विकास एनकाउंटर मामला: ‘यूपी में ऐसी घटना दोबारा नहीं हो’ मौखिक कथन है, जिसका न्यायिक महत्व शून्य है

विकास दुबे एनकाउंटर केस में उच्चतम न्यायालय ने सरकार को यह नसीहत दी है कि यूपी में ऐसी घटना दोबारा नहीं हो, इसे सुनिश्चित किया जाए। लेकिन आप शायद नहीं जानते कि उच्चतम न्यायालय की यह टिप्पणी मौखिक है। इस मामले में उच्चतम न्यायालय का जो आदेश सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड हुआ है उसमें उक्त टिप्पणी का कोई उल्लेख नहीं है। यदि उल्लेख होता तो विकास दुबे एनकाउंटर केस की जाँच के लिए कोई आयोग बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ती क्योंकि मौखिक टिप्पणी से ही यह ध्वनि निकल रही है कि एनकाउंटर फर्जी था।

उच्चतम न्यायालय की मौखिक टिप्पणियों का कानून की नजर में रत्ती भर भी महत्व नहीं होता। इस बीच तीन सदस्यीय जांच आयोग में शामिल पूर्व पुलिस महानिदेशक के.एल. गुप्ता की शुचिता, यानि निष्पक्षता को लेकर गम्भीर सवाल उठ खड़े हो गये हैं, क्योंकि विकास दुबे एनकाउंटर पर केएल गुप्ता पहले ही कह चुके हैं कि शक करना ठीक नहीं है।

गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय  ने विकास दुबे एनकाउंटर मामले की जांच के लिए रिटायर्ड जस्टिस बीएस चौहान की अगुआई में तीन सदस्यीय जांच आयोग की नियुक्ति को मंजूरी दी है और इसे दो महीने के अंदर अदालत और उत्तर प्रदेश सरकार को रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा है। आयोग के अन्य दो सदस्यों में इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस शशिकांत अग्रवाल और पूर्व पुलिस महानिदेशक के.एल. गुप्ता हैं। केएल गुप्ता जांच की टीम में शामिल होने से पहले कुछ दिन पूर्व ही एक टीवी डिबेट में विकास के एनकाउंटर को सही ठहराते नजर आए थे। अब ये निष्पक्ष जांच कैसे करेंगे यह शोध का विषय है।

के एल गुप्ता उत्तर प्रदेश के तेज तर्रार अफसरों में से एक माने जाते हैं। पूर्व आईपीएस केएल गुप्ता 2 अप्रैल 1998 से 23 दिसंबर 1999 तक कल्याण सिंह की सरकार के दौरान उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक पद पर रहे थे। कुछ दिन पहले ही विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद एक टीवी डिबेट पर के एल गुप्ता नजर आए थे। इस शो में एनकाउंटर से जुड़े कई सवालों के जवाब देते नजर आए।

विकास दुबे की गाड़ी के एक्सीडेंट पर जब एंकर ने सवाल पूछा तो के एल गुप्ता ने जवाब देते हुए कहा था कि मैं आपको शुक्रिया अदा करना चाहूंगा कि आपकी टीम उज्जैन से विकास दुबे के साथ चली आई, उसके तो मां-बाप और भाई बहन भी इस तरह से उसके साथ नहीं आए होंगे। जिस तरह से आप लोग साथ-साथ चले। टोल बैरियर पर पुलिस की गाड़ी तो निकल जाती है। दूसरी गाड़ियों की चेकिंग में 10-मिनट लगते हैं, उसी में प्रेस वालों ने हंगामा करना शुरू कर दिया। हर चीज को आप निगेटिविटी से मत देखिए।

यही नहीं केएल गुप्ता ने कानपुर के बिकरू गांव में 8 पुलिस वालों की मौत का जिक्र करते हुए कहा था कि जो आठ पुलिस वाले मरे थे उनके लिए आपने क्या किया? क्या आपने उनके घर जाकर देखा कि उनके घरवाले भूखे मर रहे हैं या क्या कर रहे हैं।  विकास दुबे के घर कारबाइन कहां से आई, उसने अपने घर में फैक्ट्री बना रखी थी, उसकी आपने तफ्तीश की। केएल गुप्ता ने विकास दुबे की गाड़ी बदलने की थ्योरी पर कहा था कि आप लोग घर चीज पर डाउट क्यों करते हैं, अरे सरप्राइज एलिमेंट के लिए गाड़ी भी बदल दी जाती है।  हाइवे पर रोज गाड़ी पलटती हैं, लोगों का एक्सीडेंट होता है।

