स्वामी चिन्मयानंद मामले में दोनों पक्षों का हृदयपरिवर्तन

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अदालत में आये दिन न्याय और आपराधिक न्याय प्रणाली का आये दिन मखौल उड़ता है जब  मुकदमें के ट्रायल के दौरान वादी व गवाह खुद अपने बयान से मुकर जाते हैं। यहाँ तक कि एक दूसरे के खिलाफ दर्ज़ कराये गये एफआईआर के मुकदमों, जिन्हें न्याय की भाषा में क्रास केस कहा जाता है, में भी दोनों पक्ष अपने बयानों से मुकर जाते हैं और किसी भी पक्ष को सज़ा नहीं मिलती। अब यक्ष प्रश्न यह है कि क्या आरोप ही सही नहीं थे, या किन्हीं कारणों से बयान पलटने की नौबत आ गई, जो भी हो अदालत का वक्त तो बर्बाद होता ही है और पुलिस की भी छीछालेदर हो जाती है। हत्या, दुष्कर्म, धोखाधड़ी जैसे मामलों में वादी और गवाहों के मुकर जाने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। ऐसे मामलों में दोनों पक्षों में लेनदेन के साथ समझौता या गवाहों का बिक जाना या गवाहों के जान माल का खतरा कुछ भी संभव है।

ऐसा ही ताजा मामला रेप केस में फंसे पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं भाजपा नेता स्वामी चिन्मयानंद उर्फ कृष्णपाल सिंह का है जिन्हें एमपी/एमएलए कोर्ट ने बरी कर दिया है। इसके अलावा दुष्कर्म का आरोप लगाने वाली युवती और उसके साथियों को भी रंगदारी मांगने के मामले में कोर्ट ने बरी कर दिया है। दोनों मामलों (क्रास केस) में दोनों पक्षों के वादियों सहित सभी गवाह पक्षद्रोही हो गये थे यानि अपनी गवाहियों से मुकर गये थे। अब इस मामले में दोनों पक्षों में आपसी समझौता हो गया था या दोनों का हृदयपरिवर्तन यह शोध का विषय है।

इस मामले में दोनों पक्षों की गिरफ़्तारी और जेल हुई थी तथा इस मामले ने राजनितिक रंग भी लिया था और इसकी मीडिया में लगातार सुर्खियाँ बनी थीं। पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री चिन्मयानंद को 20 सितंबर, 2019 को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। वहीं, रंगदारी मामले में छात्रा व उसके दोस्तों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। 11 दिसंबर 2020 को शाहजहांपुर जेल से छात्रा को रिहाई मिली थी। वहीं, चिन्मयानंद को 135 दिनों बाद 4 फरवरी 2020 को इलाहाबाद हाईकोर्ट जमानत दी थी। 

सांसदों की एक विशेष अदालत ने शुक्रवार को पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता स्वामी चिन्मयानंद को शाहजहांपुर में लॉ स्टूडेंट को बंधकर बनाकर रखने और बलात्कार करने के आरोप से बरी कर दिया। विशेष न्यायाधीश पी. के. राय ने आरोपों से बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष ने मामलो को संदेह से परे साबित नहीं किया। पीड़ित छात्रा ने भी चिन्मयानंद के खिलाफ मुकदमे की सुनवाई के दौरान पक्षद्रोही (होस्टाईल) व्यवहार किया। अदालत ने दूसरी तरफ लॉ स्टूडेंट और उसके साथ अन्य सह-अभियुक्त संजय सिंह, डीपीएस राठौर, विक्रम सिंह, सचिन सिंह और अजीत सिंह, जिन पर चिन्मयानंद से पैसे मांगने की कोशिश करने के आरोप थे, उन्हें भी सभी आरोप से बरी कर दिया। अदालत ने चिन्मयानंद सहित आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।

चिन्मयानंद के खिलाफ मुकदमा 27 अगस्त, 2019 को शाहजहाँपुर के कोतवाली पुलिस स्टेशन में पीड़ित छात्रा के पिता की शिकायत पर दर्ज किया गया था, जिन्होंने कहा था कि उनकी बेटी चिन्मयानंद के आश्रम द्वारा संचालित कॉलेज में एलएलएम कर रही थी और वहाँ एक छात्रावास में रह रही थी। उन्होंने कहा था कि लड़की का मोबाइल फोन 23 अगस्त से बंद था। उन्होंने कहा कि उन्हें अपनी लड़की के फेसबुक अकाउंट से पता चला कि उसका चिन्मयानंद और उसके लोगों द्वारा यौन उत्पीड़न और बलात्कार करने की धमकी दी गई है। छात्रा के पिता ने आशंका व्यक्त की थी कि उनकी बेटी के साथ कुछ अनहोनी हुई है। उन्होंने कहा था कि जब उन्होंने चिंमयानंद से संपर्क करने की कोशिश की, तो उन्होंने अपना मोबाइल बंद कर लिया था। चिन्मयनांद को 20 सितंबर, 2019 को मामले में गिरफ्तार किया गया और जेल भेज दिया गया था।

बाद में मामले में जांच पूरी हो गई और उसके खिलाफ 4 नवंबर, 2019 को आईपीसी की धारा 376-सी के तहत एक आरोप पत्र दायर किया गया, जिसमें किसी व्यक्ति द्वारा किसी व्यक्ति की हैसियत का दुरुपयोग करने या छेड़खानी करने, लैंगिग संभोग करने और बलात्कार आदि का आरोप शामिल थे। दूसरी ओर, अधिवक्ता ओम सिंह ने 25 अगस्त, 2019 को कानून की छात्रा और उसके दोस्तों के खिलाफ उसी पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की थी, जिसमें आरोप लगाया था कि उन्होंने कथित तौर पर चिन्मयनाद से जबरन 5 करोड़ रुपये की मांग की थी। चिन्मयानंद द्वारा कानून की छात्रा और उसके दोस्तों के खिलाफ दायर किए गए मामले में चार्जशीट 4 नवंबर, 2019 को दायर की गई थी, जिसमें आईपीसी की धारा 385 के तहत उन्हें एक व्यक्ति को जबरन वसूली और आईटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। चिन्मयानंद पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली पीड़िता ने मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान भी दर्ज कराया था।

मुकरने वाले गवाह यानी होस्टाइल विटनेस का मतलब होता है अदालत के सामने अभियोजन की कहानी को सपोर्ट न करने वाला गवाह। अदालत में शपथ लेकर झूठ बोलने के मामले में दोषी पाए जाने पर सजा का प्रावधान है। गवाह की सहमति से पुलिस सीआरपीसी की धारा-161 के तहत उसका बयान दर्ज करती है। किसी गवाह के बारे में अगर पुलिस को शक होता है कि वह बाद में अपने बयान से मुकर सकता है तो उस गवाह का धारा-164 में मैजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज कराया जाता है। धारा-164 में बयान देने वाले का बाद में मुकरना आसान नहीं होता। ऐसे गवाहों के खिलाफ सीआरपीसी की धारा-340 के तहत अदालत शिकायत करती है। ऐसे गवाह के खिलाफ अदालत में झूठा बयान देने के मामले में आईपीसी की धारा-193 के तहत मुकदमा चलाया जाता है। इस मामले में दोषी पाए जाने पर अधिकतम 7 साल कैद की सजा का प्रावधान है।

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