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हाथरस कांड: मीडिया को बयान देने के चलते बर्खास्त दोनों एएमयू डॉक्टरों की हुई बहाली

जब मीडिया में खबर आई कि हाथरस कांड पर मीडिया को बयान देने वाले अलीगढ़ मेडिकल यूनिवर्सिटी के जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के दो टैंपरेरी कैजुअलिटी मेडिकल ऑफिसर (सीएमओ) अज़ीम मलिक और उबैद हक की नियुक्ति निरस्त कर दी गयी है तो अचानक बौद्धिक एवं विधिक क्षेत्रों में निष्कर्ष निकाला जाने लगा कि हाथरस कांड में  लीपापोती के लिए सीबीआई जांच हो रही है। ऐसा होता भी क्यों न क्योंकि सीबीआई ने जो तफ्‍तीश अभी तक की है उसकी मीडिया रिपोर्टिंग में यही पता चल रहा है कि आरोपियों की तुलना में पीड़िता के परिजनों से बहुत ज्यादा पूछताछ की गयी है। इसका एक ही निहितार्थ है कि हाथरस कांड पर पीड़ित परिवार का झूठ पकड़ने की कोशिश हो रही है। लेकिन शुक्रवार को अचानक ख़बर आई कि एएमयू प्रशासन ने जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में अस्थायी चिकित्साधिकारी के तौर पर काम कर रहे डॉक्टर मोहम्मद अज़ीमुद्दीन मलिक और डॉक्टर उबैद इम्तियाज़ हक़ की सेवाएं वापस बहाल कर दी है।

माना जा रहा था  कि उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में 19 वर्षीय युवती के साथ गैंगरेप और मौत के मामले में राज्य पुलिस के उलट बयान देने के कारण दोनों को हटाया गया था। वहीं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का कहना था कि इनकी नियुक्ति एक साल के लिए ही की गई थी और उन्हें कार्यकाल समाप्त होने के बाद हटाया गया। विश्वविद्यालय के प्रवक्ता उमर पीरजादा ने बताया, ‘अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा बुधवार को भेजे गए प्रस्ताव के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने दोनों डाक्टरों का कार्यकाल बढ़ाए जाने का निर्देश दिया है।’

मलिक ने अतिरिक्त महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) प्रशांत कुमार के बयान के उलट कहा था कि फॉरेंसिक रिपोर्ट के लिए 11 दिन बाद सैंपल लिए जाने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि इससे रेप होने की पुष्टि नहीं हो सकती है, जबकि सरकारी दिशानिर्देशों के मुताबिक, फॉरेंसिक रिपोर्ट में सही परिणाम आने के लिए घटना के 96 घंटे के भीतर सैंपल लिया जाना चाहिए। जबकि कुमार ने फॉरेंसिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा था कि चूंकि जांच के दौरान शरीर पर वीर्य नहीं पाया गया है, जो बताता है कि रेप नहीं हुआ था।

इसके बाद 16 अक्तूबर को डॉ. अजीम को एक पत्र मिला, जिसमें कहा गया था कि अस्पताल के अस्थायी सीएमओ बनाने के उनके कॉन्ट्रैक्ट को और आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रहे डॉ. अजीम को अगस्त में उस समय सीएमओ बनाया गया था, जब अस्पताल के 11 में से छह सीएमओ कोरोना संक्रमित पाए गए थे। उनकी नौकरी को नवंबर महीने तक के लिए बढ़ाया जाना था, लेकिन बीते 16 अक्तूबर को उन्हें नोटिस देकर कहा गया कि उनका कार्यकाल 10 अक्तूबर से लेकर 8 नवंबर तक बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूर नहीं किया गया है। इसके बाद 20 अक्तूबर को उन्हें उनके पद से तत्काल हटाने का नोटिस दिया गया।

उत्तर प्रदेश का हाथरस कांड इन दिनों लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। मंगलवार यानी 20 अक्तूबर को इस संबंध में दो और नए मामले सामने आए। एक ओर इस घटना पर फैक्ट फाइंडिंग टीम ने अपनी रिपोर्ट जारी कर उत्तर प्रदेश सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए। तो वहीं दूसरी ओर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के दो डॉक्टरों ने आरोप लगाया कि उन्हें हाथरस के मामले में मीडिया से बात करने की वजह से नौकरी से हटा दिया गया है। दोनों ही मामले यूपी सरकार और प्रशासन के निष्पक्ष जांच के दावे पर कई सवाल खड़े करते हैं।

हाथरस मामले पर नेशनल अलायंस ऑफ़ पीपुल्स मूवमेंट यानी एनएपीएम की ओर से मंगलवार, 20 अक्तूबर को एक फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट जारी की गई। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर, एक्टिविस्ट और लेखिका मणि माला, सुप्रीम कोर्ट के वकील एहतेशाम हाशमी और सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के संदीप पांडेय सहित नौ सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग टीम ने नौ अक्तूबर को गांव का दौरा कर, पीड़ित परिवार और उनके रिश्तेदारों से बातचीत की थी। फैक्ट फाइंडिंग टीम ने कहा कि हमने इस मामले में राज्य सरकार के उत्पीड़न, पुलिस और अस्पताल अधिकारियों की लापरवाही देखी है। यह मामला क्रूर तरीके से पितृसत्तात्मक व्यवस्था का उदाहरण है जिसमें जाति व्यवस्था कैसे महिलाओं को दबाती है ये दिखाई पड़ता है।

जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने कहा कि हाथरस की घटना पर हमारी रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष ये है कि इस अत्याचार की क़ानूनी प्रक्रिया चाहे वो जाँच की हो या अत्याचारी के ख़िलाफ़ कार्रवाई की, पूरे हेरफेर में राज्य शासन का समर्थन है। हाथरस मामले में फैक्ट फाइंडिंग टीम की इस रिपोर्ट ने कई पहलुओं को सामने रखा है। इसमें आरोप लगाया गया है कि राज्य ने सच को दबाने और मामले को हमेशा के लिए बंद करने की कोशिश की, लेकिन सिविल सोसाइटी और मीडिया के एक समूह ने जब मामले को उठाना और सच बाहर लाना शुरू किया तो चीज़ें बदलीं।

इस मामले में शुरुआत से ही सवालों के घेरे में रही उत्तर प्रदेश पुलिस को एक बार फिर कठघरे में खड़ा किया गया है। रिपोर्ट में यूपी पुलिस के काम करने के तरीक़े पर सवाल उठाया गया है और ये कहा गया है कि पुलिस का ये कहना कि हिंसा की आशंका को देखते हुए शव का दाह संस्कार देर रात में कर दिया गया, “इस बात पर कोई भरोसा नहीं करेगा, क्योंकि इससे पुलिस पीड़िता की सुरक्षा की अपनी ख़ुद की अक्षमता दिखाती है और ये भी बताती है कि वो ख़ुद कोई अप्रिय घटना रोकने में सक्षम नहीं है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on October 24, 2020 9:41 am

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