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बदले की भावना के साथ ही कुदरती न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है प्रो. साईबाबा की बर्खास्तगी: डूटा

दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (DUTA) ने राम लाल आंनद कॉलेज में सहायक प्रोफेसर रहे डॉ. जीएन साईबाबा को नौकरी से टर्मिनेट किये जाने के संदर्भ में दिल्ली विश्वविद्यालय के फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे मनमाना, प्रतिशोधपूर्ण और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ़ बताया है।

डूटा अध्यक्ष राजीब रे द्वारा दिल्ली यूनिवर्सिटी के कार्यवाहक वाइस चांसलर प्रो. पीसी जोशी को लिखे पत्र में कहा गया है कि “गढ़चिरौली सेशन कोर्ट के फैसले के खिलाफ़ 5 अप्रैल, 2017 को वो बाम्बे हाईकोर्ट के नागपुर बेंच में याचिका दायर की गई है और अभी भी सुनवाई की तारीख की प्रतीक्षा है। डॉ. साईबाबा की बीवी श्रीमती एएस वसंता ने डूटा (दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ) को यह कहते हुए एक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था कि इस बात की प्रबल संभावना है कि उच्च न्यायालय साईबाबा के खिलाफ़ आरोपों की अस्थिरता और सबूतों की प्रकृति को देखते हुए उन्हें बरी कर दे। DUTA ने कुलपति को भेजे अपने तत्कालीन अपील में इस अभ्यावेदन को संलग्न किया था, और इसकी एक प्रति 14.9.2017 को आरएलए स्टाफ एसोसिएशन द्वारा आरएलए के प्रिंसिपल को भी प्रस्तुत किया गया था।”

पत्र में डूटा ने आगे लिखा है कि “इस बीच, राम लाल आंनद कॉलेज की गवर्निंग बॉडी ने शासी निकाय के भीतर से ही एक चार सदस्यीय जांच कमेटी का गठन किया और, डॉ. साईबाबा की सेवाओं को समाप्त करने की दिशा में कार्यवाही शुरू कर दिया। जबकि 26.6.2019 को, उप रजिस्ट्रार एस.के. डोगरा ने राम लाल आनंद कॉलेज के शासी निकाय अध्यक्ष को पत्र संख्या CS-SDC / 149/2019/724 के माध्यम से लिखा था- “मैं आपको सूचित करने के लिए निर्देशित हूं कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के लीगल काउंसिल की सलाह के अनुसार कॉलेज से अनुरोध है कि वह शासी निकाय द्वारा लगायी जाने वाली सजा की मात्रा के लिए एक और कारण बताओ नोटिस आरोपित शिक्षक डॉ. जी.एन. साईंबाबा को भेजे। जिसके जवाब में जी एन साईबाबा की संगिनी श्रीमती वसंता द्वारा 28.11.2020 RLA कॉलेज को लिखे गए अंतिम पत्र में बताया गया था कि कोविड-19 लॉकडाउन के कारण डॉ. साईबाबा से जेल मिलने जाने को कड़ाई से प्रतिबंधित कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप और उनके अस्वस्थ होने के कारण से भी अंतिम कारण बताओ नोटिस के जवाब के बारे में डॉ साईबाबा से कोई निर्देश नहीं लिया जा सका।

डूटा ने राम लाल आनंद कॉलेज के शासी निकाय पर प्रतिशोधपूर्ण कार्रवाई का आरोप लगाते हुए कहा कि “इसके बाद 01.4.2021 को श्रीमती वसंता को एक ज्ञापन और एक पत्र मिला जो कि जीएन साईबाबा को संबोधित था। 31.3.2021 को राम लाल आनंद कॉलेज के प्रिंसिपल की ओर से भेजे गये इस पत्र में कहा गया कि 31.3.2021 से तत्काल प्रभाव से जीएन साईबाबा की सोवाओं को समाप्त कर दिया गया है।

डूटा ने टर्मिनेशन लेटर को ‘आघात’ बताते हुए कहा है कि “दिल्ली यूनिवर्सिटी के 26.6.2019 के निर्देश पर कॉलेज द्वारा भेजे गये कारण बताओ नोटिस के जवाब की प्रतीक्षा किये बिना ही उन्हें टर्मिनेट करने का फैसला लिया गया है। यदि विश्वविद्यालय ने शासी निकाय के निर्णय को मंजूरी दे दी है, तो यूनिवर्सिटी द्वारा जीएन साईबाबा को नया कारण बताओ नोटिस भेजने के यूनिवर्सिटी के अपने ही निर्देश के विपरीत है। जबकि डॉ साईबाबा को ताजा कारण बताओ नोटिस जारी होने के बाद, कॉलेज को प्रतिकूल कार्रवाई करने से पहले इस मामले में उनके जवाब के लिए इंतज़ार करना चाहिए था। लेकिन बिना उनके जवाब की प्रतीक्षा के उनकी सेवाएं समाप्त करने का निर्णय वो भी तब जब वो जेल की लॉकडाउन शर्तों और बेहद बीमार (कई गंभीर बीमारियों समेत वो खुद कोविड संक्रमण से जूझ रहे हैं) होने के चलते जवाब देने में असमर्थ हैं, मनमाना, प्रतिशोधपूर्ण और और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है।

