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अर्णब की जमानत संबंधी फैसला बन गया है सुप्रीम कोर्ट के गले की हड्डी

उच्चतम न्यायालय में पर्सनल लिबर्टी सर्वोपरि के नाम पर अर्णब गोस्वामी के अंतरिम जमानत का मामला नजीर बन गया है और अन्य मामलों में इसके उल्लेख पर पीठ को माकूल जवाब नहीं सूझ रहा। जहां केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन की गिरफ़्तारी मामले में उच्चतम न्यायालय हर सुनवाई में याचिकाकर्ता के वकील सिब्बल से पूछता है कि वो इस मामले में हाईकोर्ट क्यों नहीं जाते? वहीं सिब्बल का जवाब होता है कि गोस्वामी की याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने फैसला किया था, जबकि निचली अदालत के समक्ष उनकी जमानत याचिका लंबित थी। अब इसे अगले सप्ताह सुना जाएगा।

बुधवार को सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय एक बार फिर याचिकाकर्ता के वकील सिब्बल से पूछा कि वो इस मामले में हाईकोर्ट क्यों नहीं जाते? चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने सिब्बल से कहा, ‘क्या आप हमें कोई मिसाल दिखा सकते हैं, जहां एक एसोसिएशन ने राहत की मांग करते हुए अदालत का रुख किया था। कपिल सिब्बल ने कहा कि अर्णब गोस्वामी का मामला उच्चतम न्यायालय  ने तय किया जबकि निचली अदालत में उनकी जमानत याचिका लंबित थी। इस पर चीफ जस्टिस बोबडे ने जवाब दिया कि हर मामला अलग है । जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यन भी इस पीठ में शामिल थे।

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि वह केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन को हिरासत से रिहा करने के मामले में अर्णब गोस्वामी के फैसले पर भरोसा करेंगे। सिब्बल ने कहा कि रिपब्लिक टीवी के एंकर गोस्वामी को तब भी उच्चतम न्यायालय ने राहत दी थी, जब उनकी जमानत की अर्जी सेशंस कोर्ट में लंबित थी। सिब्बल ने कहा कि अर्णब गोस्वामी के मामले में, जमानत की अर्जी लंबित होने पर आपने हस्तक्षेप किया है। मैं उस पर भरोसा करूंगा। सिब्बल महाराष्ट्र पुलिस द्वारा दर्ज आत्महत्या के मामले में अर्णब गोस्वामी को जमानत देने के लिए जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की पीठ द्वारा दिए गए हालिया आदेश का उल्लेख कर रहे थे। 26 नवंबर को गोस्वामी की रिहाई के आदेश देने के कारणों को देखते हुए पीठ ने जोर देकर कहा कि न्यायालय नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए बाध्य हैं।

पीठ केरल यूनियन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (केयूडब्ल्यूजे) द्वारा उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा पत्रकार सिद्दीक कप्पन की हिरासत को चुनौती देने के लिए दायर हेबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उत्तर प्रदेश सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एक हलफनामा दाखिल करने के लिए स्थगन की मांग की। उन्होंने यह भी कहा कि कप्पन की जांच में “चौंकाने वाला” विवरण सामने आया है। सिब्बल ने स्थगन के लिए प्रार्थना का विरोध करते हुए कहा कि इस मामले में पर्सनल लिबर्टी का सवाल है।

केयूडब्ल्यूजे ने उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा पत्रकार सिद्दीक कप्पन की कथित अवैध गिरफ्तारी पर उच्चतम न्यायालय के एक सेवानिवृत्त जज से एक स्वतंत्र जांच की मांग की है। उच्चतम न्यायालय में दाखिल जवाबी हलफनामे में यूपी सरकार के दावों पर सवाल उठाए। यूनियन ने कहा है कि कप्पन की रिहाई की मांग करने वाली याचिका के जवाब में यूपी सरकार द्वारा दी गई दलीलें झूठी और तुच्छ हैं। हलफनामे में कहा गया है कि 56 दिनों तक सिद्दीक को हिरासत में रखना गैरकानूनी है। साथ ही इसमें पुलिस द्वारा उसे हिरासत में यातना देने का भी आरोप लगाया गया है।

दिल्ली के एक पत्रकार, कप्पन, जो मलयालम समाचार पोर्टल ‘एझिमुखम’ के लिए रिपोर्टिंग करते हैं और केयूडब्ल्यूजे  की दिल्ली इकाई के सचिव भी हैं को 19 वर्षीय दलित लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या के मामले को कवर करने के लिए हाथरस जाते समय मथुरा, उत्तर प्रदेश में तीन अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार किया गया था। बाद में उन्हें गैरकानूनी गतिविधियों (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के प्रावधानों के तहत आरोपित किया गया और उन पर राजद्रोह के आरोप भी लगाए गए।

केयूडब्ल्यूजे द्वारा यह भी दावा किया गया कि कप्पन को 5 अक्तूबर और 6 अक्तूबर को नींद और दवाओं से वंचित किया गया था, हालांकि वह मधुमेह और दवा पर है। कप्पन की पिटाई की गई, उसे जेल अधिकारियों ने घसीटा और “मानसिक यातना” के अधीन कर दिया।

उत्तर प्रदेश सरकार ने यह भी कहा था कि कप्पन ने स्पेशल टास्क फोर्स को गुमराह किया था जब उसे दिल्ली लाया गया था। उन्होंने जांच में सहायता नहीं की और भ्रामक विवरण दिया। उनके फ्लैट के साथी जो पीएफआई के सदस्य हैं और इसके विभिन्न पक्षों ने पहुंच से इनकार कर दिया है। उत्तर प्रदेश सरकार के हलफनामे में कहा गया है कि आखिरकार, तलाशी वारंटों से लैस होकर, जब पुलिस द्वारा परिसर की तलाशी ली गई, तब और भी खतरनाक सामग्री बरामद की गई, जो कि जांच का विषय है।

राज्य सरकार ने यह भी कहा था कि कप्पन को चार अन्य लोगों के साथ 5 अक्तूबर को गिरफ्तार किया गया था। पत्रकार और तीन अन्य लोगों द्वारा दायर जमानत अर्जियों को एक सक्षम अदालत ने विस्तृत कारणों से खारिज कर दिया था।

(जनचौक ब्यूरो की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on December 3, 2020 3:30 pm

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