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तबलीगी जमात मामला: सरकार और मीडिया के गाल पर तमाचा है दिल्ली की अदालत का फैसला

अब दिल्ली की भी एक अदालत ने कोरोना फैलाने के आरोपों का सामना कर रहे तबलीगी जमात के 36 विदेशी नागरिकों को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि आरोप लगाने वाली दिल्ली पुलिस कोई सबूत पेश नहीं कर सकी है और गवाहों के बयानों में भी काफी विरोधाभास है। इससे पहले बॉम्बे हाई कोर्ट और मद्रास हाई कोर्ट भी विदेशों से आए तबलीगी जमात के सदस्यों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को खारिज कर उन्हें बरी कर चुकी है। बिना किसी सबूत के तबलीगी जमात को कोरोना फैलाने के लिए जिम्मेदार ठहराने पर दोनों उच्च अदालतों ने पुलिस और मीडिया की खिंचाई की थी।

दिल्ली की अदालत का ताजा फैसला भी उसी मामले में आया है, जो इसी साल मार्च महीने में निजामुद्दीन इलाके में हुए तबलीगी जमात के कार्यक्रम से जुड़ा था। दिल्ली पुलिस ने तबलीगी जमात से जुड़े करीब 950 विदेशी नागरिकों के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया था। उनमें से अधिकतर कोर्ट में याचिका लगाकर और अनुमति लेकर अपने-अपने देश चले गए, लेकिन 44 दिल्ली में ही रुक कर मुकदमे का सामना कर रहे थे।

इन्हीं में से 8 को दिल्ली की साकेत अदालत ने अगस्त महीने में रिहा कर दिया था। बाक़ी के 36 को भी विदेशी अधिनियम की धारा 14 और आईपीसी की धारा 270 और 271 के तहत रिहा किया गया था, लेकिन वे महामारी अधिनियम, आपदा प्रबंधन अधिनियम और आईपीसी की अन्य धाराओं के तहत आरोपों का सामना कर रहे थे।

अदालत ने अपने फैसले में आरोपियों की पहचान में चूक के लिए शिकायतकर्ता हजरत निजामुद्दीन के पुलिस थाना प्रभारी और जांच अधिकारी की खिंचाई भी की। अदालत ने आरोपियों की इस दलील की संभावना को माना, ”संबंधित अवधि के दौरान उनमें से कोई भी तबलीगी जमात के मरकज केंद्र में मौजूद नहीं था और उन्हें अलग-अलग जगहों से उठाया गया. ताकि गृह मंत्रालय के निर्देश पर दुर्भावना से उन पर मुकदमा चलाया जा सके।’’

जाहिर है कि दिल्ली की अदालत के इस फैसले से भी केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस समेत उन तमाम लोगों के गाल पर एक बार फिर करारा तमाचा पड़ा है, जो योजनाबद्ध तरीके से तबलीगी जमात को और उसके बहाने मुस्लिम समुदाय को देश में कोरोना फैलाने के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे थे।

गौरतलब है कि मार्च के महीने में दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात के मरकज में एक कार्यक्रम हुआ था। उसमें देश-विदेश के करीब 9000 लोगों ने शिरकत की थी। कार्यक्रम खत्म होने पर बड़ी संख्या में आए भारतीय तो अपने-अपने राज्यों में लौट गए थे, लेकिन लॉकडाउन लागू हो जाने के कारण विदेशों से आए लोग मरकज में ही फंसे रह गए थे। वहां से निकले लोग जब देश के अलग-अलग राज्यों में पहुंचे तो वहां कोरोना संक्रमण बहुत तेजी से फैलना शुरू हो चुका था।

मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए हमेशा मौके की तलाश में रहने वाले लोगों ने महामारी के इस दौर को अपने अभियान के लिए माकूल अवसर माना और सोशल मीडिया के जरिए जमकर दुष्प्रचार किया कि तबलीगी जमात के लोगों की वजह से कोरोना का संक्रमण फैल रहा है। तबलीगी जमात के बहाने मुस्लिम समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने के अभियान को तेज करने में लगभग सभी टीवी चैनलों और अधिकांश अखबारों ने भी बढ़-चढ़कर अपनी भूमिका निभाई और ऐसी तस्वीर बना दी गई कि भारत में कोरोना संक्रमण फैलाने के तबलीगी जमात के लोग ही जिम्मेदार हैं।

