Sunday, March 3, 2024

जजों की नियुक्ति : सरकार के वार पर कॉलेजियम का पलटवार, रॉ और आईबी की रिपोर्ट सार्वजनिक की

मोदी सरकार द्वारा जजों की नियुक्ति को लेकर जिस तरह कानून मंत्री किरण रिजजू और एक संवैधानिक पद पर बैठे उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ ने न्यायपालिका पर पिछले कुछ महीनों से हल्लाबोल शुरू किया है, उससे सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जबर्दस्त पलटवार किया है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने पहली बार ऐतिहासिक कदम उठाया है और कॉलेजियम ने हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति में रॉ (रिसर्च एंड एनालसिस विंग) और आईबी रिपोर्ट को सार्वजनिक कर दिया है। इसके साथ ही केंद्र की आपत्तियों का खुलासा करते हुए इसका विस्‍तार से जवाब दिया है।

दरअसल, जजों की नियुक्ति को लेकर केंद्र और न्यायपालिका के टकराव के बीच सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने ये बड़ा और सख्त कदम उठाया है। केंद्र के रुख का जवाब देने के लिए चीफ जस्टिस की अगुवाई में कॉलेजियम ने तय किया कि इस बार सारे मामले को सार्वजनिक किया जाए। यहां तक कि कॉलेजियम की सिफारिशों में केंद्र की आपत्तियों, रॉ व आईबी की रिपोर्ट का भी हवाला दिया जाए । साथ ही ऐसे मामलों में कॉलेजियम की राय को भी सिफारिशों में शामिल किया जाए।

यह तो अभी बानगी है। विधि एवं न्यायिक क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि न्यायिक नियुक्तियों के प्रारंभिक दौर से सरकारी अडंगेबाजी की पूरी रिपोर्ट सर्वजनिक हो जाए तो सरकार की भारी भद्द पिटना तय है ।

एनडीटीवी ने खबर ब्रेक किया है कि सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों की पदोन्नति पर केंद्र के साथ अपने संचार को सार्वजनिक करने का अभूतपूर्व कदम चार दिनों के विचार-विमर्श के बाद लिया है। सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने न केवल कॉलेजियम के साथी न्यायाधीशों के साथ परामर्श किया था, जो न्यायाधीशों की नियुक्तियों पर निर्णय लेते थे, बल्कि उस न्यायाधीश से भी, जिनके भविष्य में चीफ जस्टिस बनने की उम्मीद है। जजों की नियुक्ति में बड़ी भूमिका निभाने की कोशिश कर रही सरकार की ओर से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।

गुरुवार को अपलोड किए गए तीन पत्रों में कोर्ट ने केंद्र और खुफिया एजेंसियों की आपत्तियों के कारणों और उस पर अपनी प्रतिक्रिया का खुलासा किया है।

पिछले चार दिनों में कई बैठकों में न्यायाधीशों ने पूरे मामले को जनता के सामने लाने का फैसला किया। यह भी निर्णय लिया गया कि कॉलेजियम वकीलों सौरभ कृपाल, सोमशेखर सुंदरेसन और आर जॉन सत्यन की पदोन्नति की फिर से सिफारिश करेगा।

बुधवार को पत्रों पर हस्ताक्षर करने वाले तीन न्यायाधीशों– चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस एसके कौल और केएम जोसेफ ने बैठक की। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर पत्रों को अपलोड करने से पहले सुबह एक अनुवर्ती बैठक आयोजित की गई।

तीन उम्मीदवारों को दिल्ली, बॉम्बे और मद्रास उच्च न्यायालयों में पदोन्नत करने की सिफारिश को नवंबर में केंद्र से खारिज कर दिया गया था। कॉलेजियम ने खुलासा किया कि सौरभ कृपाल के मामले में केंद्र की आपत्ति उनके यौन रुझान और उनके साथी की विदेशी नागरिकता को लेकर थी।

अन्य दो उम्मीदवारों- सोमशेखर सुंदरेसन और आर जॉन सत्यन को उनके सोशल मीडिया पोस्ट के कारण खारिज कर दिया गया था। उनमें से एक, सत्यन ने, अन्य बातों के अलावा, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करते हुए एक लेख साझा किया। दूसरे सोमशेखर सुंदरेसन ने नागरिकता संशोधन अधिनियम के बारे में विपरीत राय व्यक्त की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह पलटवार उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ की कड़ी टिप्पणी के एक हफ्ते बाद किया है, जो अब तक राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति अधिनियम को खत्म करने के बारे में मुखर रहे हैं।