दरअसल उत्तर प्रदेश का विकास दुबे एनकाउंटर पर उत्तर प्रदेश के डीजीपी एचसी अवस्थी ने जो हलफनामा उच्चतम न्यायालय में दाखिल किया था वह वही पुलिसिया कहानी थी जो यूपी पुलिस मुठभेड़ को सही साबित करने के लिए मुठभेड़ के दिन से ही बार बार दोहराती रही है।  

यह सर्वविदित है कि सीआरपीसी में कोई ऐसा प्रावधान नहीं है कि किसी भगोड़े अपराधी का मकान बिना कोर्ट के तत्सम्बन्धी किसी प्रकार के आदेश के ज़मींदोज कर दिया जाये । पुलिस ने  विकास दुबे के बिकरू गाँव के मकान को बिना किसी वैधानिक आदेश के  ज़मींदोज़ कर दिया गया। एफ़िडेविट के अनुसार पुलिस को ऐसी सूचना मिली थी कि उक्त मकान की दीवारों में सुराख़ करके उनमें हथियार और गोला बारूद छिपाया गया था। पुलिस ने ‘पहले दीवारों की खुदाई शुरू की और इस प्रक्रिया में बिल्डिंग का कुछ भाग भरभरा कर गिर पड़ा।’ पुलिस को वहाँ से एक एके-47 रायफल और बम, विस्फोटक आदि मिले।

वास्तव में  जिस समय मकान को विकास गुप्ता के जेसीबी की मदद से धाराशाई किया जा रहा था, घटनास्थल पर सैकड़ों की तादाद में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के संवाददाता मौजूद थे। कोई पत्रकार ऐसा नहीं जिसकी आँखों के सामने हथियार निकले हों। स्वयं प्रदेश सरकार के जनसम्पर्क विभाग और पुलिस के पीआर वाले इस दिन किसी हथियार की स्टिल या वीडियो तस्वीर जारी नहीं कर सके थे।पुलिस की एफ़िडेविट के अनुसार खुदाई के दौरान मकान के कुछ हिस्से धराशाई हो गए। हक़ीक़त यह है कि समूचे मकान को ही धराशाई कर दिया गया था।

पुलिस हलफनामे में मोटर के पलट जाने की कहानी में भी झोल है । यदि मान भी लिया जाये कि पुलिस वाहन बाईं ओर से आते रेवड़ से बचने के लिए दाहिनी ओर मुड़ा होगा। हाइवे पर इस तरफ़ पक्की सड़क से 1 फुट की दूरी पर तारों का कसा हुआ बाड़ खींचा गया है। जिस जगह गाड़ी पलटी है, वहाँ के कंक्रीट सड़क पर कोई नुक़सान नहीं पहुँचा है।यही नहीं गाड़ी पलट गयी, बाक़ी पुलिस वाले चोटिल होकर अर्धमूर्क्षित हो गये पर दो खाकी के बीच बैठा विकास बिना चोट खाये उठा, पलटी गाड़ी से पीछे की सीट को तोड़कर कैसे बाहर निकला और उसने इन्स्पेक्टर की पिस्तौल छीनी और पीछे के दरवाज़े से टहलता हुआ (पैर में रॉड पड़ी होने से वह ओलम्पियन की रफ़्तार से हरगिज़ नहीं भाग सकता) दूर कच्ची सड़क तक पहुँच गया।यह सब शोध का विषय है जिसे जस्टिस चौहान का आयोग करेगा और कोर्ट को बतायेगा।

इसके अलावा सभी बिन्दुओं में झोल ही झोल है। वो कहते हैं कि एक झूठ को सच साबित करने के लिए हजार झूठ बोलने पड़ते हैं फिर भी झूठ-झूठ ही रहता है ।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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