‘अस्पताल में मौलानाओं ने बिरयानी मांगी’, ‘मौलानाओं ने अपने कपड़े उतारकर नर्सों को घूरा’, ‘मौलानाओं ने डॉक्टरों पर थूका’, ‘मौलानाओं ने नर्सों के सामने पेशाब किया’, ‘मौलाना अस्पताल से फरार’, ‘मौलाना ने अपना ब्लड सेंपल देने से इनकार किया’, ‘मौलाना ने नर्स का हाथ पकड़ा’…. मार्च महीने में लॉकडाउन शुरू होने के ठीक बाद से लेकर लगभग दो महीने तक तमाम टेलीविजन चैनलों पर सुबह से लेकर देर रात यही खबरें छाई हुई थीं, जिन्हें बदतमीज, कुपढ़ और हिंसक वृत्ति के रिपोर्टर और एंकर चीख-चीख कर दिखा रहे थे।

ज्यादातर अखबार भी अपने पाठकों को यही खबरें परोस रहे थे और यही खबरें सोशल मीडिया में भी वायरल हो रही थीं। रही सही कसर केंद्र सरकार के मंत्री, कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री, सत्तारूढ़ दल और पुलिस सहित तमाम सरकारी एजेंसियों के प्रवक्ता पूरी कर दे रहे थे। कुल मिलाकर सबकी कोशिश ऐसी तस्वीर बना देने की थी, मानो कोरोना एक समुदाय विशेष की ही बीमारी है और वही समुदाय इसे देश भर में फैला रहा है।

कोरोना महामारी की आड़ में मुसलमानों के खिलाफ जिस तरह सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर योजनाबद्ध तरीके से नफरत-अभियान और मीडिया ट्रायल चलाया जा रहा था, उसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। यूरोपीय देशों के मीडिया में भी भारत की घटनाएं खूब जगह पा रही थीं। सबसे पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस तरह का अभियान बंद करने की अपील की और कहा था कि इस महामारी को किसी भी धर्म, जाति या नस्ल से न जोड़ा जाए। बाद में खाड़ी के देशों ने भी भारतीय घटनाओं पर सख्त प्रतिक्रिया जताई थी। कुवैत और सऊदी अरब ने तो कोरोना महामारी फैलने के लिए मुस्लिम समुदाय को जिम्मेदार ठहराने और मुसलमानों को प्रताड़ित किए जाने की घटनाओं पर भारत सरकार को चेतावनी देने के अंदाज में चिंता जताई थी।

इन प्रतिक्रियाओं पर न सिर्फ भारतीय राजदूतों को सफाई देनी पड़ी थी, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी ट्वीट करके कहना पड़ा था कि कोरोना नस्ल, जाति, धर्म, रंग, भाषा आदि नहीं देखता, इसलिए एकता और भाईचारा बनाए रखने की जरूरत है। इससे पहले भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जेपी नड्डा को अपनी पार्टी के नेताओं से कहना पड़ा था कि वे कोरोना महामारी को लेकर सांप्रदायिक नफरत फैलाने वाले बयान देने से परहेज बरतें।

हालांकि प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष की ये अपीलें पूरी तरह बेअसर रही थीं, मगर इनसे इस बात की तसदीक तो हो ही गई थी कि देश में कोरोना महामारी का राजनीतिक स्तर पर सांप्रदायीकरण कर एक समुदाय विशेष को निशाना बनाया जा रहा है। यह सब करते और कराते हुए इस बात पर जरा भी विचार नहीं किया गया कि इसका खाड़ा के देशों में रह रहे भारतीयों के जीवन पर क्या प्रतिकूल असर हो सकता है।

हकीकत यह भी रही कि प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी के अध्यक्ष ने भले ही औपचारिक तौर कुछ भी कहा हो, मगर कोरोना को लेकर सांप्रदायिक राजनीति सरकार के स्तर पर भी हो रही थी और सत्तारूढ़ पार्टी तथा उसके सहयोगी संगठन भी अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए महामारी की इस चुनौती को एक अवसर के तौर पर इस्तेमाल कर रहे थे।