इस बार धनखड़ ने केशवानंद भारती मामले पर सुप्रीम कोर्ट के 1973 के ऐतिहासिक फैसले और संविधान पर परिणामी बुनियादी संरचना सिद्धांत पर सवाल उठाया था। उन्होंने कहा था कि आज न्यायिक मंचों से यह एक-तरफ़ा और सार्वजनिक तेवर अच्छा नहीं है। इन संस्थानों को पता होना चाहिए कि खुद को कैसे संचालित करना है।

16 जनवरी को केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ को पत्र लिखकर कहा कि कॉलेजियम में सरकारी प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए। यह पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही को प्रभावित करेगा।

दरअसल न्यायिक नियुक्तियों के मुद्दे पर कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका की बहस तेज हो गई है, जहां सरकार बड़ी भूमिका के लिए जोर दे रही है। पिछले वर्षों में, सरकार ने उच्चतम न्यायालय द्वारा पदोन्नति के लिए चुने गए नामों पर बार-बार आपत्ति जताई है। नवंबर में, इसने 19 उम्मीदवारों के नाम वापस कर दिए- एक सूची जिसमें दिल्ली, बॉम्बे और मद्रास उच्च न्यायालयों के तीन वकील शामिल थे।

गौरतलब है जस्टिस एसके कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने अटॉर्नी जनरल से भी कहा था कि वे संवैधानिक अधिकारियों को कॉलेजियम प्रणाली पर बयान देने से बचने की सलाह दें।

चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ पिछले कुछ दिनों से कॉलेजियम की सिफारिशों को लेकर विचार कर रहे थे। हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति की सिफारिश और सौरभ कृपाल समेत अन्य वकीलों के नामों को दोहराने की सिफारिश का फैसला किया गया।

दरअसल कृपाल को नियुक्त करने का प्रस्ताव पांच साल से अधिक समय से लंबित है। 13 अक्टूबर 2017 को दिल्ली हाईकोर्ट के कॉलेजियम द्वारा सर्वसम्मति से सिफारिश की गई और 11 नवंबर 2021 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा मंजूरी दी गई थी। कॉलेजियम ने केंद्र द्वारा उनके सेक्सुअल ओरिएंटेशन के बारे में खुलेपन के आधार पर प्रस्ताव वापस भेजने पर असहमति जताई है। दरअसल केंद्र को आशंका थी कि समलैंगिक अधिकारों के लिए उनके “लगाव” को देखते हुए, कृपाल के पूर्वाग्रह की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए प्रस्ताव को पुनर्विचार के लिए वापस भेजा गया था।

हालांकि, 18 जनवरी के एक प्रस्ताव में कृपाल के नाम को दोहराते हुए, कॉलेजियम ने कहा है कि सौरभ अपने ओरिएंटेशन के बारे में खुले हैं। यह एक ऐसा मामला है जिसका उनको श्रेय को जाता है। न्यायपालिका के लिए एक संभावित उम्मीदवार के रूप में, वह अपने ओरिएंटेशन के बारे में गुप्त नहीं रहे हैं। संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त अधिकारों को ध्यान में रखते हुए उस आधार पर उनकी उम्मीदवारी को खारिज करना सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित संवैधानिक सिद्धांतों के स्पष्ट रूप से विपरीत होगा। कृपाल के पास योग्यता, सत्यनिष्ठा और बुद्धिमता है। उनकी नियुक्ति दिल्ली हाईकोर्ट में समावेश और विविधता प्रदान करेगी। उनका आचरण और व्यवहार विवाद से परे रहा है।

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में एडवोकेट सोमशेखर सुंदरेसन को नियुक्त करने के लिए केंद्र को पिछले साल की अपनी सिफारिश को दोहराया है। कॉलेजियम ने इस सिफारिश में कहा है कि सोशल मीडिया पर उनके विचारों का उपयोग यह अनुमान लगाने के लिए नहीं किया जा सकता है कि वह अत्यधिक पक्षपाती विचार वाले व्यक्ति हैं।

कॉलेजियम ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत सभी नागरिकों को भाषण और अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार है। एक उम्मीदवार द्वारा विचारों की अभिव्यक्ति उसे तब तक एक संवैधानिक पद धारण करने से वंचित नहीं करती है, जब तक कि न्यायाधीश पद के लिए प्रस्तावित व्यक्ति सक्षमता, योग्यता और सत्यनिष्ठा वाला व्यक्ति है।