डूटा ने कहा है कि डॉ. साईबाबा के खिलाफ़ मामला हाईकोर्ट में लंबित है और सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है, मामला उप-न्याय है, और मूल कार्यवाही जारी है, ऐसे में उसके खिलाफ़ मामला नहीं चल सकता। जब तक कि सभी अपीलीय अवसर अंतिम रूप से समाप्त न हो जायें। इसलिए डूटा उनके खिलाफ़ की गई कार्रवाई की समीक्षा करने और वापस लेने के लिए आपसे एक बार फिर से अनुरोध करता है। डूटा ने पत्र में कहा है कि डॉ. जीएन साईबाबा के खिलाफ़ की गई कार्रवाई वापस ली जाये और आगे कोई कार्रवाई तब तक नहीं की जाये जब तक उनकी अपील सुनी और तय नहीं हो जाती।

डूटा ने अपने पत्र में ये भी कहा है कि राम लाल आनंद कॉलेज के शासी निकाय द्वारा डॉ जीएन साईबाबा के खिलाफ़ इससे पहले कभी भी कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई का एक भी मामला नहीं आया है।

डूटा ने पत्र में आगे प्रोफेसर एसआर गिलानी के मामले का उदाहरण देते हुए कहा है कि “कृपया डॉ एसआर गिलानी, एसोसिएट प्रोफेसर के मामले में, जाकिर हुसैन कॉलेज (ई), दिल्ली विश्वविद्यालय, 2001 में संसद हमले में अभियुक्त मामले को देखें। संसद हमले में गिरफ्तारी के बाद डॉ. गिलानी को निलंबित कर दिया गया था। संसद हमले के मामले में सेशन कोर्ट से मौत की सजा पाने के बावजूद और हाईकोर्ट में ट्रायल के दौरान भी उन्हें टर्मिनेट नहीं किया गया। और मनानीय हाईकोर्ट द्वारा आरोप से बरी किये जाने के बाद उन्हें फिर से बहाल कर दिया गया था। इसी तरह, डॉ. जीएन साईबाबा के मामले में भी न्यायपालिका के अंतिम निर्णय का इंतजार करना चाहिए जबकि उनकी अपील माननीय उच्च न्यायालय में लंबित है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी ने साईबाबा को नौकरी से टर्मिनेट किया

इससे पहले 31 मार्च, 2021 को दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कॉलेज ने सहायक प्रोफेसर जीएन साईबाबा की सेवा तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी थी।

जीएन साईबाबा की संगिनी को भेजे राम लाल आनंद कॉलेज के प्रिंसिपल राकेश कुमार गुप्ता के हस्ताक्षर वाले पत्र में कहा गया है, “रामलाल आनंद कॉलेज के सहायक प्रोफेसर जीएन साईबाबा की सेवाएं 31 मार्च, 2021 की दोपहर से तत्काल प्रभाव से समाप्त की जाती हैं। उनके बैंक खाते में तीन महीने के वेतन का भुगतान कर दिया गया है।”

गौरतलब है कि अंग्रेजी के सहायक प्रोफेसर साईबाबा को साल 2014 में महाराष्ट्र पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद निलंबित कर दिया गया था। और गिरफ्तारी के बाद से उनकी पत्नी और बेटी को उनका आधा वेतन मिलता रहा था।

डॉ साईबाबा की संगिनी ए एस वसंता ने इस कदम को “भिन्न विचार वाले लोगों की आवाज दबाना” करार देते हुए आरोप लगाया है कि यह ‘कर्मचारी के अधिकारों का उल्लंघन’है और वह मामले को अदालत में ले जाएंगी।

एएस वसंता ने कहा है कि “सजा के खिलाफ़ हमारी अपील अब भी बांबे हाईकोर्ट में लंबित है, तो फिर वे इस तरह का निर्णय कैसे ले सकते हैं। एसएआर गिलानी (संसद हमला मामले में दोषी) इसके बेहतर उदाहरण हैं। उन्हें सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया, उनको कभी सेवा से नहीं हटाया गया। तो फिर साईबाबा की सेवा क्यों समाप्त की जा रही है? यह कर्मचारी के अधिकारों का उल्लंघन है।

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This post was last modified on April 7, 2021 8:44 pm

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