अगर ऐसा नहीं होता तो भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल कोरोना संक्रमण के शुरुआती दौर में रोजाना की प्रेस ब्रीफिंग में कोरोना मरीजों के आंकड़े संप्रदाय के आधार पर नहीं बताते। गुजरात में कोरोना मरीजों के इलाज के लिए हिंदू और मुसलमानों के लिए अलग-अलग वार्ड नहीं बनाए जाते। भाजपा कार्यकर्ता गली, मोहल्लों और कॉलोनियों में फल-सब्जी बेचने वाले मुसलमानों के बहिष्कार का अभियान नहीं चलाते। मुसलमानों को ‘कोरोना बम’ कह कर उनका मजाक नहीं उड़ाया जाता। पुलिस लॉकडाउन के दौरान सड़कों पर निकले लोगों के नाम पूछ कर पिटाई नहीं करती।

जरूरतमंद गरीबों को सरकार की ओर से बांटी जाने वाली राहत सामग्री, भोजन के पैकेट, गमछों और मास्क पर प्रधानमंत्री की तस्वीर और भाजपा का चुनाव चिह्न नहीं छपा होता। भाजपा का आईटी सेल अस्पतालों में भर्ती तबलीगी जमात के लोगों को बदनाम करने के लिए डॉक्टरों पर थूकने वाले फर्जी वीडियो और खबरें सोशल मीडिया में वायरल नहीं करता और खुद प्रधानमंत्री लॉकडाउन के दौरान लोगों से एकजुटता दिखाने के नाम पर थाली, घंटा, शंख आदि बजाने और दीया-मोमबत्ती जलाने जैसी धार्मिक प्रतीकों वाली अपील नहीं करते।

कोरोना महामारी की आड़ में एक समुदाय विशेष को निशाना बनाने और सत्तारूढ़ दल के पक्ष में अभियान चलाने के इस काम में मुख्यधारा के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भी इस में बढ़चढ़ कर शिरकत कर रहा था। तमाम टीवी चैनलों पर प्रायोजित रूप से तबलीगी जमात के बहाने पूरे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ मीडिया ट्रायल चलाया जा रहा था। यही नहीं, मीडिया को सांप्रदायिक नफरत फैलाने से रोकने के लिए जब एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई तो प्रधान न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने प्रेस की आजादी की दुहाई देते हुए उस याचिका को खारिज कर दिया।

अगर इस तरह के संगठित अभियान को लेकर ‘शक्तिशाली’ प्रधानमंत्री जरा भी चिंतित होते तो इतनी देरी से एक अपील जारी करने की खानापूरी करने के बजाय वे इस तरह का अभियान चलाने वालों को सख्त चेतावनी देते। कोरोना काल में प्रधानमंत्री मोदी ने अब तक छह बार टीवी पर राष्ट्र को संबोधित किया है, लेकिन किसी एक संबोधन में भी उन्होंने इस महामारी का सांप्रदायीकरण करने के अभियान पर न तो नाराजगी जताई, न ही अभियान चलाने वालों को कोई चेतावनी दी और न ही नफरत फैलाने वाली खबरें दिखाने और बहस कराने वाले टीवी चैनलों को नसीहत दी। नतीजा यह हुआ कि नफरत फैलाने का यह अभियान परवान चढ़ता गया।

सरकार द्वारा कोरोना संक्रमण की गंभीरता को नजरअंदाज करने और पूरा ध्यान इस महामारी की आड़ में एक समुदाय विशेष को बदनाम करने और उसके खिलाफ नफरत फैलाने में लगाने का ही यह नतीजा है कि जब हमारे पड़ोसी देशों में कोरोना संक्रमण को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया गया है, लेकिन भारत में अब भी रोजाना 20 से 30 हजार तक संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं।

हम कोरोना के संकट से आज नहीं तो कल उबर ही जाएंगे, मगर जिस तरह यह महामारी इतिहास के पन्नों में दर्ज होगी, उसी तरह यह भी दर्ज होगा कि दुनिया के तमाम दूसरे देशों ने जब अपनी पूरी ऊर्जा कोरोना की चुनौती से निबटने में लगा रखी थी, तब भारत में सरकार, उसके समर्थकों का एक बड़ा हिस्सा और मुख्यधारा का मीडिया अपनी पूरी क्षमता के साथ तबलीगी जमात के बहाने एक समुदाय के खिलाफ नफरत को हवा देने में जुटा हुआ था। पहले मद्रास और बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले और अब दिल्ली की अदालत का फैसला भी इसी बात की ओर इशारा करता है। कहा नहीं जा सकता है कि सरकार और मीडिया इस इशारे के कितनी गंभीरता से लेंगे।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on December 18, 2020 6:10 pm

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