरा गांधी ने संविधान के अनुच्छेद 352 में ‘आंतरिक अशांति’ के प्रावधान के आधार पर राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा की थी।

आपातकाल में हुए संशोधनों में सबसे पहला था, भारतीय संविधान का 38वां संशोधन। 22 जुलाई 1975 को पास हुए इस संशोधन के द्वारा न्यायपालिका से आपातकाल की न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार छीन लिया गया। इसके लगभग दो महीने बाद ही संविधान का 39वां संशोधन लाया गया। यह संविधान संशोधन इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री पद को बनाए रखने के लिए किया गया था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर चुका था, लेकिन इस संशोधन ने न्यायपालिका से प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त व्यक्ति के चुनाव की जांच करने का अधिकार ही छीन लिया। इस संशोधन के अनुसार प्रधानमंत्री के चुनाव की जांच सिर्फ संसद द्वारा गठित की गई समिति ही कर सकती थी। आपातकाल को समय की जरूरत बताते हुए इंदिरा गांधी ने उस दौर में लगातार कई संविधान संशोधन किए। 40वें और 41वें संशोधन के जरिए संविधान के कई प्रावधानों को बदलने के बाद 42वां संशोधन पास किया गया।

यही नहीं इंदिरा सरकार ने आपातकाल के दौरान  वर्ष 1976 में 42वां संविधान संशोधन (1976) पारित कराया था। इसके द्वारा संविधान में व्यापक परिवर्तन लाए गए, जिनमें से मुख्य निम्लिखित थे-
(क) संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ ‘धर्मनिरपेक्ष’ एवं ‘एकता और अखंडता’ आदि शब्द जोड़े गए।
(ख) सभी नीति-निर्देशक सिद्धांतों को मूल अधिकारों पर सर्वोच्चता सुनिश्चित की गई।
(ग) इसके अंतर्गत संविधान में दस मौलिक कर्तव्यों को अनुच्छेद 51(क), (भाग-iv क) के अंतर्गत जोड़ा गया।
(घ) इसके द्वारा संविधान को न्यायिक परीक्षण से मुख्यत किया गया।
(ङ) सभी विधानसभाओं एवं लोकसभा की सीटों की संख्या को इस शताब्दी के अंत तक के लिए स्थिर कर दिया गया।
(च) लोकसभा एवं विधानसभाओं की अवधि को पांच से छह वर्ष कर दिया गया।
(छ) इसके द्वारा यह निर्धारित किया गया कि किसी केंद्रीय कानून की वैधता पर सर्वोच्च न्यायालय एवं राज्य के कानून की वैधता का उच्च न्यायालय परीक्षण करेगा। साथ ही, यह भी निर्धारित किया गया कि किसी संवैधानिक वैधता के प्रश्न पर पांच से अधिक न्यायधीशों की बेंच द्वारा तिहाई बहुमत से निर्णय दिया जाना चाहिए और योदि न्यायाधीशों की संख्या पांच तक हो तो निर्णय सर्वसम्मति से होना चाहिए।
(ज) इसके द्वारा वन संपदा, शिक्षा, जनसंख्या- नियंत्रण आदि विषयों को राज्य सूचि से समवर्ती सूची के अंतर्गत कर दिया गया।
(झ) इसके अंतर्गत निर्धारित किया गया कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद एवं उसके प्रमुख प्रधानमंत्री की सलाह के अनुसार कार्य करेगा।
(ट) इसने संसद को राष्ट्र विरोधी गतिविधियों से निपटने के लिए कानून बनाने के अधिकार दिए एवं सर्वोच्चता स्थापित की।

इसके बाद जब केंद्र में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार आई तो उसने 44वां संशोधन (1978) संसद से पारित कराया। इसके अंतर्गत राष्ट्रीय आपात स्थिति लागू करने के लिए आंतरिक अशांति के स्थान पर सैन्य विद्रोह का आधार रखा गया एवं आपात स्थिति संबंधी अन्य प्रावधानों में परिवर्तन लाया गया, जिससे उनका दुरुपयोग न हो। इसके द्वारा संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों के भाग से हटा कर विधेयक (क़ानूनी) अधिकारों की श्रेणी में रख दिया गया। लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं की अवधि 6 वर्ष से घटाकर पुनः 5 वर्ष कर दी गई। उच्चतम न्यायालय को राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति के निर्वाचन संबंधी विवाद को हल करने की अधिकारिता प्रदान की गई।

44वां संविधान संशोधन (1978) अत्यंत व्यापक एवं महत्वपूर्ण हैं। इसे जनता दल की सरकार ने 42वें संविधान संशोधन द्वारा किए गए अवांछनीय परिवर्तनों को समाप्त करने के लिए पारित किया था। इसके द्वारा किए गए प्रमुख संशोधन निम्नलिखित हैं-
क- अनुच्छेद 352 में राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा का आधार ‘आंतरिक अशांति’ के स्थान पर ‘सशस्त्र विद्रोह’ को रखा गया। अतः अब राष्ट्रपति आपात की उद्घोषणा ‘आंतरिक अशांति’ के आधार पर की जाती है।
ख- यह भी उपबंधित किया गया कि राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा तभी करेगा, जब उसे मंत्रिमंडल द्वारा इसकी लिखित सूचना दी जाए।

ग- संपत्ति के मूलाधिकार को समाप्त करके इसे अनुच्छेद 300क, के तहत विविध अधिकार का दर्जा प्रदान किया गया। इसके लिए अनुच्छेद 31 तथा अनुच्छेद 19 को निरस्त किया गया।
घ- अनुच्छेद 74 में पुनः संशोधन कर राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया कि वह मंत्रिमंडल की सलाह, को एक बार पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है, किन्तु पुनः दी गई सलाह को मानने के लिए बाध्य होगा।
ङ- लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं की अवधि पुनः 5 वर्ष कर दी गई।
च- उच्चतम न्यायालय को राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति के निर्वाचन संबंधी विवाद को हल करने की अधिकारित पुनः प्रदान कर दी गई।

न्यायपालिका को दोबारा मजबूत करने और 42वें संशोधन के दोषों को दूर करने के साथ ही 44वें संशोधन ने संविधान को पहले से भी ज्यादा मजबूत करने का काम भी किया है। इस संशोधन ने संविधान में कई ऐसे बदलाव किए, जिससे 1975 के आपातकाल जैसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो। इस संशोधन ने मौलिक अधिकारों को भी मजबूती दी। जनता पार्टी भले ही अपने इस कार्यकाल के बाद पूरी तरह बिखर गई हो, लेकिन उसने निश्चित ही भारतीय संविधान को बिखरने से बचाया था।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on December 15, 2020 12:02 pm

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