बॉम्बे हाईकोर्ट के कॉलेजियम ने 04 अक्टूबर 2021 को एडवोकेट सोमशेखर सुंदरेसन के नाम की सिफारिश की थी। 16 फरवरी 2022 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए सोमशेखर सुंदरेसन के नाम की सिफारिश की। 25 नवंबर, 2022 को सरकार ने उक्त सिफारिश पर पुनर्विचार की मांग की। केंद्र की आपत्ति यह थी कि उन्होंने कई मामलों पर सोशल मीडिया में अपने विचार प्रसारित किए हैं जो अदालतों के विचाराधीन विषय हैं।

एडवोकेट सोमशेखर सुंदरेसन के नाम को दोहराते हुए कॉलेजियम ने कहा, “जिस तरह से उम्मीदवार ने अपने विचार व्यक्त किए हैं, वह इस अनुमान को सही नहीं ठहराता है कि वह अत्यधिक पक्षपाती विचारों वाला व्यक्ति” हैं या वह सरकार की महत्वपूर्ण नीतियों, पहलों और निर्देशों पर सोशल मीडिया पर चुनिंदा रूप से आलोचनात्मक रहे हैं। जैसा कि न्याय विभाग की आपत्तियों में संकेत दिया गया है और न ही यह इंगित करने के लिए कोई सामग्री है कि उम्मीदवार द्वारा उपयोग किए गए भाव किसी भी राजनीतिक दल के साथ मजबूत वैचारिक झुकाव के साथ उनके संबंधों का संकेत देते हैं।

इसमें कहा गया है कि एडवोकेट सुंदरेसन ने वाणिज्यिक कानून में विशेषज्ञता हासिल की है और यह बॉम्बे हाईकोर्ट के लिए एक संपत्ति होगी, जिसमें अन्य शाखाओं के अलावा वाणिज्यिक और प्रतिभूति कानूनों के मामले बड़ी संख्या में हैं।

न्याय विभाग ने सेकेंड जजेस केस [(1993) 4 एससीसी 441] के पैराग्राफ 175 का इस आशय से उल्लेख किया कि चुने जाने वाले उम्मीदवार में उच्च सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, कौशल, भावनात्मक स्थिरता, दृढ़ता, कानूनी सुदृढ़ता, क्षमता और धीरज और शांति का उच्च क्रम होना चाहिए। उम्मीदवार इन गुणों को पूरा करता है। इसलिए कॉलेजियम बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में मिस्टर सोमशेखर सुंदरेसन की नियुक्ति के लिए 16 फरवरी 2022 की अपनी सिफारिश को दोहराने का प्रस्ताव करता है।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा न्यायिक नियुक्तियों में हस्तक्षेप शुरू करने तक संविधान की स्थापना के समय से ही कार्यपालिका ने न्यायाधीशों की नियुक्तियों में न्यायपालिका की प्रधानता का हमेशा सम्मान किया है।

1993 में, दूसरे न्यायाधीशों के मामले में सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने स्पष्ट रूप से माना कि वरिष्ठ न्यायाधीशों के विचारों के आधार पर एक परामर्श प्रक्रिया के माध्यम से गठित सीजेआई की राय, प्रधानता रखती है, और ना ही सर्वोच्च न्यायालय या किसी भी उच्च न्यायालय में किसी भी न्यायाधीश की नियुक्ति तब तक की जा सकती है जब तक कि वह भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय के अनुरूप न हो।

इस व्याख्या के पीछे कारण यह था कि मुख्य न्यायाधीश एक उम्मीदवार के मूल्य को जानने और उसका आकलन करने के लिए और एक वरिष्ठ न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए उनकी उपयुक्तता को जानने के लिए सबसे बेहतर है। किसी न्यायाधीश की प्रारंभिक नियुक्ति के चरण में भी राजनीतिक प्रभाव को समाप्त करना भी आवश्यक था।

उच्चतम न्यायालय के मामले में नियुक्ति के प्रस्ताव की पहल भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा की जानी चाहिए, और उच्च न्यायालय के मामले में उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा की जानी चाहिए। न्यायाधीशों के मामलों में निर्धारित कानून कहीं भी एक खोज-सह-मूल्यांकन समिति की भूमिका की परिकल्पना नहीं करता है, वह भी उस पर एक सरकारी नामित व्यक्ति के साथ।

विशेष रूप से, 1998 में तीसरे न्यायाधीशों का मामला संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को दिए गए एक राष्ट्रपति के संदर्भ से उत्पन्न हुआ। अटार्नी जनरल ने अदालत को आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार दूसरे न्यायाधीशों के मामले में फैसले की समीक्षा या पुनर्विचार की मांग नहीं कर रही है, और वह संदर्भ में निर्धारित प्रश्नों के लिए अदालत के जवाबों को स्वीकार करेगी और उन्हें बाध्यकारी मानेगी।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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